Sindbad Travels-29 Switzerland-1 Geneva

Sindbad Travels:-29,

Switzerland-1

Geneva

सिंदबाद ट्रेवल्स:- 29

स्विट्ज़रलैंड-1

जिनेवा

पेरिस से जिनेवा,स्विट्ज़रलैंड की ओर मैं, जहाज में बैठा, उड़ा जा रहा था.यह स्विस एयर का जहाज था जो कि अंतरमहाद्वीपीय/अंतरराष्ट्रीय उड़ानों वाले जम्बो जेट- बड़े बोइंग 747 या एयर बस जहाजों से छोटा था यद्यपि तकनीकी रूप से यह भी एक अंतर्राष्ट्रीय उड़ान ही थी. जहाज हवा में आने के बाद स्विस एयर की एयर होस्टेस अपनी नेवी ब्लू यूनीफॉर्म में जिसमें शर्ट सफेद थी काफी चुस्ती से सब लोगों को स्नैक्स परोस रही थीं.स्विस एयर के स्नैक्स का स्तर काफी अच्छा था. जहाज में मेरी सीट खिड़की वाली थी और ऊपर से देखने पर नीचे की वादियां, बर्फ से आच्छादित पहाड़ और हरियाली भी कहीं कहीं बहुत ही मनोरम दृश्य उत्पन्न कर रहे थे.

मुझे घर से विदेश यात्रा पर निकले लगभग 18 दिन हो चले थे.मैं जहाज में बैठे-बैठे सोच रहा था कि कैसे दुबई में शरद भाईसाहब से मुलाकात हुई और कपूर साहब ने पहला ऑर्डर दिया.मुझको दोहा के इस्माइल शेख,बहरीन के रतन कपूर भाईसाहब,भाभी,आंखों से न देख सकने वाले व्यापारी शेख जुबारी, आबूधाबी के इब्राहीम अहमद मत्तार साहब याद आ रहे थे तो काहिरा-इजिप्ट के शिरीन और मैगदी साहब भी.मैं सोच रहा था कि इन 18-20 दिनों में मैंने कितनी दुनिया देख ली,कैसे कैसे लोगों से मिला और कितने अनुभव हुए.मिस्र के पिरैमिड और स्फिंक्स देखे तो लन्दन के म्यूज़ियम भी और फ्रांस के आइफ़िल टावर,आर्क दे ट्रायम्फ और लूव म्यूज़ियम की यादें तो अभी ताजा ही थीं.मैं सोच रहा था कि जिनेवा कैसी जगह होगी? स्विजरलैंड की भाषा क्या होगी,ये भी मुझको पता नहीं था (तब इंटरनेट आदि की सुविधाएं नहीं थी कि घर बैठे सारी जानकारी मिल जाये).

सच कहूँ तो यदि मुझको दुनिया के सबसे सुंदर देशों में से एक स्विट्ज़रलैंड जाने का उत्साह था तो अब जहाज में बैठे-बैठे मुझको अपने घर की याद भी सताने लगी थी.मुझको अपनी माँ और पत्नी रचना की याद आ रही थी जिन्होंने मेरी यात्रा के लिए शक्करपाड़े, मठरी और लड्डू आदि बनाये थे और जिनमें उनके प्यार और स्नेह का स्वाद भी शामिल था,मेरे पापा जिन्होंने मेरी इस विदेश यात्रा के लिए सभी आवश्यक बंदोबस्त कराये थे,मेरे छोटे भाई अभिनव, जिन्होंने इस यात्रा के लिए सैम्पिल तैयार करने में मेरे मित्र संजय तैलंग(अब स्व0) और मेरे साथ काम करने वाले राजा बाबू के साथ दिन और रात एक कर दिया था.मुझको अपनी बहन अर्चना और बहनोई डॉक्टर अपूर्व की भी याद आ रही थी जिनको मेरी इस पहली व्यापारिक विदेश यात्रा का खूब जोश था और मेरा खूब उत्साहवर्धन किया.सबसे अधिक मुझको याद आ रही थी अपने घर के छोटे बच्चों यानी कि मेरे भतीजों किट्टू और बिट्टू की,मेरे भांजे ईशान और मेरे लगभग 1 साल के बेटे अर्पित की लेकिन जिसकी याद सबसे अधिक आती थी वो थी मेरी 5 साल की चुलबुली खूब बातूनी और अपनी बातों से हम सबका मन लगाने वाली मेरी भांजी ईशा की,उसकी बातों की,उसकी नगीना फ़िल्म के गाने,”मैं तेरी दुश्मन,दुश्मन तू मेरा” पर डांस करने की. शायद 2 हफ्ते से अधिक पहली बार देश से बाहर रहने के कारण मेरा मन ज्यादा ही घर की ओर भटक रहा था.

