इतिहास और संस्कृति के किस्से – 48 गंगा किनारे करेंटी की हवेली,

इतिहास और संस्कृति के किस्से – 48

गंगा किनारे करेंटी की हवेली, 
हुमायूँ को शरण, 
जयपुर के महाराजा भारमल की सहायता, सुप्रीम कोर्ट का फैसला…
 एक ही धागे से जुड़ी विरासत की महागाथा।

आज इतिहास और संस्कृति के किस्सों में चर्चा है उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले की कुंडा तहसील के करेंटी गांव की

कोविड के दौरान जब मैं मथुरा से सम्बंधित श्री माथुर चतुर्वेदी समुदाय के लोगों के इतिहास और संस्कृति पर आधारित अपनी यूट्यूब श्रृंखला Chaturvedi Heritage by Atul Chaturvedi बना रहा था तो एक बहुत रोचक किस्सा मेरे संज्ञान में आया जो आज मैं आपके सामने फेसबुक पोस्ट के रुप में प्रस्तुत कर रहा हूँ।

 करेंटी की हवेली, गंगा का तट, हुमायूँ का भागना और माथुर चतुर्वेदी विरासत की अद्भुत कहानियाँ

विरासत सिर्फ़ पुरानी बातों का ढेर नहीं होती—विरासत वह सांस है जो पीढ़ियों के बीच चलती रहती है।
 इस किस्से का समय वह समय था जब हिंदुस्तान का शहंशाह हुमायूँ अपने जीवन के सबसे कठिन दौर से निकल रहा था—
 सेना बिखरी हुई, शरीर घायल, मन भयभीत।
 दुश्मन उसके पीछे और भाग्य उसके सामने खड़ा।
जब हिंदोस्तान का बादशाह हुमायूँ भागा-भागा फिर रहा था, घायल अवस्था में, टूटी हुई सेना के साथ, तब वह शेरशाह की सेना यानी अपने दुश्मनों से अपनी जान और शान बचाता हुआ गंगा के पास स्थित वर्तमान प्रतापगढ़ जिले की कुंडा तहसील के गांव करेंटी  पहुँचा।
करेंटी में उस समय चिंतामणि चतुर्वेदी की बहुत बड़ी हस्ती थी। उनकी कोठी गंगा के किनारे थी और उनका बहुत बड़ा व्यापार था। बताते हैं कि वहाँ पर उनका एक किला बना हुआ था। गंगा नदी के रास्ते के माध्यम से बहुत व्यापार हुआ करता था। चौबे चिंतामणि का एक बहुत बड़ा व्यापार खाँड़ यानी चीनी का भी था।
जब हुमायूँ इस प्रकार से भटकता हुआ वहाँ पहुँचा तो इन्हीं चौबे चिंतामणि जी ने उसे और उसके साथ के लोगों को शरण दी,
 सेवा-सुश्रुषा की, सुरक्षा दी और उसे वहाँ आसरा मिला। हुमायूँ वहीं स्वस्थ हुआ, और कृतज्ञ होकर उसने 125 बीघा भूमि की जागीर / पट्टा चौबे चिंतामणि जी को प्रदान किया। 
उधर शेरशाह सूरी की मुस्लिम फौज हुमायूँ का पीछा करते-करते करेंटी पहुँची। चौबे चिंतामणि को आभास हो गया था कि शेरशाह के लोग भी सहायता और रसद मांगेंगे जो वह देना नहीं चाहते थे तो उन्होंने अपने यहाँ रखी सारी चीनी गंगा में बहा दी, ताकि शत्रु सेना को रसद न मिल सके।
इधर जब शेरशाह के सैनिक करेंटी पहुँचे तो उन्होंने चिंतामणि चतुर्वेदी के यहाँ से चीनी माँगी, पर चिंतामणि जी ने कहा कि यहाँ कोई चीनी नहीं हैं।
 सैनिकों ने घर-घर खोजा पर चीनी नहीं मिली और मिलती भी कैसे क्योंकि चीनी तो गंगा में प्रवाहित की जा चुकी थी। जब प्यास से बेहाल  सैनिकों ने गंगा का पानी पिया, तो वह शर्बत जैसा मीठा निकला।
 तभी उन्हें पूरा माजरा समझ में आ गया कि चीनी को कहीं छिपाया नहीं गया—
 उसे गंगा जी में बहा दिया गया था।
चौबे चिंतामणि जी के वंशज आज भी बताते हैं कि
 लगभग 40 किलोमीटर तक गंगा का पानी मीठा हो गया था और कई दिनों तक मीठा रहा।
 कितनी भारी मात्रा में चीनी होगी, इसका कोई अनुमान नहीं, लेकिन घटना तो आज भी जीवित है।
उधर इसके बाद शेर शाह सूरी ने हुमायूँ को हरा कर खुद दिल्ली के राज्य पर कब्जा कर लिया था यह हम सबको पता है।
बाद में जब अकबर की सल्तनत स्थापित हुई और उसने दस्तावेज़ों की समीक्षा की,
 तो उसे पता चला कि—
“करेंटी के चौबे चिंतामणि जी ने ही संकट-घड़ी में मेरे पिता हुमायूँ को शरण दी थी।”
अकबर ने न केवल वह जागीर बहाल की,
 बल्कि उस परिवार को पूर्ण सम्मान के साथ वही अधिकार प्रदान किए।

