राय साहब पूरनमल जी और रीवा
फेसबुक पर एक ग्रुप है "आपन रीवा आपन बघेली"
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उस पर एक दिन रीवा राज्य के यशस्वी शासक रहे महाराज वेंकट रमण सिंह जी के समय की चर्चाएं एक पोस्ट पर हो रही थीं।
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उन लोगों से चर्चा में मैंने कहा था कि मैं स्वर्गीय महाराज साहब वेंकटरमण सिंह जी के जो ट्यूटर ऐंड गार्जियन रहे थे जब महाराज नाबालिग थे उनके विषय में लिखूँगा।
आज समय मिलने पर उस वायदे को पूरा कर रहा हूँ।
राय साहब पूरनमल के विषय में:-
पूरनमल चतुर्वेदी जी (जिनको उनके घर और समाज में मास्टर साहब या मास्टर बाबा नाम से जाना जाता है) का जन्म वैसाखसुदी 15 विक्रम संवत 1914 यानी कि सन 1857 ईस्वी के मई महीने में हुआ था।ये वही साल है जब भारत में अंग्रेजों के खिलाफ पहला स्वतंत्रता संग्राम हुआ था जिसे विप्लव और ग़दर भी कहा गया है।पूरनमल जी बचपन से ही बहुत होनहार और मेधावी थे। उनका शरीर बहुत सुडौल था और वो कुश्ती एवं तत्कालीन खेलों में दक्ष थे।फ़िरोज़ाबाद (उत्तर प्रदेश) तहसील मिडिल स्कूल से सन 1872 में उन्होंने वर्नाक्यूलर मिडिल(हिंदी मिडिल) पास किया। उसी साल इस परीक्षा का श्री गणेश इस प्रांत में हुआ था। पूरनमल जी का अंग्रेजी पढ़ने का बहुत मन था जिसका पहले घर की महिलाओं ने काफी विरोध किया किंतु बाद में सबकी सहमति से वो आगरा ( आगरा कॉलेज स्थापित 1823 ईस्वी) पढ़ने गए और 1877 ईस्वी में केवल पाँच वर्ष की अंग्रेजी की पढ़ाई करके एंट्रेंस की परीक्षा पास की। सन 1879 में एफ ए की परीक्षा पास की और सन 1881 में बीए की परीक्षा दी।उनके विषय अंग्रेजी,संस्कृत और गणित थे।1882 में मिस्टर टामसन आगरा कॉलेज के प्रिंसिपल बनके आये।1883 के आरंभ में प्रिंसिपल साहब के कहने पर,मन ना होते हुए भी, पूरनमल जी ने मथुरा हाई स्कूल में सैकिंड मास्टर की नौकरी की।उनके हैडमास्टर आत्माराम जी थे।यहाँ मास्टर बाबा ने 6 महीने काम किया। उनका वेतन 60 रुपये मासिक था।
इसी दौरान रीवा के अल्पवयस्क नाबालिग महाराज ( महाराज साहब रीवा नरेश परम् आदरणीय श्री व्यंकटरमण जी साहब) के लिए एक “योग्य,कुलीन, पूज्यनीय,संस्कृतज्ञ ब्राहम्मण शिक्षक” की आवश्यकता हुई जिसकी खोज पूरे उत्तर भारत में हुई और तब आगरा कालेज के प्राचार्य मिस्टर टामसन ने इस पद के लिए मास्टर बाबा पूरनमल जी का नाम भेजा और पूरनमल जी से इस पद को स्वीकार करने का अनुरोध किया जिसको उन्होंने भी मान लिया। पूरनमल जी अंग्रेजों की नौकरी नहीं करना चाहते थे तो रीवा महाराज के शिक्षक का कार्य जो कि अतिसम्मान का विषय भी था उनके मनमाफिक भी था।
पूरनमल जी की ननसाल करहल में विद्याधर जी के घर में थी यानी कि बाबा मूलचंद की पत्नी करहल की थीं।
