Sindbad Travels-25 France-4 Paris 2nd day

Sinbad Travels-25 France-4 Paris 2nd day
Eiffel Tower

सिंदबाद ट्रेवल्स-25 फ्रांस-4 पेरिस 2सरा दिन
आइफ़िल टॉवर

पेरिस के यूथ हॉस्टल में अपने बंक बैड पर जैसे ही सुबह सुबह मेरी आँख खुली तो मैंने देखा कि उस हॉल के अधिकतर लोग मुझसे पहले जाग चुके थे।मैं भी बेड से उतर कर शौचालय की तरफ बढ़ा।ये बड़ा हॉल था जिसमें एक तरफ सामने की ओर एक लाइन से शौचालय बने हुए थे तो बाएं हाथ पर लाइन से वाश बेसिन लगे हुए थे और दाहिनी तरफ स्नानागार थे।उस हॉल का नजारा अद्भुत था-मेरे लिए तो “न भूतो न भविष्यति” वाला था और अचानक मुझको लगा कि इन सभी नौजवानों में मैं ही odd man out था क्योंकि वहाँ का आलम यह था कि सभी  लड़के वाश बेसिन पर खड़े होकर मंजन कर रहे थे अथवा मुँह-हाथ धो रहे थे वो ऊपर तो टीशर्ट,बनियाइन अथवा कुछ न कुछ पहने हुए थे किन्तु नीचे नितांत निर्वस्त्र थे और सभी बिना किसी अपवाद के यानी कि उनके बीच पाजामा पहने अकेला मैं ही वो व्यक्ति था जो कि नीचे भी कुछ पहना था।वहाँ की गतिविधि और सामान्य किस्म की चर्या देख कर मुझको समझ आ गया कि इसमें अजीब कुछ नहीं था और संभवतः यूरोप आदि के कई यूथ हॉस्टलों में ये एक सामान्य बात ही थी।खैर,मैं वहाँ से जल्दी से तैयार होकर निकला और लगभग 9:30 10 बजे मैंने पास के फोन बूथ से जो पता मुझ पर था उन सज्जन से बात की और ये मेरी खुश किस्मती थी कि उन्होंने मुझको तुरंत ही मिलने को बुला भी लिया।
मैं तुरंत मेट्रो पकड़ कर  Mr.Wagnor (काल्पनिक नाम ) के बताए पते के लिए चल दिया।ये स्थान पेरिस के बाहरी इलाके से में था।उनके घर के लिए एक छोटी सी गलीनुमा सड़क से जब मैं अंदर घुसा तो दाहिने हाथ पर बगीचा और बाएं हाथ पर मकान बना हुआ था और उसी के बीच से पेड़ों की झुरमुट से में से एक पतला सा घुमावदार रास्ता उनके घर के मुख्य द्वार की तरफ जाता था।लम्बे करीने से कटे और छंटे खूब्सूर्त वृक्षों से गुजरते उस गलियारे में  कुछ अजीब सी शांति थी।उस रास्ते पर चल कर मैं एक बरामदे नुमा स्थान पर पहुँचा और मैंने दरवाजे पर लगी कॉल बेल बजायी तो अंदर से सफेद मूछों और सर पर हल्के बाल वाले लगभग 50-55 वर्ष के एक व्यक्ति ने दरवाजा खोला और मुझे अंदर आने को कहा।यही मिस्टर वेगनर थे।अंदर फिर एक लंबा सा गलियारा था जिसमें बहुत सारी मूर्तियाँ,पेंटिंगें और बेशकीमती सजावट की वस्तुएं भरी पड़ी थीं और कई मूर्तियाँ कपड़े से ढकी हुयी भी थीं।मिस्टर वेगनर एक दुबले पतले किन्तु अच्छे और प्रभावशाली व्यक्तित्व के स्वामी थे।