जिनेवा पहुँचने पर मुझको अतुल भैया के यहाँ रुकना था.अतुल भैया यानी कि श्री अतुल चतुर्वेदी जो कि उत्तर प्रदेश काडर के 1974 बैच के IAS अधिकारी थे.जब मेरा विदेश यात्रा का कार्यक्रम बना और किस देश में कहाँ रुकेंगे यह चर्चा हुई तो मेरी बुआ के लड़के भैय्यो दा(अब स्व0)  ने कहा कि स्विजरलैंड में तो अतुल (भैया) जिनेवा में आजकल पोस्टेड हैं तो उनके रुक जाना. अतुल भैया मेरी बुआ के लड़के भैय्यो दा के कज़िन हैं और उनके पिताजी स्व0 पृथ्वीनाथ चतुर्वेदी जी और उनकी माँ स्व0 तारो बुआ से मेरे पापा के भी बहुत अच्छे और घनिष्ठ सम्पर्क थे.अतुल भैया से मेरी इसके पहले की कोई विशेष परिचयात्मक मुलाकात नहीं थी यद्यपि लखनऊ में भैय्यो दादा के यहाँ जेल हाउस में और स्व0 पृथ्वीनाथ फूफाजी के घर गौतम पल्ली और क्ले स्क्वायर में उनको देखा अवश्य था.अतुल भैया की शादी की दावत में लखनऊ में भी मैं शामिल हुआ था.अतुल भैया की पत्नी यानी कि कनक भाभी जो कि हाथरस की हैं और जैसा कि चतुर्वेदी समाज में सब का कहीं न कहीं किसी न किसी के माध्यम से एक दूसरे से रिश्ता होता है उसको छोड़ कर कनक भाभी से भी मेरा अब तक कोई सीधा परिचय नहीं था.मैं जहाज में बैठा हुआ मन ही मन सोच रहा था कि अतुल भैया और कनक भाभी के साथ मेरा रुकने का अनुभव कैसा रहेगा.उन लोगों से मेरा खुद का पहले से कोई विशेष परिचय न होने के कारण मन में एक झिझक सी भी थी.अतुल भैया उस समय जिनेवा में भारत सरकार की तरफ से पोस्टेड थे और WTO यानी कि विश्व व्यापार संगठन में भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे थे.यही सब सोचते हुए न जाने कब लगभग सवा घंटे का पेरिस से जिनेवा का सफर तय हो गया और जहाज में उदघोषिका ने घोषणा की कि यात्री गण अपनी सीट बेल्ट्स बांध लें और हमारा जहाज जिनेवा के हवाई अड्डे पर उतारने वाला था.जहाज जिनेवा हवाई अड्डे पर उतरा,इमीग्रेशन और कस्टम के बाद अपना सामान लिए मैं लॉबी में इधर उधर देख ही रहा था कि अचानक मेरे पीछे से किसी ने मेरे कंधे पर हाथ रखा और कहा, ”भाई किसको ढूंढ रहे हो, किसको देख रहे हो?”मैंने चौंक कर पीछे मुड़ कर देखा तो सामने अतुल भैया खड़े मुस्कुरा रहे थे.मैंने झुक कर उनके पैर छुए और अचानक मन बहुत अच्छा और सहज हो गया क्योंकि बहरीन के बाद अपना कोई परिचित मिला था और भारत से चलने के बाद अब लगभग 3 हफ्ते के बाद कोई घर जैसा करीबी मिला था.

