अथ श्री बार्बर कथा
अभी हाल में ही मैं अपने घर पर अपने बाल कटवा रहा था तो मिस्टर बार्बर से हमेशा की भांति बातचीत भी हो रही थी और इस संवाद में मेरी ज्यादा भुइमिका श्रोता की ही रहती है। वह मुझे बता रहा था कि आजकल शहर के और देश के क्या हालात हैं, सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक विषयों पर आजकल लोगों की क्या सोच है और क्या विचार हैं। उससे बात करते हुए मैं सोच रहा था कि ऐसे पेशों के लोग जिनका रोज ही समाज के विविध किस्म के लोगों से मिलना-जुलना होता दरअसल समाज के सच्चे आईने होते हैं जैसे चौराहे के चाय वाले, पान की दुकान वाले, हेयर कटिंग सैलून वाले आदि।
यही विचार करते मुझको अपने बचपन से अब तक के न जाने कितने बार्बर याद आने लगे जिनसे जुड़ी घटनाओं की यादें आपके साथ यहाँ शेयर कर रहा हूँ क्योंकि आपके सभी के भी इस किस्म के बहुत से अनुभव होंगे। हम लोग अधिकांशतः फिरोजाबाद में अपने घर पर ही बाल कटवाते रहे हैं न कि किसी दुकान पर जाकर।मुझको बचपन की याद आयी कि हमारे बाबा ने अपनी जायदाद में कुछ लोगों को रहने को स्थान दिया हुआ था उनमें एक बलबीर नाई भी हुआ करते थे। बाहर मेन रोड की तरफ एक ओर बलबीर की कुर्सी आदि के साथ दुकान चलती रहती थी और जब हम लोगों को बाल कटवाने होते तो को बुलवा लेते।बलबीर बाल काटते समय अक्सर पुराने किस्से सुनाया करते और बीच-बीच में उनकी अपनी कैंची को बार-बार ऐसे ही खाली बजाने की आदत थी। बलबीर अपने पुराने किस्से सुनाया करते जिसमें उनके नकली चवन्नी बनाने वाले गिरोह में किसी जमाने में काम करने की न जाने कितनी सच्ची और कितनी बनावटी बातें भी होती थीं।
इसके बाद मुझको याद आये अपनी ननिहाल के बार्बर। ये 1960 के दशक और 1970 के दशक के शुरुआती दिनों की यादें हैं। इटावा में हमारी ननिहाल में हम लोगों के बाल काटने को बहादुर नामक एक वृद्ध से नाई आते थे जो धोती और कमीज पहने हुआ करते थे और साथ में उनकी पेटी हुआ करती थी जिसमें उनके समस्त उपकरण हुआ करते थे। इटावा की पुरोहितन टोला स्थित हम लोगों की ननसाल में बाहर की ओर बने एक चबूतरे पर हम लोगों को जमीन पर बैठा कर हम लोगों के बाल काटे जाते थे और बच्चों के बाल कटवाने में ज्यादा ऊधम करने पर आवश्यकतानुसार वो बहादुर हम कमजोर बच्चों के सर को अपने दोनों घुटनों के बीच दबा कर भी जबरन बाल काट दिया करते थे।बाल काटते समय बहादुर के लगभग बिना दांत वाले मुँह से हमिंग बर्ड की भांति हम्म-हम्म की आवाज भी आती कल जैसी याद है जो शायद वह कुछ गुनगुनाते रहे होंगे।
लखनऊ में कॉल्विन कॉलेज में बाल काटने की व्यवस्था हम लोगों के अंजुमन हाउस में ही एक ओर थी और वहाँ के नाई लोग अक्सर स्कूल की पॉलिटिक्स बतियाते थे। लखनऊ में एक सैलून काफी प्रसिद्ध हुआ करता था ऐ ऐन जॉन नाम से। वहाँ भी कई बार जाना होता था और उनको भी पुराने किस्से सुनाने की आदत थी।