उन्होंने मुझको कॉफी के लिए पूछा और मेरे हाँ कहने पर वहीं एक तरफ रखी इलेक्ट्रिक केतली से कॉफी बनाई जो हम दोनों ने साथ साथ पी।बातचीत के दौरान मिस्टर वेगनर ने बताया कि वो मुख्यत: एंटीक्स के व्यापारी हैं और इसके अतिरिक्त आर्टिफैक्ट्स में भी डील करते हैं।मेरे सैम्पिलों में उनके मतलब का कुछ नहीं था।इस प्रकार बिना किसी व्यापार के किन्तु बहुत सी नयी जानकारियां लेकर मैं वहाँ से वापिस अपने यूथ हॉस्टल को चल दिया।वापिस लौटते में मेरी समझ में आ गया था कि पेरिस में भी अब इस बार तो कोई व्यापार होना नहीं है तो बाकी के एक दो दिन पेरिस को देख कर समय और पैसे का सदुपयोग ही कर लिया जाए।
यूथ हॉस्टल में सैम्पिलों को वापस रख कर मैं फिर से मेट्रो पकड़ कर champ Elysée इलाके में पहुँच गया।वहाँ की और आसपास की दुकानों और शो रूम्स को देख कर मैं ये तलाशता रहा कि यहाँ ऐसी क्या वस्तुएं बिक रही हैं जो मैं भी सप्लाई कर सकता हूँ।यही सब करते हुए लगभग चार बजे चुके थे और मुझको ध्यान आया कि चार बजे का समय हिरान से आइफ़िल टावर के पास मिलने का तय हुआ था सो मैं आइफ़िल टावर पहुँच गया।थोड़ी देर में ही वहाँ हिरान भी आ गयी।
हिरान ने मुझसे पूछा कि व्यापार से सम्बंधित कहीं कुछ बात बनी।मेरे मना करने पर उसने मुझसे कहा कि निराश होने की कोई जरूरत नहीं है,उनके यहाँ कहा जाता है  प्रयास कभी विफल नहीं होता।लगे रहने से ही सफलता मिलती है।फ्रेंच भाषा में एक मुहावरा है “Petit a petit, l’oiseau fait son nid” जिसका अर्थ है कि  “Little by little, the bird makes its nest.” अर्थात धैर्य और लगे रहने से ही कार्य की सिद्धि होती है.
अब मैं  लोहे के खम्भों,गर्डरों,जालियों आदि से बनी उस भव्य संरचना के सामने खड़ा था जो आधुनिक काल की मानव निर्मित अत्यंत शानदार और चर्चित और प्रमुख  संरचनाओं में  स्थान रखती है यानी कि पेरिस का आइफ़िल टावर.पेरिस के champ de Mars इलाके के पास यह 300 मीटर  (984 फीट) और यदि इसकी चोटी को भी सम्मिलित करें तो 324मीटर ( 1063 फीट) ऊंची मानव निर्मित रचना है जो अपने बनने के लगभग 41 वर्षों तक विश्व की  सबसे ऊंची इमारत रही,इसके पहले यह गौरव अमेरिका की राजधानी वाशिंगटन डीसी के  Washington Monument को प्राप्त था और इसके बनने के 41 वर्षों बाद अमेरिका के ही न्यू यॉर्क शहर की Chrysler Building को यह गौरव हासिल हुआ.आइफ़िल टावर तीन मंजिलों की पूर्ण रूप से लोहे से बनी इमारत है.इसका जमीन पर आसार चौकोर है और इसकी हर भुजा 125 मीटर ( 410 फीट ) की है.ऊंचाई के हिसाब से यह लगभग 81 मंजिला इमारत की तरह है.
