Posts

ज़िंदगी मेरी ?-24 इलाहाबाद की होली और कानपुर का मुंडा पेड़ा

Image
# ज़िंदगी मेरी?-24 #AtulChaturvediKeKisse भारत भारती में धीरे-धीरे समय बीत रहा था और हम लोग हॉस्टल के उस जीवन के अभ्यस्त हो चुके थे। सुबह उठकर दौड़ लगाना, पढ़ाई को बैठना, नाश्ता, नहाना, स्कूल जाना, दोपहर का खाना, आराम, शाम को खेलना, फिर कुछ नाश्ता या फल, उसके बाद शाम की पढ़ाई, रात का खाना, सोने के पहले की प्रार्थना और फिर रात को सोना। यही हमारी रोजमर्रा की दिनचर्या बन गयी थी। स्कूल में हॉस्टल के बाहर ही खेल का मैदान था और उस मैदान में एक तरफ नींबू का एक बहुत बड़ा झाड़ था। उसके बीच में काफी खाली स्थान था और हम लोग खेलते हुए अक्सर उस नींबू के झाड़ के अंदर जाकर बैठ जाते और वहीं खेलते रहते थे। उसी झाड़ के पास एक बहुत लंबा लैंप पोस्ट भी था, जिसकी जलती हुई लाइट से नींबू के उस झाड़ और उसके आसपास पूरी रात उजाला रहता था। उस साल की एक घटना यह भी हुई कि जब दशहरा-दिवाली की छुट्टियों के पहले घर जाने के लिए मैं बड़ी मौसी के यहाँ पहुँचा तो मालूम पड़ा कि कुछ दिन पहले ही मेरे बाबा के बड़े भाई, यानी जज साहब सुरेश चंद्र जी की पत्नी का स्वर्गवास हो गया था। रिश्ते में वे भी मेरी दादी ही हुईं। घर मे...

लोकसेवक-2 महमूद बट आई 0 ए 0 एस 0

Image
लोकसेवक — 2 महमूद बट साहब : एक दबंग और विवादास्पद प्रशासक के किस्से #LoksevakonKeKisse पिछली कड़ी में मैंने अपने परिवार के एक बुजुर्ग, जज साहब सुरेश चंद्र चतुर्वेदी जी का एक किस्सा लिखा था। उसमें एक ऐसे न्यायाधीश की चर्चा थी जिनके बारे में उनके साथ सुबह टहलने वाले वरिष्ठ पुलिस अधिकारी तक को विश्वास था कि वह सरकार की ओर से किसी अनुचित सिफारिश को सुनना भी पसंद नहीं करेंगे। आज बात एक ऐसे लोकसेवक की, जिनका स्वभाव और कार्यशैली कुछ अलग थी। वह दबंग थे, कठोर थे, अपने निर्णयों पर अडिग रहते थे और उन्हें लागू कराने में किसी दबाव की परवाह नहीं करते थे। उन्होंने इलाहाबाद के सौंदर्यीकरण और नगर व्यवस्था को सुधारने के लिए काफी काम किया, लेकिन अपनी सख्त कार्यशैली और कुछ निर्णयों के कारण विवादों में भी रहे। आगे चलकर वह उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव भी बने। ये थे महमूद बट साहब। जैसा कि मैंने इस श्रृंखला की पहली कड़ी में भी लिखा था, मेरा उद्देश्य केवल आदर्श लोकसेवकों के किस्से सुनाना नहीं है। हमारे देश में समय-समय पर अनेक निष्पक्ष, निर्भीक और दृढ़ इच्छाशक्ति वाले लोकसेवक हुए हैं। लेकिन ऐसा भी नहीं कि वे ...

