Posts

फ़िरोज़ाबाद के बड़े हनुमान जी

Image
​ फ़िरोज़ाबाद शहर का इतिहास लगभग 500 वर्ष  पुराना है।इस शहर में वैसे तो अनेकों धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व के स्थल हैं किंतु शहर में स्थित हनुमान जी या बड़े हनुमान जी का मंदिर अति प्राचीन और सिद्ध स्थल माना जाता है।मंदिर के पास में ही रामलीला मैदान है जहाँ काफ़ी समय से प्रति-वर्ष होने वाली रामलीला का किसी जमाने में उत्तर प्रदेश के एक बड़े हिस्से में बहुत नाम हुआ करता था।1960 के दशक से तो इस स्थान की यादें मेरी ही हैं।समय के साथ इस रामलीला में वो बात नहीं रही और ना ही इसका वो क्रेज रहा जो कभी हुआ करता था और शायद इसका एक बड़ा कारण यह भी है कि एक तो पहले यह ही पूरे इलाक़े का सबसे बड़ा मेला और लोगों के मनोरंजन का साधन हुआ करता था और दूसरे तब यह मात्र  कुछ लोगों और प्रशासन का काम न होकर सारे शहर का उत्सव होता था।तब शहर के मुअज्जिज़ लोग मिल कर कमेटी बनाते थे और इसके आयोजन हेतु जो  कमेटी बनती थी उसके माध्यम से शहर के सभी लोग अपने आपको इस मेले के आयोजन से जुड़ा महसूस करते थे।मुझको याद है कि हर साल एक कागज पर रामलीला का पूरा कार्यक्रम छपा हुआ होता था जिसके पीछे पिछले वर्ष का पूरा ...

काँच का इतिहास:विश्व,भारत और फ़िरोज़ाबाद

​ फ़िरोज़ाबाद और यहाँ के काँच के काम का इतिहास  फ़िरोज़ाबाद और काँच उद्योग-1 भारत में काँच का इतिहास अत्यंत प्राचीन, समृद्ध और बहुआयामी रहा है। देश के विभिन्न भागों में जैसे-जैसे पुरातात्त्विक उत्खनन बढ़ते गए, वैसे-वैसे यह बात अधिक स्पष्ट होती गई कि प्राचीन भारत में काँच-निर्माण कोई सीमित या केवल आयातित गतिविधि नहीं थी, बल्कि यह एक व्यापक, स्वदेशी और तकनीकी रूप से विकसित परंपरा थी। उत्तर प्रदेश के कोपिया, उत्तर-पश्चिम के तक्षशिला/टैक्सिला,  सातवाहन कालीन स्थलों और अन्य अनेक पुरास्थलों से काँच के मनके, चूड़ियाँ, कटोरे, स्लैग, छोटे पात्र, टाइलें और काँच की शीशियाँ बड़ी मात्रा में प्राप्त हुई हैं। इन वस्तुओं की संख्या और विविधता यह संकेत करती है कि इन्हें केवल विदेशी आयात मानकर नहीं समझा जा सकता। इसी संदर्भ में यह भी उल्लेख मिलता है कि जितने अधिक उत्खनन हुए, उतना ही यह सिद्ध होता गया कि प्राचीन भारत में काँच-कार्य व्यापक था, और उपलब्ध वस्तुओं का बड़ा भाग स्थानीय उत्पादन पर आधारित रहा होगा। काँच की उत्पत्ति को लेकर विद्वानों में लंबे समय तक चर्चा रही है और यह विषय आज भी पूरी तरह “...

