My close encounter with Death
My Close Encounter with DEATH
यह अभी इसी 20 दिसंबर की सुबह की बात है।
19 तारीख को शाम को मैं अपनी पत्नी और बेटी के साथ दिल्ली से लौटा था और जैसा कि अक्सर होता था मैं स्वयं ही कार चला कर आया था। दिल्ली से आते में एक्सप्रेसवे के दूसरे टोल नाके के बाद हम लोग कुछ चाय-पानी को रुके तो बेटी के साथ हम लोगों ने भी कुछ खाने की इच्छा जतायी और मैंने अपने लिए ‘सब वे’ से एक रैप लिया जिसमें काफ़ी कुछ सलाद ही था। तीसरे टोल नाके के पास पहुँचते हुए मुझको कुछ असहज सा लगा तो बेटी ने कहा कि पापा कार मैं चला लेती हूँ पर मैंने यह कह कर मना कर दिया कि ऐसिडिटी लग रही है घर चल कर कोई दवा ले लेंगे और आराम हो जायेगा। घर पहुँच कर आराम से खाना खाया, सदैव की भांति खाने के बाद दूध भी लिया और ऐसिडिटी की दवा खा कर थोड़ा देर से सो गया।
सुबह लगभग साढ़े तीन बजे मुझको कुछ बेचैनी महसूस हुई जो बढ़ने लगी और मेरे कराहने से मेरी पत्नी जाग गईं फिर मेरी बेटी भी जाग कर पास आ गई। मेरे पसली के पास और फिर बायें हाथ में दर्द शुरू हुआ जो बढ़ता जा रहा था। यह दर्द पसली की तरफ़ हुआ फिर बायें कंधे से बायें हाथ की हथेली की उंगलियों तक असहनीय रूप से हो रहा था।
इतनी ही देर में मेरी पत्नी रचना ने खबर की तो छोटे भाई अभिनव, उनकी पत्नी नीता एवं पुत्र अभीष्ट भी आ गए। पहले लगा कि कुछ गैस की तकलीफ़ है लेकिन फिर दर्द इतना ज़्यादा बढ़ता जा रहा था कि मैंने कहा कि यह गैस की तकलीफ़ नहीं लग रही।फिर उसी समय इन लोगों ने मेरी बहन अर्चना और बहनोई डॉक्टर अपूर्व से बात की जो उस वक्त कोलकाता में थे।
इसी बीच मुझको बाथरूम जाने की जरूरत महसूस हुई तो अभिनव आदि मुझको पकड़ कर बाथरूम तक ले गए। जब मैं कमोड के पास पहुँचा तो दर्द इतना तीव्र हो गया कि मेरा कमोड पर बैठना संभव ही नहीं था और ना ही मैं पेशाब कर सका, बस ऐसा लगा कि मेरा पूरा शरीर सुन्न हो गया है दर्द की तीव्रता से और न मैं बोल पा रहा हूँ ना शरीर कुछ काम कर रहा है बस सबको सूनी आँखों से देख पा रहा था । मुझको लगा कि उस क्षण जीवन और मृत्यु के बीच की दूरी सिर्फ़ एक साँस जितनी रह गई थी।शरीर सुन्न था और लगा कि साथ छोड़ रहा था,
मन में अजीब-सी शांति और शून्यता का विचित्र मिश्रण था।
समय जैसे ठहर गया हो—
ऐसा दर्द मुझको इससे पहले जीवन में कभी नहीं हुआ था, पर जीवन अभी बाक़ी था।
किसी तरह से ये लोग मुझको बिस्तर पर ले आए।इतनी सर्दी में भी मेरा सर पसीने से पूरा भीगा हुआ था और दर्द था ही। अभिनव ने ड्राइवर और राम सिंह आदि को भी बुला लिया था।डॉक्टर साहब से बात चल रही थी तो घरवाले मुझको पहले बंसल नर्सिंग होम ले गए जहाँ के ICU के डॉक्टर ने जाँच करके डॉक्टर अपूर्व को बताया कि MI (Myocardial Infarction) है अर्थात दिल का दौरा।डॉक्टर अपूर्व से बात करते हुए ही वहाँ मौजूद डॉक्टर साहब ने मुझको तुरंत प्राथमिक चिकित्सा दी।
उधर डॉक्टर अपूर्व और अभिनव ने उसी समय डॉक्टर नीरज गुप्ता जी तथा अन्य डॉक्टरों से बात की और तय किया कि मुझको तुरंत आगरा ले जाना उचित रहेगा क्योंकि दिल्ली अपेक्षाकृत दूर है और कोहरे की वजह से समय भी ज़्यादा लगता तो ये लोग तुरंत मुझको आगरा ले गए। मेरी कार मेरी बेटी ऐश्वर्या चला कर ले गई, रचना, अभिनव उनकी पत्नी नीता , बेटा अभीष्ट आदि सब लोग साथ थे ही, उधर अर्पित और उपासना भी गाजियाबाद से तुरंत चल कर आगरा आ गए उनके साथ उपासना के छोटे भाई विश्वराज भी थे।
