My Visit to Colvin Taluqdars' College Lucknow on 8th January 2022

अपनी हाल की लखनऊ यात्रा के दौरान कल मैं अपने पुराने स्कूल  Colvin Taluqdars' College गया था।कॉल्विन तालुकेदार्स कॉलेज की स्थापना 1889 में हुई थी और इसका शुमार देश के सर्वश्रेष्ठ संस्थानों में किया जाता था;जब हम लोग इसमें पढ़ते थे तब भी इसके चर्चा सबसे अच्छे स्कूलों में ही थी।इस शिक्षण संस्था के छात्रों ने देश ही नहीं दुनिया में ;विविध क्षेत्रों में अपना नाम किया है।
मैं इस महान शिक्षण संस्थान में 1974 से 1978 तक पढा था।जब कॉलेज के अंदर प्रवेश किया तो न जाने कितनी पुरानी यादें मन में उमड़ने-घुमड़ने लगीं।अंदर घुस कर बाएं हाथ पर अवध हाउस था और दाहिने हाथ पर सड़क पर जाकर अंजुमन हाउस।मैं पहले अंजुमन हाउस गया,हॉस्टल खाली था क्योंकि अभी छुट्टियां चल रही थीं।अंजुमन हाउस में जिन कमरों में रहा था (1974 से 1976 तक) उन कमरों तक गया।कमरों के नम्बर बदले जा चुके थे।जो मेरा कमरा 30 नम्बर हुआ करता था वो अब 1 नम्बर था और 9वीं क्लास में दाखिले के समय जिस कमरे नम्बर 22 में आया था उसका नम्बर अब 9 हो गया है।मैं वहीं काम करने वाले स्टाफ के कुछ लोगों के साथ मैस तक भी गया,पीछे जाकर देखने पर मालूम हुआ कि जहाँ हम बाल कटवाते थे वो सैलोन वाला कमरा आदि अब वहाँ नहीं था।अंजुमन हाउस के कॉमनरूम में भी गया और टेबिल टेनिस की टेबिल को देख कर पुराने दिनों की याद आयी।कॉमन रूम के बाहर ही वो छोटी सी खिड़की नुमा अलमारी भी दिखी जिसमें फोन रखा रहता था और घर से फोन आने पर हम लोग बात करते थे।अंजुमन हाउस के ग्राउंड के बीच की कोठरी में एक कुआं जैसा भी था जिसमें पम्प लगा था और एकाधिक बार पम्प की एयर निकाल कर उसको चालू करने हेतु मैं भी सीढ़ियों से नीचे कुएं में उतरा था जहाँ नीचे लकड़ी के तख्ते लगे हुए थे।हमारे समय में अंजुमन हाउस के हाउस मास्टर समीउल्लाह सर और यादव सर हुआ करते थे।अंजुमन हाउस में ही  इनफरमरी थी जिसमें बीमार होने पर भर्ती होते थे और जिसकी देखभाल को कंपाउंडर साहब थे जिनका लम्बा सा डील-डॉल था और जिनके लड़के इज़हार अली सिद्दीकी और इरफान अली सिद्दीकी बहुत अच्छे और तेज दौड़ने वाले धावक थे।
अंजुमन हाउस से निकल कर मैं अवध हाउस में गया जहाँ मैं कक्षा 11 और 12 के दौरान(1976 से 1978 तक) रहा।हॉस्टल में घुसते ही फिर न जाने कितनी यादें ताज़ी हो गईं किंतु अवध हाउस का खराब हाल देख कर मन बहुत ही खराब हो गया।वहाँ मैस वाली साइड के बरामदे में कुछ लोग खाना बना रहे थे।जिस मैस का शानदार खाना आज भी याद आता है उसका इतना बुरा हाल देख कर बहुत बुरा लगा।ऐसा लग रहा था कि किसी पुरानी इमारत के खंडहर में आ गए हैं।बीच के लॉन के अंदर बेतरतीब किस्म के उगे झाड़-झंखाड़ ने दृश्य और भी भयावह कर रखा था।मैस और उसके बगल के अपने 12वीं क्लास के दौरान के कमरे नम्बर 22 को पहचानना भी लगभग नामुमकिन सा ही था।अवध हाउस में खड़ा होकर में हाउस मास्टर रहे S.N.Tandon sir, S.P.Singh sir,S.K.Dayal Sir और Matloob Ali Siddiqui sir को याद कर रहा था।
मुझे उस पुराने बूढ़े चौकीदार रामबोध की भी याद आयी जो "उट्ठो भैया उट्ठो,साढ़े 5 बज गवा" कह कर हम लोगों को अल-सुबह उठाया करते थे।