सन 1889 में फ्रांस की क्रान्ति के 100 वर्ष पूरे होने वाले थे और फ्रांस के लोग इसको एक अभूतपूर्व उत्सव की भांति मनाना चाहते थे.इस उत्सव को मनाने के लिए एक वैश्विक मेले (World Fair) के आयोजित करने का तय किया गया.दरअसल सन 1853 ईस्वी में न्यूयोर्क सिटी में बनी ‘Latting Observatory’ से प्रेरित होकर दो इंजीनियरों ने,जिनके नाम मौरिस कोच्लिन और एमिल नौगुइएर थे,एक भव्य और विशाल इमारत कि डिजाइन बनायी थी जिस में बाद में थोड़े परिवर्तन किये गए और फ्रांस के इंजीनियर गुस्ताव आइफ़िल ने इसके सर्वाधिकार खरीद लिए.इन्हीं आइफ़िल महोदय की कम्पनी ने आगे चलकर आइफ़िल टावर को पूर्णतः डिजाइन किया और बनाया.30 maarch 1885 को पेरिस,फ्रांस की संस्था ‘societe des Inginieurs civils’ के समक्ष गुस्ताव आइफ़िल ने 1889 में आयोजित होने वाले वैश्विक मेले Exposition Universelle के आयोजन स्थल के मुख्य द्वार के पास एक अत्यंत भव्य इमारत बनाने का प्रस्ताव यह कहते हुए रखा कि यह इमारत/मीनार न केवल आधुनिक इंजीनियरिंग कि प्रतीक होगी अपितु यह उस शताब्दी,जिसमें वो लोग रह रहे थे यानी कि उन्नीसवीं सदी,के विज्ञान और औध्योगिक विकास कि भी परिचायक होगी जिसके लिए 18वीं सदी के वैज्ञानिक आन्दोलन और 1789 की फ्रांस की क्रान्ति ने पथ प्रशस्त किया.यध्यपि शुरुआत में पेरिस में इस इमारत के बनाने का काफी विरोध हुआ कि इससे पेरिस जैसे सुंदर शहर की खूबसूरती खराब हो जायेगी किन्तु जब यह मीनार रूपी इमारत बन कर तैयार हुयी तो उसके बाद से आज तक यह पेरिस के प्रमुख पहचान चिन्ह के रूप में जानी जाती है.इस इमारत का वजन लगभग दस हजार मीट्रिक टन है और इसको बनाने में लगभग 18 हजार लोहे के टुकड़ों का प्रयोग हुआ.इसमें आठ लिफ्ट हैं.इसका रंग लालपन लिए हुए भूरा था जो ऊपर हल्का और नीचे गहरा होता चला गया.ईस्वी सन 1968 में इसका रंग तांबई कर दिया गया जिसको ‘Eiffel Tower Brown’ भी कहा जाता है.आइफ़िल को इसको देखने आने वाले पर्यटकों से 20 साल तक के वसूली के अधिकार मिले और इसको बनाने की कीमत 6.5 मिलियन फ्रैंक का 25% धन भी.कुल मिलाकर यह सौदा उनके लिए हर प्रकार से अत्यंत लाभ का रहा पैसा भी खूब मिला और इतिहास में नाम भी.हाँ एक रोचक बात यह भी मालूम पड़ी कि शुरू में इस टावर को इसके बनने के 20 वर्ष बाद ढहा देना तय हुआ था किन्तु इसकी लोकप्रियता ऐसा परवान चढ़ी कि आज लगभग 20,000 लाइटों के प्रकाश से आलोकित यह आइफ़िल टावर पेरिस की शान और प्रमुख पहचान  माना जाता है.

1991 की इस पहली पेरिस यात्रा के बाद ईस्वी सन 2000 तक मुझको कई बार फ्रांस और पेरिस जाने का मौक़ा मिला और लगभग हर बार मैं आइफ़िल टावर भी जाता रहा हूँ.आइफ़िल टावर के नजदीक के मेट्रो स्टेशनों के नाम यह हैं :1.champ de Mars/Tour Eiffel,2.Ecole Militare and 3.Bir Hakeim.

