Sindbad Travels-22 France-1 Paris 1st day

Sindbad Travels-22

France-1 -Paris

Reached Paris 1st day

लंदन के हीथ्रो हवाई अड्डे से तमाम औपचारिकताओं को पूरा करके,सुरक्षा जांच करवाकर मैं एयरपोर्ट की लाउंज में बैठ कर अपनी फ्लाइट की बोर्डिंग की घोषणा होने का इंतज़ार करने लगा।मैं सोच रहा था कि इतने दिन हो गए घर से चले हुए और अब तक जो स्थान एवं देश मैं घूम चुका था उनके दृश्य और लोग मानो मेरे मस्तिष्क में घूम रहे थे।दुबई के शरद चतुर्वेदी भाईसाहब और कपूर साहब,आबूधाबी के मत्तार साहब,बहरीन के रतन कपूर भाईसाहब और अर्चना भाभी और साथ ही वो मोतियों के अंधे व्यापारी,दोहा के इस्माइल शेख और काहिरा के मिस्टर मैगदी,लंदन के मिस्टर जेम्स सलीम जो सद्दाम के दोस्त बताये गए थे और मिस्टर एडवर्ड जिन्होंने मेरे यूथ हॉस्टल में ठहरने का संज्ञान लिया था और हाँ वो बुजुर्ग महिला जिन्होंने कोक की खाली कैन डस्टबिन में ना डालने पर मुझको दौड़ा लिया था।कितनी बड़ी दुनिया,कितने भिन्न देश,उनकी भिन्न भिन्न भाषाएं और उनकी अलग अलग संस्कृति किन्तु मानव स्वभाव सब स्थानों पर एक जैसा ही लगा।मैं यही सब बातें सोच रहा था कि अचानक उद्घोषणा सुनाई पड़ी कि लंदन से पेरिस को जाने वाली एयर फ्रांस की उड़ान की बोर्डिंग शुरू हो गयी है।मैं भी लाइन में लग कर थोड़े समय में जहाज में अपनी सीट पर बैठ गया।यहाँ भी मुझको खिड़की वाली सीट मिल गयी थी।

एयर फ्रांस के जहाज के अंदर की साज सज्जा बहुत आकर्षक और सुंदर थी और साथ ही साथ तरह तरह के सेटों की खुशबुएँ।एयर होस्टेस ने पहले फ्रेंच भाषा और फिर अंग्रेज़ी में उदघोषणा की और बताया कि लंदन से पेरिस की हमारी ये यात्रा लगभग 1 घंटे और 20 मिनट की होने वाली थी।जहाज रनवे पर चला,दौड़ा और फिर हवा में उड़ लिया और साथ ही साथ मैं भी अपनी विचार श्रृंखला में खोने लगा।

मैं सोच रहा था कि अब अगला मुकाम पेरिस,फ्रांस है।फ्रांस के नाम से सबसे पहले मुझको ध्यान आये इलाहाबाद विश्वविद्यालय में इतिहास की क्लास के मेरे गुरु रहे श्री विनय चंद्र पांडे जी और ध्यान आ गयी मुझको यूरोपियन हिस्ट्री की क्लास जिसमें श्री वी सी पांडे जी रैनिसां अर्थात पुनर्जागरण और फ्रेंच रिवोल्यूशन पढ़ाते थे।उनका कई-कई  हफ्तों तक फ्रेंच रिवोल्यूशन पढ़ाना जीवन का एक ऐसा अनुभव था जो उनके विद्यार्थी सदैव याद रखते हैं।ये हम लोगों का सौभाग्य था कि हमको श्री विनय चंद्र पांडे जैसे अति श्रद्धेय व्यक्ति और अद्भुत,अद्वितीय विद्वान शिक्षक से पढ़ने का मौका मिला और मैंने तो बाद में उनके मातहत डी0 फिल0 भी जॉइन की थी जो मैं पूरी नहीं कर पाया।फ्रेंच रिवोल्यूशन ध्यान आने के साथ ही मैं सोचने लगा कि अब मैं उस सरजमीं पर जा रहा हूँ जहाँ से आधुनिक युग में दुनिया को मानवाधिकार,Liberty,Property,security,resistance to oppression,अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता,प्रेस की स्वतंत्रता के अधिकार मिलने की शुरुआत हुई।ये 1789 का फ्रेंच रिवोल्यूशन ही था जिस से सरकारी पदों पर काबिलियत के आधार पर पहुँचने का रास्ता दिखाया बनिस्पत जन्म के आधार के।

