Sindbad Travels-10
Sindbad Travels-10
Egypt-6. Cairo 2nd day
Pyramids of Giza
सिंदबाद ट्रैवल्स-10
मिस्र-6. काहिरा 2सरा दिन
गीज़ा के पिरैमिड
मिस्र के संग्रहालय से निकल कर अब हमारी गाड़ी चल पड़ी थी काहिरा के उपनगर गीज़ा की ओर जहाँ मेरा होटल भी था।हम जा रहे थे विश्व के प्राचीन सात अजूबों (7 Wonders of world) में से एक और वर्तमान में प्राचीन सात में से एकमात्र मौजूद अजूबे यानी कि मिस्र/गीज़ा के पिरैमिड को देखने।हमारी शानदार गाड़ी हाँफती,कराहती आखिर गीज़ा पहुँच गयी और जहाँ मिस्टर मैगदी ने गाड़ी रुकवायी वहाँ हैंडीक्राफ्ट्स के बहुत सारे शो रूम्स बने हुए थे और दाहिने हाथ पर सामने ऊँचाई पर पिरैमिड भी नज़र आये।पिरैमिडों की झलक होटल से भी दिखती थी लेकिन अब तो विश्व का अजूबा मेरी आँखों के सामने ही था।सामने तीन पिरैमिड दिख रहे थे जिनमें एक सबसे बड़ा था।यदि पिरैमिड की ओर सीधे मुँह करके खड़े हों तो दाहिने हाथ पर कुछ नीचे प्रसिद्ध स्फिंक्स भी दृष्टव्य था।ये दृश्य जीवन के यादगार दृश्यों में था और आज भी जब ये लिख रहा हूँ तो वो दृश्य जैसे साक्षात मेरे सामने उपस्थित सा हो गया है!!
गाड़ी से उतर कर मिस्टर मैगदी ने मुझसे कहा कि वो वहीं रुकेंगे और मैं पिरैमिड देख आऊँ।
मैंने आगे बढ़कर देखा तो मालूम पड़ा कि पिरैमिडों तक पहुँचने हेतु एक रेतीली पहाड़ी सी पर ऊपर जाना था और कुछ लोग ऊँट तथा कुछ घोड़ों पर जाते दिखे हाँलांकि जहाँ हमारी गाड़ी रुकी थी उस से थोड़ा आगे बढ़कर वो रेगिस्तानी पहाड़ी शुरू थी।मैं आगे बढ़ते हुए सोचने लगा कि बड़े कमाल की बात है कि विश्व की इतनी प्रसिद्ध जगह देखने को सिर्फ ऊँट या घोड़े पर जाना पड़ता है अन्य कोई साधन यहाँ से दिख नहीं रहा था लेकिन ये तो सामने दिख ही रहा था कि यहाँ की व्यवस्था शायद ऐसी ही है।मुझे लगा कि शायद लोगों को एक अलग सी प्राचीन काल की अनुभूति हो इसलिए यहाँ ऐसी व्यवस्था की हुयी है।खैर मैंने एक ऊँट वाले से बात की, न मैं उसकी भाषा समझा और न वो मेरी लेकिन पैसा एक ऐसी चीज़ है जिसकी भाषा सब समझ जाते हैं। तो अंततः पैसे कितने देने थे और कितने लेने थे वापिसी तक के ये हम दोनों में तय हो गया और मैं ऊँट पर बैठ गया. मेरे पास एक स्टिल कैमरा था,एक वीडियो कैमरे का बड़ा सा बैग था और पानी की बोतल भी थी।दोनों कैमरे गले से लटके थे।