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चूल्हे-चौके से होम डिलीवरी तक:- हमारी मान्यताएँ, परम्पराएँ, धर्म और जीवन

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हमारी मान्यताएँ, परम्पराएँ, धर्म और जीवन पहली कड़ी : चूल्हे-चौके से होम डिलीवरी तक मुझे अपने बचपन की दो तस्वीरें आज भी याद हैं। एक हमारे घर की रसोई की, जहाँ पहले मेरी दादी खाना बनाती थीं, फिर मेरी माँ ने यह जिम्मेदारी सँभाली और धीरे-धीरे समय बदला तो खाना बनाने के लिए एक रसोइया भी आने लगी। लेकिन एक बात हमेशा बनी रही, साफ-सफाई का विशेष ध्यान। दूसरी तस्वीर कुछ अलग है। उन दिनों शादी-ब्याह और दूसरी दावतों के समाप्त होने के बाद जो खाना बच जाता था, उसे फेंक दिया जाता था। मैंने अपनी आँखों से देखा है कि कुछ अत्यन्त विपन्न लोग उस फेंके हुए खाने में से खाने योग्य चीजें बीनकर अपने साथ ले जाते थे। कभी उसी भोजन में कोई जानवर भी मुँह मारता हुआ या मुँह मारने की कोशिश करता दिखाई दे जाता था। यह दृश्य बड़ा ही हृदयविदारक होता था। लेकिन उस समय के समाज में ऐसी घटनाएँ एक तरह से सामान्य और स्वीकार्य-सी हो गई थीं। शायद इसलिए भी कि अभाव और विवशता के सामने बहुत-सी सामाजिक मान्यताएँ अर्थहीन हो जाती हैं। जिन लोगों के सामने पेट भरने का प्रश्न हो, उनके लिए भोजन कहाँ से आया, किसने बनाया या किस स्थिति में पड़ा था, ये ...

मैं 65 वर्ष का हो गया

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कल मैं 65 साल का हो गया।  सबसे पहले इस अवसर पर आप सभी से मिली ढेर सारी शुभकामनाओं, स्नेह और आशीर्वाद के लिए हृदय से बहुत-बहुत आभार। आपका यह अपनापन मेरे लिए बहुत मायने रखता है। पिछले कुछ दिनों से सोच रहा था कि आखिर 65 साल का हो जाने में ऐसी क्या खास बात है? फिर लगा कि खास बात शायद उम्र का यह आँकड़ा नहीं, बल्कि जिंदगी के इतने साल जीने का अवसर मिलना है। भगवान ने इस उम्र तक पहुँचाया, इसके लिए उसका धन्यवाद तो देना ही चाहिए। वैसे तो न जाने कितने लोग 75, 85 और 95 साल के भी होते हैं, लेकिन न जाने कितने ऐसे भी थे जो 65 साल की उम्र तक नहीं पहुँच सके। इसलिए अब इस उम्र का महत्व कुछ अलग ही महसूस हो रहा है। जब हम छोटे थे तो पापा-मम्मी के साथ आगरा घूमने और फिल्म देखने जाया करते थे। आगरा जाते समय अपने बाबा से कहते कि बाबा, आगरा जा रहे हैं, सिनेमा देखकर लौटेंगे। तो हमारे बाबा कहते, "तुम आगरा जाकर सिनेमा देखोगे और हम यहीं बैठे-बैठे अपनी आँखें मूँदते हैं तो आँखों में सिनेमा की रील-सी चल जाती है।" बाबा की उम्र उस समय 80-82 साल रही होगी और मेरी 11-12 साल। उनकी बात का मर्म उस समय ठीक से समझ में नह...

