Sindbad Travels-24 France-3 Paris 1st day

Sindbad Travels-24

France-Paris 1st day

Arc de Triomphe

सिंदबाद ट्रेवल्स-24

फ्रांस-पेरिस दिन-1

आर्क दे ट्रॉइम्फ


Avenue de Champ Elysees से जैसे ही आगे बढ़े तो क्षण भर को तो ऐसा लगा कि हम पेरिस में न होकर दिल्ली आ गए हैं क्योंकि मेरे सामने जो इमारत थी वो इंडिया गेट जैसी दिखी।दरअसल यह इमारत पेरिस की प्रमुख पहचानों में से एक  Arc de Triomphe थी।मैंने हिरान से कहा कि इस इमारत और हमारी दिल्ली के इंडिया गेट में देखने में बहुत कुछ साम्य प्रतीत होता है।उसके बताने पर मालूम हुआ कि जैसे इंडिया गेट विश्व युद्ध में शहीद सैनिकों के सम्मान हेतु बनाया गया था और उनके नाम इस पर उत्कीर्ण हैं उसी भाँति Arc de Triumphe है। ऑस्ट्रिटज़ की विजय के पश्चात ईस्वी सन 1806 में अपनी सफलता के शिखर पर आसीन सम्राट नेपोलियन ने इसको कमीशन किया/बनवाना शुरू किया था और 29 जुलाई 1836 को इसका उद्घाटन हुआ, हाँलांकि नेपोलियन की तब तक मृत्यु हो चुकी थी।बाद में सन 1840 में सम्राट नेपोलियन के पार्थिव शरीर के अवशेष  सेंट हेलेना द्वीप से लाकर invalides में दफनाने को ले जाते समय इसी इमारत के बीच से ले जाए गए थे।यह भव्य इमारत उन सभी शहीदों के प्रति सम्मान की प्रतीक है जो फ्रांस के सम्मान के लिए विभिन्न युद्धों जैसे नेपोलिएनिक युद्ध, फ्रांस की क्रांति आदि में लड़े और शहीद हुए।इन सभी शहीद सिपाहियों और जनरलों के नाम इस पर अंकित हैं।इसके नीचे प्रथम विश्व युद्ध के अनाम शहीद का मकबरा भी है।यूरोप की ये पहली इमारत है जिसमें उन अनाम शहीदों की स्मृति में अमर शाश्वत अखंड ज्योति प्रज्वलित है जिनके नाम कभी मालूम नहीं पड़े।1961 में अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति जॉन एफ केनेडी और उनकी पत्नी ने यहाँ का दौरा किया था और इस अमर जवान ज्योति से बहुत प्रभावित हुए थे।राष्ट्रपति केनेडी की हत्या के बाद जब उनको वर्जीनिया के अर्लिंगटन राष्ट्रीय कब्रिस्तान में दफनाया गया तो उनकी पत्नी ने उनकी कब्र के पास Arc de Triomphe जैसी अखंड ज्योति जलाए जाने की इच्छा प्रकट की थी और वहाँ फिर ऐसी ही ज्योति जलाई भी गई।

Arc de Triomphe जाने को Champ Elysée या avenue de la grande armee  से underpass के रास्ते भी पहुँचा जा सकता है। यह विश्व प्रसिद्ध स्मारक अर्थात Arc de Triomphe सीन नदी के दाहिने तट से थोड़ी दूरी पर  स्थित 50 मीटर (164 फीट) ऊंची इमारत है। इसके पास के मेट्रो स्टेशन का नाम  Charles de Gaulle Etoile हैं।यह इमारत रोम के टाइटस के arc (Arc of Titus) से प्रेरित है।इसका स्थापत्य प्राचीन रोमन स्थापत्य कला का neo classical version है।इसके खंभों पर शानदार स्थापत्य कला का नमूना दिखता है विभिन्न मूर्तियों के रूप में जो इमारत के आयताकार खंभों पर उकेरी गई हैं और उनकी कलात्मकता,कारीगरी की सफाई और सुंदरता तथा सुगढ़ता देखते ही बनती है।चूँकि यह स्मारक 1792, 1810, 1814 और 1815 के युद्धों की जीतों की याद के तौर पर बनाने की शुरुआत की गई थी तो इसमें मुख्यतः चार किस्म के मूर्तिकारों की टीमों ने काम किया बताते हैं।किसी ने ये भी बताया कि इसमें 6 किस्म की उभरी हुई नक्काशी की डिजाइनें बनाई गई हैं जो फ्रांसीसी क्रांति के 6 महत्वपूर्ण चरणों की परिचायक हैं।

