Sindbad Travels-26 France-5 Paris 2nd day “Bateaux Mouche” Cruise on river The Seine.

Sindbad Travels-26 France-5 Paris 2nd day

“Bateaux Mouche”

Cruise on river The Seine.

सिंदबाद ट्रेवल्स-26

फ्रांस-5 पेरिस दूसरा दिन

“बटू मौश”

सीन नदी में नौका विहार

आइफ़िल टॉवर से नीचे उतर कर अब मैं सीन नदी की तरफ बढ़ रहा था.सीन नदी में नौका विहार बहुत प्रसिद्ध है और पेरिस तथा आइफ़िल टॉवर तक जो पर्यटक आते हैं उनमें से काफी लोग सीन नदी में नौका विहार भी करते हैं.इस नौका विहार के लिए वहाँ का प्रचलित शब्द “Bateaux Mouche” बटू मौश या मूश है.

असलियत में Bateaux Mouche पेरिस की एक प्रसिद्ध नौका पर्यटन कंपनी ‘compagnie des bateaux mouches’ का रजिस्टर्ड ट्रेड मार्क है किंतु ये इस व्यापार में इस कंपनी की सफलता के कारण अब सीन नदी के नौका पर्यटन के लिए सभी लोगों द्वारा प्रयोग में लाया जाता है ठीक उसी प्रकार से जैसे हमारे देश भारत में सभी ‘water pumps’ के लिए ‘टुल्लू पम्प’ शब्द का प्रयोग आम तौर पर किया जाता है.बटू मौश का शाब्दिक अर्थ fly boats है लेकिन गलत मत समझियेगा यहाँ fly से तात्पर्य उड़ना नहीं अपितु मक्खी (fly insect) से है और mouche शब्द का origin Lyon शहर के मौश इलाके से है जहाँ के नौका यार्ड में मूल रूप से यह नावें बनती थीं.

सीन नदी के दाहिने तट पर Pont de l'Alma पर पहुँच कर

वहाँ के प्लेटफॉर्म नुमा स्थान पर पहुँच कर मैंने अपना और हिरान का टिकट लिया और हम लोग अपनी बारी आने का इंतज़ार करने लगे.यह स्थान बहुत ही साफ सुथरा और सुंदर था.टिकट लेकर आप एक बड़े से शीशे की दीवारों के बीच कमरे में में आते हैं और फिर वहाँ से अपनी बारी आने पर नाव में चढ़ जाते हैं.सबसे पहले बात नाव की;ये नावें अधिकतर काफी लंबी और दो मंजिला हैं.ऊपर की मंजिल पर आप खुली हवा का आनंद लेते हैं.ऊपर बढ़िया सुव्यवस्थित तरीके से बैठने को कुर्सियां और मेजें भी थीं.नावों में रेस्टॉरेंट और बार भी था जहाँ खाने पीने की तमाम वस्तुएं उपलब्ध थीं.नाव की नीचे की मंजिल शीशे से ढंकी हुयी थी.सामने को मुँह करके कुर्सियां जमी हुई थीं.मैं सबसे आगे वाली लाइन में बैठ गया.शाम हो चली थी.बोट में धीमी सी  आवाज में संगीत बज रहा था.शीशे के अंदर से बाहर सीन नदी का शांत जल और उस पर पड़ती रोशनी बहुत ही सुंदर दृश्य उपस्थित कर रहे थे.नाव में उद्घोषणा हुयी और धीरे धीरे मंथर गति से नाव ने आगे बढ़ना शुरू किया.हमारे दाहिनी तरफ आइफ़िल टॉवर था जो रोशनी में नहाया हुआ बहुत ही गजब का लग रहा था और उन सभी रोशनियों से सीन के थरथराते जल में उत्पन्न प्रतिबिम्ब एक बहुत ही आकर्षक दृश्य उपस्थित कर रहे थे.एक महिला बहुत ही शांत और सुरीली आवाज में कमेंट्री कर रही थी यानी कि पर्यटकों को बताती चल रही थी और हाँ मैंने अंग्रेज़ी भाषा में बताते हैं वो टूर लिया था.जैसे जैसे नौका आगे बढ़ रही थी हमारे दोनों ओर (नदी के बाँएं किनारे को Rive Gauche और दाहिने तट को Rive Droite कहते हैं) पेरिस की प्रसिद्ध इमारतें दिख रही थीं और शाम हो जाने के कारण वो सभी इमारतें शानदार रोशनी से नहाई हुयी प्रतीत हो रही थीं.