आइफ़िल टावर के नीचे पहुँचने पर एक अजीब सा अहसास हुआ.वहाँ बहुत सारे लोग थे,विभिन्न देशों,विभिन्न संस्कृतियों से आये हुए लोग.ऐसा प्रतीत हो रहा था कि आइफ़िल टावर के इस विशाल आसार के नीचे जैसे सारी दुनिया इकट्ठी हो गयी है और सबके सर के ऊपर बायें,दायें चारों तरफ निगाह घुमाएं तो बस नजर आ रही  है लोहे की  बनी  एक अत्यंत विशाल संरचना जिसकी मानो चारों भुजाएं चार दिशाओं में जमीन को छू रही हैं.कुल मिलाकर यह एक अद्भुत नजारा और अनुभव था.आइफ़िल टावर के प्रत्येक पाए से ऊपर के लिए लिफ्ट जाती हैं,कुछ पर्यटकों को ले जाती हैं और कुछ उनके कर्मचारियों तथा सामान के लिए हैं.भूतल से लिफ्ट पहली और दूसरी मंजिल को ले जाती है जबकि तीसरी यानी कि सबसे ऊपर की मंजिल के लिए लिफ्ट दूसरी मंजिल पर बदलनी होती है.लिफ्ट में काफी लोग थे और लिफ्ट के चारों ओर के दरवाजों में शीशा था और ऊपर भी ताकि आप ऊपर जाते अथवा नीचे आते वक़्त बाहर का नजारा आराम से देख सकें.ये लिफ्ट हाईड्रौलिक सिस्टम से चलती हैं और चलते समय लोहे की संरचना होने के कारण बहुत  जोर से खरड़-खरड़/ घड़-घड़ की आवाज भी होती रहती है.लिफ्ट जब भूतल से ऊपर की ओर चली तो ऐसा प्रतीत हुआ कि यह कुछ तिरछी होकर जा रही है जो कि सही भी था क्योंकि टावर नीचे से चौड़ा और ऊपर पतला होता चला गया है तो लिफ्ट वास्तव में नीचे के चौड़े हिस्से से ऊपर के पतले हिस्सों में कुछ ऐसी ही जा रही थी.जैसे जैसे घड़-घड़ की आवाज करते हुए लिफ्ट ने ऊंचाई  की ओर बढ़ना शुरू किया वैसे-वैसे शीशे से बाहर देखते हुए कई पर्यटकों ने कुछ भय,कुछ रोमांच और कुछ उत्तेजना के कारण  चीखना-चिल्लाना शुरू कर दिया.यह एक अनोखा अनुभव हो रहा था और मैं सोच रहा था कि यह तो गनीमत है कि किसी ने आइफ़िल साहब को यह नहीं सुझाया कि लिफ्ट का फर्श भी शीशे का कर  दें अन्यथा लिफ्ट से नीचे उतरते में पर्यटकों का क्या हाल होता यह कहना मुश्किल है !!खैर हम लोग दूसरी मंजिल पर पहुँच कर  पहले सीधे तीसरी मंजिल पर चले गए.यहाँ यह भी बताना जरूरी है कि इस के बाद भी जब भी मैं पेरिस गया हूँ तो आइफ़िल टावर पर चक्कर जरूर लगा है और समय के साथ वहाँ परिवर्तन भी होते रहते हैं.आइफ़िल टावर पर रौशनी कि भी ऎसी गजब की व्यवस्था की गयी है कि उस पर चारों तरफ से फोकस  और बीम लाइटों से ऎसी रौशनी पड़ती है कि बस देखते ही बनता है और हाँ 1990 के दशक में उस पर लाइटों से ही अगली शताब्दी अर्थात वर्ष 2000 का काउंट डाउन भी लगातार चलता था जो यह बताता था कि अगली शताब्दी कितनी दूर है.