आर्क दे ट्रायम्फ के आस पास दिल्ली के इंडिया गेट की तरह ही खूब चहल पहल रहती है।हिरान ने मुझको बताया कि शहीदों का स्मारक स्थल होने के कारण लोग इस इमारत का बहुत सम्मान करते हैं और इसी कारण से आर्क के ठीक नीचे से अनाम शहीद स्मृति बनने के बाद से कोई परेड नहीं निकाली जाती।यहाँ तक कि जब 1940 में हिटलर ने पेरिस पर जीत हासिल कर अपनी परेड निकाली तो उसने भी शहीद का सम्मान करते हुए इमारत के बीच से परेड नहीं निकाली और 1944 में पेरिस को वापिस जीतने के पश्चात जनरल दी गॉल ने भी इस प्रथा का पालन किया।

इंडिया गेट से साम्य होने के कारण मुझको यह इमारत बहुत अच्छी लगी और मैं जितनी बार भी पेरिस गया हूँ मैं हर बार इस जगह गया। बाद की एक यात्रा (सन 2000 में) मुझको मालूम पड़ा कि Arc de Triomphe में ऊपर भी जाया जा सकता है तो मैं टिकट लेकर ऊपर भी गया।इमारत के पायों के बीच बनी पत्थर की 284 चौड़ी सीढ़ियाँ जो कि चौकोर इमारत में अंदर गोलाकार रूप में बनी हुई हैं और एक तरफ लोहे की रेलिंग लगी हुई हैं,उन सीढ़ियों  से चढ़ कर जब आप 150 फिट से भी अधिक ऊँचाई पर पहुँचते हैं तो वहाँ से पेरिस के नजारे की बात ही कुछ और है।एक तरफ नीचे साफ पानी से भरी हुयी सीन नदी बह रही है उसमें चलती खूबसूरत नाव नजर आती हैं तो बगल में ही आइफ़िल टावर खड़ा हुआ है जो इतना विशाल है और लगता है बिल्कुल पास ही तो है,सहसा मन करता है कि हाथ बढ़ाओ और छू लो लेकिन फिर समझ आता है कि असलियत में इतना पास भी नहीं है कि छू लो। ऊपर से चारों तरफ देखने पर एक ओर एक बिल्डिंग की सबसे ऊपर की छत पर बहुत शानदार बगीचा भी बना दिखा जिसमें कुर्सी और सोफा भी पड़ा हुआ था मतलब पचासों फीट की ऊँचाई पर बगीचे में बैठ कर पेरिस की ख़ूबसूरती का आनन्द उठाने की व्यवस्था थी।

150 फिट ऊपर आर्क दे ट्रायम्फ की समतल पथरीली छत पर कभी कभी हवा काफी तेज और ठंडी महसूस होती है।यहाँ पर पर्यटक इतनी ऊंचाई से पेरिस को मन भर कर देख सकें,उसकी ख़ूबसूरती का लुत्फ उठा सकें इसके लिए एक बहुत दमदार दूरबीन भी लगी हुई थी।छत पर भी पर्यटकों की चहल पहल भरपूर थी और फोटो तो इतनी खींची जा रही थीं कि कैमरे की क्लिक क्लिक की आवाज़ें जैसे एक लयबद्ध तरीके से लगातार सुनाई पड़ रही थीं।

