Sindbad Travels-14

Sindbad Travels 14

England-2,London day 1

अपना सामान लादे मैं यूथ हॉस्टल पहुँच गया था।ये एक पुरानी संभवतः महारानी विक्टोरिया के काल की बिल्डिंग थी।उसमें काउंटर पर पहुँच कर मैंने अपना नाम बताया और मेम्बरशिप कार्ड दिखाया तो उन्होंने कहा हाँ आपकी बुकिंग है और मुझको मेरे कमरे का बता दिया।ये एक डॉरमेट्रीनुमा कमरा था जिसमें लकड़ी के बहुत अच्छे कई बंक बैड पड़े हुए थे,उनमें से ही एक मुझे अलॉट हुआ था और जो बैड मुझको मिला था वो बंक बैड में नीचे वाला बैड था।उसके सिरहाने ही लकड़ी की  एक छोटी सी अलमारी थी उसमें आप अपना कुछ सामान रख सकते थे और चाहें तो ताला भी लगा सकते थे।यूथ हॉस्टल में बाथरूम और टॉयलेट कॉमन थे किंतु चूंकि उस समय मुझको अपना यूनिवर्सिटी का हॉस्टल छोड़े बहुत समय नहीं हुआ था इसलिए इस बात से मुझको कोई समस्या नहीं थी हाँलांकि आज के समय में ये मेरे लिए एक समस्या अवश्य होती।हॉस्टल में फर्श पर कार्पेट पड़ा हुआ था जिस से स्थान सुंदर प्रतीत होता था।हॉस्टल में पहुँच कर मैंने हाथ मुँह धोया और फिर अपने बैड पर बैठ कर अपना बैग खोला।मेरे साथ घर के बने मीठे शकरपाड़े और मठरी थे सो उनको खाया,कोका कोला पीया और स्वेटर,सूट,ओवरकोट और हाँ पैर में स्पोर्ट्स शूज़ पहन कर तैयार होकर हॉस्टल से निकल पड़ा।अभी तक अधिकतर मैं पैर में दुबई से खरीदे रीबॉक के स्पोर्ट्स शूज़ ही पहन रहा था क्योंकि अधिक पैदल चलने पर चमड़े के जूतों के मुकाबले यही आरामदेह लगते थे हाँलांकि इन स्पोर्ट्स शूज़ को लेकर बाद में चलकर जर्मनी में एक ऐसा किस्सा हुआ जिसके कारण मुझको अपनी ये आदत बदलनी पड़ी थी लेकिन वो किस्सा बाद में कभी बताऊंगा।हॉस्टल के दरवाजे पर एक रैक में लंदन के नक़्शे और अंडरग्राउंड ट्रेन के रूट के नक्शे रखे थे तो वहाँ से मैंने वो Maps ले लिए।विदेशों में खास तौर से यूरोप में शहर के maps का बड़ा अच्छा सिस्टम है और शहर या देश में कहीं भी आने जाने में इनसे बड़ी मदद मिलती है इसलिए कहीं भी पहुँचते ही ये नक्शा ले लेना चाहिए,ये बहुत उपयोगी चीज़ है।अपने देश में न तो इसका रिवाज़ है और ना ही व्यवस्था अलबत्ता अब गूगल मैप आदि से ये समस्या काफी हल हो चुकी है।

जब मैं हॉस्टल से निकला तो पास से ही सबसे पहले मैंने टेलीफोन का कार्ड लिया और पास के टेलीफोन बूथ से सबसे पहले घर फोन करके अपने ठहरने के स्थान आदि की जानकारी दी।हिंदुस्तान से चलते वक्त मेरे पास विभिन्न जगहों से जुटाए हुए कुछ विदेशी व्यापारियों के संपर्क थे।उनमें से लंदन के कुछ नंबरों पर मैंने फोन मिलाया तो एक नंबर पर फोन उठा।वो कोई क्रिश्चियन या अरबीनुमा नाम वाले कोई सज्जन थे उन्होंने मुझको अगले दिन का सुबह 11 बजे के लगभग का मिलने का समय दिया।फिर एक और नंबर पर बात हुई वो अंग्रेज से लगे उन्होंने मुझको दो दिन बाद का मिलने का समय दिया।मतलब दो appointment हो गए थे।मैंने सोचा कि अब कुछ लंदन देखने का कार्यक्रम भी कर लिया जाए।