एयरपोर्ट से अतुल भैया की गाड़ी में सामान रख कर हम लोग उनके घर पहुँचे. उनका घर जिनेवा के बहुत ही अच्छे इलाकों में से एक “रू द फ्लोरेसां-rue de florissant”  पर था.वहाँ पहुँच कर फिर हम उनके घर पहुँचे जो कि 6वीं मंजिल पर था.घर पहुँचते ही कनक भाभी से मुलाकात हुई जिन्होंने अपनी सौम्य मुस्कुराहट के साथ welcome किया.घर में घुस कर दाहिने हाथ को एक कमरा था,भाभी ने बताया कि उस कमरे में मेरे रुकने का इंतज़ाम था,हम लोग बाएं हाथ पर चल कर उनके ड्राइंग रूम में पहुँचे.उनका ड्राइंग रूम काफी बड़ा सा था और बहुत ही सुरुचिपूर्ण ढंग से सजा हुआ था.घर पहुँच कर बढिया चाय नाश्ता हुआ और मुझको लगा ही नहीं कि मैं अपने घर और देश से हजारों किलोमीटर दूर एक नितांत अपरिचित देश में बैठा हुआ हूँ. अतुल भैया का यह घर काफी बड़ा था.थोड़ी देर में ही ड्राइंग रूम में ही उनके बच्चों नन्दिता और यश से भी मुलाकात हुई जो बच्चों की ही भांति मुझको देखकर शर्मा रहे थे और धीमे धीमे स्वर में भाभी से कुछ बातें कर रहे थे जिसका मैंने अनुमान लगाया कि वो मेरे विषय में पूछ रहे होंगे कि ये कौन हैं.अतुल भैया और भाभी ने अब तक की मेरी यात्रा के हाल चाल पूछे फिर भाभी ने कहा कि यहाँ वो मेरे साथ मार्केट चलेंगी. थोड़ी देर में ही हम लोग घर से निकले,सैम्पिल मेरे साथ थे और हम लोग ट्राम में बैठ कर जिनेवा के रीव्स मार्केट पहुँच गए.

जिनेवा स्विट्ज़रलैंड का ज़्यूरिक के बाद दूसरा सबसे बड़ा शहर है.यह 46° 12’ N & 6° 09’ E के
को-ऑर्डिनेट्स पर स्थित है.जिनेवा एक अंतरराष्ट्रीय शहर है और इसका लगभग 4000 साल पुराना इतिहास है.जिनेवा का पहली लिखित चर्चा जूलियस सीज़र के गॉलिक युद्ध के सिलसिले में मिलती है.जिनेवा अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के केंद्रों में प्रमुख शहर है.यहाँ अनेकों अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों के केंद्र हैं जैसे International Committee of the Red Cross,ILO,UN High Commission for Refugees आदि,आदि.एक मजेदार बात यह भी है कि जिनेवा कैण्टन या राज्य मूलतः स्विट्ज़रलैंड का अंग नहीं था,नैपोलियनिक युद्धों के उपरांत 1 जून 1814 को जिनेवा स्विस संघ का सदस्य बना.

जहाँ तक भौगोलिक स्थिति का सवाल है तो लेक जिनेवा के दक्षिणी मुहाने पर जिनेवा शहर, जिसे फ्रेंच में ‘जिनीव’ भी उच्चारित करते हैं,बसा हुआ है जहाँ से Rhone नदी बहती है जो फ्रांस से होती हुयी भू मध्य सागर में गिरती है.जिनेवा तीन पर्वत श्रेणियों Jura,Vuache और Sal'eve से घिरा हुआ है और लगभग तीन तरफ से ही फ्रांस से इसकी सीमाएं भी लगतीं हैं.
यहाँ का अधिकतम तापमान अभी तक 39.7℃ ( जुलाई 2015 में) और न्यूनतम तापमान -20℃ (फरवरी 1956 में) रिकॉर्ड हुआ है.

