RCEP और देश में शुद्ध दूध का मुद्दा

RCEP मुद्दे के बहुत से पहलू है परन्तु एक पहलू ऐसा है जो हमारे देश की वर्तमान एवं भविष्य की पीढ़ियों के न सिर्फ स्वास्थ्य अपितु उनके जीवन से भी जुड़ा हुआ है.

इसी संदर्भ में एक बहुत महत्वपूर्ण बात जो ध्यान देने योग्य है वो यह है  कि हमारे देश में दूध का आधिकारिक रूप से उत्पादन सन 2017-18 में लगभग 176.35 मैट्रिक टन रहा है और बताया गया है कि दुग्ध उत्पादन के विकास की दर 6.3%  रही है जबकि वैश्विक दुग्ध उत्पाद दर लगभग 2.3% कही जा रही है.

1970 में भारत में दूग्ध उत्पादन लगभग 22 मिलियन टन था जबकि 2015-16 में 156 मिलियन टन रहा है मतलब 46 वर्षों में बहुत बड़े प्रतिशत की बढ़ोत्तरी उत्पादन में;

 श्वेत क्रांति…

इसका मतलब यह भी है कि भारत में प्रति कैपिटा दूध की उपलब्धता 355 ग्राम प्रतिदिन हो गयी है जो बहुत बड़ी उपलब्धि और प्रसन्नता की बात है.प्रसन्नता की बात यह भी है कि हमारा भारत आज विश्व के सबसे बड़े दुग्ध उत्पादक देश में है.मतलब आज हम दुग्ध उत्पादन में गजब की प्रगति कर रहे हैं और वो दिन दूर नहीं जब शायद फिर से हमारे देश में दूध और दही की नदियां बहने लगेंगी!!!

चलिए बहुत हो गयी खुशनुमा आंकड़ों की बात अब कुछ हकीकत से भी रू ब रू हो जाइए.


उपरोक्त फोटो साभार अमर उजाला


यह फोटो मैंने इंटरनेट पर अमरउजाला से ली है और जो एक भयावह स्थिति को दर्शाती है.

इस विषय पर और जानकारी करने पर निम्न तथ्य सामने आए हैं:-

1.हमारे देश में आंकड़ों के अनुसार हम दुग्ध उत्पादन में चाहे कितने ही बड़े,आत्मनिर्भर और सक्षम क्यों न हो गए हों किन्तु हमारे यहाँ दूध में मिलावट एक बहुत गम्भीर स्वास्थ समस्या है.

2.FSSAI के राष्ट्रव्यापी सर्वे से जानकारी मिलती है कि देश में पैकेज्ड मिल्क (कम्पनी कोई भी हो सकती है उसका नाम महत्वपूर्ण नहीं) कच्चे दूध से लगभग दुगना Toxic यानी कि विषैला है.प्रोसेस्ड मिल्क के लगभग 10.4% नमूने सुरक्षा मानकों पर फेल हुए हैं.भारत की जनसंख्या से यह प्रतिशत करोड़ों लोगों,बच्चों को जानलेवा बीमारियों से भयंकर किस्म के नुकसान पहुंचाने वाला है.

3.इस मिलावट में एफ्लाटॉक्सिन- एम 1, एंटीबायोटिक व कीटनाशक जैसे जहरीले पदार्थ मिले हैं। प्रोसेस्ड दूध में एफ्लाटॉक्सिन अधिक है। एफ्लाटॉक्सिन का पशु आहार में इस्तेमाल होता रहा है।

4.यूपी,आँध्रप्रदेश,महाराष्ट्र,गुजरात आदि प्रदेशों के दूध के नमूनों में एंटीबायोटिक्स भी बहुत मिले हैं.