अब जैसे ही ऊँट खड़ा हुआ तो मैं तो जैसे पूरा हिल ही गया,पहले वो अगले घुटनों पर आया तो मैं पीछे झुका फिर उसने अपने पिछले पैर हिलाए और पहले पूरा पिछले पैरों पर खड़ा हुआ तो मैं अब आगे झुक गया और फिर उसने अपने अगले पैर भी पूरे खड़े किए तो मेरी पूरी कसरत हो गयी।अब जब वो चला तो मुझको बड़ा असहज सा लगा सारी कमर और पेट का बुरा हाल हुआ और मैंने वहाँ का माहौल देख कर सोचा कि यदि किसी ने मेरा कैमरा छीना तो इस ऊँट पर से तो मैं कुछ कर भी नहीं पाऊंगा इसलिए मैंने ऊँट वाले को रोका और उस ऊँट पर से उतर गया। उतारने को जब वो ऊँट बैठा तो फिर पूरी कसरत हो गयी।अब मैंने एक घोड़े वाले से बात की जो उम्र में लगभग 15-16 वर्ष का ही रहा होगा।उस से भी इशारों से आने जाने का तय हुआ और मैं उसके घोड़े पर बैठ गया।ये घोड़ा था तो अरब देश में ही लेकिन इसकी इतिहास प्रसिद्ध अरबी घोड़ों से कोई रिश्तेदारी नहीं थी अपितु ये गर्धवराज के निकट के वंश का रिश्तेदार प्रतीत हो रहा था।मैंने भी सोचा कि अब अरब देशों के तेल से तेल के घोड़े चलने लगे हैं तो यहाँ घास खाने वाले अरबी घोड़ों की इसलिए शायद कोई कदर नहीं रही है।खैर तो अब वो तथाकथित घोड़ा धीरे धीरे आगे बढ़ रहा था और उसके प्रत्येक कदम से मैं पिरैमिडों के नज़दीक पहुँच रहा था और रेतीले टीले पर चढ़ते हुए आखिर हम पिरैमिड के सामने पहुँच गए।घोड़े वाले ने मुझको उतार दिया और इशारों में कहा कि जब मुझको वापिस चलना होगा तो वो वहीं पर मिलेगा और स्फिंक्स दिखाते हुए मुझको वापिस कार तक ले चलेगा।जब मैं पिरैमिड के सामने पहुँचा तो मैंने देखा कि सामने एक अच्छी सी सड़क थी और लोगों की गाड़ियां उस सड़क से पिरैमिडों की तरफ आ रही थीं।मुझको मिस्टर मैगदी पर बहुत क्रोध आया कि वो मुझको सीधे रास्ते से क्यों नहीं लाये!!ये मामला कुछ ऐसा था कि आपको आगरा में ताजमहल देखना हो तो बजाय इसके कि आप सीधे रास्ते से जाएं आपको यमुना जी के तट पर छोड़ दिया जाए कि उधर से ताजमहल के पास जाओ लेकिन अब मैं इसमें झल्लाने के अतिरिक्त क्या करता।हाँलांकि ये भी सत्य है कि यदि मिस्टर मैगदी ने मुझको पहले से बताया होता कि पिरैमिड तक पहुँचने के दो तरीके हैं एक कार से और दूसरा ऊँट या घोड़े से और मैं अपनी मर्जी से घोड़े या ऊँट से आया होता तो मैं ना तो ठगा हुआ महसूस करता और साथ ही enjoy भी खूब करता।
अब विश्व के सात अजूबों में से एक अर्थात पिरैमिड मेरे सामने था और कुछ समय तक तो बस मैं पिरैमिड की तरफ देखता ही रहा उसको अपलक निहारता रहा, कितना विशाल structure था वो magnificent!!!