जिनेवा शिक्षा के अच्छे केंद्रों में भी है।यूनिवर्सिटी ऑफ जिनेवा की स्थापना सन 1559 ईस्वी में जॉन कैल्विन ने द जिनेवा अकेडमी के रूप में की थी जो सन 1873 ईस्वी में यूनिवर्सिटी ऑफ जिनेवा बनी. यहाँ विश्व के सबसे पुराने International Schools में से एक The International School of Geneva भी है जिसकी स्थापना सन 1924 में ‘लीग ऑफ नेशंस’ के साथ ही हुई थी.जहाँ तक भाषा और मुद्रा का सवाल है तो असल में स्विट्ज़रलैंड में बोली जाने वाली मुख्य भाषाएं फ्रेंच,जर्मन और इटैलियन हैं लेकिन यहाँ आपको दुनिया के विभिन्न कोनों के लोग मिल जाएंगे और भाषाएं भी.जिनेवा में फ्रांस के नजदीक होने की वजह से भी मुख्यतः फ्रेंच भाषा ही बोली जाती है. स्विट्ज़रलैंड की मुद्रा स्विस फ्रेंक थी.

यहाँ इस बात का जिक्र करना भी उचित होगा कि जिनेवा रूसो, नीत्से, विलियम वर्डस्वर्थ,स्कॉट फिट्ज़राल्ड,फ्रैंक्सटीन की लेखक मैरी शैली आदि प्रबुद्ध लोगों का निवास भी रहा है.

खैर,मैं और कनक भाभी सफेद/क्रीम और ऑरेंज/लाल जैसे रंग के डिब्बों वाली  ट्राम में बैठ कर रीव्स मार्केट पहुँच गए थे.ट्राम की सवारी बहुत ही आनन्ददायक है।ट्राम आराम से चलती है और बहुत साफ सुथरी है,ये बात मुझको और ध्यान देने योग्य इसलिए भी लगी कि इस से पहले मैंने सिर्फ कोलकाता की ट्राम ही देखी थी.जिनेवा एक बहुत ही खूबसूरत शहर है या कहा जाए कि विश्व के सबसे खूबसूरत स्थानों में से एक है तो अतिश्योक्ति नहीं होगी.बढिया चौड़ी सड़कें,दोनों तरफ चौड़े फुटपाथ,करीने से सँवारे हुए पेड़ों की पंक्तियां सड़क के दोनों ओर तथा काफी व्यवस्थित ट्रैफिक; जिसमें कार, ट्राम आदि के अलावा साइकिल सवार भी चलते दिखते हैं और कुछ लोग अपने खूबसूरत कुत्तों को साथ लिए टहलते भी दिखते हैं.स्विट्ज़रलैंड में कुत्तों के पालने का लाइसेंस लेना तो आवश्यक है ही किसी ने मुझको बताया कि वहाँ पर पालतू जानवरों और खास तौर पर कुत्तों को जोड़े में ही रख सकते हैं और वहाँ जानवरों का इतना ख्याल है कि वहाँ इनसे सम्बंधित वकील यानी कि Pet Lawyers भी होते हैं. जिनेवा की एक खास बात यह भी थी कि यह काफी शांत शहर लगा और पेरिस की तड़क भड़क के बाद तो कोई भी स्थान शांत ही लगता तो  जिनेवा भी और शांत ही लगा.

