हमारी मान्यताएँ, परम्पराएँ, धर्म और जीवन-2 यज्ञोपवीत-इतिहास,परंपरा और अब
हमारी मान्यताएँ, परम्पराएँ, धर्म और जीवन-2 यज्ञोपवीत-इतिहास,परंपरा और अब आज मैं घर के कुछ पुराने फ़ोटो ऐल्बम देख रहा था तो उनमें मेरे और मेरे छोटे भाई अभिनव “गुड्डू” के यज्ञोपवीत संस्कार अथवा जनेऊ के कार्यक्रम का ऐल्बम देखा और पुरानी यादें ताजा हो गयीं। हमारे बाबा स्वर्गीय सुशील चंद्र चतुर्वेदी जी ने 1910 के दशक में B.Sc., LL.B. आदि की पढ़ाई की थी और वो साइंटिफिक टैंपर वाले व्यक्ति थे। किन्तु साथ ही साथ धार्मिक परम्पराओं में भी उनकी रुचि थी, लेकिन न अंधविश्वास था और न ज्यादा कर्मकांड। यद्यपि हमारी दादी स्वर्गीय कृष्णा चतुर्वेदी जी का धार्मिक, पौराणिक पूजा-पाठ और कर्मकांडों आदि में काफी रुझान था। हमारे बाबा का बहुत मन था कि हम लोगों का जनेऊ हो जाए। उन्होंने हमसे कहा कि हम चाहते हैं कि तुम लोगों का जनेऊ हो जाए लेकिन दो बातें हैं। एक तो तुमको उसके संस्कार के दौरान बाल मुँड़वाकर गंजा होना पड़ेगा, दूसरे जनेऊ पहनना और उसके नियमों का पालन करना पड़ेगा। हम लोग उसके लिए तैयार हुए और बड़े उत्साह से मार्च 1977 में 28 और 29 तारीख को हम दोनों भाइयों के यज्ञोपवीत का संस्कार हुआ और हमारे कान में विध...