इन्हीं चिंतामणि चतुर्वेदी का एक और किस्सा मेरी जानकारी में आया या कहें कि इतिहास में एक और प्रसंग है—

 जब जयपुर के महाराजा भारमल गया की यात्रा पर गए थे और यात्रा के दौरान अचानक उन्हें धन की आवश्यकता पड़ी। अब उस जमाने में यह इतना आसान नहीं था कि वह जयपुर से धन मंगवाते तो चौबे चिंतामणि करेंटी वाले उनके काम आए।
 उस समय राजा भारमल और चौबे  चिंतामणि  दोनों के सम्बंध अकबर से जुड़े हुए थे।
 राजा भारमल ने चिंतामणि चतुर्वेदी को सन्देश भेज कर सहायता माँगी और चौबे चिंतामणि जी ने उदारता से उनकी सहायता की। बाद में आभार के रूप में महाराजा भारमल ने जयपुर क्षेत्र के रामगढ़ की जमीन का पट्टा चिंतामणि जी को दिया।
 1950 के दशक तक वहाँ से इस परिवार को राशि प्राप्त होती रही।

करेंटी का किला, पुरानी हवेली और 1832 का कुआँ
करेंटी की हवेली—जिसे किला भी कहा जाता है—आज भी वहाँ मौजूद है।
 1832 का पुराना कुआँ, मंदिर और निर्माण आज भी उस समय के वैभव का प्रमाण है।
 करेंटी परिवार उस दौर में समृद्ध, प्रभावशाली और समाज का नेतृत्व करने वाला परिवार था।

