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My close encounter with Death

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​ My Close Encounter with DEATH यह अभी इसी  20 दिसंबर की सुबह की बात है।  19 तारीख को शाम को मैं अपनी पत्नी और बेटी के साथ दिल्ली से लौटा था और जैसा कि अक्सर होता था मैं स्वयं ही कार चला कर आया था। दिल्ली से आते में एक्सप्रेसवे के दूसरे टोल नाके के बाद हम लोग कुछ चाय-पानी को रुके तो बेटी के साथ हम लोगों ने भी कुछ खाने की इच्छा जतायी और मैंने अपने लिए ‘सब वे’ से एक रैप लिया जिसमें काफ़ी कुछ सलाद ही था। तीसरे टोल नाके के पास पहुँचते हुए मुझको कुछ असहज सा लगा तो बेटी ने कहा कि पापा कार मैं चला लेती हूँ पर मैंने यह कह कर मना कर दिया कि ऐसिडिटी लग रही है घर चल कर कोई दवा ले लेंगे और आराम हो जायेगा। घर पहुँच कर आराम से खाना खाया, सदैव की भांति खाने के बाद दूध भी लिया और ऐसिडिटी की दवा खा कर थोड़ा देर से सो गया। सुबह लगभग साढ़े तीन बजे मुझको कुछ बेचैनी महसूस हुई जो बढ़ने लगी और मेरे कराहने से मेरी पत्नी जाग गईं फिर मेरी बेटी भी जाग कर पास आ गई। मेरे पसली के पास और फिर बायें हाथ में दर्द शुरू हुआ जो बढ़ता जा रहा था। यह दर्द पसली की तरफ़ हुआ फिर बायें कंधे से बायें हाथ की हथेली की उंगल...

इतिहास और संस्कृति के किस्से – 48 गंगा किनारे करेंटी की हवेली,

इतिहास और संस्कृति के किस्से – 48 गंगा किनारे करेंटी की हवेली,  हुमायूँ को शरण,  जयपुर के महाराजा भारमल की सहायता, सुप्रीम कोर्ट का फैसला…  एक ही धागे से जुड़ी विरासत की महागाथा। आज इतिहास और संस्कृति के किस्सों में चर्चा है उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले की कुंडा तहसील के करेंटी गांव की कोविड के दौरान जब मैं मथुरा से सम्बंधित श्री माथुर चतुर्वेदी समुदाय के लोगों के इतिहास और संस्कृति पर आधारित अपनी यूट्यूब श्रृंखला Chaturvedi Heritage by Atul Chaturvedi बना रहा था तो एक बहुत रोचक किस्सा मेरे संज्ञान में आया जो आज मैं आपके सामने फेसबुक पोस्ट के रुप में प्रस्तुत कर रहा हूँ।  करेंटी की हवेली, गंगा का तट, हुमायूँ का भागना और माथुर चतुर्वेदी विरासत की अद्भुत कहानियाँ विरासत सिर्फ़ पुरानी बातों का ढेर नहीं होती—विरासत वह सांस है जो पीढ़ियों के बीच चलती रहती है।  इस किस्से का समय वह समय था जब हिंदुस्तान का शहंशाह हुमायूँ अपने जीवन के सबसे कठिन दौर से निकल रहा था—  सेना बिखरी हुई, शरीर घायल, मन भयभीत।  दुश्मन उसके पीछे और भाग्य उसके सामने खड़ा। जब हिंदोस्तान क...