ये लोग मुझको डॉक्टर शुभम सिंघल के कमला नगर स्थित रश्मि हार्ट सेंटर हॉस्पिटल ले गए जहाँ मेरी सारी जाँच हुईं, एंजियोग्राफ़ी में एक आर्टरी बताया कि 100% ब्लॉक थी और अन्य दो में भी गड़बड़ थी लेकिन सबसे पहले उन्होंने 100 प्रतिशत वाली में स्टेंट डाला और यह सब काम लगभग 11 बजे सुबह तक निबट गया था मतलब कि तकलीफ़ मालूम पड़ने के 6 साढ़े छै घंटों के भीतर एंजियोप्लास्टी हो गई यानी इलाज मिल गया था।इसके बाद तो इलाज, आराम आदि डॉक्टरों की राय के अनुसार चल ही रहा है किंतु ईश्वर की कृपा, गुड्डू और घर वालों की बिना घबराये चुस्ती तथा डॉक्टर अपूर्व की फुर्ती, आगरा के डॉक्टर साहब के तुरंत इलाज से समय से उपचार हो गया और आगे का प्रोग्राम भी चल ही रहा है।
इस पोस्ट को लिखने की वजह है।
आज मैंने सोशल मीडिया पर 2007 के इंडियन आइडल के विजेता प्रशांत तमांग के अचानक गुज़र जाने की खबर सुनी जबकि उनके पहले के कोई हैल्थ इश्यूज़ बताते हैं कि नहीं थे।पिछले कुछ समय से विशेषत: कोविड के बाद से ऐसी अचानक मृत्यु होने के बहुत समाचार मिल रहे हैं।
मुझको लगा कि मुझको अपना यह अनुभव शेयर करना चाहिए जिससे जो लापरवाही शायद मुझसे हुई उससे अन्य लोग बच सकें।मुझको वैसे तो कोई मेजर हेल्थ इश्यूज़ नहीं थे पर हाँ मैं कुछ समय से ब्लड प्रेशर की दवाई लेता था और मेरा बीपी अमूमन ठीक चलता था।जब मैंने और सोचा तो ध्यान आया कि पिछले कुछ समय से मैं शाम होते-होते कई बार थक जाता था और अपने घर पर कहता था कि ऐसा लगता है कि शाम होते-होते शरीर की बैटरी डिस्चार्ज हो जाती है किंतु उस थकान को मैंने कभी बहुत गंभीरता से नहीं लिया जो कि लगता है कि लेना चाहिए था।कई बार लगता है कि हम बिल्कुल स्वस्थ हैं और इसी चक्कर में हम अपने शरीर के उन संकेतों को नजरंदाज करते चले जाते हैं जो बाद में हो सकने वाले गंभीर रोग की तकलीफ़ की दरअसल चेतावनी होते हैं।
दूसरे जब यह दर्द उठा तो मुझको बाथरूम बिल्कुल नहीं जाना चाहिए था,वो तो गनीमत रही कि मैं कमोड पर बैठा नहीं और कोई जोर भी नहीं लगाया।
तीसरे शायद मुझको सॉर्बिट्रेट की गोली अपने पास हमेशा रखनी चाहिए थी और ऐसा दर्द होने पर तुरंत ले लेनी थी।
स्ट्रेस, लाइफ़ स्टाइल और ख़ान-पान की बात तो सब जानते ही हैं।
वैसे सबसे बड़ी बात शायद यह भी है कि जब दर्द अपने पूरे ज़ोर पर था और मैं बाथरूम गया तो बस जीवन बाक़ी था इसीलिए बच गया क्योंकि और सब इलाज तो उसके बाद ही हुए और इसीलिए यह पोस्ट लिखी है कि यदि शरीर कोई सिग्नल दे तो उसको इग्नोर नहीं करना चाहिए।
वैसे अब यह कोई चिंता का विषय नहीं रहा है, इलाज खूब सुलभ और सहज है पर सावधानी तो रखनी चाहिए। और हाँ काफ़ी लोग मुझको Welcome to Angioplasty Club भी कह चुके हैं। मैं अब पहले से काफी बेहतर महसूस कर रहा हूँ और उम्मीद है कि जल्द ही आप सभी के बीच नार्मल जीवन जीते दिखूँगा ।
तो मस्त रहिए, ख़ुश रहिए पर लापरवाह मत रहिए।
आख़िर में ईश्वर , सभी डॉक्टरों, घरवालों, रिश्तेदारों, इष्ट-मित्रों और शुभचिंतकों का धन्यवाद कहने को मेरे पास शब्द नहीं हैं।
आपके आने, आकर भी इन्फ़ेक्शन के डर की वजह से न मिल पाने पर भी आपने आकर घर वालों का हौसला बढ़ाया,आपके संदेशों ने मुझमें नई ऊर्जा का संचार किया और धन्यवाद इसलिए भी क्योंकि ये आप सबकी शुभकामनाओं का ही परिणाम है कि मैं आपको संबोधित यह पोस्ट लिख पा रहा हूँ।

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