ज़िंदगी मेरी?-23

Image
ज़िंदगी मेरी?-23 #AtulChaturvediKeKisse हम लोग अब स्कूल और हॉस्टल के रोजमर्रा के रूटीन में थे, लेकिन हॉस्टल का जीवन कुछ ऐसा होता है कि रोज कुछ न कुछ नयी घटना होती रहती थी। इसी बीच उस भारत दर्शन यात्रा की एक पुरानी ब्लैक एंड व्हाइट फोटो भी मिल गयी है, जो कन्याकुमारी में विवेकानंद रॉक मेमोरियल के सामने खींची गयी थी। उस फोटो में मेरे साथ बहन जी भी हैं और शायद शीला द्विवेदी भी हैं, जिनके भाई अशोक द्विवेदी भी हमारे साथ ही पढ़ते थे। इतने वर्षों बाद वह फोटो मिली तो उस यात्रा की यादें एक बार फिर ताजा हो गयीं। सोचा, इस कड़ी के साथ वह फोटो भी आप सबके साथ शेयर कर दूँ। मुझको बचपन से कहानियाँ, उपन्यास आदि पढ़ने का बहुत शौक था। घर पर चन्दामामा, पराग, चंपक आदि मैगजीन नियमित रूप से आती थीं और हम सब पढ़ते थे। इनके अलावा इंद्रजाल कॉमिक्स में वेताल, मैन्ड्रेक और अमर चित्र कथा आदि भी पढ़ा करते थे। आप पाठकों में से जिन्होंने भी ये सब अपने बचपन में पढ़ा होगा, वो इनके आनंद से पूरी तरह वाकिफ होंगे। इनके अलावा उस समय बाल पॉकेट बुक्स का नया प्रचलन शुरू हुआ था और बाल भारती बाल पॉकेट बुक्स के नाम से छोटी कि...

चूल्हे-चौके से होम डिलीवरी तक: हमारी मान्यताएँ, परम्पराएँ, धर्म और जीवन

Image
हमारी मान्यताएँ, परम्पराएँ, धर्म और जीवन पहली कड़ी : चूल्हे-चौके से होम डिलीवरी तक मुझे अपने बचपन की दो तस्वीरें आज भी याद हैं। एक हमारे घर की रसोई की, जहाँ पहले मेरी दादी खाना बनाती थीं, फिर मेरी माँ ने यह जिम्मेदारी सँभाली और धीरे-धीरे समय बदला तो खाना बनाने के लिए एक रसोइया भी आने लगी। लेकिन एक बात हमेशा बनी रही, साफ-सफाई का विशेष ध्यान। दूसरी तस्वीर कुछ अलग है। उन दिनों शादी-ब्याह और दूसरी दावतों के समाप्त होने के बाद जो खाना बच जाता था, उसे फेंक दिया जाता था। मैंने अपनी आँखों से देखा है कि कुछ अत्यन्त विपन्न लोग उस फेंके हुए खाने में से खाने योग्य चीजें बीनकर अपने साथ ले जाते थे। कभी उसी भोजन में कोई जानवर भी मुँह मारता हुआ या मुँह मारने की कोशिश करता दिखाई दे जाता था। यह दृश्य बड़ा ही हृदयविदारक होता था। लेकिन उस समय के समाज में ऐसी घटनाएँ एक तरह से सामान्य और स्वीकार्य-सी हो गई थीं। शायद इसलिए भी कि अभाव और विवशता के सामने बहुत-सी सामाजिक मान्यताएँ अर्थहीन हो जाती हैं। जिन लोगों के सामने पेट भरने का प्रश्न हो, उनके लिए भोजन कहाँ से आया, किसने बनाया या किस स्थिति में पड़ा था, ये ...

मैं 65 वर्ष का हो गया

Image
कल मैं 65 साल का हो गया।  सबसे पहले इस अवसर पर आप सभी से मिली ढेर सारी शुभकामनाओं, स्नेह और आशीर्वाद के लिए हृदय से बहुत-बहुत आभार। आपका यह अपनापन मेरे लिए बहुत मायने रखता है। पिछले कुछ दिनों से सोच रहा था कि आखिर 65 साल का हो जाने में ऐसी क्या खास बात है? फिर लगा कि खास बात शायद उम्र का यह आँकड़ा नहीं, बल्कि जिंदगी के इतने साल जीने का अवसर मिलना है। भगवान ने इस उम्र तक पहुँचाया, इसके लिए उसका धन्यवाद तो देना ही चाहिए। वैसे तो न जाने कितने लोग 75, 85 और 95 साल के भी होते हैं, लेकिन न जाने कितने ऐसे भी थे जो 65 साल की उम्र तक नहीं पहुँच सके। इसलिए अब इस उम्र का महत्व कुछ अलग ही महसूस हो रहा है। जब हम छोटे थे तो पापा-मम्मी के साथ आगरा घूमने और फिल्म देखने जाया करते थे। आगरा जाते समय अपने बाबा से कहते कि बाबा, आगरा जा रहे हैं, सिनेमा देखकर लौटेंगे। तो हमारे बाबा कहते, "तुम आगरा जाकर सिनेमा देखोगे और हम यहीं बैठे-बैठे अपनी आँखें मूँदते हैं तो आँखों में सिनेमा की रील-सी चल जाती है।" बाबा की उम्र उस समय 80-82 साल रही होगी और मेरी 11-12 साल। उनकी बात का मर्म उस समय ठीक से समझ में नह...