लोकसेवक — 1 जज साहब सुरेश चंद्र चतुर्वेदी

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​ लोकसेवक — 1 जज साहब सुरेश चंद्र चतुर्वेदी लोकसेवक कौन है? क्या केवल कोई सरकारी अधिकारी? कोई न्यायाधीश? कोई मंत्री या शासक? या फिर हर वह व्यक्ति जिसे किसी समय समाज, राज्य या व्यवस्था ने कोई सार्वजनिक जिम्मेदारी सौंपी और जिसके फैसलों का असर दूसरे लोगों के जीवन पर पड़ा? इतिहास में सत्ता की चर्चा बहुत होती है, लेकिन सत्ता और समाज के बीच खड़े उन लोगों की चर्चा शायद उतनी नहीं होती जिन्हें किसी न किसी रूप में लोकसेवा की जिम्मेदारी मिली। इनमें राजा भी रहे, मंत्री भी, न्यायाधीश भी, प्रशासक भी, पुलिस अधिकारी भी, सेनापति भी, अर्थशास्त्री और समाज सुधारक भी और बहुत से ऐसे लोग भी जिन्हें शायद इतिहास ने उतनी जगह नहीं दी जितनी मिलनी चाहिए थी। अलग-अलग कालखंड। अलग-अलग क्षेत्र। अलग-अलग देश और भौगोलिक परिस्थितियाँ। अलग-अलग व्यवस्थाएँ और अलग-अलग तरह की लोकसेवा। और जाहिर है, सभी लोकसेवक आदर्श नहीं रहे। किसी ने अपने पद की मर्यादा बढ़ाई तो किसी ने उसे विवादों में डाला। किसी ने सत्ता के सामने खड़े होकर अपने दायित्व को निभाया तो किसी पर सत्ता के सामने झुकने के आरोप लगे। किसी के फैसले आज भी मिसाल के रूप में या...

University of Allahabad 139th Foundation Day 23 September 2026

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​ आज 23 सितम्बर 2026 को इलाहाबाद विश्वविद्यालय के स्थापना दिवस पर इस पावन संस्था से जुड़े रहे और जुड़े हुए सभी लोगों को बहुत बहुत बधाई। आज फिर से मैं ये पोस्ट इसलिए लिख रहा हूँ क्योंकि शिक्षा के इस पावन संस्थान से मेरा और मेरे परिवार का आरंभ से ही संपर्क रहा है। हमारे परिवार का संपर्क इस विश्वविद्यालय से बहुत पुराना यानी कि कई पीढ़ियों पुराना है।मेरे बाबा के चाचा  दीवान बहादुर स्व0 जानकी प्रसाद जी चतुर्वेदी ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से B.A. द्वितीय श्रेणी सन 1893 में M.A (English) प्रथम श्रेणी में और दूसरी पोजीशन के साथ सन 1895 में और फिर LLB भी प्रथम श्रेणी में सन 1896 में पास किया था।उस जमाने में एंट्रेंस और इंटर की परीक्षाएं भी इलाहाबाद विश्वविद्यालय कराता था और स्व0 जानकी प्रसाद जी ने आगरा कालेज,आगरा से इलाहाबाद विश्वविद्यालय की ये परीक्षा पास की थीं अर्थात सन 1889 से हमारे परिवार का इस गौरवशाली विद्या के मंदिर से लगातार संपर्क बना रहा और ये हम लोगों के लिए बड़े गौरव और गर्व की बात है। उनके बाद मेरे पितामह स्व0 सुशील चंद्र जी चतुर्वेदी ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से B.Sc. और LLB ...

ज़िंदगी मेरी?-9 3-बैंक रोड, मिन्नम की तकलीफ और स्कूल का टूर

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​ ज़िंदगी मेरी?-9 3-बैंक रोड, मिन्नम की तकलीफ और स्कूल का टूर #AtulChaturvediKeKisse #ZindagiMeri #BharatBharatiTales #HostelDiaries जाड़ों की छुट्टियाँ समाप्त हो गयीं और सन 1973 की जनवरी में हम लोग एक बार फिर से वापिस हॉस्टल आ गए थे। घर से वापिस आते में उदास होना, रोना-धोना अनिवार्य था तो वह सब इस बार भी होना ही था और हुआ भी। स्कूल में मेरी गिनती अब एक सिन्सियर और पढ़ाई में सर्वश्रेष्ठ तो नहीं लेकिन बेहतर बच्चों में की जाने लगी थी। खेलों में मैं कभी भी अच्छा नहीं था लेकिन हॉस्टल में रहने का यह लाभ अवश्य हुआ कि मैं लगभग सारे खेल, जो स्कूल में होते थे, वह खेलना सीख गया था, फिर चाहे वह क्रिकेट हो, फुटबॉल हो या खो-खो। इसी बीच एक बार मुझको बीमार होने जैसी कुछ तकलीफ हुई जिसकी सूचना मैं अपने घर वालों तक पहुँचाना चाहता था पर यह हो कैसे? पत्र में लिखने पर वासुदेव उच्चानी का किस्सा याद आता था और बहन जी द्वारा प्रताड़ित होने का भय, लेकिन मन भी था कि मानता नहीं था। कई दिन सोचने के बाद एक तरकीब निकल ही आयी। मुझको याद आया कि बचपन में मेरे घर पर मेरा निकनेम ‘मिन्नम’ हुआ करता था। बस फिर क्या था, म...