Arc de Triomphe के ऊपर छत पर पहुँच कर जब आप देखते हैं तो लगता है कि पेरिस के सारे रास्ते बस इसी जगह को आते हैं।अपने इंडिया गेट से भी थोड़े बड़े गोल चक्कर पर पेरिस की 12 सड़कें यहाँ पर आकर मिलती है।उन सड़कों पर चलती शानदार कारें 150 फिट की ऊँचाई से खिलौने जैसी नजर आती हैं।सचमुच जब आप आर्क दे त्रिओं (Arc de Triomphe)  की छत पर से लंबे बाँस नुमा लोहे की छड़ों की बेहद खूबसूरत रेलिंग के बीच से नीचे देखते हैं तो नजारा बड़ा ही मनमोहक लगता है।सड़कों के बीच में इमारतें बनी हुई हैं और चूंकि सड़कें इस गोल चक्कर पर आकर सिमटती सी मिलती हैं तो ऊपर से देखने पर ऐसा लगता है जैसे सड़कें अंग्रेज़ी के 'V’ अक्षर की भांति फैलती जाती हैं और उनके बीच में एकसार इमारतें बनी हुई हैं,सुंदर चौकोर और आयताकार कटिंग किये हुए पेड़ एक अलग ही छटा बिखेरते दिखते हैं।किसी ने बताया था कि चूंकि अंग्रेज पेड़ों को उनके स्वाभाविक शेप में रहने देते हैं तो उनके विपरीत फ्रांसीसी लोग पेड़ों की काँट छंट कर अपनी डिज़ाइन के अनुरूप उनको शेप दे देते हैं,कारण कुछ भी हो लेकिन कुल मिलाकर यह सब एक मनभावन दृश्य उत्पन्न करते हैं।

आर्क दे त्रिओं की खास बात यह है कि यहाँ दिन में जाइये तो खुली धूप,पेड़ों की हरियाली,नीचे की चहल पहल, गाड़ियों का शोर,बच्चों की दौड़ भाग सब एक बहुत खुशनुमा माहौल पैदा करते हैं और यदि आप दिन ढलने के बाद जाएं तो कहने ही क्या हैं!!!शाम को इस स्थान से सूर्यास्त का नजारा देखना खुद में एक अनोखा अनुभव है!!! और फिर रात को रौशनी में तो पेरिस की छटा की बात ही कुछ और है।नीचे की सड़कों पर लगे लैम्पों की खूबसूरत लाइटें तथा सड़क किनारे इमारतों और बीच में चलने वाले वाहनों की रोशनी एक अलौकिक सा दृश्य उपस्थित करती है।उधर चारों ओर रंग बिरंगी रोशनी दृष्टव्य है तो एक तरफ लाइटों से सजा अपनी अद्भुत ख़ूबसूरती बिखेरता आइफ़िल टावर है वहीं  दूसरी ओर सीन नदी में चलती रंग बिरंगी रोशनी से चमकती नावें और सीन नदी के दोनों ओर रोशनी से चमकती प्राचीन इमारतें और छत पर शरीर को सिहरन भरी ठंडक का आभास देकर स्पर्श करती मंद मंद बयार,ऐसे माहौल में मन होता है कि हाथ में गर्म कॉफी का प्याला लिए हुए बस घंटो उसी रमणीक वातावरण में बैठे रहो,घूमते रहो,पेरिस की ख़ूबसूरती को इतनी ऊँचाई से निहारते रहो।

आर्क दे त्रिओंम्फ की खास बात ये है कि एक तो यहाँ पर आकर आपका मन भावुक होकर श्रद्धा से भर जाता है क्योंकि ये शहीद स्मारक है और शहीद किसी भी देश के हों वो सम्मान और श्रद्धा के पात्र होते हैं दूसरे ये एक भव्य इमारत है जिसकी भव्यता के साथ फ्रांस की स्थापत्य कला और फ्रांस का इतिहास भी जुड़ा हुआ है।इसके अतिरिक्त एक सैलानी की निगाह से ये एक अद्भुत स्थान,अद्भुत इमारत और शानदार अनुभव है।

