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Showing posts from 2026

ज़िंदगी मेरी?-9 3-बैंक रोड, मिन्नम की तकलीफ और स्कूल का टूर

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​ ज़िंदगी मेरी?-9 3-बैंक रोड, मिन्नम की तकलीफ और स्कूल का टूर #AtulChaturvediKeKisse #ZindagiMeri #BharatBharatiTales #HostelDiaries जाड़ों की छुट्टियाँ समाप्त हो गयीं और सन 1973 की जनवरी में हम लोग एक बार फिर से वापिस हॉस्टल आ गए थे। घर से वापिस आते में उदास होना, रोना-धोना अनिवार्य था तो वह सब इस बार भी होना ही था और हुआ भी। स्कूल में मेरी गिनती अब एक सिन्सियर और पढ़ाई में सर्वश्रेष्ठ तो नहीं लेकिन बेहतर बच्चों में की जाने लगी थी। खेलों में मैं कभी भी अच्छा नहीं था लेकिन हॉस्टल में रहने का यह लाभ अवश्य हुआ कि मैं लगभग सारे खेल, जो स्कूल में होते थे, वह खेलना सीख गया था, फिर चाहे वह क्रिकेट हो, फुटबॉल हो या खो-खो। इसी बीच एक बार मुझको बीमार होने जैसी कुछ तकलीफ हुई जिसकी सूचना मैं अपने घर वालों तक पहुँचाना चाहता था पर यह हो कैसे? पत्र में लिखने पर वासुदेव उच्चानी का किस्सा याद आता था और बहन जी द्वारा प्रताड़ित होने का भय, लेकिन मन भी था कि मानता नहीं था। कई दिन सोचने के बाद एक तरकीब निकल ही आयी। मुझको याद आया कि बचपन में मेरे घर पर मेरा निकनेम ‘मिन्नम’ हुआ करता था। बस फिर क्या था, म...

ज़िंदगी मेरी?-8 पूरब पश्चिम तथा हॉस्टल की तेल की शीशी वाला किस्सा

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​ ज़िंदगी मेरी?-8 पूरब पश्चिम तथा हॉस्टल की तेल की शीशी वाला किस्सा #AtulChaturvediKeKisse #ZindagiMeri #BharatBharatiTales #HostelDiaries भारत भारती में हम लोगों को समय कब कट जाता है पता ही नहीं चलता था क्योंकि पूरे दिन की दिनचर्या नियमित और काफी कसी हुयी थी। हेस्टिन्गस रोड पर चौराहे पर ही ठीक भारत भारती के गेट के सामने एक नया मकान बन रहा था जो हम लोगों के देखते-देखते बना लेकिन उसने हमारा ध्यान आकर्षित किया जब वो पूरा बन गया और उसकी वजह थी उसका नाम। तब समझ में आया कि लोग मकानों के भी नाम रखते हैं और बाद में ध्यान भी गया कि इलाहाबाद में बैंक रोड पर मौसाजी के मकान का नाम था “पुरषोत्तम निवास” और उनके सामने प्रोफेसर जे. एस. माथुर साहब रहते थे, उनके मकान का नाम था “मातृ अञ्चल”। तो भारत भारती के सामने जो भव्य मकान बना उसका नाम उस पर सामने शायद पहली मंजिल के बॉर्डर पर बहुत बड़ा, जो दूर से पढ़ने में आता था, लिखा था, “पूरब पश्चिम”। सन 1970 में प्रसिद्ध फिल्म अभिनेता और निर्देशक मनोज कुमार की एक फिल्म आयी थी “पूरब पश्चिम” जो बहुत हिट फिल्म थी और मनोज कुमार अपनी ज्यादातर फिल्में देश प्रेम, राष्ट...