फिरोज़ाबाद — काँच का शहर, विरासत की आग

फिरोज़ाबाद — काँच का शहर, विरासत की आग सदियों से फिरोज़ाबाद की भट्टियों की लौ ने न जाने कितने लोगों के घरों को रोशनी दी है।  मुग़ल दरबारों से लेकर आधुनिक शो-रूम्स तक — यहाँ के शिल्पियों ने आग को सौंदर्य में और कौशल को विरासत में बदला है। पर इस जबरदस्त चमक के पीछे एक संघर्ष भी है।  आज भी अधिकांश कारीगर “देखकर सीखते” हैं — न कि किसी औपचारिक प्रशिक्षण या आधुनिक डिज़ाइन शिक्षा से और असलियत यह है कि यदि उनको उचित प्रशिक्षण मिले तो ये लोग कमाल ही कर देंगे।  हुनर पुराना है, और व्यवस्था शायद उससे भी पुरानी पड़ चुकी है। दुनिया जब वेनिस के Murano Glass की तारीफ़ करती है, तब यह समझना भी जरूरी हो जाता है कि  फिरोज़ाबाद के शिल्पकार सीमित साधनों, कच्चे माल की कमी और आधुनिक डिज़ाइन एक्सपोज़र के बिना भी अपनी कला को जीवित रखते हैं।  आधुनिक ऑटोमैटिक भट्टियाँ आईं, उत्पादन बढ़ा, लेकिन हाथ की वह नज़ाकत — वह आत्मा — जिसने इस शहर को पहचान और प्रसिद्धि दी, धीरे-धीरे खोने लगी। आज छोटे उद्योग लालफीताशाही, अनुमति, प्रक्रियाओं और भारी अनुपालनों में उलझे हैं।  ऊर्जा के रूप में गैस का उ...

इतिहास और संस्कृति के किस्से – 47 आज का किस्सा है भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम यानी 1857 के घटनाक्रम का

इतिहास और संस्कृति के किस्से – 47 आज का किस्सा है भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम यानी 1857 के घटनाक्रम का और उस विषय में ब्रिटेन के तत्कालीन नेता विपक्ष बेंजामिन डिसराइली के प्रसिद्ध भाषण जो उन्होंने ब्रिटिश संसद में दिया और प्रसिद्ध विचारक और चिंतक कार्ल मार्क्स के इस विषय में न्यूयॉर्क टाइम्स में छपे लेख का साल था 1857 — जब भारत अंग्रेज़ी शासन के खिलाफ़ अंगार बन उठा था।  दिल्ली, झाँसी, कानपुर, अवध, मेरठ और ग्वालियर — हर ओर विद्रोह की ज्वाला थी।  इसी समय, यूरोप में बैठा एक चिंतक Karl Marx ब्रिटिश उपनिवेशवाद की परतें उधेड़ रहा था। कार्ल मार्क्स के इस विषय पर कई लेख इंटरनेट पर भी उपलब्ध हैं।  14 अगस्त 1857 को उसने New York Daily Tribune में लंदन से  एक लेख लिखा —   “The Indian Question. उधर लंदन में ब्रिटेन की संसद में भी इस विषय पर उथल-पुथल थी। ब्रिटिश संसद और बेंजामिन डिसरेली का भाषण (27 जुलाई 1857) डिसरेली ने उस दिन प्रधानमंत्री लॉर्ड पामरस्टन की सरकार पर तीखा प्रहार करते हुए कहा कि  भारत में यह जो “विद्रोह” हो रहा है, वह किसी सिपाही की अवज्ञा नहीं, ...

इतिहास और संस्कृति के किस्से – 46 आज की इस पोस्ट में चर्चा करेंगे मुग़ल दरबार और बादशाहों से सम्बंधित कुछ और रोचक बातों की

इतिहास और संस्कृति के किस्से – 46 आज की इस पोस्ट में चर्चा करेंगे मुग़ल दरबार और बादशाहों से सम्बंधित कुछ और रोचक बातों की जैसा मैं पहले बता चुका हूँ कि मुग़ल दरबार में प्रोटोकॉल तथा अन्य नियम-कायदे काफी कुछ स्पष्ट रूप ले चुके थे और उनका पालन करना ही होता था। मुग़ल बादशाह के दरबार में जो लोग मौजूद रहते थे उनके लिए वह क्या पहनेंगे, किस रंग के वस्त्र वहन सकते हैं और कौन से नहीं ये सारी बातें स्पष्ट रूप से निर्धारित थीं। लाल और पीले रंग के वस्त्र सिर्फ बादशाह ही पहन सकते थे। जो लोग दरबार में मौजूद रहते उनके सिर पर पगड़ी का बँधा होना जरूरी था और उनके पैर खाली होने चाहिए थे। दरबारियों के नाखूनों, दाढ़ी और पाजामों की लंबाई कितनी होगी यह भी तय होता था। एक बार का किस्सा है कि औरंगज़ेब के दरबार में मरहमत खान नामक व्यक्ति एक ऐसा पाजामा पहन कर चला आया जिससे कि उसके पैरों की उंगलियाँ नजर नहीं आ रही थीं। उसकी उंगलियाँ ढकी हुई थीं यह बात बादशाह की तेज नजरों से छिपी नहीं रह सकी और बादशाह ने तुरंत आदेश दिया कि उसके पाजामे को दरबार के शिष्टाचार  के मुताबिक कुछ इंच छोटा करवाया जाए और ऐसा ही किया भी गया। ल...