लोकसेवक — 1: जज साहब सुरेश चंद्र चतुर्वेदी

Image
​ लोकसेवक — 1 जज साहब सुरेश चंद्र चतुर्वेदी लोकसेवक कौन है? क्या केवल कोई सरकारी अधिकारी? कोई न्यायाधीश? कोई मंत्री या शासक? या फिर हर वह व्यक्ति जिसे किसी समय समाज, राज्य या व्यवस्था ने कोई सार्वजनिक जिम्मेदारी सौंपी और जिसके फैसलों का असर दूसरे लोगों के जीवन पर पड़ा? इतिहास में सत्ता की चर्चा बहुत होती है, लेकिन सत्ता और समाज के बीच खड़े उन लोगों की चर्चा शायद उतनी नहीं होती जिन्हें किसी न किसी रूप में लोकसेवा की जिम्मेदारी मिली। इनमें राजा भी रहे, मंत्री भी, न्यायाधीश भी, प्रशासक भी, पुलिस अधिकारी भी, सेनापति भी, अर्थशास्त्री और समाज सुधारक भी और बहुत से ऐसे लोग भी जिन्हें शायद इतिहास ने उतनी जगह नहीं दी जितनी मिलनी चाहिए थी। अलग-अलग कालखंड। अलग-अलग क्षेत्र। अलग-अलग देश और भौगोलिक परिस्थितियाँ। अलग-अलग व्यवस्थाएँ और अलग-अलग तरह की लोकसेवा। और जाहिर है, सभी लोकसेवक आदर्श नहीं रहे। किसी ने अपने पद की मर्यादा बढ़ाई तो किसी ने उसे विवादों में डाला। किसी ने सत्ता के सामने खड़े होकर अपने दायित्व को निभाया तो किसी पर सत्ता के सामने झुकने के आरोप लगे। किसी के फैसले आज भी मिसाल के रूप में या...

इलाहाबाद विश्वविद्यालय का 139वाँ स्थापना दिवस | University of Allahabad

Image
​ आज 23 सितम्बर 2026 को इलाहाबाद विश्वविद्यालय के स्थापना दिवस पर इस पावन संस्था से जुड़े रहे और जुड़े हुए सभी लोगों को बहुत बहुत बधाई। आज फिर से मैं ये पोस्ट इसलिए लिख रहा हूँ क्योंकि शिक्षा के इस पावन संस्थान से मेरा और मेरे परिवार का आरंभ से ही संपर्क रहा है। हमारे परिवार का संपर्क इस विश्वविद्यालय से बहुत पुराना यानी कि कई पीढ़ियों पुराना है।मेरे बाबा के चाचा  दीवान बहादुर स्व0 जानकी प्रसाद जी चतुर्वेदी ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से B.A. द्वितीय श्रेणी सन 1893 में M.A (English) प्रथम श्रेणी में और दूसरी पोजीशन के साथ सन 1895 में और फिर LLB भी प्रथम श्रेणी में सन 1896 में पास किया था।उस जमाने में एंट्रेंस और इंटर की परीक्षाएं भी इलाहाबाद विश्वविद्यालय कराता था और स्व0 जानकी प्रसाद जी ने आगरा कालेज,आगरा से इलाहाबाद विश्वविद्यालय की ये परीक्षा पास की थीं अर्थात सन 1889 से हमारे परिवार का इस गौरवशाली विद्या के मंदिर से लगातार संपर्क बना रहा और ये हम लोगों के लिए बड़े गौरव और गर्व की बात है। उनके बाद मेरे पितामह स्व0 सुशील चंद्र जी चतुर्वेदी ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से B.Sc. और LLB ...