मैं ये सोच कर बहुत उत्साहित था कि जल्द ही मैं पेरिस पहुँचने वाला हूँ।वो पेरिस जहाँ से दुनिया भर की फैशन के ट्रेंड शुरू होते हैं।वो पेरिस जो दुनिया के सबसे खूबसूरत शहरों में प्रमुख स्थान रखता है।वो पेरिस जो कला, पाक-व्यंजन कला, संस्कृति, फैशन, विज्ञान और वाणिज्य हर क्षेत्र में विश्व में अपनी एक अनूठी और प्रमुख पहचान रखता है।वो पेरिस जहाँ विश्व प्रसिद्ध आइफ़िल टॉवर है,जहाँ खूबसूरत सीन नदी है,वो पेरिस जहाँ विश्व प्रसिद्ध लूवर (Louvre) म्यूज़ियम है जिसमें अनेकों अनूठी कलाकृतियां आदि हैं और मोनालीसा भी।पेरिस एक ऐतिहासिक शहर भी है और आधुनिकतम शहर भी।ऐसे शहर को देखना कितना रोमांचकारी होगा।

मैं ये सब सोच रहा था कि अचानक मेरा ध्यान अपनी खिड़की से बाहर गया और ऐसा लगा कि जैसे रुई के गोलों के ऊपर हमारा जहाज तैर रहा है।दूर दूर तक जिधर नजर जाए उधर रुई के गोले रूपी बादल ही बादल थे।मैं मंत्रमुग्ध सा होकर उस दृश्य को देख रहा था कि तभी लगा जैसे जहाज बुरी तरह से हिचकोले ले रहा है,मुझको कुछ डर सा भी लगा।बादल काले हो चले थे और कड़कती बिजली दिखाई दे रही थी।काफी देर जहाज ऊपर नीचे होता रहा।बाद में मालूम हुआ कि लंदन पेरिस के बीच ये आम बात है और बाद की यात्राओं में मैंने अनुभव किया कि खास तौर से जब पेरिस से लंदन जाएं तो लंदन के पास पहुँचने पर ऐसा अनुभव होना एक आम बात है।कुछ देर बाद एक और बहुत ही अद्भुत दृश्य देखने को मिला कि नीचे इंग्लिश चैनल का समुद्र दिख रहा था और उसमें बड़ी बड़ी मछलियां ऊपर को उछलती और फिर पानी में चली जातीं,ये दृश्य भी बड़ा ही मनोरम था।थोड़ी देर में ही जहाज नीचे आना शुरू हो गया।एयर होस्टेस ने अनाउंस किया कि हम लोग पेरिस के चार्ल्स डि गॉल हवाई अड्डे पर पहुँचने वाले थे।अब ऊपर से पेरिस दिखना शुरू हो गया था और दिन होने के कारण खूब व्यवस्थित हरियाली दृष्टव्य थी।थोड़ी देर में ही जहाज पेरिस के हवाई अड्डे पर उतर चुका था और हम लोग जहाज के बाहर टनल से निकल कर विश्व के सुंदरतम हवाई अड्डों में से एक ‘चार्ल्स डि गॉल’ हवाई अड्डे पर थे।

