दादाजी बनारसीदास चतुर्वेदी और प्रवासी भारतीय

आज समाचारपत्रों में एक बार फिर से मध्यप्रदेश में हो रही प्रवासी भारतीय ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट को लेकर प्रवासी भारतीयों की चर्चा है।
इस अवसर पर मैं याद करना चाहूँगा पदम भूषण दादा जी स्व0 बनारसी दास जी चतुर्वेदी को जिन्होंने प्रवासी भारतीयों के हित चिंतन को बहुत काम किया और महात्मा गांधी जी के कहने पर फीजी आदि देशों की यात्रा भी प्रवासी भारतीयों की उस समय की दुर्दशा देखने को की।
दादा जी ने फर्रुखाबाद में अपने अध्यापन काल में ही तोताराम सनाढ्य के लिए उनके संस्मरणों की पुस्तक 'फिज़ी द्वीप में मेरे 21 वर्ष' लिखी थी। 'फिज़ी द्वीप में मेरे 21 वर्ष' के संस्मरणों में उस द्वीप पर अत्यंत दारुण परिस्थितियों में काम करने वाले भारत के प्रवासी गिरमिटिया मजजदूरों की त्रासदी का बड़ा ही संवेदनाप्रवण चित्रण था। बाद में चतुर्वेदी जी ने सीएफ एंड्रयूज़ की माध्यम से इन मजदूरों की दुर्दशा का अंत सुनिश्चित करने के लिए बहुविध प्रयत्न किए।यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि उस जमाने में विदेश में बसे भारतीय लोगों के हालात बहुत खराब थे और वो अपने अस्तित्व के लिए संघर्षरत रहने को मजबूर थे।ये वर्तमान प्रवासी भारतीयों के पूर्वजों के त्याग, कड़ी मेहनत और संघर्ष का ही फल है कि आज वो जहाँ भी रह रहे हैं उस समाज में उनका एक सम्मानजनक स्थान है और उनके मूल देश भारत से उनकी चिंता करने वाले दादा जी बनारसीदास चतुर्वेदी जैसे लोगों के सतत प्रयास भी इस दिशा में सदैव स्मरण योग्य रहेंगे।आज उनका उल्लेख करने का कारण मध्यप्रदेश से उनका गहरा जुड़ाव होना है।1930 में उन्होंने ओरछा नरेश वीरसिंह जू देव के प्रस्ताव पर टीकमगढ़ जाकर ‘मधुकर’ नाम के पत्र का संपादन किया और काफी अर्से तक टीकमगढ़ रहे भी।

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