सिंदबाद ट्रैवल्स-33 जर्मनी-2 हाइडलबर्ग-2

सिंदबाद ट्रैवल्स-33

जर्मनी-2;हाइडलबर्ग 2


Sindbad Travels-33

Germany-;Heidelberg 2


हाइडलबर्ग के इस्कॉन के गैस्टहाउस में मेरा सामान लेकर जो जनाब सीढ़ी चढ़ कर आगे चले गए थे उनके पीछे-पीछे मैं भी उस हॉल नुमा कमरे में पहुँच गया।कमरे में एक तरफ उन्होंने मेरा सामान रख दिया,वो भारतीय नहीं थे, मैंने उनको धन्यवाद दिया फिर उन्होंने बताया कि इस कमरे में दो लोग और हैं।कमरे में दो सिंगल पलंग अलग-अलग दीवारों से सटे आमने सामने पड़े थे और ज़मीन पर मेरे लिए एक मोटा डनलप का गद्दा उन लोगों ने डाला था जिस पर अगले कुछ दिन तक मेरा सोना होना था और साथ में ओढ़ने को कम्बल भी था वैसे सारी बिल्डिंग सेंट्रली हीटेड थी।जैसा मैं पहले बता भी चुका हूँ कि अपनी विदेश यात्रा शुरू करने के पहले मैंने यूथ हॉस्टल और इस्कॉन की लाइफ मेम्बरशिप ली थी।इस्कॉन की मेम्बरशिप में एक बार में 8 दिन तक उनके दुनिया भर के किसी भी गैस्ट हाउस में रुका जा सकता था और खाना भी उसमें निःशुल्क मिलता था, वो भी भारतीय, जो उस समय में विदेश में एक बड़ी नेमत थी।इस्कॉन के दुनिया के अनेकों शहरों में रेस्टॉरेंट्स हैं और कई शहरों में रुकने की व्यवस्था भी है।ठहरने वालों को उन्हीं रेस्टॉरेंट्स के खाने में से खाना उपलब्ध कराया जाता है किंतु ऐसा नहीं कि उनके रेस्टॉरेंट के मैन्यू की हर चीज़ ठहरने वालों को भी उपलब्ध है बल्कि जो ज्यादा या उनके निमित्त बना होता है वही मिलता है।यहाँ यह रेस्टॉरेंट ठहरने वाले गैस्ट हाउस के नीचे वाले मार्केट में अर्थात ग्राउंड फ्लोर पर था।मैंने 1991 में ये सदस्यता 7777/=₹ में ली थी और इसको लेने का मुख्य उद्देश्य भी विदेश यात्रा में खाने ठहरने सम्बन्धी ही अधिक था।ये अनुभव कुल मिलाकर अच्छा था जैसा मैं आगे बताऊंगा लेकिन उस 1991 की यात्रा के बाद कभी इस्कॉन में रुकने का मेरा संयोग नहीं बना।

हॉं तो फिर मैंने उस एक गद्दे पर अपना कब्जा जमाया तब तक अन्य दो लोग जो वहाँ रुके थे वो भी आ गए।वो दोनों ही उम्र में मुझसे छोटे थे और उनमें से एक नवयुवक कलकत्ता (अब कोलकाता) से थे जिनका नाम विकास बाफना था।दूसरे युवक के विषय में मुझको न जाने अधिक कुछ क्यों याद नहीं है और चूंकि मेरे पास मेरी यात्राओं के कोई नोट्स नहीं हैं तो काफी कुछ स्मृति आधारित है और कुछ उस यात्रा की वीडियोज़ हैं जो लगभग खराब सी हैं पर फिर भी उनसे कुछ मदद मिल जाती है,लिखने में।विकास बाफना का प्रकाशन/पब्लिशिंग सम्बंधित कुछ व्यवसाय था और वो दोनों भी व्यवसाय के लिए ही वहाँ आये हुए थे।कुछ देर उन लोगों से बातचीत होती रही और वहाँ अन्य जो विदेशी थे उनसे भी अच्छा परिचय हो गया।यहाँ इस बात का उल्लेख अवश्य करना चाहूँगा कि मेरे मथुरा कनैक्शन,चतुर्वेदी समुदाय और भगवान श्री कृष्ण के सखाभाव के किस्सों की चर्चा आदि के कारण उन सबकी मुझसे बात और सम्पर्क करने में बहुत रुचि और उत्सुकता दोनों ही हो चली थी और वहाँ के प्रवास के दौरान इस ब्रज क्षेत्र वासी कनैक्शन के कारण एक घटना ऐसी होने वाली थी जिसमें मैं काफी अजीबो-गरीब स्थिति में फंस ही गया था लेकिन शायद भगवान श्री कृष्ण की कृपा से ही अपनी प्रत्युतपन्न मति से बचा जिसका किस्सा आगे बताऊंगा।