Arc de Triomphe देखने के बाद चूँकि समय काफी हो चला था तो मैंने हिरान से कहा कि अब मैं यूथ हॉस्टल जाऊँगा तो उसने कहा कि वो भी अपने हॉस्टल जाएगी।मैंने उस से पूछा कि उसके माता पिता कहाँ रहते हैं तो उसने बताया कि वो यहीं पेरिस में रहते हैं किंतु साथ नहीं रहते।मेरे पूछने पर उसने बताया कि उसके पिता और उसकी माँ अलग हो गए और पिता ने किसी और से शादी कर ली और उसी के साथ रहते हैं इसलिए वो उनके साथ नहीं रहती।जब मैंने उस से पूछा कि वो लेकिन अपनी माँ के साथ क्यों नहीं रहती तो उसने कहा कि माँ ने भी किसी और से शादी कर ली इसलिए वो माँ के साथ भी नहीं रहती है।उसकी कहानी सुन कर मैं अवाक रह गया और थोड़ा उदास भी किन्तु वो बिल्कुल सामान्य थी क्योंकि उनकी सभ्यता और समाज के लिए शायद इस बात में कुछ भी अजीब नहीं था जबकि मैं तो ऐसी स्थिति की कल्पना करके ही सिहर उठा था।अगले दिन 4 बजे आइफ़िल टावर के नीचे मिलने की बात तय करके हम दोनों ने एक दूसरे से विदा ली।हिरान ने मुझको अपने यूथ हॉस्टल तक जाने की मेट्रो का समझा दिया था।मेट्रो में बैठा हुआ मैं हिरान के विषय में ही सोच रहा था कि देश और सभ्यता कोई भी हो लेकिन इंसानों में इंसानियत हर जगह होती है,उनके सुख दुःख एक जैसे होते हैं,उनकी भावनाएं एक जैसी होती हैं और उनकी इच्छाएं और आकांक्षाएं भी कमोबेश एक सी ही होती हैं।ये सब बातें सोचते हुए मैं मेट्रो से उतर कर अपने यूथ हॉस्टल तक आ गया।

यूथ हॉस्टल में आकर मैं कपड़े बदल कर अपने बंक बैड पर ऊपर वाली जगह पर लेट गया।उस हॉल में कोई जर्मनी से था तो कोई इटली से एक पलंग पर एक अमेरिका का लड़का था तो मेरे सामने वाले बंक बैड पर 22-23 साल का एक नौजवान था जो ऑस्ट्रेलिया से था।उस से बातचीत हुयी तो मालूम पड़ा कि वो ऑस्ट्रेलिया में बस कंडक्टर की नौकरी करता था और अब अपनी गर्लफ्रेंड के साथ यूरोप घूमने आया था।ये जान कर मैं तो वाकई दंग रह गया और एक साथ दो बातें मेरे मन में आयीं।एक बात तो ये थी कि मैं 29 वर्ष के लगभग की आयु का हो चला और अपने माँ-बाप के पैसों से विदेश व्यापार करने निकला हूँ,वो भी घूमने नहीं,घूमना तो असलियत में बाई-प्रोडक्ट के रूप में हो रहा है और ये 22-23 साल का बालक खुद की कमाई करके दुनिया घूम रहा है और दूसरी जो बात मन में आयी वो ये थी कि हमारे देश में किसी भी उम्र में क्या बस कंडक्टर या उनके समकक्ष के कोई व्यक्ति भले ही वो सरकारी कर्मचारी ही क्यों न हों, कभी ऐसे विदेश क्या अपने देश में भी नौकरी से अवकाश लेकर घूमने की सोचेंगे….अपने देश के लोगों की मजबूरियां और इन विकसित देश के लोगों की बेहतर स्थिति,सुविधा,सोच और हमारी और इनकी पारिस्थितिक विषमताओं को सोच कर मेरा मन अवसाद और दुःख से भर गया लेकिन साथ ही साथ मैंने सोचा कि अब हमारा देश भी बदल रहा है आज मेरे जैसे नौजवान व्यापार के लिए विदेश में मौके तलाश रहे हैं लेकिन कल ऐसा भी समय आएगा जब विदेशी हमारे देश में आकर व्यापार तलाशेंगे और हमारे यहाँ व्यापार करेंगे और देश विदेश के व्यापार और व्यापारियों में हम भारतीयों की खूब इज़्ज़त और शौहरत होगी।यही सब सोचते हुए मैं अगले दिन के कार्यक्रमों के विषय में सोचने लगा कि कुछ दुकानों को जुहारूँगा और एक पता पास में था उनसे फोन करके मिलने की पूछूंगा और फिर शाम को आइफ़िल टावर भी देखूंगा।यही सब सोचते हुए मेरी आँख लग रही थी लेकिन तब मुझे इस बात का कतई अंदाज़ा नहीं था कि कल सुबह मेरा सामना एक ऐसी स्थिति/दृश्य से होगा जो मेरी जिंदगी का “ना भूतो ना भविष्यति” जैसा होगा!!!

Comments

  1. सुंदर और भावप्रवण लेखन !लगा यूं कि पाठक ही लेखक बन पेरिस में घूम रहा हो ! अंत पढ़ कर फिर से उत्सुकता हो चली है कि अगले दिन आखिर क्या घटा होगा !इसलिए अब अगला अंक जल्दी से ...

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