हवाई अड्डे पर हम लोग  आप्रवासन यानी कि  इमीग्रेशन की लाइन में लगे हुए अपना नम्बर आने का इंतज़ार कर रहे थे।जब मेरा नम्बर आया तो इमीग्रेशन अधिकारी ने मेरा पासपोर्ट देखा और बहुत ही रूखे स्वर में मुझसे पूछा कि क्या तुम पहले भी कभी फ्रांस आये हो।मेरे मना करने पर और ये बताने पर कि मैं पहली बार फ्रांस आ रहा हूँ उसने पूछा कि क्यों आये हो?मैंने जवाब दिया कि व्यापार के लिए।इस पर उसने फिर पूछा कि तुम रुकोगे कहाँ?इस पर मेरा जवाब था कि मैं किसी भी अच्छे होटल में रुक जाऊँगा।इस पर भी वो महोदय संतुष्ट नहीं थे और बोले पैसे हैं तुम्हारे पास?मैंने जवाब में कहा कि जी बिल्कुल हैं।उस अधिकारी ने फिर कहा कहाँ हैं पैसे ? इस पर मैंने उनको पासपोर्ट के पिछले पन्ने की तरफ इशारा करते हुए कहा कि देखिए ये चढ़े हुए हैं।लेकिन उन महाशय को तो शायद मेरी शक्ल ही अच्छी नहीं लग रही थी सो वो इस पर भी संतुष्ट नहीं हुए और बोले,नहीं,नहीं मुझको पैसे दिखाओ कि तुम्हारे पास हैं।अब मैं क्या करता,मैंने अपना एयर बैग एक तरफ रखा,वीडियो कैमरा बैग रखा फिर कोट की बटन खोली,स्वेटर ऊपर किया,शर्ट की बटन खोली और उसके अंदर पहनी अपनी बंडी की जिप खोलने लगा तो वो बोले कि अरे अरे ये क्या कर रहे हो।इस पर अपनी झल्लाहट भूल हँसते हुए मैंने कहा कि सुरक्षावश मैं रुपये ऐसे ही सम्भाल कर रखता हूँ और मैंने उनको डॉलर दिखाए इस पर हँसते हुए उसने मेरे पासपोर्ट पर मुहर का ठप्पा लगा दिया और बोला जाओ,मौज करो।मैं भी धन्यवाद कह कर आगे फ्रांस की सीमा में दाखिल हो गया।आज दुनिया के इतने देशों की यात्रा करने के पश्चात मेरा अनुभव ये है कि देश कोई भी हो इमीग्रेशन पर अधिकतर कुछ कड़े,न मुस्कुराने वाले और अक्सर कुछ खड़ूस किस्म के ही अफसर तैनात होते हैं।

अब अपना सामान लेकर मैं खड़ा था विश्व के एक शानदार,अति खूबसूरत हवाई अड्डे चार्ल्स डि गॉल पर।इस हवाई अड्डे का दूसरा नाम Roissy Airport भी है।इस हवाई अड्डे का नाम द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान स्वतंत्र फ्रांस की सेनाओं के नायक चार्ल्स डि गॉल के नाम पर रखा गया जो कि फ्रांस के पाँचवे गणतंत्र (French 5th Republic ) के संस्थापक और 1959 से 1969 तक फ्रांस के राष्ट्रपति भी रहे थे।जब इस हवाई अड्डे के बनाने की बात हुई तो फ्रांस में ये तय किया गया कि फ्रांस जिस कलात्मकता,फैशन और सोच के लिए मशहूर है ये हवाई अड्डा उसी के अनुरूप एक अद्भुत कारीगरी और सुंदरता भरी डिज़ाइन का नमूना होना चाहिए और वास्तव में ये उस से बेहतर ही बना जैसा इसको बनाने के पहले सोचा गया था।इसका निर्माण 1966 में आरम्भ हुआ और 1974 में चार्ल्स डि गॉल नाम इसको मिला।इस हवाई अड्डे के इंजीनियर थे प्रसिद्ध पॉल आंद्रेय (Paul Andrey). ये हवाई अड्डा पेरिस से 25 किलोमीटर उत्तरपूर्व में स्थित है।वास्तव में ये हवाई अड्डा जैसा सुना था वैसा ही पाया।पहले एक क्षण को तो मैं इसकी चकाचौंध से हतप्रभ रह गया।जैसे अब सड़कें एक दूसरे के ऊपर से गुजरती हैं वैसे वहाँ अजीब सी गोल घेरे की पारदर्शी प्लास्टिक या एक्रिलिक से घिरी टनल जैसी में मूविंग स्ट्रिप्स पर यात्री निकल और चल रहे थे  और एक ही बड़े हॉल जैसे में से ये मूविंग टनल्स एक दूसरे के ऊपर से यात्रियों को इधर से उधर ले जा रहे थे,ये एक ऐसा दृश्य था जो बहुत ही गजब का लग रहा था और लोगों को चमत्कृत करने को पर्याप्त था।इस हवाई अड्डे पर बड़े बड़े हॉल नुमा गलियारे, ऊपर थोड़ी नीची सीलिंग पर बड़ी सी, काफी बड़ी सी कनसील्ड किस्म की दूधिया लाइटिंग और फिर आगे बढ़ने पर छत पर अपेक्षाकृत छोटी लाइटें।जब और आगे बढ़े तो छत की डिज़ाइनै आर्च नुमा हो गईं थीं।गलियारों में विभिन्न ब्रांडों की दुकाने भी थीं।यहाँ ये भी ध्यान रखना होगा कि मैं 1991 में भारत से गया था तो तब हमारे हवाई अड्डे इतने शानदार और आधुनिक नहीं थे तो थोड़ा आश्चर्य होता भी अधिक था।वहीं मैंने मनी एक्सचेंजर से कुछ डॉलर देकर फ्रेंच फ्रैंक्स बदले में ले लिए।मैंने हिसाब लगाया था तो जैसा मुझे हल्का सा ध्यान है उस समय 1 फ्रेंच फ्रैंक बराबर था लगभग 5 भारतीय रुपयों के।

