बंदी देवी और दाऊजी के दर्शन 21 मार्च 2023

कल मंगलवार दिनांक 21 मार्च जो विक्रम सम्वत्  2079 का आखिरी दिन था को मथुरा-महावन में इलाके में स्थित बंदी देवी,आनंदी देवी और मनोवांछा देवी के दर्शनों का सौभाग्य प्राप्त हुआ।बंदी देवी भगवान श्रीकृष्ण और बलराम जी के परिवार की कुलदेवी बताई गई हैं और कहते हैं कि श्रीकृष्ण जी और बलदाऊ और बाद में उनकी संतानों का भी मुंडन संस्कार यहीं हुआ था। देवी के योगमाया रूप और कंस के कारागार से भगवान श्री कृष्ण के निकलने की कथा से हम सब परिचित हैं ही।
कहते हैं भगवान श्री कृष्ण को उन पर आने वाले संकटों से बचाने हेतु यशोदा मैया ने मनोवांछा देवी से प्रार्थना की थी।
आगरा के सेठ घासीराम ने इस मंदिर का जीर्णोद्धार 14वीं शताब्दी में कराया था और वहाँ एक अष्टकोणीय तालाब/कुंड भी बनवाया था।
बंदी देवी का मंदिर राया से बलदेव के बीच में बलदेव से 3 किलोमीटर और राया से लगभग 12 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है और देवी के नाम पर ही उस गांव का नाम भी बंदी गांव ही है।यह बहुत सिद्ध स्थल माना गया है और भागवत के दसवें स्कंध के  तीसरे और चौथे अध्याय में बंदी देवी की चर्चा है।
मेरे  पिता जी स्व0 अशोक चंद्र चतुर्वेदी जी की इस स्थान में बहुत आस्था थी और हम लोग कई बार उनके साथ यहाँ आते रहे हैं।

बंदी देवी से लगभग तीन किलोमीटर की दूरी पर बलदेव स्थान है जहाँ भगवान बलराम दाऊ जी महाराज का प्रसिद्ध मंदिर है।
मंदिर का शाम का खुलने का समय सवा 6 बजे का है और हम लोग लगभग सवा पाँच बजे पहुँच गए थे तो पहले तो लस्सी और गर्म समोसे का आनन्द लिया फिर वहीं मंदिर प्रांगण में भगवान साक्षी गोपाल के मंदिर के सामने छोटे से चबूतरे पर बैठ कर वहीं के कुछ पंडे-पुजारियों से बहुत रोचक चर्चा भी हुईं। चर्चा में मालूम पड़ा कि जैसे भगवान श्री कृष्ण ने शरद पूर्णिमा को महारास किया था वैसे ही बलराम जी ने चैती पूर्णिमा को नाग वंशीय गोपिकाओं के साथ महारास रचाया था।वैसे तो दाऊ जी महाराज का रंग गोरा बताया गया है किंतु यहाँ वो भी श्याम वर्णीय रूप में हैं और उसके पीछे की भी एक कथा बताई। मुझको याद आया कि हम लोगों के बचपन में हमारी मम्मी स्व0 श्रीमती रजनी चतुर्वेदी जी भी साक्षी गोपाल की एक कहानी सुनाती थीं।
श्री माथुर चतुर्वेदी समुदाय में दाऊ जी महाराज की बहुत मान्यता है।श्री कृष्ण जी को सखा भाव से और बलदाऊ बलराम जी को अग्रज तथा ईश भाव से देखा-माना जाता है।
इस यात्रा में मेरा भतीजा अभीष्ट भी मेरे साथ था।मंदिर के कपाट खुलने पर हम दोनों ने माँ रेवती और बलदाऊ जी के दर्शन किये और उनको माखन-मिश्री का भोग अर्पित किया।
ब्रज क्षेत्र के हर हिस्से में भगवान कृष्ण की लीलाओं के किस्से हैं और कण-कण से उनकी यादें जैसे जुड़ी हुई हैं। 

Comments

Popular posts from this blog

काँच का इतिहास:विश्व,भारत और फ़िरोज़ाबाद

So you are on the wrong side of the barricades

अथ श्री बार्बर कथा