जैसे जैसे नाव आगे बढ़ती गयी उद्घोषिका ने बताना शुरू किया कि अब आइफ़िल टॉवर हमारे पीछे छूट गया है.Grand Palais भी निकल गया और सामने

नाव आगे बढ़ी और सामने एक बहुत बड़ी मेहराब वाला पुल दिखने लगा.इसके दोनों किनारों पर पंखयुक्त घोड़ों की शानदार मूर्तियां हैं और पुल की मेहराब के बीचोबीच शानदार कलाकृति उत्कीर्ण की हुयी दिखती है जिसको nymphs of the neva कहते हैं.यह पुल सन 1896-1900 में रूस के शासक जार अलेक्ज़ेंडर तृतीय के नाम पर बनाया गया था और यह फ्रांस और रूस की मैत्री का प्रतीक था.यह Pont Alexandre III पुल एक ओर champs Elysees और दूसरी तरफ invalides और आइफ़िल टॉवर को जोड़ता है.मैं इस पुल के विषय में सोच ही रहा था कि हमारी नाव आगे बढ़ी और हमको एक दूसरा पुल नज़र आया.इस दूसरे पुल का नाम है ‘Pont Neuf’ अर्थात New Bridge (नया पुल) और वर्तमान में पेरिस पर सीन नदी पर बने पुलों में यह सबसे पुराना (1578-1607) पुल है यद्यपि जब ये बना था तब सबसे नया होने के कारण इसको यह नाम मिला किन्तु सौंदर्यीकरण की दौड़ में धीरे-धीरे और पुराने पुल इतिहास का अंग बनते गए और यह सबसे पुराना पुल हो गया.इस पुल पर फ्रांस के राजा हेनरी चतुर्थ की घोड़े पर सवार मूर्ति स्थापित है.नाव से हमने Bir Hakeim bridge भी देखा जो दो मंजिला था;एक मंजिल मोटर कारों हेतु और एक पैदल सवारों हेतु.

नाव सीन नदी के शांत जल पर मानों अठखेलियाँ करते हुए और आगे बढ़ गयी और अब दिखा Musée d'Orsay यानी कि ओरसे म्यूज़ियम.यह 20वीं सदी में सन 1986 में चालू हुआ यद्यपि पहले यहाँ Gare d’Orsay नामक रेलवे स्टेशन हुआ करता था.सीन नदी के बाँएं तट पर यह पत्थर से बनी एक लंबी सी अनेकों मेहराबदार दरवाज़े -खिड़कियों से युक्त इमारत है.सीन नदी के इस टूर में आगे विश्व प्रसिद्ध म्यूज़ियम Louvre Museum की इमारत भी दिखाई पड़ी.इस संग्रहालय के विषय में आगे चलकर विस्तार से चर्चा करूँगा.इस नौका विहार की एक खास बात यह है कि अलग अलग मौसम में आपको अलग अलग अनुभूतियां होती हैं,ये मैंने बाद की यात्राओं में महसूस किया.जैसे कम ठंडे मौसम में आपको सीन नदी के दोनों किनारों पर करीने से कटे और छंटे वृक्ष एक अद्भुत नजारा पेश करेंगे जबकि पतझड़ के मौसम में बिना पत्तियों के पेड़ों की छटा दूसरी ही नज़र आती है.