5.कई प्रमुख ब्रांड के पैकेज्ड दूध (प्रोसेस्ड मिल्क) और कच्चे दूध के नमूने निर्धारित गुणवत्ता और तय मानकों पर खरे ने नहीं उतरे हैं। खाद्य नियामक भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) के अध्ययन में यह खुलासा हुआ है। इसके मुताबिक, गुणवत्ता मानकों पर प्रोसेस्ड दूध के 2,607 नमूनों में से 37.7 फीसदी फेल हो गए।वहीं, कच्चे दूध के 3,825 नमूनों में से 47 फीसदी मानकों के मुताबिक नहीं थे।

6.कच्चे दूध की तुलना में प्रोसेस्ड दूध में एल्फाटॉक्सिन की मात्रा अधिक पाई गई। विशेषज्ञों के मुताबिक पशु आहार में एफ्लाटॉक्सिन का लंबे समय से इस्तेमाल हो रहा है, जो कि बहुत खतरनाक है.

7.दिल्ली में 60 से 65 फीसदी पैकेट दूध का इस्तेमाल होता है। बाहरी दिल्ली को छोड़ दें तो मध्य दिल्ली में करीब 95 फीसदी तक पैकेट दूध का ही इस्तेमाल होता है। FSSAI की एक हालिया जांच में दिल्ली के 262 नमूने लिए गए थे। इनमें 194 प्रोसेस्ड और 68 त्वरित दूध के नमूने थे। 262 में से 38 नमूनों की जांच में एफ्लाटॉक्सिन एम1 मिला।

इन 38 में से सर्वाधिक 36 नमूने प्रोसेस्ड यानी पैकेट दूध के शामिल हैं। केवल 2 नमूने ऐसे थे, जो कि पशुओं से निकाले गए त्वरित दूध में मिले थे। ठीक इसी तरह चार नमूनों में एंटीबायोटिक्स मिला है। इनमें से तीन नमूने पैकेट दूध के थे।

एम्स के डॉक्टरों का कहना है कि इस रिपोर्ट के आधार पर सरकार को जल्द से जल्द सख्त फैसला लेना चाहिए। देश का हर परिवार इससे जुड़ा है। सरकार को ऐसे रसायनों के पशु आहार में इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाना चाहिए।

सात  फीसदी दूध पीने लायक ही नहीं है.

8.पैकेज्ड दूध के नमूनों में एफ्लाटॉक्सिन एम-1 नामक रसायन मिला। दो में यूरिया, तीन में डिटर्जेंट पाउडर, छह में हाइड्रोजन ऑक्साइड और एक में न्यूट्रलाइजर के तत्व मिले हैं।कई प्रमुख ब्रांड के पैकेज्ड दूध (प्रोसेस्ड मिल्क) और कच्चे दूध के नमूने निर्धारित गुणवत्ता और तय मानकों पर खरे ने नहीं उतरे हैं। खाद्य नियामक भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) के अध्ययन में यह खुलासा हुआ है। इसके मुताबिक, गुणवत्ता मानकों पर प्रोसेस्ड दूध के 2,607 नमूनों में से 37.7 फीसदी फेल हो गए।

8.कई प्रमुख ब्रांड के पैकेज्ड दूध (प्रोसेस्ड मिल्क) और कच्चे दूध के नमूने निर्धारित गुणवत्ता और तय मानकों पर खरे ने नहीं उतरे हैं। खाद्य नियामक भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) के अध्ययन में यह खुलासा हुआ है।

9.अखबार में छपे एक समाचार के अनुसार दिल्ली एम्स, मेडिसिन विभाग के एक डॉक्टर कहते हैं कि बताया कि एफ्लाटॉक्सिन एम1 रसायन से कैंसर व मस्तिष्क रोगों का खतरा बढ़ता है। यह इंसानों के लिवर पर दुष्प्रभाव डाल सकता है। बच्चों के लिए ज्यादा हानिकारक है, क्योंकि उनके शारीरिक विकास को सीधे तौर पर प्रभावित कर सकता है।

10.दूध में मिलावट के प्रति हमारे देश के सर्वोच्च न्यायालय का रुख भी कड़ा रहा है और सुप्रीम कोर्ट ने भी कई बार चिंता व्यक्त की है और कहा है कि दूध में मिलावट के हालात खतरनाक हो चले हैं. केंद्र और राज्यों को इसे काबू में करने के लिए मौजूदा कानून में संशोधन कर कड़े कानूनी प्रावधान बनाने होंगे. देश में बच्चों को दूध पिलाने की परंपरा रही है और मिलावटी दूध बच्चों की सेहत के लिए खतरनाक है. ऐसे में हालात से निपटने के लिए जरूरी कदम उठाए जाने चाहिए.

