ज़िंदगी मेरी?-9 3-बैंक रोड, मिन्नम की तकलीफ और स्कूल का टूर
ज़िंदगी मेरी?-9 3-बैंक रोड, मिन्नम की तकलीफ और स्कूल का टूर #AtulChaturvediKeKisse #ZindagiMeri #BharatBharatiTales #HostelDiaries जाड़ों की छुट्टियाँ समाप्त हो गयीं और सन 1973 की जनवरी में हम लोग एक बार फिर से वापिस हॉस्टल आ गए थे। घर से वापिस आते में उदास होना, रोना-धोना अनिवार्य था तो वह सब इस बार भी होना ही था और हुआ भी। स्कूल में मेरी गिनती अब एक सिन्सियर और पढ़ाई में सर्वश्रेष्ठ तो नहीं लेकिन बेहतर बच्चों में की जाने लगी थी। खेलों में मैं कभी भी अच्छा नहीं था लेकिन हॉस्टल में रहने का यह लाभ अवश्य हुआ कि मैं लगभग सारे खेल, जो स्कूल में होते थे, वह खेलना सीख गया था, फिर चाहे वह क्रिकेट हो, फुटबॉल हो या खो-खो। इसी बीच एक बार मुझको बीमार होने जैसी कुछ तकलीफ हुई जिसकी सूचना मैं अपने घर वालों तक पहुँचाना चाहता था पर यह हो कैसे? पत्र में लिखने पर वासुदेव उच्चानी का किस्सा याद आता था और बहन जी द्वारा प्रताड़ित होने का भय, लेकिन मन भी था कि मानता नहीं था। कई दिन सोचने के बाद एक तरकीब निकल ही आयी। मुझको याद आया कि बचपन में मेरे घर पर मेरा निकनेम ‘मिन्नम’ हुआ करता था। बस फिर क्या था, म...