अवध हाउस से निकल कर स्कूल की मेन बिल्डिंग तक गया जो आज भी अपनी पुरानी आन-बान-शान के साथ खड़ी हुई है।प्रिंसिपल साहब के ऑफिस के सामने के कॉरिडोर और पोर्च से निकलने की न तब हिम्मत थी और न अब ही पड़ी।स्टाफ रूम के सामने से आगे असेम्बली ग्राउंड की तरफ बढ़ा और याद आये हमारे प्रिंसिपल H.L.Dutt साहब।मेरे विचार से उनकी गिनती विश्व के महानतम प्रिंसिपल्स में होनी चाहिए।उनका प्रिंसिपल होना हम जैसे छात्रों को एक अलग किस्म के गौरव की अनुभूति और आत्मविश्वास देता था।असेम्बली वाले स्थान को देख कर याद आया कि कैसे अजंता,तक्षशिला,साँची, नालंदा (मेरा हाउस) और उज्जैन हाउस के छात्र असेम्बली में खड़े होते थे।सामने तीन विशाल पेड़ अभी भी मौजूद हैं जिनमें से एक पर स्कूल की बैल टँगी रहती थी,कैंटीन जो कि बंद थी;वहाँ के समोसे याद आये।सामने ही जूनियर स्कूल और हिन्द हाउस की बिल्डिंग भी चमक रही थी।
अपने पुराने क्लासरूम्स को निहारते हुए,लाइब्रेरी के सामने से होते हुए मैं मुख्य बिल्डिंग के पीछे आया और वहीं खड़ा होकर बच्चों को खेलते हुए देखता रहा।Mango Tree Ground, Main Ground,गड्ढे वाला फील्ड (जो अब समझ में नहीं आया),स्वीमिंग पूल आदि सबकी स्मृतियां जैसे मन-मस्तिष्क से निकल कर सामने आ खड़ी हुई थीं।हमारे कॉलेज का शानदार दरबार डे, उसमें होने वाले भव्य आयोजन अचानक याद आने लगे और मुझको लगा कि जैसे सामने फील्ड में परेड निकल रही है,मुख्य अतिथि के रूप में  राज्यपाल महोदय बैठे हैं,प्राइज डिस्ट्रीब्यूशन होने को है,बैंड बज रहा है,चारों तरफ हर्षोल्लास से भरी चहल-पहल का वातावरण है।
पुराने टीचर्स,पुराने साथी सब एक-एक करके याद आ रहे थे।प्रिंसिपल साहब के घर के रास्ते के सामने से जब वापिस लौट रहा था तो बाएं हाथ पर टेनिस कोर्ट और दाहिने हाथ पर बना बहुत अच्छा squash court का स्थान देख कर प्रसन्नता हुई।
पुराने टीचर्स में मुझको house masters के अतिरिक्त S.B.Singh sir(VP), R.P.Singh Sir,Y.Pathak Sir,Vaisali Sir,G.R.Sahni sir,Vora sir,Rakeshwar Singh sir,M.B.Singh sir, M.L.Namra sir,Kirtan Singh sir, K.K.Saxena sir(संस्कृत), K.K.Srivastava sir, Amanat ullah sir,P.Ghosh sir,S.Mishra sir,A.K.Goyal sir,Arun Chandra sirआदि बहुत से शिक्षकगण और उनसे जुड़ी बातें याद आ रही थीं और पुराने मित्र भी याद आ रहे थे।
एक लंबे अंतराल के बाद अपने पुराने स्कूल जाकर बहुत अच्छा लगा लेकिन साथ ही मन में ये प्रश्न लगातार उठता रहा और अभी भी है कि आज के दौर में जब कोई भी एक नया स्कूल खोलता है तो कुछ ही सालों में वो स्कूल एक सफल रूप में चलने लगता है तो फिर क्या वजह है कि हमारा यह नामचीन स्कूल जिसका इतना शानदार-गौरवशाली अतीत रहा है,जो एक समय में देश के सर्वश्रेष्ठ शिक्षण संस्थानों में गिना जाता था आज अपने उस स्थान पर खड़ा नहीं दिखता,क्या वजह है कि शानदार अवध हाउस आज एक खंडहर में तब्दील होता दिख रहा था??!!!
मेरा Colvin Taluqdars' College के management से जुड़े लोगों, शिक्षकों और सभी Old Colvinians से अनुरोध है कि वो कृपया इस विषय में सोचें और इस शानदार शिक्षण संस्थान को एक बार फिर से देश के सर्वश्रेष्ठ शिक्षण संस्थान बनाने हेतु गंभीर प्रयास करें।मुझे उम्मीद है और विश्वास भी कि हमारा Colvin Taluqdars' College एक बार फिर से अपने शानदार स्थान पर स्थापित होगा।
अतुल चतुर्वेदी
फिरोजाबाद

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