​अमर शहीदों और क्रांतिकारियों के किस्से-2 साँडर्स गोली कांड

​ अमर शहीदों और क्रांतिकारियों के किस्से-2 साँडर्स गोली कांड  सन् 2007 में मुझको कांग्रेस महासचिव श्री दिग्विजय सिंह जी और अध्यक्ष उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी श्रीमती रीता बहुगुणा जोशी जी के कार्यकाल में उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी में महासचिव का  पद और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और उनके आश्रितों से संबंधित विभाग की जिम्मेदारी दी गई थी।राजनीति की बात तो फिर कभी करूँगा यदि कभी राजनीति से संबंधित संस्मरण लिखे तो।इसके अतिरिक्त मैंने चूंकि इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से आधुनिक इतिहास में ऐम ऐ भी किया था तो स्वंत्रता संग्राम से संबंधित घटनाओं में मेरी रुचि और भी ज्यादा थी।अब यश की धरोहर पुस्तक को पढ़ने के बाद लग रहा है कि कितने अद्भुत शौर्य वाले थे वो क्रांतिकारी जिन्होंने देश के लिए अपनी जान क़ुर्बान कर दी।इन संस्मरणों की विशेष बात ये है कि इनको उन लोगों ने ख़ुद लिखा है जो देशभक्ति की इन वीरतापूर्ण घटनाओं में स्वयं शामिल थे। आज क़िस्सा लाला लाजपतराय के ऊपर मरणांतक लाठीचार्ज में शामिल अंग्रेज़ पुलिस अफ़सर साँडर्स की गोली मारकर हत्या करने की घटना का।यह क़िस्सा क्रांतिकारी भगवानदास माहौर ने ...

​अमर शहीदों और क्रांतिकारियों के किस्से-1 अमर शहीद राजगुरु की नींद और सरदार भगत सिंह

​ अमर शहीदों और क्रांतिकारियों के किस्से-1 अमर शहीद राजगुरु की नींद और सरदार भगत सिंह  आजकल तबियत जो ख़राब हुई थी उसके कारण ज्यादातर बैड रैस्ट चल रहा है और अन्य सामान्य ऐक्टिविटी भी बंद सी ही हैं पर पढ़ना खूब हो रहा है। अभी 3-4 दिन पहले मेरे बहनोई डॉक्टर अपूर्व जी ने पूज्य दादाजी बनारसीदास चतुर्वेदी द्वारा सम्पादित एक पुस्तक “यश की धरोहर” का जिक्र किया।पुस्तक मिल भी गई।इस पुस्तक में क्रांतिकारियों के संस्मरण हैं अर्थात तीन क्रांतिकारियों पूज्यनीय- भगवान दास माहौर, सदाशिवराव मलकापुरकर और शिव वर्मा जी ने एक-एक में  लेख शहीदे आज़म भगत सिंह, चंद्रशेखर ‘आज़ाद’ राजगुरु,सुखदेव और नारायणदास खरे जैसे अमर शहीदों के संस्मरण लिखे हैं।  इन संस्मरणों को पढ़ना किसी गीता और रामायण के पढ़ने से कम नहीं है। ये वे वीर शहीद थे जिन्होंने हमारे सुख और देश की आज़ादी के लिए अपना जीवन हँसते-हँसते कुर्बान कर दिया। इन संस्मरणों को पढ़ कर एहसास होता है कि उनका रोज़मर्रा का जीवन ऐसा था कि उसमें देशभक्ति के जज़्बे के अलावा और कुछ नहीं था।हँसते-हँसते मौत का सामना करने वाले इन नौजवान शहीदों का रोज़मर्रा ...

सूरज भगवान की कहानी

​ हमारे समाज में केवल साहित्य और लोककथाएँ ही नहीं, बल्कि एक और अमूल्य परंपरा रही है—धार्मिक और संस्कारों से जुड़ी घरेलू कहानियों की परंपरा। ये वे कहानियाँ हैं जो किसी ग्रंथ में नहीं, बल्कि घरों के आँगन, रसोई की चौखट और शाम की चौपालों में जन्म लेती थीं। दादी, नानी, माँ, ताई, चाची—इन सबकी ज़ुबान से निकली ये कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी हमारी संस्कृति की धारा की भांति बहती रहीं, हमारे संस्कारों को मजबूर करती हुई। ये कहानियाँ गणेश जी की, सूरज भगवान की, चंद्रमा की, कार्तिक मास की, चौथ जैसे व्रतों की—आस्था, नीति और जीवन-बोध से जुड़ी सरल लेकिन गहरी कथाएँ होती थीं। चूँकि ये अधिकतर लिखित रूप में नहीं थीं, इसलिए हर घर में, हर पीढ़ी में इनका स्वरूप थोड़ा बदल जाता था। कहीं शब्द बदले, कहीं पात्र—लेकिन भावना वही रहती थी, शुद्ध और आत्मीय। मैंने भी अपने बचपन में ऐसी अनगिनत कहानियाँ अपनी दादी, नानी और माँ से सुनी हैं। अफ़सोस कि समय के साथ उनमें से बहुत-सी स्मृतियों के कोनों में धुँधली पड़ गईं। आज, स्वास्थ्य कारणों से  आराम के ये दिन मुझे स्वयं से मिलने का अवसर दे रहे हैं, तो मन हुआ कि क्यों न उन बिखरी स्मृ...