इलाहाबाद (अब प्रयागराज) में हम लोगों के हॉस्टल सर गंगा नाथ झा छात्रावास के लगभग सामने दो नए सैलून खुले थे एक लाल कुर्सियों वाला और दूसरा नीली कुर्सियों वाला। हम लोग नीली कुर्सी वाले को बेहतर समझ कर प्रिफर करते थे पर वहाँ के कर्मचारियों की बातें कटरा के मामलों से जुड़ी ज्यादा होती थीं, सिविल सर्विसेज और सिविल सर्वेंट्स की बातें वहाँ के पान वाले और चाय की दुकान वाले किया करते थे।
इलाहाबाद सिविल लाइंस में एक प्रसिद्ध सैलून हुआ करता था बुलाकी साहब का। उनके जलवे और नखरे अलग ही थे और होते भी क्यूँ नहीं आखिर हाईकोर्ट के अधिकांश न्यायाधीशगण, बड़े वकील लोग, अधिकारीगण आदि सभी उनके मुरीद थे तो एक तो वहाँ वेटिंग लंबी थी दूसरे बातें भी लेकिन वहाँ बाल कटवाने का आनन्द ही कुछ और हुआ करता था और हाँ वो हज्जाम ही क्या जो दुनिया भर की बातें न करे।
दिल्ली में एक दो किस्से मुझको याद आ रहे हैं, एक तो 1980, 1990 के दशक की याद है हम लोग साउथ एक्सटेंशन और बाद में कभी-कभी लोधी होटल स्थित एक नामचीन पार्लर में बाल कटवाने जाते रहे। वहाँ अत्यंत बड़े अधिकारी, बड़े वकील, बड़े व्यापारी घरानों के लोग और विशिष्ट महिलाओं का आना जाना काफी देखा और हाँ सुप्रीम कोर्ट के कुछ माननीय जज साहब लोगों का भी। इन हेयर स्पेशलिस्ट महोदय के तो जलवे ही निराले रहे हैं जिनका भारत की स्वतंत्रता से पहले का भी इस क्षेत्र में एक गौरवपूर्ण इतिहास रहा है। उनका सभी लोगों से न सिर्फ हँसीं मजाक बराबरी का देखा अपितु वह रिश्ते भी सजेस्ट करते दिखते थे और बड़े-बड़े लीग एक किस्म से उनकी खुशामद सी करते भी दिखते। उनके ही चक्कर में उस जमाने में मुझको अपने बाल कलर करना शुरू करना पड़ा और अपने बाल पूरे तथा जल्दी सफेद तथा कम होने में उनका काफी योगदान में मानता हूँ।
एक और किस्सा; अभी कुछ वर्ष पहले मैं दिल्ली के सरिता विहार इलाके में एक अच्छे से सैलून में बाल कटवाने गया। मैं अपनी दाढ़ी खुद ही बनाता हूँ लेकिन उस दिन मैंने उस नौजवान से कहा कि भाई मेरी दाढ़ी भी तुम्ही बना देना। मेरे बाल काटते में उस नवयुवक ने, जो बहुत सुस्त सा दिख रहा था हाँलाँकि बातें फिल्मों की कर रहा था, तीन चार बार अपने हाथ से कैंची, कंघा जमीन पर गिराये और जैसे तैसे बाल काट कर बोला अब आप अपनी दाढ़ी खुद ही अपने घर जाकर बना लेना।माजरा क्या है पूछने पर ज्ञात हुआ कि वह फिल्मों में जाना चाहता था और पिता के दबाव में वो यह काम लगभग जबरदस्ती ही कर रहा था। उसकी निराशा, मजबूरी और सबसे बड़ी काम करने के प्रति आलस तथा निराशा भरी उसकी अनिच्छा मुझको अक्सर यह सोचने पर मजबूर कर देती है कि जीवन में ऐसा भी होता है।
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