मैंने The great Pyramid में जाने का टिकट लिया जो 150 या 200 इजिप्शियन पाउंड का था शायद और चल पड़ा पिरैमिड के प्रवेश द्वार की ओर।
यहाँ मैंने यद्यपि गाइड नहीं किया था क्योंकि मेरा मूड भी नीचे की तरफ से आने के कारण कुछ खराब सा हो गया था किंतु वहाँ गाइड और लोगों को जो बता रहे थे वो मैं भी सुन रहा था।गाइड बता रहे थे कि मिस्र के पिरैमिडों में गीज़ा का ये विशाल पिरैमिड ही विश्व के प्राचीन सात अजूबों में शुमार है और इन सात अजूबों (Seven wonders) में से आज पृथ्वी पर सिर्फ यही अजूबा ऐसा है जो नष्ट नहीं हुआ है और आज भी मौजूद है।यहाँ ये भी स्पष्ट हुआ कि हमारा ताजमहल विश्व के प्राचीन प्रसिद्ध सात अजूबों का हिस्सा नहीं है अपितु मध्यकालीन/आधुनिक अजूबों में है।ये विशाल पिरैमिड लगभग 2560 ईस्वी पूर्व यानी कि आज से लगभग 4500 से भी अधिक साल पहले मिस्र के चौथे वंश के राजा खूफु द्वारा अपनी दफन स्थली के रूप में बनवाया गया था।इस पिरैमिड को बनाते समय इसकी ऊंचाई लगभग 488 फिट थी जो ऊपर का कुछ हिस्सा बाद में नष्ट हो जाने के कारण अब लगभग 455 फिट है।19वीं सदी तक भी यह विश्व की सबसे बड़ी और ऊँची इमारत मानी जाती थी।लगभग 13 एकड़ में फैला इस पिरैमिड का आधार फुटबॉल के लगभग 16 फील्डों के बराबर का है और इसको बनाने में लाखों टन चूना पत्थर और हजारों टन ग्रेनाइट का प्रयोग हुआ था।आश्चर्य की बात ये भी है कि इनमें से प्रत्येक पत्थर का वजन लगभग 2 टन से 30 टन तक का था,जी हाँ 30 टन!!!!!!!इसके बनाने में कारीगरी की शुद्धता अद्भुत थी,इन पत्थरों को इतनी कुशलता से जोड़ा गया था कि इनके बीच में एक ब्लेड तक नहीं जा सकता था।इनको बनाने में माप की भी गजब की शुद्धता थी और होती भी कैसे नहीं,भला इतनी कमाल की शुद्धता के बिना इतनी बड़ी विशालकाय इमारत साढ़े चार हजार साल तक खड़ी ही कैसे रह सकती थी…...
गाइड बताता जा रहा था कि मिस्र के इन पिरेमिडों का खगोलशास्त्र से भी यानी कि Astronomy से भी कुछ संबंध था और ये तीनों पिरैमिड आकाश के तारामंडल के “ओरियन राशि (Orion) “ के तीन तारों की सीध में हैं।ये भी मालूम पड़ा कि पिरैमिडों के अंदर का तापमान पृथ्वी के औसत तापमान अर्थात लगभग 20 डिग्री सेल्सियस के आसपास ही रहता है।इन पिरैमिडों में कुछ ऐसा वातावरण होता था कि इनके अंदर वस्तु खराब नहीं होती या बहुत देर तक खराब नहीं होती और तभी तो पिरैमिडों में रखी ममी और अन्य चीज़ें खराब नहीं हुईं और मुझको इजिप्शियन म्यूज़ियम में रखी हुई गुलाब के फूल की पत्तियां भी याद आयीं जो प्रसिद्ध फराओ तूतनखामन की ममी पर चढ़ाई गयी थीं।
गाइड बोलता जा रहा था कि इन पिरैमिडों के कई रहस्य अभी भी अबूझ हैं और अभी भी कभी कभी पिरैमिडों में किसी पत्थर के पीछे कोई नई चीज/नया रास्ता अथवा नया कक्ष/नयी वस्तु निकल आती है।उसने बताया कि इस पिरैमिड को बनाने में लगभग 23 साल का समय लगा था।गाइड की बातें सुनते हुए मेरा मन पहुँच गया था भारत में आगरा के ताजमहल के पास।उसको बनाने में भी लगभग 22 वर्ष लगे थे और वो भी उत्कृष्ट मानवीय कारीगरी का अद्भुत नमूना है।ताजमहल का निर्माण भी मकबरे के प्रयोजन से हुआ था और पिरैमिड का भी हाँलांकि ताजमहल इतना विशाल नहीं है जितने कि पिरैमिड।लेकिन एक बात अवश्य थी कि ताजमहल को देख कर,उसकी सुंदरता और उसके बनाने के पीछे का प्रेम भाव देख कर मन में एक सात्विक सौंदर्य और प्रेम का भाव उमड़ता है जबकि पिरैमिड को निहार कर,उन लोगों की बातें सुनकर एक प्रकार के रहस्य और रोमांच के भाव जागृत हो रहे थे।
