रिश्ते और संबंध
रिश्ते और संबंध
You can choose your friends but you can't choose your family.
इसी कहावत का और विस्तार किया जाए या थोड़ा परिवर्तन किया जाए तो हम कह सकते हैं कि रिश्ते तो हमको विरासत में मिलते हैं और संबन्ध हम स्वयं बनाते-निभाते और बिगाड़ते हैं।उदाहरण के लिए एक ही परिवार में अनेकों रिश्तेदार होते हैं जिनका रिश्ता आपस में कमोबेश एक सा ही होता है किंतु उनके आपसी संबन्ध सभी से एक से नहीं होते।कभी सोच कर देखा है कि ऐसा क्यूँ होता है?परिवार में ही आपसी संबन्ध अलग-अलग लोगों से भिन्न-भिन्न किस्म के क्यों होते हैं?
चाहे खून के रिश्ते हों या अन्य किस्म के संबंध;ये एक किस्म का बगीचा होता है जिसमें अलग-अलग किस्म के पेड़,पौधे,फुलवारी आदि होते हैं जिनको सहेज कर रखने के लिए- उनकी नियमित देखभाल,भरोसे,प्यार,सद्भाव, सहजता,समझदारी,गाम्भीर्य,सदव्यवहार, शालीनता जैसी चीजों के खाद-पानी की आवश्यकता होती है।जब हम इन चीजों से रिश्तों-संबंधों की फुलवारी को सींचते रहते हैं तो हमारे रिश्ते-संबन्ध रोज़ ब रोज़ मजबूत होते जाते हैं और हमारा रिश्तों-संबंधों का बगीचा खूब पुष्पित और पल्लवित होता रहता है जिसकी खुशबू चारों ओर फैलती ही है।
इसके विपरीत जब हमारे इन रिश्तों-संबंधों के बगीचे में ईर्ष्या,द्वेष,विश्वासघात, घमंड,झूठ,चालबाजी,स्वार्थ,गलतफहमी आदि जैसे कीड़े-दीमक लग जाते हैं और उनका इलाज नहीं किया जाता तो उस रिश्ते-संबन्ध की फुलवारी का अस्त-व्यस्त होना या खराब होना निश्चित ही होता है।
संबन्ध-रिश्ते एक नाजुक डोर जैसे होते हैं जिनको जैसा मैंने पहले कहा कि आपसी विश्वास,निस्वार्थता, प्यार,सद्भाव से मजबूत किया जा सकता है और करना चाहिए।रहीम दास जी का इस विषय में एक प्रसिद्ध दोहा है,"रहिमन धागा प्रेम का मत तोड़े चटकाय,जोड़े से जुड़े नहीं,जुड़े गांठ पड़ि जाए"
अक्सर ऐसा होता है कि स्वार्थ,गलतफहमी, अहंकार और/या क्रोधवश हम इन संबंधो के धागे को या तो बहुत कमजोर कर देते हैं या तोड़ ही देते हैं और जब तक हमको दुबारा उन संबंधों की याद आती है या महत्व समझ में आता है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।कई बार जो व्यक्ति उन रिश्तों और संबंधों को निभाने की भरपूर कोशिश कर रहा होता है उसकी इस भावना को लोग उसकी कमजोरी समझ लेते हैं किंतु ये आप खुद समझ सकते हैं कि ऐसा प्रयास करने वाला क्या वाकई कमजोर होता है?संबंधों के महत्व को हर व्यक्ति को समझना चाहिए और ये भी कि दुनिया में सबसे बड़ी पूंजियों में संबन्ध की पूंजी अग्रणी स्थान पर है और ये यदि आप पर है तो आपसे बड़ा सम्पन्न व्यक्ति कोई नहीं।
जीवन जब हम जीते हैं तो एक-एक घड़ी पल,सैकिंड, मिनट,घंटा और दिन करके जीते चलते हैं-चलते चले जाते हैं पर एक क्षण के लिए तनिक रुक कर आंखें मूँद कर सोचिए तो सही; ऐसा लगेगा कि जो जितना जीवन जी लिया वो तो पल भर में मानो निकल गया और साथ ही न जाने कितने अनमोल रिश्ते-नाते-सम्बन्ध वाले अति प्रिय लोग भी पीछे छूट गए;कितना भी प्रयास कर लीजिए वो लोग अब कभी मिलने वाले नहीं।अब ये भी सोचिए कि वक़्त और वक़्त के साथ हमारे रिश्तेदार-सम्बन्धी मुट्ठी से फिसलती रेत की भांति हाथ से निकल जाएंगे,जब तलक हैं तब तलक इन रिश्तों-संबंधों को सहेज कर संजो कर रख लीजिए नहीं तो बाद में सब बहुत याद आएगा,बहुत तलाशेंगे किंतु कुछ न रह जायेगा।
एक मिनट लगता हैं,
रिश्तों को खाक में मिलाने में,
और सारी उम्र बीत जाती हैं,
एक रिश्ते को बनाने में…
Well said.. Just marvellous expression of Atul ji
ReplyDeleteIt's Ravi Chaturvedi not Anonymous
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