ज़िंदगी मेरी?-8 पूरब पश्चिम तथा हॉस्टल की तेल की शीशी वाला किस्सा

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​ ज़िंदगी मेरी?-8 पूरब पश्चिम तथा हॉस्टल की तेल की शीशी वाला किस्सा #AtulChaturvediKeKisse #ZindagiMeri #BharatBharatiTales #HostelDiaries भारत भारती में हम लोगों को समय कब कट जाता है पता ही नहीं चलता था क्योंकि पूरे दिन की दिनचर्या नियमित और काफी कसी हुयी थी। हेस्टिन्गस रोड पर चौराहे पर ही ठीक भारत भारती के गेट के सामने एक नया मकान बन रहा था जो हम लोगों के देखते-देखते बना लेकिन उसने हमारा ध्यान आकर्षित किया जब वो पूरा बन गया और उसकी वजह थी उसका नाम। तब समझ में आया कि लोग मकानों के भी नाम रखते हैं और बाद में ध्यान भी गया कि इलाहाबाद में बैंक रोड पर मौसाजी के मकान का नाम था “पुरषोत्तम निवास” और उनके सामने प्रोफेसर जे. एस. माथुर साहब रहते थे, उनके मकान का नाम था “मातृ अञ्चल”। तो भारत भारती के सामने जो भव्य मकान बना उसका नाम उस पर सामने शायद पहली मंजिल के बॉर्डर पर बहुत बड़ा, जो दूर से पढ़ने में आता था, लिखा था, “पूरब पश्चिम”। सन 1970 में प्रसिद्ध फिल्म अभिनेता और निर्देशक मनोज कुमार की एक फिल्म आयी थी “पूरब पश्चिम” जो बहुत हिट फिल्म थी और मनोज कुमार अपनी ज्यादातर फिल्में देश प्रेम, राष्ट...

ज़िंदगी मेरी?-7 मालवीय जी की कोठी,गंगा किनारा और बेडू पाको बारो मासा

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​ ज़िंदगी मेरी?-7 मालवीय जी की कोठी,गंगा किनारा और बेडू पाको बारो मासा #AtulChaturvediKeKisse #ZindagiMeri #BharatBharatiTales #HostelDiaries जाड़ों की छुट्टियाँ हुईं तो सब लोग घर गये। घर पर तो समय अच्छा और शानदार बीतता ही था किन्तु समस्या यह रही कि हमेशा ऐसा लगा कि घर रहने की छुट्टियाँ बहुत जल्दी ही बीत जाती थीं और हॉस्टल आने पर घर की मधुर स्मृतियाँ मन के तार झंकृत करती रहती थीं। शायद स्मृतियों का यही स्वभाव है—वे समय के साथ धुंधली नहीं होतीं, बल्कि जीवन के अलग-अलग पड़ावों पर नए अर्थ लेकर लौटती रहती हैं। लेकिन आपको एक बात बताता हूँ कि आज जब मैं पीछे मुड़ कर देखता हूँ तो यह भी लगता है कि ज़िंदगी का इतना सारा समय भी मानो पलक झपकते ही बीत गया है और अब तक की बितायी ज़िंदगी की मधुर स्मृतियाँ उसी भाँति मन के तार झंकृत करती रहती हैं और जैसे किसी म्यूज़िक कंसर्ट में एक के बाद एक संगीत की स्वर लहरियाँ उठती जाती हैं, गीत गाए जाते हैं और आप आनंद लेते हैं, वैसे ही ज़िंदगी भी एक किस्म का म्यूज़िक कंसर्ट ही तो है जिसमें अनेक यादों की स्वर लहरियाँ हैं, कभी उतार तो कभी चढ़ाव हैं और स्थिरता भी है और प...