यही बातें सुनते हुए मैं पिरैमिड के प्रवेश द्वार पर पहुँच गया और वहाँ पर तैनात गार्ड ने मुझसे पूछा कि कैमरे का टिकट कहाँ है तो मैंने उस से कहा कि मैंने कैमरे का टिकट तो लिया नहीं है।इस पर वो गार्ड बोला कि फिर आप कैमरा यहीं मेरे पास छोड़ जाओ जिसके लिए मैं कतई तैयार नहीं था।आखिर में उसने कहा कि आप अपने कैमरे की बैटरी निकाल कर मुझको दे जाओ तो अंदर बिना बैटरी के वीडियो कैमरा लेकर जा सकते हो।इस बात पर मैं भी राजी था और वीडियो कैमरे की बैटरी निकाल कर,उसको सौंप कर मैं पिरैमिड के अंदर घुस गया।
पिरैमिड के अंदर घुस कर एक संकरी गैलरी जैसी थी जिसको grand gallery भी कहा जाता है उसमें बहुत भीड़ और
एक किस्म की हल्की सी घुटन या suffocation जैसी थी। वहाँ कुछ भी बोला जाए उसकी आवाज़ बहुत देर तक गूंजती थी और कुछ लोग ऐसा कर भी रहे थे।पिरैमिड की इस गैलरी में बहुत मंद सी रोशनी थी और वातावरण अंधेरा सा,कुछ घुटन भरा और रहस्यमय सा प्रतीत हो रहा था।आगे बढ़ कर गैलरी की ऊंचाई कम हो चली थी,कुछ ऊपर की तरफ चढ़ाई सी पर चढ़ कर जाना था जो कि लकड़ी के पटरों से बना एक ढलवां रास्ता सा था।गैलरी काफी संकरी थी,उसमें दोनों तरफ लकड़ी की रेलिंग जैसी लगी थी और बहुत ही मद्धिम प्रकाश था,उसी से हम लोग ऊपर की ओर चढ़ रहे थे और नीचे आने वाले भी उसी रास्ते से आ रहे थे और लगभग सभी लोग बीच बीच में हाँफ से भी रहे थे मय मेरे।उस गैलरी में दो लोग भी एक बराबर से सीधे मुश्किल से ही चल सकते थे।मुझको काफी उमस, गर्मी और घुटन सी महसूस हो रही थी, गैलरी में कुछ हिस्से में तो सीधे खड़े होकर चलना भी संभव नहीं था क्योंकि वहाँ गैलरी के उस हिस्से में ऊँचाई काफी कम थी।
कुल मिलाकर कह सकते हैं कि मैं अपने आप को comfortable महसूस नहीं कर रहा था लेकिन ये पिरैमिड देखने का उत्साह ही था जो मुझे ऐसे में भी आगे बढ़ाए ले जा रहा था।ऊपर पहुँच कर एक कमरा सा था जिसको लोग Kings chamber कह रहे थे।कमरा खाली था बस उसमें एक पत्थर का हौद सा था जिसको Sarcophagus यानी कि पत्थर का ताबूत बताया था।इस प्रकार के ताबूत में ही राजा की ममी रखी जाती थी जो लकड़ी/स्वर्ण आदि के अन्य ताबूतों में बंद होती थी और इस पत्थर के ताबूत को फिर एक बहुत ही कलात्मक किस्म के एक पत्थर के ढक्कन से ही बंद कर दिया जाता था।उस स्थान पर एक विचित्र किस्म की अजीब सी शांति थी।मैंने कहीं पढ़ा था कि पिरैमिडों के अंदर के हिस्से में माहौल कुछ ऐसा होता है कि मनुष्य गहरा ध्यान लगा सकता है और कुछ ऐसा ही यहाँ प्रतीत भी हो रहा था,कुछ दैवीय शांति सी थी।
पिरैमिड का विशालकाय निर्माण बहुत गजब का था और अगर इसको साक्षात न देखें तो विश्वास ही नहीं होगा कि कोई मानवीय संरचना ऐसी शानदार और इतनी विशालकाय (Huge) भी हो सकती है और वो भी लगभग 4500 वर्ष पुरानी!!!!
इस पिरैमिड को देख कर मैं ये सोचने पर मजबूर था कि उस प्राचीन काल में 23 साल में भी ऐसी विशालकाय,मजबूत इमारतें कैसे बनी होंगी??!!
क्या कमाल के इंजीनियर और आर्कीटेक्ट रहे होंगे??!!!!
क्या कमाल के राज मिस्त्री और मजदूर रहे होंगे??!!!
कैसे इतने लाखों पत्थर इतने उम्दा तरीके से तराशे गए होंगे??!!!
कैसे अद्भुत औजार रहे होंगे!!!