कनक भाभी के साथ अपने सैम्पिल लिए मैं बाज़ार की एक दुकान में घुसा.वो दुकान काँच के मोतियों और आर्टीफीशियल ज्वेलरी की थी. दुकानदार ने हम लोगों को बहुत अच्छी तरह से बैठाया और बातचीत शुरू हुई.दुकानदार को सिर्फ फ्रेंच भाषा आती थी लेकिन अच्छी बात ये थी कि कनक भाभी भी फ्रेंच बोल लेती थीं.हम लोगों ने अपने काफी सैम्पिल दिखाए और भाभी ने दुकानदार से काफी बातचीत की किन्तु ऑर्डर की कोई बात बनी नहीं.भाभी और मैं एक एक करके और भी कई दुकानों पर गए लेकिन ऑर्डर लेने में कोई सफलता नहीं मिली.दरअसल मुझको ये बात काफी समय बाद समझ में आनी थी कि रिटेल के दुकानदार सीधे विदेश ऑर्डर नहीं देते हैं क्योंकि एक तो उनकी quantity कम होने से भाड़ा महंगा पड़ता है दूसरे वो आयात के झंझटों में नहीं पड़ना चाहते.बाद के सालों में मैंने स्विट्ज़रलैंड से खूब व्यापार किया और बड़े बड़े ऑर्डर लेकर काम किया किन्तु वो सभी काम ट्रेड फेयरों में ही मिले.

कनक भाभी के साथ चलते हुए मैं यह सोच रहा था कि उनके स्वभाव और व्यवहार से यह लगता ही नहीं था कि वस्तुतः हम पहली बार मिले हैं.उनका मेरे साथ बाज़ार में जाकर दुकान दुकान घूम कर मुझे ऑर्डर दिलवाने का प्रयास करना वाक़ई एक सीखने लायक अनुभव था कि यदि कोई आपके पास अपने देश से आये तो उसके साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए और कैसे उसकी मदद करनी चाहिए.

अब रात हो चली थी और हम लोग भी घर पहुँच गए थे.घर पर पूरा भारतीय खाना बहुत दिनों बाद खाया और फिर उनके ड्राइंगरूम में बैठ कर अतुल भैया और भाभी से काफी देर तक बातचीत होती रही.अतुल भैया ने बताया कि वो भारत सरकार की तरफ से WTO का काम देख रहे हैं और एक अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार समझौते जिसका नाम GATT है उस पर काम किया जा रहा है.आगे चल कर ये GATT समझौता काफी चर्चा में रहा.जब हम सोने चले तो भाभी ने कहा कि मैं सुबह अपने जो कपड़े धुलने हों वो जाने के पहले निकाल कर रख जाऊं.

अगले दिन सुबह नहा के तैयार हो कर और बढिया नाश्ता कर के मैं जिनेवा शहर घूमने को अकेला निकल गया.जिनेवा एक बहुत ही खूबसूरत शहर है.यहाँ पर विश्व की सबसे बड़ी पुष्प घड़ी है जो फूलों की बनी हुयी है.यह घड़ी जिनेवा के इंग्लिश गार्डन में है और इसका व्यास 5 मीटर का है.यह बहुत ही सुंदर है और इसको देखना एक अच्छा अनुभव है.जिनेवा में CERN lab भी है जिसको इंटरनेट का जन्मस्थान भी कहा जाता है.
जिनेवा की सबसे प्रसिद्ध और सुंदर चीज़ है ‘लेक जिनेवा’.यह झील आल्प्स पर्वत श्रृंखला के उत्तर दिशा में से है और स्विट्जरलैंड और फ्रांस के बीच स्थित है.इसका क्षेत्रफल लगभग 580 वर्ग किलोमीटर है.इसकी अधिकतम लंबाई लगभग 73 किमी और चौड़ाई लगभग 14 किमी है.इसकी औसत गहराई लगभग 154 मीटर और अधिकतम गहराई 310 मीटर है.यह अर्धचंद्राकार रूप में स्थित है. इसी झील में जिनेवा का विश्व प्रसिद्ध जेट फाउंटेन  jet d'Eau है.यह फव्वारा 140 मीटर ऊंचा जाता है,यह जिनेवा शहर के प्रतीकों में ऐसे ही है जैसे पेरिस का आइफ़िल टावर या आगरा का ताजमहल.काफी दूर से दिखने वाले लेक जिनेवा स्थित इस फव्वारे को चलता देखना अपने आप में एक बहुत रोमांचक अनुभव है और जरा सोचिए कि 140 मीटर यानी लगभग 420 फीट ऊपर तक फव्वारे को देखने को सिर और गर्दन को कितनी कसरत करनी पड़ेगी!!! और हाँ आप यदि शादी शुदा हैं, जिनेवा अकेले आये हैं और लेक जिनेवा के किनारे बैठ कर झील के शांत जल को निहार रहे हैं तो ऐसा हो नहीं सकता कि आपको अपने जीवन साथी की याद न आये और मैं भी इसका अपवाद नहीं था, मुझको भी यहाँ रचना का साथ न होना अखर रहा था.