रीवा में मास्टर साहब पूरनमल जी की बहुत इज़्ज़त और सम्मान था। वो टेनिस और बैडमिंटन खेल भी खेलते थे।मास्टर बाबा राज्य में जहाँ कहीं भी जाते अपनी डायरी में स्थानों और घटनाओं के संबंध में ऐतिहासिक, शिक्षाप्रद, धार्मिक, सामाजिक सभी प्रकार के वर्णन करते थे। महाराज साहब रीवा के 18 वर्ष के होने पर मास्टर साहब ने वहाँ सबकी इच्छा और अनुरोध के बाबजूद रीवा छोड़ दिया कि जिन को पढ़ाया है उनके पूर्णकालिक महाराज होने पर उनकी नौकरी नहीं करेंगे यद्यपि उनको महाराज के प्राइवेट सेक्रेटरी जैसा प्रतिष्ठित पद भी offer हुआ था किंतु वे नहीं माने।सन 1894 में मास्टर साहब को राय साहब का खिताब नवाजा गया।सन 1895 में मास्टर बाबा ने रीवा छोड़ दिया तब उनकी तनख्वाह 250 रुपये मासिक थी।ये पूरी की पूरी तनख्वाह उनको पेंशन के रूप में भी मिलती थी।
सन 1895 से 1899 तक मास्टर बाबा उदयपुर में रहे।वो पहले वहाँ के महाराज के ट्यूटर रहे फिर चीफ मजिस्ट्रेट बनाये गए और फिर सन 1898 में उदयपुर राज्य के पुलिस सुपरिंटेंडेंट बनाये गए।उदयपुर में मास्टर बाबा का स्वास्थ्य बहुत बिगड़ गया और 1899 में वो जब उमराव सिंह जी (यानी अपने बड़े भाई और बाबू चच्चा,लंबे चाचा और दाढ़ी वाले चाचा के पिताजी ) की पुत्री गोविंदी (अब्बा)की शादी में जब फ़िरोज़ाबाद आये तो उदयपुर अपना इस्तीफा भेज दिया।
इसके बाद महाराज रीवा के बहुत आग्रह करने पर वो एक बार फिर रीवा गए वहाँ उनको सरदार हजूरपद नियुक्त किया गया जो बहुत ही सम्मान की चीज़ थी किन्तु वे 16 जून 1900 को फ़िरोज़ाबाद लौट आये। जब मास्टर साहब इस बार रीवा गए तो महाराज साहब रीवा महाराजाधिराज श्री व्यंकट रमण सिंह जी अपने मास्टर साहब से मिलने स्वयं उनके पास आये और बहुत देर तक अस्वस्थ मास्टर साहब चारपाई पर लेटे थे और महाराज साहब उनका हाथ अपने हाथों में पकड़े हुए थे और गुरु शिष्य दोनों की आँखों से अश्रुप्रवाह हो रहा था।यह दृश्य हमारे घर के लिखे लिखे-जोखों में दर्ज है।
फ़िरोज़ाबाद में मास्टर बाबा और उनकी मित्रमंडली सामाजिक और साहित्यिक चर्चाओं को करती थी।उन्होंने जापान का इतिहास लिखा था जो संभवत: किसी भारतीय द्वारा जापान का लिखा गया पहला इतिहास था पर दुर्भाग्यवश यह छप न सका।उन्होनें उदयपुर के महाराणाओं की फेहरिस्त भी सम्पादित की थी।रीवा में मास्टर बाबा ने एक नागरी प्रचारिणी सभा की नींव भी डाली थी।मास्टर बाबा के निर्देशन और मदद से रीवा में लाल बलदेव सिंह जी ने ‘भारत भ्राता’ नाम से पत्रप्रकाशन का आरंभ किया था।
पहले चतुर्वेदी समाज का का पत्र चतुर्वेदी चंद्रिका निकलता था उसका संचालन इटावा के राधारमण डुंडवार जी करते थे।कतिपय कारणों से ये पत्रिका बहुत दिन न चल सकी फिर मास्टर बाबा ने इसका जीर्णोद्धार रीवा से किया।ध्यान रहे कि हिंदी साहित्य में यह गतिविधियां मास्टर साहब पूरनमल जी 1880 और 1890 ईस्वी के दशक में कर रहे थे। मास्टर साहब पूरनमल के पूरे देश के बुद्धिजीवियों, साहित्यकारों और ऐसे अनेकों लोगों से गहरे और प्रेरणा देने वाले सम्बन्ध थे जिनमें से कई बाद में भारत के स्वतंत्रता के संघर्ष में सक्रिय रूप से जुड़े। इस विषय में विस्तार से अलग से लिखूंगा।