ज़िंदगी मेरी?-7 मालवीय जी की कोठी,गंगा किनारा और बेडू पाको बारो मासा

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​ ज़िंदगी मेरी?-7 मालवीय जी की कोठी,गंगा किनारा और बेडू पाको बारो मासा #AtulChaturvediKeKisse #ZindagiMeri #BharatBharatiTales #HostelDiaries जाड़ों की छुट्टियाँ हुईं तो सब लोग घर गये। घर पर तो समय अच्छा और शानदार बीतता ही था किन्तु समस्या यह रही कि हमेशा ऐसा लगा कि घर रहने की छुट्टियाँ बहुत जल्दी ही बीत जाती थीं और हॉस्टल आने पर घर की मधुर स्मृतियाँ मन के तार झंकृत करती रहती थीं। शायद स्मृतियों का यही स्वभाव है—वे समय के साथ धुंधली नहीं होतीं, बल्कि जीवन के अलग-अलग पड़ावों पर नए अर्थ लेकर लौटती रहती हैं। लेकिन आपको एक बात बताता हूँ कि आज जब मैं पीछे मुड़ कर देखता हूँ तो यह भी लगता है कि ज़िंदगी का इतना सारा समय भी मानो पलक झपकते ही बीत गया है और अब तक की बितायी ज़िंदगी की मधुर स्मृतियाँ उसी भाँति मन के तार झंकृत करती रहती हैं और जैसे किसी म्यूज़िक कंसर्ट में एक के बाद एक संगीत की स्वर लहरियाँ उठती जाती हैं, गीत गाए जाते हैं और आप आनंद लेते हैं, वैसे ही ज़िंदगी भी एक किस्म का म्यूज़िक कंसर्ट ही तो है जिसमें अनेक यादों की स्वर लहरियाँ हैं, कभी उतार तो कभी चढ़ाव हैं और स्थिरता भी है और प...

ज़िंदगी मेरी?-6 चाबी के गुच्छे, ब्लैक आउट और विजय

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​ ज़िंदगी मेरी?-6 चाबी के गुच्छे, ब्लैक आउट और विजय  #AtulChaturvediKeKisse #BharatBharatiTales #HostelDiaries    बचपन में हमें इतिहास की किताबें बाद में मिलीं, इतिहास पहले जीने को मिला..  आज के हॉस्टल की यादों के लेख में मुझको दो घटनाएँ याद आ रही हैं। बात शायद नवंबर महीने की है और सं था 1971, इलाहाबाद सिविल लाइंस में कॉफी हाउस के सामने एक भार्गव इंजीनियरिंग करके बहुत विशाल बिल्डिंग हुआ करती थी जिसके बाहर एक काफी बड़ा खाली मैदान था और उसके पास एक बड़ा सा घर था 16-A MG Road  जो मेरे बाबा स्वर्गीय सुशील चंद्र जी के बड़े भाई जज साहब स्वर्गीय सुरेश चंद्र जी का हुआ करता था और फिर उसमें उनके मँझले पुत्र जिनको हम लोग पी दादा कहा करते थे वह और उनका परिवार रहते थे। पी दादा के बड़े लड़के थे ध्रुव भाईसाहब जो कि इलाहाबाद के बहुत बड़े और नामचीन वकीलों में हुआ करते थे और हमारे पापा और वो लगभग हमउम्र से थे हाँलांकि रिश्ते में पापा और वे चाचा भतीजे थे।ध्रुव भाईसाहब 1983 में अमेरिका से दिल का ऑपरेशन करा के आए थे और एक महीने बाद ही काफी यंग ऐज में उनकी मृत्यु हो गयी थी।खैर, तो बा...

ज़िंदगी मेरी?-5 फांसी वाली इमली,सिविल-लाइंस और संगम

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​ ज़िंदगी मेरी?-5 फांसी वाली इमली,सिविल-लाइंस और संगम  #AtulChaturvediKeKisse #BharatBharatiTales #HostelDiaries  जब तक समझ में आया तब तक तो दशहरा दिवाली कि छुट्टियाँ खत्म हो चली थीं और नंबर आ गया था हॉस्टल जाने का। घर पर बहुत अच्छा समय बिताना ही था, हॉस्टल के किस्से सबके लिए ही रोचक थे और सुनाते वक्त  खुद को भी ऐसा लगता था कि हमने भी कोई बहुत बड़ा काम किया है। बाबा बहुत खुश थे और प्रेरणास्पद बातें,किस्से,घर का इतिहास बताते थे और कहते थे कि खूब पढ़ लिख कर जीवन में सफल बनो। बहरहाल जैसे-जैसे हॉस्टल वापिस  जाने का समय पास आया मन मलिन पड़ने लगा और दिल में धुकधुकी भी बढ़ने लगी थी।  खैर,हम लोग इलाहाबाद पहुँच गए और फिर इलाहाबाद में मम्मी पापा सबके साथ एक-दो दिन छुट्टी के और बिताए।  हम लोग हॉस्टल में जहाँ भी रहे जब पापा और मम्मी आते थे तो दो चीजें पक्की थीं एक तो कम से कम एक फिल्म देखना और दूसरा किसी अच्छे रेस्टोरेंट में लंच या डिनर पर सभी लोगों का जाना।एक बार हम लोग इलाहाबाद में थे (सन याद नहीं है लेकिन बात बहुत पुरानी है  ) बात हुयी कि निरंजन सिनेमा में फिल्...