किस प्रकार से ये पत्थर सैकड़ों फीट तक इतनी ऊँचाई तक पहुँचाये गए होंगे और कैसे लगाए गए होंगे???!!!!!!!
जिन लाखों मजदूरों ने दशकों तक मेहनत करके इस पिरैमिड को बनाया गया होगा उनको यदि सिर्फ खाना और रहना भी दिया जाता होगा तो इतने राजकोष की व्यवस्था कैसे की गयी होगी????!!!!!!
मैं यही सब सोच रहा था और गैलरी में आ गया था कि एक आदमी ने मेरे कंधे पर हाथ रख कर मुझको बुलाया,मैंने चौंक कर उसकी ओर देखा तो वो वह गार्ड था जिसके पास मैं अपने वीडियो कैमरे की बैटरी छोड़ आया था।उसने बैटरी मुझको वापिस दी और इशारा किया कि फोटो खींच लो,अब तक मैं भी समझ चुका था कि पैसे और भ्रष्टाचार की भाषा यहाँ भी बहुतों की रग रग में व्याप्त थी।मैंने हँस कर उसको इशारा किया कि भाई मैंने बैटरी लगा दी अब वीडियो तुम ही बना दो जो कि उसने बना भी दिया।इसके बाद उसने कहा तो मैंने उसको बैटरी वापिस निकाल कर दे दी फिर उसने कहा “give me some tip...Money" तो मैंने अपनी जेबें उलटीं तो उसमें केवल 2 इजिप्शियन पाउंड थे जो कि उसने बहुत बुरे मन से ग्रहण किये लेकिन ले लिए और मुझको सख्त ताकीद की कि ये बात मैं उसके दूसरे साथी को, जो बाहर ही खड़ा था,बिल्कुल न बताऊँ और मुझको भी बताने की क्या पड़ी थी।वहाँ मुझको पिरैमिडों और मिस्र के इतिहास की बहुत सारी और बहुत रोचक कई जानकारियां और मिलीं लेकिन वो जब कभी विशेष रूप से पिरैमिड आदि के विषय में कभी लिखा तो अवश्य लिखूंगा।हाँ एक बड़ी बात ये ज़रूर मन में आयी कि हमारे हिंदुस्तान में ताजमहल, सिकंदरा या अन्य जो भी बादशाहों के मकबरे बने हैं वो यद्यपि इतने विशाल नहीं हैं लेकिन उनमें एक सुरुचिपूर्ण architecture है जबकि मिस्र के पिरैमिडों में विशालता है,रहस्य है,थोड़ा भय भी है कहीं कहीं,लेकिन एक अजीब सी नीरसता है और उदासी भी है हाँलांकि कुछ आध्यात्मिक सी शांति भी थी उस पिरैमिड के अंदर के चैंबर में।साथ ही साथ ये भी सत्य है कि मिस्र के गीज़ा के ग्रेट पिरैमिड जैसी पृथ्वी पर दूसरी कोई कृति नहीं, उनको देखकर मन विस्मय
से भर जाता है , वे कैसे बने होंगे
मन-मस्तिष्क में ये प्रश्न भी बार बार उठता ही रहता है।इन पिरैमिडों में कितनी अकूत संपत्ति थी जो शायद लुटेरों द्वारा लूट ली गयी और जो लूटने से बच गयी वो काहिरा के इजिप्शियन म्यूज़ियम में प्रदर्शित है लेकिन इन सबसे बड़ी जो बात थी वो ये की आज से लगभग 4500 वर्ष पहले आखिर ऐसी विशाल कृतियाँ मनुष्य ने कैसे बनायीं जो आज भी इस आधुनिक टैक्नोलॉजी के जमाने में भी बनाना कोई आसान काम नहीं होगा।मैं ये भी सोच रहा था कि अगली बार कभी आया तो पिरैमिडों को तसल्ली से देखने को खूब समय लेकर आऊंगा।
पिरैमिड देख कर जब मैं बाहर निकला तो उस गार्ड ने मेरे कैमरे की बैटरी वापिस कर दी। बैटरी लेकर अब मैं उस स्थान पर पहुँचा जहाँ अरबी घोड़े वाले ने मुझको छोड़ा था तो वो वहाँ नहीं था।मैं उसको इधर उधर खोजता रहा किन्तु वो नहीं मिला।
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