 हलवाई वाला प्रकरण 
यह वह प्रसंग है जिसे मुझको करेंटी परिवार से सम्बंधित और वर्तमान में कानपुर के श्री विजय शंकर चतुर्वेदी जी ने विस्तार से बताया।
 यह इतिहास का प्रमाणित अध्याय नहीं—
 एक किंवदंती है,
 लेकिन इतनी प्रसिद्ध कि पूरे करेंटी–भदावर–कानपुर क्षेत्र में पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुनाई जाती है।
 किंवदंती का आरंभ — सपना और संपत्ति का संकट
चीनी वाली घटना के बाद, बताते हैं कि चिंतामणि जी के एक गुमाश्ते से मजबूरी में झूठ बोला गया—
 “हमारे यहाँ चीनी नहीं है।”
उसी रात चिंता­मणि जी को सपना आया—
 कि झूठ बोलने के कारण
 “अब इस घर में संपत्ति नहीं टिकेगी।”
उसी भय से उन्होंने बड़े-बड़े
 लोहे के खंभों, ड्रमों और कर्तलों में
 सोना, चाँदी, हीरे-जवाहरात भरकर
 उन्हें ज़मीन में गाड़ दिया।
लेकिन प्रकृति की अपनी ही लीला है—
 कुछ समय बाद गंगा जी में भीषण बाढ़ आई,
 और वह सब संपत्ति पानी के साथ बह गई।
कहानी बनारस पहुँचती है
किंवदंती कहती है कि वह सारा भारी-भरकम सामान बहते हुए या किसी ने बहते से उठाया और फिर वह सामान बनारस के एक हलवाई तक पहुँच गया।
उसके पास लोहे की पेटियाँ, ड्रम, खंभे आए और उसने उन्हें खरीद लिया।
इधर चिंतामणि जी बाढ़ में बहे अपने मूल्यवान सामान को खोजते-खोजते बनारस पहुँचे।
 वहाँ मल्लाहों ने बताया कि बहुत सारा लोहे का सामान बहकर आया था और
 फलाँ हलवाई को बेच दिया है।
हलवाई ने चिंतामणि जी को पहचानते ही कहा—
 “हाँ, मेरे पास है वह सामान।”
 जब लोहे के पात्र खोले गए, तो
 उनमें से सोना-चाँदी और जवाहरात निकल आए।
हलवाई ने कहा—
 “ये सब आपका है, आप ले जाइए।”
 पर चिंतामणि जी को मानो वैराग्य सा हो चला था तो उन्होंने उत्तर दिया—
 “अब ये सब तुम्हारा है। मेरे भाग्य का होता तो बहता नहीं।”
चौबे चिंतामणि के यह कहने से हलवाई को संतोष नहीं हुआ।
 उसने बड़े-बड़े लड्डू बनाए—
 और उन लड्डुओं में
 अशर्फियाँ, हीरे, जवाहरात, मोती
 भरकर चिंतामणि जी को दे दिए।S
करेंटी लौटते समय चिंतामणि जी इलाहाबाद पहुँचे।
 वहाँ भोजन कर ही रहे थे कि
 एक बूढ़ा सा साधु आ गया।
 उसने भोजन माँगा।
 चिंतामणि जी ने बिना कुछ सोचे,
 सारे लड्डू उसी को दे दिए।
साधु ने वे लड्डू संगम के पास
 एक हलवाई की दुकान पर दिए।
 वह हलवाई उसी बनारसी हलवाई के परिवार का था। तो वह समझ गया कि ये लड्डू उसकी ही दुकान के बने हुए हैं।
जैसे ही उसने लड्डू तोड़ा—
 अंदर से अशर्फी निकली।
 वह तुरंत समझ गया कि ये लड्डू
 उसी दिन बनारस में तैयार किए गए थे,
 और ये सब करेटी के चौबे चिंतामणि जी की कहानी से जुड़े हैं।
उसने चिंतामणि जी को बुलवाया और कहा—
 “महाराज, ये सब आपका है।”
चिंतामणि जी मुस्कुराए और बोले—
 “मेरे भाग्य में नहीं था। इसलिए आया भी और चला भी गया। तुम इसे स्वीकार करो।”
हलवाई ने भी उसी भाव से स्वीकार किया।
यह कथा चाहे इतिहास न हो—
 लेकिन यह उस युग की मनोभूमि, आस्था और मानवीय मूल्यों की गवाही अवश्य देती है।

 सुप्रीम कोर्ट का निर्णय — हुमायूँ के फ़रमान के आधार पर (2003)
करेंटी  की हवेली पर कई पीढ़ियों बाद विवाद खड़ा हुआ। मुकदमे चले।
 अंततः भारतीय अभिलेखागार में
 हुमायूँ का मूल फ़रमान मिला,
 और उसी प्रमाण के आधार पर
 सुप्रीम कोर्ट ने 2003 में फैसला करेंटी परिवार के पक्ष में दिया।

  निष्कर्ष
इतिहास केवल राजाओं-नवाबों का नहीं होता—
 वो उन परिवारों का भी होता है जिन्होंने संकट के समय धर्म, नैतिकता, शरण और सहायता का हाथ बढ़ाया।
करेंटी की हवेली, गंगा में बहाई गई चीनी, हलवाई की कथा, राजा भारमल का किस्सा— ये सब मिलकर हमारे क्षेत्र की विरासत की रीढ़ हैं।
यह सब बातें हमारी पहचान है।
 हमारा इतिहास हमारी संस्कृति हमारा गौरव है।
 और इस इतिहास को संजोना हम सबकी जिम्मेदारी है।

नोट:- इस विषय में मुझको आदरणीय Heramb भाईसाहब, करेंटी परिवार के कानपुर रहने वाले श्री विजय शंकर चतुर्वेदी, बरेली रहने वाले करेंटी परिवार के श्री विमल चतुर्वेदी ने काफी जानकारी दी। वज्मल जी  हम लोगों के बहुत नजदीक रहे इटावा के
 स्व0 शीतल बाबू की बहन शकुंतला जीजी के पुत्र हैं (शकुंतला जीजी की शादी करेंटी परिवार में हुयी थी)।
इनके अलावा करेंटी में ही रह रहे श्री सौरभ चतुर्वेदी ने भी काफी जानकारी दी थी। उन सभी का धन्यवाद। 
🙏🙏😊

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