Sindbad Travels-5
दोहा से काहिरा की यात्रा शुरू हो गयी थी।जहाज के उड़ कर हवा में आने के बाद मेरे विचार भी पंख लगा कर उड़ने लगे थे।मेरा इजिप्ट में एक सप्ताह रुकने का कार्यक्रम था।इजिप्ट यानी मिस्र जाने को लेकर मैं बहुत उत्साहित था क्योंकि व्यापार तो करना ही था लेकिन मेरी रुचि विभिन्न देशों के इतिहास और संस्कृति में होने के कारण मैंने इजिप्ट के विषय में जो कुछ भी पढ़ा था उसने मुझको बहुत आकर्षित किया था और अब मेरा मन इजिप्ट को साक्षात देख कर वहाँ के विषय में जानने को उत्सुक एवं उत्साहित था। हम लोग जब पढ़ रहे थे तो “गुट निरपेक्ष आंदोलन” के संदर्भ में मिस्र का नाम “नेहरू-टीटो-नासिर” की तिकड़ी की विरासत के साथ खूब आता था।एक मनोवैज्ञानिक अवधारणा ऐसी बनी हुई थी कि इजिप्ट और यूगोस्लाविया तो भारत के दोस्त हैं मतलब हमारे दोस्त हैं। मैं सोच रहा था कि कैसे होंगे इजिप्ट के लोग?कैसी संस्कृति होगी?नील नदी दिखने में कैसी होगी?मिस्र की गलियाँ यानी कि streets कैसी होंगीं?मिस्र के पिरैमिड कैसे होंगे?स्फिंक्स नज़दीक से देखने में कैसा लगता होगा?मिस्र के फराओ (Pharaohs) यानी कि प्राचीन राजाओं की ममी (Mummies) कैसी लगती होंगी...