मास्टर बाबा पूरनमल जी का विवाह सन 1872 में इटावा के छेदीलाल मैहारी (चतुर्वेदी) की बहिन से हुआ था।विवाह उनके बड़े भाई कक्का मथुरा प्रसाद ने ही सम्पादित किया था क्योंकि मास्टर साहब के पिता मूलचंद जी का देहांत इसके सात वर्ष पूर्व यानी कि 1865 ईस्वी में ही हो गया था।मास्टर बाबा की पत्नी को बाद की पुश्तें ‘अच्छी अम्मा’ के नाम से जानती हैं और वो यथा नाम तथा गुण ही थीं।मास्टर बाबा की पहली संतान पुत्री थीं जिनका नाम जड़िया देवी या जड़ो बुआ(विवाह हाथरस) था।इनका जन्म 1880 ईस्वी और मृत्यु 1906 में हुई।उनकी दूसरी संतान बनारसी दास जी’काका जी’ थे। उनका जन्म सन 1883 ईस्वी में हुआ था। तीसरी संतान पुत्री विद्यावती जी (विवाह हाथरस) थीं जिनको हम लोग विद्या बुआ के नाम से भी जानते हैं। फ़िरोज़ाबाद की पीली कोठी जिसको हम लोग गोदाम नाम से भी जानते हैं मास्टर बाबा ने रहने हेतु बनवाई थी। मास्टर बाबा की मृत्यु सन 1902 ईस्वी में मात्र 45 वर्ष की उम्र में हो गयी। उनके विषय में लिखने को एक ग्रंथ लिखा जा सकता है लेकिन वो सब फिर कभी।उन्होंने फ़िरोज़ाबाद में चतुर्वेदी बच्चों के लिए कई खेलकूद की प्रतियोगिताएं भी शुरू करवायी थीं। रीवा हो उदयपुर, साहित्य हो या खेलकूद,राजकाज हो या सामाजिक क्षेत्र मास्टर बाबा की हर जगह समाज में एक विशिष्ट पहचान थी और उस समय के देश के इन सभी क्षेत्रों के प्रसिद्ध लोगों से मास्टर बाबा का घनिष्ठ संपर्क और एक अति सम्मानजनक स्थान था। मास्टर साहब पूरनमल जी मेरे बाबा स्वर्गीय पंडित सुशील चंद्र चतुर्वेदी जी के बाबा स्वर्गीय मथुरा प्रसाद जी के छोटे भाई थे जो अपने चार भाइयों में तीसरे नम्बर के थे। हम लोगों के परिवार की ही नहीं अपितु संपूर्ण समाज की वो एक बहुत बड़ी हस्ती थे और आज भी हम लोगों के परिवार क़ा जो गौरव है वो उनकी ही देन है। हमको गर्व है कि हम लोग मास्टर बाबा पूरनमल जी की संतति हैं।उनकी स्मृतियों को सादर नमन!
ये वह समय था जब देश में अगली सदी के भारतवर्ष के संघर्षों और समाज की नींव रखी जा रही थी तथा नयी पीढ़ी को इसके लिए गधा जा रहा था और इस काम को करने वालों में पूरनमल जी भी एक प्रमुख व्यक्ति थे किंतु दुर्भाग्य से उनका जीवन बहुत लंबा नहीं रहा किंतु उनकी कीर्ति आज भी उनके इस दुनिया को छोड़ने के लगभग सवा सौ वर्ष बाद भी विद्यमान है।
आगे मैं आपको दीवान बहादुर पंडित जानकी प्रसाद चतुर्वेदी जी के विषय में बताऊंगा जो यू पी पी सी ऐस के शुरुआती बीच के टॉपर थे किंतु उन्होंने भी अंग्रेजों की नौकरी न करके रीवा राज्य में अपनी सेवाएं दिन और वहाँ उच्चतम पदों पर तो रहे ही साथ ही साथ अपने तरीके से उन्होंने देश की स्वन्त्रता के संघर्ष और समाज सुधार में अपना योगदान दिया। वे पूरनमल जी के भतीजे थे।
कुर्सी/स्टूल पर बैठे हुए राय साहब पूरनमल जी चतुर्वेदी "मास्टर बाबा" ये उनकी original photograph है सन 1902 के पहले की
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