दूध में मिलावट करने वालों के खिलाफ उम्र कैद तक का कठोर कानून बनाने की मांग वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्यों को अहम दिशा निर्देश जारी किए हैं. सुप्रीम कोर्ट ने मिलावट को गंभीर मुद्दा बताते हुए निर्देश दिए हैं कि केंद्र और राज्य सरकारें फूड सेफ्टी एंड स्टेंडर्डस एक्ट 2006 को लागू करने के लिए प्रभावी कदम उठाएं. राज्य सरकार अपने इलाके के डेयरी मालिक, डेयरी आपरेटरों और विक्रेताओं को सूचना दें कि अगर दूध में कीटनाशक और कास्टिक सोडा जैसे केमिकल पाए गए तो उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी.ये तमाम बातें कागजों पर तो हैं किंतु हमारे देश में इस विषयक असलियत अभी तो बहुत ही भयावह है.


अब जरा आप लोग खुद भी सोचिए कि एक तो रोजमर्रा में जितना दूध का उत्पादन नहीं है उस से कई गुना अधिक प्रतिदिन सारा देश कैसे और कौन सा दूध पी लेता है??

दूसरी बात भंडारे,तेरहवीं,पितृ-पक्ष, तीज-त्योहार और शादी-विवाह आदि के सीजन में जब पूरे देश में एक साथ डिमांड बढ़ती है तो अचानक देश में दूध-खोया-पनीर भी उसी मांग के अनुरूप कैसे बढ जाता है?

क्या इन अवसरों पर दुधारू जानवर ज्यादा दूध देने लगते हैं??

सोचिए जरा..

मामला गंभीर है…..

यह बात और भी गम्भीर तब हो जाती है जब हमको मालूम ही पड़ गया है कि यह मिलावट सिर्फ पानी की नहीं होती है…..(पानी की उपलब्धता और शुद्धता पर चर्चा फिर कभी करेंगे)

उन लोगों की बात छोड़ दीजिए जिन्होंने खुद दुधारू पशु पाले हुए हैं और उनका दूध पीते हैं (हांलांकि उनके पशु भी उतना ही शुद्ध दूध देंगे जितना शुद्ध चारा उनको खाने को मिलेगा)......

उनकी भी बात छोड़िए जिनके दूध के सप्लायर ईमानदार हैं या कम से कम कैमिकल का उपयोग मिलावट में नहीं करते किन्तु जो दूध के धोखे में कैमिकल ही पी रहे हैं-पिला रहे हैं उनका क्या?!!!

जरा सोचिए छोटे-छोटे बच्चे,देश की समस्याओं का बोझा अपने कंधों पर सम्हालने को तैयार होती नौजवान पीढ़ी और बुजुर्ग लोग अच्छी सेहत की लालसा और कामना में दूध पीते हैं और दरअसल बहुत बार जिस पेय को वो सेहतवर्धक दूध समझ के पी रहे होते हैं वो दूध न होकर तमाम घातक रसायनों का एक मिश्रण होता है जिसको कुछ अज्ञानी और अधिकतर लालची मौत के सौदागरों ने तैयार किया हुआ होता है और नतीजा भी आजकल खूब दिखता ही है जैसे लोग कहते मिलते हैं कि फलाने ने तो कभी शराब-पानमसाला-सुपारी को हाथ लगाया नहीं फिर भी ईश्वर जाने इसको कैंसर कैसे हो गया,फलाने का लिवर कैसे गड़बड़ा गया और किसी और की किडनी कैसे खराब हो गयी?!!!!

मेरी बहुत से लोगों से इस मिलावट के मुद्दे पर बात होती है और उनमें कई जिम्मेदार सामाजिक कार्यकर्ता,पत्रकार,साहित्यकार,बुद्धिजीवी, सरकारी अफसर और जनप्रतिनिधि आदि भी होते हैं परंतु बड़े अफसोस की बात है कि उनमें से अधिकांश लोग मुझको इस समस्या की भयावहता के प्रति संवेदनशील नहीं लगते….