जिनेवा में Palais des Nations को भी मैंने बाहर से देखा,वहाँ सड़क के दोनों तरफ विभिन्न सदस्य देशों के झंडे एक लाइन से लगे हैं जिनको देखना बहुत अच्छा लगा.

जिनेवा के बाज़ार में घूमना एक अलग अनुभव था.अभी तक यूरोप के शहरों में मैंने लन्दन और पेरिस के अद्भुत बाज़ार देखे थे जहाँ शोर-शराबा था,भीड़ थी,खूब चमक दमक थी.जिनेवा के बाज़ार में एक अलग प्रकार की रईसी की गरिमा महसूस हुयी.जिनेवा बहुत महंगी जगह है.वहाँ के बाज़ार में एक से एक महँगे ब्रांड्स के शो रूम थे जैसे Cartier  की दुकान में घड़ी, पेन, क्रॉकरी और कई वस्तुएं सुनहलेपन की फिनिश में थीं.
Le Portique के शो रूम में घड़ी और ज्वेलरी थी,पर्स और बैग के कई शो रूम थे जिनको देख कर के एक बार फिर अपनी माँ, पत्नी रचना और बहन अर्चना की याद आयी क्योंकि ये सभी पर्स और बैगों की शौकीन हैं.बाज़ार में एक ओर निगाह जाए तो Clarence showroom तो आगे शानदार Bauce & Mercer था कुछ आगे बढिये तो Longines  और Jean canal , syndic आदि के भव्य शो रूम थे जिस पर बहुत बढ़िया कारीगरी की मूर्तियां भी रखी थीं.जिनेवा में घड़ियों की एक से एक शानदार दुकाने थीं.अद्भुत और एक से एक महंगी घड़ियां और हों भी क्यों नहीं आखिर सन 1868 में जिनेवा में ही Patek Philippe ने कलाई घड़ी का अविष्कार किया था और आज भी पातिक फिलिप कलाई घड़ी के दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित और महँगे ब्रांड्स में है.एक ध्यान आकृष्ट करने वाली बात वहाँ की दुकानों में यह भी थी कि कुछ अत्यंत महँगे शो रूम्स पर घड़ी और ज्वेलरी दोनों चीजें साथ बिक रही थीं जबकि कुछ पर साथ ही पॉटरी, क्रॉकरी और कलम भी भी.1991 में हम हिंदुस्तानियों के लिए ये एक नई चीज थी हाँलाँकि बाद में भारत में भी तनिष्क जैसे महँगे ज्वेलरी के शो रूम्स हमारे यहाँ भी शुरू हुए जिन पर घड़ियाँ भी बिकती हैं.जिनेवा और वैसे पूरे स्विट्ज़रलैंड में कहीं भी घूमें जो चीज़ें आपको आकर्षित करेंगी वो हैं घरों की खिड़कियों पर गमलों में बहुत ही सुंदर फूलों की सजावट,बाज़ार में फूलों की दुकानें, झीलें,बैंक,ट्राम आदि.जिनेवा का घंटाघर भी काफी आकर्षक था. जिनेवा की एक चीज़ जो और प्रसिद्ध है वो है यहाँ की विश्वप्रसिद्ध चॉकलेट,वो भी देखीं और खरीदी भी.यहाँ एक और बात लिखना चाहूँगा कि ये यात्रा वृतांत सन 1991 का है जब छोटे और मध्यम दर्जे के शहरों में रहने वाले तो क्या बड़े शहरों के भारतीयों को भी विदेश के विकसित देशों की बहुत सी चीजों जैसे विज्ञापन के बड़े बड़े होर्डिंग्स,मेट्रो,बाज़ारों में बड़े ब्रांड्स के बड़े बड़े शो रूम्स,बड़ी बड़ी शानदार कारें आदि देख कर अचरज होता था.