नाव के इस भ्रमण में भोजन की भी व्यवस्था थी,संगीत भी था और उद्घोषिका द्वारा जानकारी भी और ये वाकई एक बहुत ही आनंददायक अनुभव था किंतु जब मैं नाव में बैठ कर सीन नदी के दोनों ओर बनी पेरिस की इमारतों को निहार रहा था तो मेरा मन पहुँच गया था अपनी यमुना मैया के पास और मैं सोच रहा था कि क्यों नहीं इस किस्म के ‘Boat Cruise’ हमारे दिल्ली,आगरा या इलाहाबाद में नहीं हो सकते?क्या पर्यटक शाम को ऐसी ही शानदार भव्य नौकाओं में जब दिल्ली में यमुना नदी में घूमें और उनको रोशनी में नहाया लाल किला दिखे तो क्या उनको मजा नहीं आएगा??और मथुरा वृंदावन में शानदार नावों में बैठ कर उस बृज के दर्शन और भ्रमण करते हुए जहाँ कभी योगीराज कृष्ण नटखट कन्हैया बन कर अपनी लीलाएं करते थे इसी कालिंदी कूल की कदंब की डालियों के मध्य.

जरा सोचिए आगरा में कैलाश मंदिर के पास से आप टूर लेते हैं और नाव की ऊपर की डेक पर बैठे हैं,यमुना नदी पर नाव तैर रही है,हल्की पुरवैया चल रही है और आपको थोड़े आगे बढ़ने पर नाव से बाँएं हाथ पर रोशनी से नहाया “राम बाग” दिखता है और नाव जब जवाहर ब्रिज के नीचे से निकलती है तो आपको अपने बाँएं तरफ ही रोशनी में जगमगाता लाल बलुई पत्थर और संगमरमर से बना एतमाद-उद्दौला नजर आता है.आप नाव के रेस्टॉरेंट से एक गर्म कॉफी का प्याला लेकर कॉफी पीना शुरू करते हैं कि आपके दाहिनी तरफ रोशनी से नहाया हुआ विशाल लाल किला दिखता है,उसका मुसम्मन बुर्ज चमक रहा है कि जरा आगे बढ़ते ही मानों दृश्य थम सा गया और थमे भी क्यों नहीं आखिर आपके दाहिनी ओर प्यार का प्रतीक संसार के सात अजूबों में एक सफेद संगमरमर से बना ताजमहल जो खड़ा है.ऐसे ही इलाहाबाद में सरस्वती घाट से नाव में बैठे और आगे चलने पर बायीं तरफ अकबर का बनवाया हुआ किला उसके आगे बड़े हनुमान जी का मंदिर जो थोड़ी दूर से ही नाव में दिखेगा और फिर संगम पर यमुना का हरा जल गंगा के सफेद जल में मिलकर उसी में अपना अस्तित्व विलीन करता हुआ ना जाने कितने पर्यटकों को आकर्षित करेगा.

मैं यह सब सोच रहा था कि अचानक हिरान ने कहा कि देखो ये पेरिस का प्रसिद्ध कैथोलिक गिरजाघर Notre-Dame Cathedral दिख रहा है.यह 1165 में बनना शुरू हुआ और 1345 में पूरा हुआ था.यह पेरिस के प्राचीन ‘फ्रेंच गौथिक’ वास्तु का एक शानदार नमूना है.1789 के फ्रेंच रिवोल्यूशन के दौरान इसको काफी क्षति पहुँची थी और बाद में इसका बहुत शानदार तरीके से जीर्णोद्धार हुआ और नाव से रोशनी से झिलमिलाता हुआ लगभग 650 साल पुराना यह गिरजाघर जिसको अंग्रेजी में ‘Our Lady of Paris’ कहा जाता है सीन नदी के किनारे अपनी अद्भुत छटा बिखेर रहा था.

इस प्रकार से पेरिस की assemblée nationale paris भी नजर आयी.पेरिस की इन भव्य और प्राचीन इमारतों को दिखाते हुए हमारी नाव ने लगभग एक घंटे से कुछ ही अधिक समय में हमको वापिस ला कर उतारा.

नाव से उतर कर हम मेट्रो स्टेशन पहुँचे जहाँ से हिरान ने अपने हॉस्टल के लिए मेट्रो पकड़ी और मैंने अपने यूथ हॉस्टल के लिए.जब हिरान विदा हुयी तो यह वाकई एक भावुक क्षण था.