लंदन लगभग 2000 वर्ष पुराना शहर है और इसकी स्थापना लगभग सन 43 ईस्वी में हुई ऐसा माना जाता है।इसके नाम के विषय में दो मान्यताएं हैं।एक तो कुछ लोगों का मानना है कि लंदन नाम का origin, King Lud से है,ये बात Geoffrey of Monmouth के 1136 के Historia Regum Britanniae में उल्लिखित है।दूसरे और ज्यादा मान्य विचार के अनुसार इस शहर को रोमन लोगों ने बसाया था और इसका मूल नाम Londinium रखा गया था,ये बात सन 43 ईस्वी की है।

1991 में जब मैं पहली बार  इंग्लैंड गया तो लंदन की जनसंख्या उस समय लगभग 26 लाख की थी और वृहद लंदन की लगभग 68 लाख। लंदन देखने में एक बहुत खूबसूरत शहर है और हो भी क्यों नहीं आखिर ये उस देश की राजधानी है जिनके राज्य में एक जमाने में सूरज कभी  नहीं डूबता था और फिर न जाने कितने देशों की बेबस जनता से लूटे हुए पैसे से यहाँ की समृद्धि और सुंदरता जुड़ी हुयी थी।लंदन शहर के कुछ इलाकों में हमारे देश के बड़े शहरों के समृद्ध इलाकों से कहीं कहीं साम्य प्रतीत हुआ जैसे कि यहाँ कई बिल्डिंग देख कर ऐसा लगता है कि हमने बम्बई (अब मुंबई) में भी ऐसा कुछ देखा है।जहाँ तक मौसम का सवाल है तो काफी ठंड महसूस हो रही थी।लंदन में मौसम बहुत ही चंचल या कहें कि unpredictable किस्म का होता है।अभी मौसम साफ है और अभी ही बारिश होने लगे और ठंड भी काफी हो जाये।

लंदन देखने के क्रम में मैंने Trafalgar Square चलने का मन बनाया और underground का map देख कर Earl's court station से Charing Cross station की मेट्रो या जिसको अंडरग्राउंड अथवा ट्यूब भी कहते हैं वो पकड़ी। Earl's Court से Charing Cross Station पहुंचने में लगभग 20-22 मिनट लगे और स्टेशन से बाहर निकल कर मैं पैदल चल कर प्रसिद्ध ट्रैफलगर स्क्वायर पर पहुँच गया।Trafalgar Square, Central London में City of Westminster में अवस्थित है।इसका निर्माण अंग्रेजों के नेपोलियन के समय फ्रांस और स्पेन की सेनाओं से लड़े गए और अंग्रेज़ नौसेना द्वारा जीते गए Battle of Trafalgar की याद में  सन 1840 मैं पूरा हुआ था।इसके डिज़ाइनर सर चार्ल्स बैरी थे।रोचक बात ये थी कि यहाँ पर जो फव्वारे चल रहे थे उनका निर्माण सन 1937 से 1939 के बीच दिल्ली  की लुट्यन्स ज़ोन बनाने के बाद Sir Edwin Lutyens ने ही किया था।ये जानकर मुझको अपनी दिल्ली की Lutyens Zone की भव्य इमारतों और दिल्ली में इंडिया गेट के आसपास के फव्वारों की याद आ गयी।