हवाई अड्डे की इन्फॉर्मेशन डेस्क से मैंने यूथ हॉस्टल की बुकिंग के विषय में जानकारी ली।यहाँ भाषा की थोड़ी सी समस्या आयी।उन्होंने एक पता लिख कर दिया,मैं हवाई अड्डे से बाहर निकला और टैक्सी वाले को पते का वह कागज देकर टैक्सी में बैठ गया।टैक्सी में बैठ कर जब चले तो पेरिस की पहली झलक दिखनी शुरू हुयी।

फ्रांस की भौगोलिक सीमाएं भूमध्य सागर से इंगलिश चैनल और उत्तरी सागर तथा राइन नदी से अटलांटिक महासागर तक हैं।इस देश के उत्तर पूर्व में बेल्जियम और लक्समबर्ग,पूर्व में जर्मनी और स्विट्जरलैंड,दक्षिण पूर्व में इटली और मोनाको तथा दक्षिण में स्पेन है।फ्रांस की राजधानी पेरिस है।इसके को-ऑर्डिनेट्स 48°51’ N एवं 2°21’ E हैं।भारत और फ्रांस में जाड़ों के मौसम में 4 घंटे 30 मिनट का समय का फर्क है,भारत फ्रांस से साढ़े चार घंटे समय में आगे है अर्थात जब फ्रांस में दोपहर के 12 बजेंगे तो भारत में शाम के साढ़े चार बजे होंगे  जबकि गर्मियों में फ्रांस में समय 1 घंटे आगे हो जाने से भारत और फ्रांस के समय में फर्क साढ़े तीन घंटे का ही रह जाता है।पेरिस की सुंदर इमारतें देखते और सीन नदी के किनारे से होते हुए ड्राइवर ने मुझको मेरे गंतव्य पते पर उतार दिया।मैंने ड्राइवर से ही इशारों में पूछा कि जहाँ मुझे जाना है वो जगह कहाँ है तो उसने सामने एक पतली सड़क या गली कहूँ तो बेहतर होगा उसकी तरफ इशारा कर दिया।वो चिकने से पत्थरों की सड़क थी और उस पर अधिक भीड़ नहीं थी।मैं अपनी पहिये वाली ट्रॉली पर अटैची,सैम्पिल वाली अटैची,बैग,ब्रीफकेस,कंधे पर वीडियो कैमरे का बैग,स्टिल कैमरा आदि लादे हुए चल पड़ा,सड़क पर पत्थर जड़े होने के कारण ट्राली के पहिये खड़-खड़ आवाज करते चल रहे थे।उस घुमावदार सड़क पर लगभग आधे किलोमीटर चल कर मुझको वो पता मिला जहाँ मुझे पहुँचना था।मैं उसको यूथ हॉस्टल का पता समझ रहा था किंतु ये वहाँ के पर्यटन विभाग का ही बुकिंग ऑफिस था।अब समस्या फिर विकट थी।उस ऑफिस में जो जनाब बैठे थे उनको अंग्रेज़ी ठीक से क्या बिल्कुल ही नहीं आती थी लेकिन गनीमत ये हुई कि उस ऑफिस में ही एक नौजवान लड़की बैठी थी वो अंग्रेज़ी काफी कुछ बोल और समझ लेती थी सो उसने  एक तरह से दुभाषिये की तरह काम किया और अंततः मेरी यूथ हॉस्टल की बुकिंग हो गयी और उन्होंने मुझको पैसे जमा करके बुकिंग का एक कागज दे दिया।उस ऑफिस से निकल कर मैं अपने सामान की ट्रॉली आदि लेकर मेन रोड के लिए चल दिया।ट्रॉली लगातार खड़खड़ाती सी आवाज कर ही रही थी।जब मुझको उस सड़क पर चलते चलते लगभग पौन किलोमीटर हो गया और मुख्य सड़क जिधर से मैं टैक्सी से उतर कर आया था वो दिखी ही नहीं तो मुझको लगा कि कुछ गड़बड़ हो गयी है।मैंने दो तीन लोगों से पूछना चाहा तो फिर से भाषा की समस्या आड़े आयी।मैंने महसूस किया कि यद्यपि पेरिस में बहुत से लोग अंग्रेज़ी जानते भी नहीं थे किंतु बहुत से ऐसे भी थे जो जानकर भी अनभिज्ञ ही बन रहे थे।