तीसरी मंजिल पर पहुँचते ही लगा कि ये हम कहाँ आ गए!!!!इतनी ऊंचाई जहाँ से नीचे देखो तो पेरिस की छटा ही निराली नजर आती थी.लेकिन सबसे पहले मेरा ध्यान जिस चीज़ ने आकर्षित किया वो वहाँ पारदर्शी शीशों  से बंद दीवारों के बीच विभिन देशों के भिन्न भिन्न स्थानों के नाम,उनकी पेरिस से दूरी और उस देश का झंडा बना हुआ.जैसे ही मैंने वहाँ अपने तिरंगे को भी बना देखा मेरा मन अत्यंत आह्लादित हो गया.वहाँ लिखा हुआ था Calcutta (Inde यानी कि India) 7871 Km. Jaipur (Inde) 6630 Km. Delhi (Inde) 6574 Km. इसके अतिरिक्त वहाँ अलग अलग देशों के स्थानों का ऐसे ही अंकित किया हुआ था.हिरान  ने मुझको उसके देश अल्जीरिया का लिखा हुआ भी दिखाया.यह एक गोल गैलरी थी जिसमें आप चारों ओर घूम कर अलग अलग दिशाओं से पेरिस के सौन्दर्य का रसपान कर  सकते हैं.नीचे देखने को वहाँ दुरबीनें लगी हुयीं थीं जो इतनी ताकतवर थीं कि उनसे जब आप नीचे देखते हो तो लगता है कि सब कुछ आप बहुत पास से देख रहे हैं जबकि वो ऊंचाई या दूरी लगभग पौन किलोमीटर से कुछ अधिक ही होगी.नीचे एक मैदान में फुटबाल का मैच हो रहा था जिसको दुरबीन से देखने पर ऐसा प्रतीत हुआ कि जैसे हम नीचे हरे घास के  मैदान में भी बिलकुल पास से ही मैच देख रहे हैं.ऊपर से देखने पर पेरिस कि रात कि रौशनी,रौशनी में आर्क दे त्रोइम्फ ,नोत्रेदम का कैसल आदि इमारतें बहुत  ही गजब की  दिखती हैं.आइफ़िल टावर की सबसे ऊपर की मंजिल से (या दूसरी मंजिल से जहाँ भी टेलीफोन बूथ था ठीक से याद नहीं )मैंने अपने घर भी बात कि और फिरोजाबाद में हरीश मामा से कहा कि आइफ़िल टावर के ऊपर ठंडी हवा में दिल कर रहा है कि आप लोग साथ होते तो यहीं पर बैठ कर हम लोग गरमागरम मूंगफली खाएं.
तीसरी मंजिल से कांच से बंद गैलरी और लोहे कि जालियों से घिरी गैलरी से पेरिस के नज़ारे देखने के बाद मैं अब दूसरी मंजिल पर चलने की सोच ही रहा था कि हिरान ने बताया कि इसी तीसरी मंजिल पर मिस्टर आइफ़िल ने अपने लिए एक अपार्टमेन्ट भी बनाया था.उस कमरे में मिस्टर आइफ़िल और उनकी पत्नी की फोटो लगी हुयी थीं.मैं काफी देर उन दोनों की तस्वीरों को निहारता रहा और मन ही मन सोचता रहा कि वाकई मिस्टर आइफ़िल गजब के दूरदर्शी और कमाल की सोच के आदमी रहे होंगे जो उन्होंने ऎसी जबरदस्त चीज़ को बनाने का न सिर्फ सोचा बल्कि अपनी उस बहुत बड़ी सोच को मूर्त रूप दिया और इतिहास में सम्मान के साथ अमर हो गए.