ट्रैफलगर स्क्वायर पर सड़कों के बीच में एक बहुत बड़ा स्थान है और उस पर अनगिनत कबूतर बैठे दाना चुगते हुए  टहल रहे थे।बहुत से लोग उन कबूतरों को दाना डाल रहे थे और कुछ लोग दाना बेच भी रहे थे।अन्य लोगों की देखा देखी मैंने भी कबूतरों को दाना खिलाया और ये करते हुए मुझको वाकई अच्छा लगा।हमारे देश में भी कई जगह लोग कबूतरों,चिड़ियाओं और बंदरों आदि को खिलाते हैं इसका भी एक अलग ही आनंद है।लोगों ने ये भी बताया कि इस स्थान का प्रयोग शांतिपूर्ण धरना प्रदर्शन,सामाजिक गतिविधियों के लिए इकट्ठा होने हेतु भी किया जाता है।बहरहाल मुझको तो वहाँ पर मेरे जैसे सैलानियों की भीड़ और दाना खाते कबूतर ही गुंटर गूँ करते दिखे।ठंड का मौसम,सैलानियों की भीड़ और उनसे भी ज्यादा कबूतरों की चहल पहल इस सबसे वहाँ एक अद्भुत समां सा नज़र आ रहा था।बताया गया कि महारानी विक्टोरिया के समय से कबूतरों को दाना खिलाने आदि का इस जगह पर प्रचलन रहा है,हाँलांकि अब जब 2017 में ये संस्मरण लिख रहा हूँ तो इस समय ट्रैफलगर स्क्वायर पर कबूतरों को दाना खिलाने पर सुना है बिल्कुल रोक लगाई जा चुकी है लेकिन उस समय ये एक कबूतर सैलानियों के लिए एक  विशेष आकर्षण के केंद्र हुआ करते थे।

शाम हो चली थी और मैं भी अपने ठहरने के इलाके की ओर underground tube से चल पड़ा था। Earl's Court station से बाहर निकल कर मैंने आसपास का इलाका देखा।उस इलाके में भीड़ थी और अंग्रेज़ अधिक दिख रहे थे।नौजवान लोग pubs & bars पर काफी थे और burger-coca cola मिलने वाली जगहों पर भी।शाम को जब मैं टेलीफोन बूथ मैं घुसा तो नज़ारा सुबह से फर्क था।टेलीफोन बूथ मैं बीयर आदि की खाली बोतलें पड़ा होना और बड़े बड़े अक्षरों में बहुत से फोन नम्बर लिखा होना एक आम बात थी।बाद में किसी से मालूम पड़ा कि वो नम्बर उन लोगों ने लिखे होते थे जिनसे लोग दिन ढलने के बाद संपर्क कर सकते थे।मतलब कि दिन ढलते ढलते समाज का विकृत रूप उजागर होने लगता था और सुबह सब कुछ उजला उजला सा ही दिखता था मतलब कि रात के टेलीफोन बूथ को आप सुबह-दिन में पहचान ही नहीं सकते थे वो बिल्कुल साफ सुथरा दिखता था मानो इसकी दीवारों पर कभी किसी ने कुछ नहीं लिखा था।मुझको ये बात बड़ी विचित्र लगी और विश्व के खुले समाज और लोकतंत्र के अलंबरदारों का ये hypocratic चेहरा भी पहचान मैं आया।मैंने महसूस किया कि वास्तव में हमारे देश की संस्कृति पर हम लोग जो गर्व करते हैं वो अकारण नहीं है।बहरहाल रात को पास में ही बर्गर खा कर और कोका कोला पीकर यानी कि डिनर करके मैं यूथ हॉस्टल में अपने बेड पर आ गया।इस समय तक मैं थक कर बुरी तरह चूर हो चुका था।कमरे में उस समय तीन चार लोग और थे उनसे थोड़ी हाय-हलो हुई और फिर मैं अगले दिन संभावित व्यापारी से मिलने और अन्य कामों के विषय में सोचता हुआ न जाने कब सो गया।

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