दो-तीन दिनों में ही हम बिल्कुल अनजान लोगों से घनिष्ठ दोस्तों में बदल गए थे और उस घनघोर पश्चिमी संस्कृति में पली बढ़ी उस लड़की की सरलता और सादगी ने मुझको बहुत प्रभावित किया.एक बिल्कुल अनजान देश में,जहाँ भाषा भी एक बड़ी समस्या थी वहाँ हिरान ने मेरी जैसे निस्वार्थ मदद की वो मेरे लिए एक बहुत ही अच्छा और प्रेरणादायक अनुभव था जो मुझको अपने जीवन में सदैव याद रहेगा और हिरान भी.मैंने ट्रेन में पहले हिरान को विदा किया.ट्रेन में बैठते वक़्त हिरान ने मुझसे कहा कि तुमसे मिलकर मुझको मालूम पड़ा कि हिंदुस्तानी बहुत ही सभ्य,शालीन और अच्छे होते हैं.हम दोनों ही उस समय काफी भावुक हो गए थे.हिरान से ये मेरी आखिरी मुलाकात थी.

अब मैंने भी अपने यूथ हॉस्टल के लिए मेट्रो पकड़ी.यूथ हॉस्टल तक की यात्रा में मुझको एक व्यक्ति मिला जो श्री लंका का तमिल था.उस से बहुत देर तक भारत-श्री लंका और तमिल समस्या पर चर्चा हुई.उसका कहना था कि उसके जैसे ना जाने कितने श्री लंकाई तमिल फ्रांस और पेरिस में रह रहे हैं.उसने मुझको यह भी बताया कि कुछ श्री लंकाई तमिल भारत से नाराज थे किंतु अधिकांश उस समय की परिस्थितियों और घटनाक्रम से बहुत परेशान और दुःखी थे.उस समय की मनःस्थिति के कारण मैंने भी उस व्यक्ति से ज्यादा बातचीत नहीं की और अपनी सीट बदल कर दूसरी जगह बैठ गया.कुछ देर में ही मैं यूथ हॉस्टल के अपने बंक बैड के ऊपर वाले फ्लोर पर था😁😁😁 और अगले दिन Louvre museum जाकर मोनालिसा को देखने का और फिर आगे स्विट्जरलैंड की फ्लाइट पकड़ने का सोचते हुए न जाने कब मेरी आँख लग गयी.

Comments

  1. बहुत ही ज्ञानवर्धक वृत्तांत है सर । आप जैसे लोग बहुत कम हैं जो विदेशी खूबसूरती की तुलना में अपने देश की प्रकृति को बेहतर समझते हैं । हमारे देश मे एक से बढ़कर एक खूबसूरत चीजें हैं, लेकिन उन्हें बेहतर तरीके से सजाने की इच्छा, जुनून और समझ का बहुत ही अभाव है । जिसके पास समझ है, उसके पास पॉवर नहीं है और जिसके पास समझ है उसके पास पावर नहीं । हमे ऐसे ही गुण सम्पन्न लोग की जरूरत है । आप में दोनों चीजें है । हमें आपसे बहुत उम्मीद है । पूरा भरोसा है जब कभी भी आपको मौका मिलेगा इसे अमलीजामा देने की पूरी कोशिश करेंगे । पेरिस में घूमते बहुत कम लोग होंगे जिन्हें यमुना का कछार, इलाहाबाद जा संगम और वृंदावन-मथुरा की याद आती है । आपको आती है क्योंकि आप अपने मुल्क से बेपनाह मुहब्बत करते हैं । ऐसे यात्रा वृतांत से हम सम्पन्न होते हैं । हमें इसकी अगली कड़ी की प्रतीक्षा है । फ़िलहाल इस बेहतरीन यात्रा वृतांत के लिए बधाई और शुभकामनाएं ।
    सादर,
    महेंद्र प्रसाद कुशवाहा

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    1. आदरणीय कुशवाह जी,
      किसी का लिखा पाठकों को अच्छा लगे इस से अच्छी क्या बात है और यदि किसी साधारण व्यक्ति जो दरअसल प्रशिक्षित लेखक भी न हो उसका लिखा आप जैसे विद्वानों को अच्छा लगे और वो उस पर अपनी प्रतिक्रिया भी दें तो यह उस लेखक के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि है.मेरा सौभाग्य है कि आपको यह यात्रा वृतांत अच्छा लगा.आपका बहुत बहुत आभार!🙏🙏😊

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