​इतिहास और संस्कृति के किस्से-50 इतिहास और संस्कृति के किस्से सीरीज में 50वां भाग टीपू सुल्तान के रॉकेट : टीपू के मैसूर ने यूरोप को रॉकेट का उपयोग दिखाया और सिखाया

​ इतिहास और संस्कृति के किस्से-50 इतिहास और संस्कृति के किस्से सीरीज में आज 50वां भाग आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूँ। आपको इस सीरीज के लेख पसंद आ रहे हैं यह मेरे लिए बहुत प्रसन्नता की बात है और इससे हौसला भी बढ़ता है। आपकी टिप्पणियाँ और आपकी इस सीरीज में रुचि लेखन को प्रेरित करती है,आप सभी का बहुत-बहुत आभार। टीपू सुल्तान के रॉकेट : टीपू के मैसूर ने यूरोप को रॉकेट का उपयोग दिखाया और सिखाया 18वीं सदी के भारत में युद्ध विज्ञान केवल तलवार, बंदूक और तोप तक सीमित नहीं था। दक्षिण में मैसूर के शेर टीपू सुल्तान और उनके पिता हैदर अली ने युद्धक तकनीक में ऐसा प्रयोग किया जिसने दुनिया की सैन्य रणनीति ही बदल दी। यह प्रयोग था — लोहे के आवरण वाले रॉकेट(Iron-cased War Rockets), जिन्हें नियंत्रित दिशा, बारूद क्षमता और दूर तक निशाना साधने की क्षमता के साथ बनाया गया। टीपू ने अपने सैन्य अभियानों में इन रॉकेट्स का इतना प्रभावी उपयोग किया कि अंग्रेज़ जनरल खुद अपनी डायरी में लिखता है— “such fire in the sky we had never imagined from the natives.” यह वह समय था जब यूरोप अभी भी लकड़ी और कागज़ के रोलिंग ट्यूब वाल...

​इतिहास और संस्कृति के किस्से-49 आज चर्चा है विदेशियों और मुगलों की समुद्री झड़प, पुर्तगालियों द्वारा शाहजादे सलीम की नाव पर हमला तथा यूरोपीय यात्रियों की जो मध्यकाल में भारत आये

​ इतिहास और संस्कृति के किस्से-49 आज चर्चा है विदेशियों और मुगलों की समुद्री झड़प, पुर्तगालियों द्वारा शाहजादे सलीम की नाव पर हमला तथा  यूरोपीय यात्रियों की जो मध्यकाल में भारत आये  मध्यकाल में भारत में यूरोपीय यात्रियों का आना शुरू हो गया था। प्रो0 हेरम्ब चतुर्वेदी ने अपनी पुस्तक मध्यकालीन भारत के विदेशी यात्री में तीन विशिष्ट यात्रियों को उनके वृत्तांतों के आधार पर प्रारंभिक पथ प्रदर्शक ‘यूरोपीय यात्री’ माना है। ये यात्री थे:- 1.वेनेशियन यात्री निकोलो द कॉन्ती 2.रूसी यात्री ऐथनाशियस निकितिन और 3.जिनोआ का हियरोनिमो दी सैंटो स्टेफेनो उन्होंने अपनी पुस्तक में पुर्तगाली यात्री पेड्रो कोविल्हाम का जिक्र किया है कि वह स्टेफेनो से भी पहले आया था। प्रो0 हेरम्ब चतुर्वेदी Heramb Chaturvedi जी ने लिखा है कि भारत (मुग़ल भारत) का प्रथम अंग्रेज यात्री लंदन का ‘मास्टर राल्फ फिच’ था। यूरोप के जो यात्री भारत आये उन्होंने अपने बहुत ज्ञानवर्धक और रोचक संस्मरण लिखे हैं जिनसे बहुत जानकारी मिलती है।  आज के इस लेख में हम जिक्र कर रहे हैं मध्यकाल या उसके मुग़ल दौर में कैसे इन यूरोपीय लोगों ने ...