खैर,थोड़ी देर में एक व्यक्ति मिला जिस से पूछने पर ज्ञात हुआ कि मैं रास्ते पर उल्टी दिशा में आ गया हूँ और मुख्य सड़क के लिए मुझको वापिस उसी दिशा में जाना होगा जिधर से मैं आया था यानी कि लगभग दुगुनी दूरी फिर से तय करनी थी अपने सारे सामान के साथ।अब मैं मुड़ कर वापिस मुख्य सड़क की दिशा में चल दिया।मैं मुश्किल से 25-50 कदम ही चला था कि खड़-खड़ करती मेरी ट्रॉली का एक पहिया टूट गया।अब तो बड़ी मुसीबत थी।ट्रॉली चलने के काबिल नहीं बची और सामान था 2 अटैची,1 एयर बैग,एक ब्रीफ केस,वीडियो कैमरा और स्टिल कैमरा आदि।अब ये सारा सामान हाथ में उठा कर भी मुख्य सडक़ तक ले जाना मुमकिन नहीं था।मैं बहुत परेशान हो गया कि अब क्या किया जाए,इतने सारे सामान के साथ आखिर मुख्य सड़क तक कैसे पहुँचा जाए…. अचानक मुझको अपने सुभाष मामा का एक गुरुमंत्र याद आया।उन्होंने एक बार कहा था कि If you want to become an exporter, you have to become a Porter first (Ex-porter).ये बात दिमाग में कौंधते ही मन ने कहा कि यहाँ पेरिस की गलियों में आखिर मुझको देख ही कौन रहा है और फिर परिस्थिति भी मरता क्या न करता वाली ही हो चली थी तो फिर कोई और चारा न देख आखिरकार मैंने पहले एक अटैची उठायी,फिर दूसरी को अपने सर पर रखा और उसके ऊपर टूटी ट्रॉली,बैग और ब्रीफकेस को भी,कैमरे गले में लटके ही थे और इस प्रकार फ़िरोज़ाबाद के एक्सपोर्टर पेरिस में एक पोर्टर बन कर अपना सामान अपने सर पर लाद कर और दोनों हाथों से सामान को सर पर पकड़े हुए उस गली से मुख्य सड़क की ओर चल पड़े।मैं मन ही मन खीझ भी रहा था कि देखो ये क्या हुआ कि पेरिस में आकर सर पर कुलियों की भांति 60-65 किलो वजन उठा कर चलना पड़ रहा है लेकिन तसल्ली इस बात की थी कि चलो इस परदेस में मुझको कोई जानता पहचानता तो नहीं है कम से कम।मैं ये सोचते हुए आगे बढ़ ही रहा था कि किसी ने मुझको पीछे से आवाज दी,”hey what are you doing here with your luggage?” खिलखिलाती हँसी के साथ आयी इस आवाज से मैं ठिठक गया और मानो मेरे कदम वहीं थम से गए और मेरे दिमाग में ये बात आई कि यहाँ पेरिस में मुझको किसने आवाज दी।

Comments

  1. वाह अतुल भाई ... बहुत आनंद आया ! आपकी हालात पढ़ कर कल्पना में भी बड़ा आनंद था ... इस आपबीती के अनुभवों को पढ़ना भी एक तरह का जीवन ज्ञान है ! अब आगे उत्सुकता यह रहेगी कि आपको कौन सी लड़की ने उस पेरिस की गली में पकड़ा ! 😊😊

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    1. हा हा हा संदीप भाई।बस अगली किश्त में बता दूँगा।

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  2. Kकलाम के जादूगर को सलाम,सजीव चित्रण की अनूठी मिसाल हैं आप,अब आप विस्मय पैदा करने की कला में भी माहिर हो चुके हैं,ऐसे स्थान पर लिखना बंद कर देते हैं कि उत्सुकता बानी रहे,आपको किसने आवाज़ दी ये उत्सुकता अगला अंक आने त बानी ही रहेगी,बेसब्री से अगले अंक का ििनतज़ार रहेगा

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  3. This comment has been removed by the author.

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