आज मैं सब्जी,दाल और अन्य खाद्य पदार्थों में मिलावट की बात नहीं कर रहा हूँ और ना ही पानी की गड़बड़ी या प्रदूषण की,इन विषयों में फिर कभी चर्चा करूंगा किन्तु एक प्रश्न सबके सामने अवश्य रखना चाहूँगा कि हम सबको गम्भीरता से सोचना होगा कि यदि हम एक राज्य के रूप में ऐसी नीतियां बना नहीं पा रहे जिनसे हमारी पीढ़ियों का स्वास्थ्य सुरक्षित और अच्छा रहे उल्टे हम आमजन को ऐसी रोजमर्रा की चीजें खाते पीते देख रहे हैं या खाने पीने दे रहे हैं  जैसे मिलावटी दूध जो गम्भीर किस्म की बीमारियों को बढाने के कारक बन रहे हैं और जिस से सिर्फ दवा कम्पनियों और अस्पतालों का ही फायदा है अन्य किसी का नहीं तो क्या इस से बेहतर यह नहीं है कि खुले बाजार की चुनौती आये और बाज़ार की स्पर्धा लोगों को खान-पान दूध आदि में शुद्धता रखने को मजबूर करे.मेरा मानना है कि देश को आत्मनिर्भर बनाने सबसे जरुरी है और वो भी खानपान से लेकर रक्षा उत्पादन जैसे हर क्षेत्र में लेकिन जैसे जब तक हम उच्च स्तर के वाहन,हथियार,वायुयान,लड़ाकू जहाज,पानी के विमानवाहक युद्ध पोत आदि नहीं बना पाते तो देश को सुरक्षित रखने को ये सामान दूसरे देशों से लेते हैं और साथ ही साथ आत्मनिर्भरता के समुचित प्रयास भी जारी रखते हैं उसी तर्ज पर हम ऐसी कोई नीति क्यों नहीं बना सकते जिसमें हम आत्मनिर्भरता की ओर तो सतत रूप से बढ़ते ही रहें किन्तु साथ ही साथ उस स्थिति तक पहुँचने की यात्रा के दौरान अपनी वर्तमान और भावी पीढ़ी का स्वास्थ्य भी सुरक्षित रख सकें और तब तक अगर मांग और आपूर्ति के गैप को भरने के लिए हमको इस किस्म के पदार्थ (दूध आदि) और डेयरी टैक्नोलॉजी भी;इनका आयात इन पर कड़ी दृष्टि रखते हुए खोलना पड़े तो क्या इस समस्या का समाधान सम्भव नहीं होगा?क्योंकि यदि ऐसी मिलावटें जारी रहीं तो देश की जनसंख्या का अधिकांश भाग  किसी न किसी बीमारी से ग्रसित मिलेगा और लोगों की आय का एक बड़ा भाग जहरीला दूध और मिलावटी खाद्य पदार्थ खा पी कर बीमारियों के इलाज में व्यर्थ खर्च होता दिखेगा.मेरे ख्याल से सरकार को इस विषय में एक व्यवहारिक और गम्भीर नीति बनाने की और उसके गम्भीरता से पालन करने की आवश्यकता है.

नोट:उपरोक्त लेख में कुछ आंकड़े और कई जानकारियां कुछ समाचारपत्रों जैसे कि अमर उजाला और इंटरनेट आदि से ली गईं हैं.इसके लिए इनको आभार ज्ञापित करता हूँ.


Comments

  1. Mr atul1971 batchmatenothing will happen till it doesn't reach the PMO office then only something will happen chamatkar hoga

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    1. It is not showing your name please?Kindly follow the blog.thanks

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  2. बहुत सामयिक और उत्तम लेख.भारत में दूध की महत्ता प्राचीन काल से रही है तथा आयुर्वेद में इसको गो अमृत कहा गया है. परन्तु इस अमूल्य द्रव को मुनाफाखोरों ने विष का रूप दे दिया है
    जब-तक कठोर दंड का प्रावधान नहीं होगा तब तक सुधार की संभावना कम है.मै तो अतुल से भी अधिक दंड का समर्थन करता हूं
    आने वाली पीढ़ियों के लिए जन आंदोलन की आवश्यकता है

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