इस गैस्ट हाउस में एक बड़े से हॉल में श्री राधा कृष्ण जी का काफी सुंदर मंदिर भी था जिसके आगे लकड़ी का एक पूरा घेरेनुमा स्ट्रक्चर भी था जिसके अंदर के हिस्से को हम गर्भगृह कह सकते हैं और उसमें पीतल की बनी टिपिकल इस्कॉन स्टाइल की राधा जी और कृष्ण जी की बहुत ही सुंदर और सजीव वस्त्रादिभूषणों से सुसज्जित मूर्तियां विराजमान थीं।गर्भगृह के बाहर के हिस्से में बहुत अच्छा कालीन बिछा था जिस पर बैठ कर इस्कॉन सम्प्रदाय में दीक्षित भक्तगण हारमोनियम और अन्य वाद्य यंत्रों के साथ अत्यंत सुरीले स्वर में भगवान श्रीकृष्ण और राधा जी के भजन गाते थे और वहीं हम लोग भी बैठे।इस्कॉन वाले ये सभी भक्त सूती धोती और अधिकांश कुर्ते में होते थे और दुपट्टा भी।इन सभी की चाँद घुटी हुई थी यानी कि गंजे थे,सर पर शिखा अर्थात चोटी और माथे पर गोपी-चंदन का वैष्णव तिलक।

यहाँ यह बताना चाहूँगा कि माथे पर राख द्वारा चिन्हित तीन आड़ी रेखाऐं दर्शाती हैं कि लगाने वाला शिव-भक्त है। नाक पर त्रिकोण और उसके ऊपर “V” चिन्ह यह दर्शाता है कि लगाने वाला विष्णु-भक्त है। यह चिन्ह भगवान विष्णु के चरणों का प्रतीक है, जो विष्णु मन्त्रों का उच्चारण करते हुए लगाया जाता है। तिलक लगाने के अनेक कारण एवं अर्थ हैं परन्तु यहाँ मैं वैष्णवों द्वारा लगाये जाने वाले गोपी-चन्दन तिलक के बारे में ही लिख रहा हूँ।गोपी-चन्दन (मिट्टी) द्वारका से कुछ ही दूर एक स्थान पर पायी जाती है। इसके विषयक मान्यता और कथा यह है कि जब भगवान श्री कृष्ण इस धरा-धाम से अपनी लीलाएं समाप्त करके वापस गोलोक गए तो गोपियों ने इसी स्थान पर एक नदी में प्रविष्ट होकर अपने शरीर त्यागे। वैष्णव इसी मिटटी को गीला करके विष्णु-नामों का उच्चारण करते हुए, अपने माथे, भुजाओं, वक्ष-स्थल और पीठ पर इसे लगाते हैं।

तो इस माहौल में जब अनेकों वाद्य-यंत्रों के साथ सस्वर श्री राधा कृष्ण जी के भजन होते थे तो एक अलग किस्म का दिव्य माहौल तो बन ही जाता था साथ ही कुछ देर के लिए ऐसा भी नहीं लगता था कि हम अपने घर-अपने देश से हजारों किलोमीटर दूर एक ऐसे देश में हैं जहाँ के लोगों की भाषा, रहन-सहन,सोच और संस्कृति सब हमसे बिल्कुल भिन्न है।शाम को इसी मंदिर में भगवान श्री राधा कृष्ण की भव्य आरती होती थी।पहले दिन इस सब को देख कर मैं बहुत ही विस्मित, चकित और अभिभूत था।आप सोचिए आप जर्मनी की धरती पर हैं और वहाँ पर उड़ीसा के एक पुजारी जी धोती पहने ऊर्ध्व ऊर्ध्व शरीर को सिर्फ धोती से ही ढंके हुए,भगवान की आरती कर रहे हैं पहले जल से,शंख से फिर दीपकाग्नि वाली सामान्य आरती फिर पुष्पों से आरती हो रही है,पीछे अनेकों यूरोपीय/कुछ अफ्रीकी देशों के लोगों द्वारा समवेत स्वर में हरे राम-हरे कृष्ण का गायन हो रहा है साथ में हारमोनियम,ढोलक, मृदंग,मंजीरे आदि बज रहे हैं बाकी लोग तन्मय होकर ताल के साथ ताली बजा रहे हैं और इसकी गति पहले धीमी,फिर थोड़ी तेज और फिर तीव्रतर होती जाती है यह सब मिलाकर एक अद्भुत दृश्य और मनमोहक समां बना रहे थे और वो भी हाइडलबर्ग,जर्मनी की धरती पर।पूजा के बाद पुजारी जी जो कि लगभग 28-30 वर्ष के ही नौजवान थे उनसे परिचय हुआ।उन्होंने बताया कि वो उड़ीसा से हैं और पिछले लगभग 6-8 महीने से इस्कॉन हाइडलबर्ग में थे।पुजारी जी घुटे हुए सर पर शिखा,तिलक लगाये,धोती पहने और ऊपर उंघाड़े काफी भव्य व्यक्तित्व के स्वामी प्रतीत हो रहे थे।

रात को कुछ भक्तों के साथ जमीन पर बैठ कर हम लोगों ने भोजन किया जिसमें मटर पनीर, कोफ्ते की सब्जी,दो तीन कोई सूखी सब्जियां, गुलाब जामुन आदि था लेकिन यहाँ यह ज़रूर कहना चाहूँगा कि खाने में कई चीजें तो थीं लेकिन स्वाद गुलाब जामुन के अलावा किसी में कुछ खास नहीं था।

रात को काफी देर तक हम लोग बातचीत करते रहे और फिर अगले दिन के व्यापार की गतिविधि के विषय में सोचते हुए मेरी आँख पता ही नहीं चला कि कब लग गयी।



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