अथ श्री बार्बर कथा
अभी हाल में ही मैं अपने घर पर अपने बाल कटवा रहा था तो मिस्टर बार्बर से हमेशा की भांति बातचीत भी हो रही थी और इस संवाद में मेरी ज्यादा भुइमिका श्रोता की ही रहती है। वह मुझे बता रहा था कि आजकल शहर के और देश के क्या हालात हैं, सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक विषयों पर आजकल लोगों की क्या सोच है और क्या विचार हैं। उससे बात करते हुए मैं सोच रहा था कि ऐसे पेशों के लोग जिनका रोज ही समाज के विविध किस्म के लोगों से मिलना-जुलना होता दरअसल समाज के सच्चे आईने होते हैं जैसे चौराहे के चाय वाले, पान की दुकान वाले, हेयर कटिंग सैलून वाले आदि। यही विचार करते मुझको अपने बचपन से अब तक के न जाने कितने बार्बर याद आने लगे जिनसे जुड़ी घटनाओं की यादें आपके साथ यहाँ शेयर कर रहा हूँ क्योंकि आपके सभी के भी इस किस्म के बहुत से अनुभव होंगे। हम लोग अधिकांशतः फिरोजाबाद में अपने घर पर ही बाल कटवाते रहे हैं न कि किसी दुकान पर जाकर।मुझको बचपन की याद आयी कि हमारे बाबा ने अपनी जायदाद में कुछ लोगों को रहने को स्थान दिया हुआ था उनमें एक बलबीर नाई भी हुआ करते थे। बाहर मेन रोड की तरफ एक ओर बलबीर की कुर्सी आदि के साथ दुकान चलती...