आसाम में चतुर्वेदी गए 16वीं शताब्दी में

कई बार बहुत से काम आप केवल अपनी खुशी (स्वान्तः सुखाय) के लिए करते हैं और ऐसे ही कोविड महामारी वाले समय में हमने भी श्री माथुर चतुर्वेदी समुदाय के इतिहास, संस्कृति, परंपरा आदि विषयों को समेटते हुए ‘चतुर्वेदी हैरिटेज’ नाम से एक यूट्यूब सीरीज बनाई थी जिसको देश-विदेश में फैले श्री माथुर चतुर्वेदी लोगों द्वारा काफी पसंद भी किया गया था।  अभी दो-तीन दिन पहले मेरे पास फेसबुक पर अरुण ज्योति छांगकाकोटी नाम से एक friend request आयी जिस पर मैंने पहले कोई ध्यान नहीं दिया क्योंकि एक तो मैं उनको जानता नहीं था दूसरे वह आसाम से थे जहाँ मेरा कोई विशेष सम्पर्क भी ध्यान में नहीं था। आज अरुण ज्योति की तरफ से एक मैसेज फेसबुक मैसेंजर पर आया जो मैं नीचे दे रहा हूँ। इस मैसेज को देख कर मुझको लगा कि मेरा चतुर्वेदी हैरिटेज की सीरीज बनाना कुछ सार्थक तो हुआ। अरुण ज्योति छांगकाकोटी के पूर्वज ज्योतिष के प्रकांड विद्वान थे और उस समय यानी लगभग सन 1575 में उनको तत्कालीन अहोम राजाओं ने अपनी मदद के लिए बुलाया था और इनको छांगकाकोटी की उपाधि दी (वैसे हो सकता है मथुरा का चतुर्वेदी आसाम पहुँचते-पहुँचते छांगकाकोटी हो गया ह...

इतिहास और संस्कृति के किस्से – 45 कुछ और बातें आगरा की

इतिहास और संस्कृति के किस्से – 45 कुछ और बातें आगरा की आज की पोस्ट में हम स्व0 सतीश चंद्र चतुर्वेदी जी के आगरा पर लिखे ग्रंथ आगरानामा में लिखी आगरा की कुछ और बातों की चर्चा करेंगे आगरा के किले पर मराठों का कब्जा हो चुका था और उसका किलेदार एक डच जॉन हैंसिंग था जो 1794 से मराठों की सेवा में था। कलकत्ता में फोर्ट विलियम बनाने के बाद अंग्रेजों ने अपने को और मजबूत किया तथा अपनी विस्तारवादी नीति पर अमल करना शुरू कर दिया। सतीश चंद्र चतुर्वेदी जी ने आगरानामा में लिखा है कि अंग्रेजों ने योजना बना कर दिल्ली से सेना भेज कर आगरा किले के अमर सिंह दरवाजे पर आक्रमण कर दिया। अंग्रेजों के 5 हजार सैनिक थे और जनरल लेक के गोपनीय प्रयासों से किले के ढाई हजार सैनिक भी अंग्रेजों से मिल गए और 17 अक्टूबर 1803 को शाम को किले की शेष सेना को जानमाल की सलामती का आश्वासन देकर किले ओर अंग्रेजों का अधिकार हो गया। किलेदार हैंसिंग का निधन 1803 में आगरा किले में ही हुआ। अंग्रेजों के हाथ 25 लाख रुपया,162 बंदूकें और पीतल की विशाल तोप लगी। ये वही ऐतिहासिक तोप थी जिसको अंग्रेजों ने अपनी जीत की खुशी में ब्रिटेन के राजा जार्ज...