जैसा मैंने कहा कि जिनेवा के महँगे बाज़ारों में एक से एक शानदार शो रूम थे,सड़कों पर एक से एक महँगी कारें किन्तु हर स्थान पर एक गरिमामयी शांति भी थी.मैं बाज़ार के फुटपाथ पर यही सोचता हुआ चला जा रहा था कि लन्दन, पेरिस, दुबई,काहिरा के बाज़ार हों या हमारे बम्बई (अब मुम्बई) या दिल्ली के वहाँ रौनक है लेकिन भीड़ और शोर शराबा बहुत है जिसके विपरीत यहाँ की शानो-शौकत में लोगों ने एक गरिमामयी शांति बनाए रखी है.जब मैं यह सोच रहा था तभी मैं क्या देखता हूँ कि सड़क के दूसरी ओर फुटपाथ पर काफी लोग (करीब 20-25) एक झुंड के रूप में जा रहे थे और उनके आगे कुछ लोग बैंड बजाते चल रहे थे.बैंड की आवाज सुनकर मेरा ध्यान उनकी ओर और  आकर्षित हुआ तो क्या देखता हूँ कि उनमें अधिकांश काले सूट/कपड़े पहने हुए थे,उनमें कुछ डांस जैसा भी कर रहे थे.मेरी समझ में कुछ नहीं आया,मैंने सोचा कि यहाँ ऐसे बैंड बाजे के साथ बारात का रिवाज तो सुना नहीं था फिर यह क्या हो रहा है??!!!आखिर मुझ पर रहा नहीं गया और मैं सड़क पार करके उधर पहुँच ही गया तो मालूम पड़ा कि वो किसी की शव यात्रा थी.मुझको ध्यान आया कि हमारे हिंदुस्तान में भी कई शहरों में यदि किसी काफी उम्रदराज बुजुर्ग या सन्त-महात्मा की मृत्यु हो जाये तो वहाँ भी उनकी अर्थी और शव यात्रा को काफी धूम धाम से निकालते हैं और कई स्थानों पर उसको विमान निकालना कहते हैं.

खैर दिन भर घूम-घाम कर जब मैं शाम को घर पहुँचा तो मेरे कमरे में मेरे सारे कपड़े धुले और प्रेस किये रखे थे जो मेरे लिए एक अत्यंत सुखद अनुभव था.रात को खाने के साथ अतुल भैया और भाभी से काफी देर बातें होती रहीं.अब अगली सुबह ज़्यूरिक जाने का कार्यक्रम था.

Comments

  1. अदभुत,रचनात्मक,लेखनी अति सुंदर

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  2. Sundar, Rochak....gazab ka lekhan,padhte samay aisa laga ki Mai swayam ghoom Raha hun.. Keep it up..

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    1. आपका बहुत बहुत आभार और धन्यवाद

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  3. जीवंत यात्रा वृतांत ...

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  4. प्रसून,बहुत बहुत धन्यवाद

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  5. अद्भुत पठनीयता । भौगोलिक और व्यापारिक जानकारियां इसे खास बनाती हैं। आपके लेखन शैली का मुरीद हो गया हूँ । आपका हृदय से आभार कि आपने घर बैठे जेनेवा का भ्रमण कराया । अब तो हमे आपकी विदेश यात्रा की किताब का बेसब्री से इंतजार है। हार्दिक बधाई सर!💐💐

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    1. आप जैसे विद्वान जब अपनी टिप्पणियों से मेरा हौसला बढ़ाते हैं तो बहुत अच्छा लगता है!
      आपका बहुत बहुत आभार!

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