ज़िंदगी मेरी?-4 हॉस्टल का दूध घोटाला और पाँच रुपये सुभाष मामा के

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​ ज़िंदगी मेरी?-4  हॉस्टल का दूध घोटाला और पाँच रुपये सुभाष मामा के  #atulchaturvedikekisse #BharatBharatiTales इलाहाबाद और भारत भारती में रहते अब कुछ समय हो चला था और मैं वहाँ के माहौल में रमने भी लगा था। एक दिन स्काउतींग में छोटे बच्चों को “शेर बच्चे” कहते थे उसकी प्रतियोगिता के लिए हम लोग नैनी के किसी स्कूल गए और वहाँ हमने प्रतियोगिता जीती भी। वहाँ अन्य कई स्कूलों के बच्चों से भी मिलना हुआ। यह अपने आप में एक अलग किस्म का अनुभव था। यहाँ जब हम और स्कूलों के बच्चों के साथ एक बड़े कमरे से में थे तो मैं एक कोने में खड़ा हुआ था और अकेले कुछ सोच रहा था कि अचानक मैंने देखा कि कुछ बच्चे मेरे घुटनों कि तरफ इशारा करके हँस रहे हैं  तब मेरी समझ में आया कि मैं खड़े -खड़े घुटने ऊपर-नीचे चला रहा था जिसमें दरअसल हँसने की कोई बात नहीं थी किन्तु जब बच्चों ने हँसना शुरू किया तो मैं उसके प्रति कौन्शस हो गया और बच्चों के हँसने से खिसिया कर मैंने अपने घुटने ऊपर ही चढ़ाए रखे कि अब नीचे करूंगा तो बहुत हँसी  फिर से बनेगी लेकिन आखिर ऐसा कितनी देर किए रहता क्योंकि ऐसा किए हुए बहुत दर्द भी हो...

ज़िंदगी मेरी?-3 वासुदेव की हथेली पर बहनजी का डंडा

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​ ज़िंदगी मेरी?-3 वासुदेव की हथेली पर बहनजी का डंडा  #AtulChaturvediKeKisse #BharatBharatiTales मेरा हॉस्टल में पहला हफ्ता ही था और हम लोग शाम को अपनी-अपनी डैस्क पर बैठ कर स्टडी कर रहे थे कि अचानक दरवाजे में से बहन जी  प्रकट हुईं, उनके हाथ में एक मोटा सा डंडा था और चेहरे पर क्रोध था।उन्होंने आवाज दी, “वासुदेव उच्चानी।” वासुदेव खड़ा हो गया, वह कानपुर का रहने वाला था और हमसे एक क्लास जूनियर था। बहन जी ने उससे पूछा कि, “ तुमने घर पर चिट्ठी में हॉस्टल की बुराइयाँ लिखी हैं? अगर कोई बात थी तो मुझसे कहनी चाहिए थी।हाथ आगे बढ़ाओ।” इसके बाद वासुदेव ने अपने दोनों हाथ एक-एक करके आगे बढ़ाए और उसकी दोनों हथेलियों पर उस मोठे डंडे से पिटाई हुयी। बाद में मालूम पड़ा कि घर लिखे जाने वाले और घर से आने वाले सारे पत्र हॉस्टल में बहन जी या  उनके द्वारा नियुक्त व्यक्ति द्वारा पढे जाते थे। यहाँ मैं यह बताना  चाहूँगा कि उस समय ना तो आराम से मिल जाने वाले फोन थे और ना ही संचार के अन्य कोई साधन तो घर से संपर्क अमूमन पत्रों द्वारा ही होता था। हर बच्चे को सप्ताह में एक पोस्टकार्ड घर लिखने को दिया...