दूसरी मंजिल पर लिफ्ट से आये थोड़ा खुली हवा में जमीन से लगभग 115 मीटर ऊपर यानी कि लगभग  350 फीट लेकिन फिर भी अब ऊंचाई कम थी.इस मंजिल पर दो तल जैसे बने हैं.इस मंजिल पर आप खुले में पेरिस कि खूब्सूरती निहार सकते हैं.दोनों तालों पर उतर कर या लोहे की रेलिंग और लोहे के ही जीने से ऊपर जाकर घूम घूम कर आइफ़िल टावर के आर्कीटेक्चर निहार सकते हैं.यहाँ पर एक रेस्तरां दिखा और भूख भी अब बहुत जोर की लग आई थी.मैंने उसको बहुत समझा कर बताया कि मुझको एक वेजिटेरियन सैंडविच चाहिए जिसमें अंडा,मांस,मछली कुछ भी नहीं हो.मैं आश्वस्त था कि उसने सब बिलकुल ठीक समझ लिया है.थोड़ी देर में उसने मुझको फुटलोंग किस्म की ब्रेड की  सैंडविच दी,ना जाने मुझको कुछ वहम हुआ और मैंने सैंडविच का ऊपर का हिस्सा हटाया तो उसमें अंदर बहुत ही करीने से कई किस्म की सब्जियां पत्ता गोभी आदि लगी हुई थीं और सैंडविच देखने में बहुत ही आकर्षक और  लजीज किस्म की लग रही थी लेकिन फिर भी मैंने सब्जियों आदि की उस परत को भी हटाया तो उसके नीचे बहुत ही करीने से पतले पतले कटे उबले अंडे रखे थे.अब जो मैं कहूँ वो समझने को तैयार नहीं था,हिरान अपनी सैंडविच लेकर बाहर चली गयी थी और सच कहूँ तो सैंडविच महँगी भी बहुत थी तो फेंकने का मन भी नहीं था और अंडा तो मेरा खाने का सवाल ही नहीं था.जब उसने मेरी एक न सुनी तो फिर मैंने एक बीच का रास्ता निकाला यानी कि एक छुरी लेकर उस से सारे अंडे हटाये,फेंके,ब्रेड को रगड़ रगड़ कर साफ़ किया,सब्जियां आदि ड्रेसिंग वापिस रखी और फिर उस सैंडविच को खाया जो वास्तविकता में खाना कम और पैसे वसूलना ज्यादा था.
इसके बाद हम और नीचे यानी कि पहली मंजिल पर आये.यह फ्लोर लगभग 56 मीटर ऊंचाई पर है यानी कि लगभग 165-170 फीट पर.इस मंजिल पर आकर भी आप पेरिस की खूबसूरती और नजारों को देख सकते हैं.यहाँ पर सोवेनियर कि दुकान भी थी,उस दुकान अथवा शो रूम से मैंने आइफ़िल टावर कि कुछ छोटी छोटी प्रतिकृतियाँ और टी-शर्ट्स आदि खरीदीं.इस मंजिल की बालकनी के  के बाहर के हिस्से में गुस्ताव आइफ़िल ने उस समय के फ्रांस/पेरिस के 72 प्रसिद्द गणितज्ञ,वैज्ञानिक और इंजीनियरों के नाम  लगभग 2 फीट या 60 सेंटीमीटर की लम्बाई में सुनहरे अक्षरों से लिखवाये थे.पहली मंजिल से दुरबीन से देखने पर जिस चीज़ ने बहुत आकर्षित किया वो थीं नीचे सीन नदी में चलने वाली नावें.ऊपर से देखने में सीन नदी के शांत जल में तरह तरह की मोटरबोट,उन पर लगीं लेतें और उन पर पड़ रही रौशनी एक बड़ा ही विहंगम दृश्य उत्पन्न कर रहे थे.हिरान ने मुझको बताया कि पेरिस में सीन नदी में नौका विहार बहुत प्रसिद्द है.दुनिया में दो ही नदियों के क्रूज़ इस प्रकार कि प्रसिद्धि रखते हैं एक इजिप्ट में काहिरा में नील नदी का क्रूज़ और दूसरा पेरिस का सीन नदी का क्रूज़.ऊपर से सीन नदी में लहरों से अठखेलियाँ करते हुए चलने वाली नावें इतनी सुंदर लग रही थीं कि मानो ख रही हों कि उस पर्यटक का पेरिस आना ही क्या जिसने नाव में बैठ कर सीन नदी की रास् और मेरे अंदर का पर्यटक मन अब सीन नदी में नौका विहार या रिवर क्रूज़ हेतु पूरे तौर पर मचल चुका था।

Comments

  1. प्रणाम सर .... आपका ब्लॉग बेहद सुरुचिपूर्ण व ज्ञानवर्धक है आप इसी प्रकार अपने जीवन संस्मरणों को हमसे साझा करते रहिए जिससे आपके अनुभवों से प्रेरणा ले सकें बहुत-बहुत धन्यवाद

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  2. धन्यवाद.आपके शब्दों से मेरा हौसला बढ़ा और खुशी भी हुई कि मेरा लिखा आपको पसंद आया.

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