ज़िंदगी मेरी?-2 #AtulChaturvediKeKisse #BharatBhartiMemories

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​ ज़िंदगी मेरी?-2  #AtulChaturvediKeKisse #BharatBhartiMemories हॉस्टल में पहुँचना मेरे लिए मानो एक नयी दुनिया में पहुँच जाना था।मेरा ऐडमिशन कक्षा 6 में हुआ था।   स्कूल के गेट से अंदर घुसते ही लंबा ईंटों के खरंजे का पाथ वे और दाहिने हाथ पर एक बड़ा सा वृक्ष जिसका फल जंगल जलेबी कहलाता था जो मुझको बाद में मालूम पड़ा।रास्ते से आगे बढ़ते हुए ही दाहिने हाथ पर दो फील्ड दिखते थे जिनके बीच में क्लासरूम्स भी बने थे।आगे एक नींबू के पेड़ का इतना बड़ा झाड़ था कि उसके अंदर या नीचे 5-7 लोग बैठ जाएँ और ठीक उसके ऊपर एक बहुत लंबे खंबे पर रात के लिए बड़ी लाइट थी। पाथ वे बाउंड्री के सहारे चलता हुआ एक शानदार बिल्डिंग के पोर्टिको में ले जाता था  जो कि दरअसल इलाहाबाद  के पुराने शानदार बंगलों में से एक थी। पोर्टिको में हमारा तांगा रुका और वहाँ से दो सीढ़ी चढ़ कर मुख्य बिल्डिंग के सामने के हिस्से में एक बरामदा था जिसमे अंदर के हिस्से के दरवाजे खुलते थे।बड़ी मौसी, मौसाजी मुझको वहाँ छोड़ कर जा चुके थे और मैं कुमारी कांता  भार्गव जी के साथ अंदर पहुँचा तो देखा कि सामने एक बहुत बड़ा हॉल...

हॉस्टल में

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​ हॉस्टल में  वैसे तो जीवन सतत परिवर्तनशील है किन्तु सन 2020 के बाद जीवन में काफी परिवर्तन आए।पहले कोविड के कारण काफी समय सभी लोग घर पर ही बिताने को मजबूर थे,उसके बाद कुच पारिवारिक घटनाक्रम तथा अब फिर दिसंबर 2025 से काफी समय घर पर ही बीत रहा है। इस समय का एक सदुपयोग यह हुआ कि मुझको पढ़ने और लिखने के लिए काफी समय मिला साथ ही मैंने सोशल मीडिया के साधनों जैसे कि फ़ेसबुक,यूट्यूब, ट्विटर(अब ऐक्स) आदि का भी काफी उपयोग किया। इसी बीच मेरी एक किताब “सियाहट मेरी स्याही से” जो कि एक यात्रा वृतांत और ऐक्सपोर्ट व्यापार से संबंधित संस्मरण है वह भी लोकभारती प्रकाशन से प्रकाशित हो गई और जैसा कि मुझको लोकभारती  इलाहाबाद के आदरणीय श्री रमेश ग्रोवर अंकल ने बताया कि उसके पहले संस्करण की सभी पुस्तकें बिक गईं और दूसरे संस्करण की तैयारी है तो यह भी एक उत्साहवर्धक खबर रही। इस बीच मेरी लिखी दो अन्य पुस्तकें भी प्रकाशकों के विचाराधीन हैं।इस समय का सदुपयोग मैंने अपनी यादों,संस्मरणों आदि को लिपिबद्ध करने में भी किया जिसमें मेरी छात्र जीवन कि यादें, व्यापारिक यादें, राजनैतिक संस्मरण आदि भी हैं और अब प्रका...

Heart Attack,Angioplasty & Experiences

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​ The night of 19 December 2025 is something I will probably never forget. I have already written an article on this subject earlier. This write-up is intended to share another aspect of that medical journey and some related experiences which may perhaps be of some use to heart patients and their families. What I initially considered to be a routine health issue turned out to be a heart attack. Circumstances unfolded in such a way that on the very same day, Dr. Shubham Singhal performed an angioplasty on me in Agra, and it would not be an exaggeration to say that he saved my life. During that angioplasty, it was also discovered that there were serious blockages in other coronary arteries. The doctors felt that treating the remaining blockages at the same time could be somewhat risky, and therefore that part of the treatment was deferred for a later date. Several investigations followed, the most important of which was a Thallium Stress Test. Based on these investigations, it appear...