Sindbad Travels-9

Sindbad Travels-9

Egypt-5 Cairo 2nd day

Egyptian Museum

मिस्र-5 काहिरा 2सरा दिन

इजिप्शियन म्यूज़ियम

काहिरा का शहीद स्मारक देख कर अब हम लोग मिस्र के विश्वप्रसिद्ध प्राचीन संग्रहालय की ओर जा रहे थे कि मिस्टर मैगदी ने ड्राइवर से गाड़ी एक मिनट को रोकने को कहा।उन्होंने हाथ के इशारे से सड़क के दूसरी तरफ दिखाया तो उधर कुछ नीचाई पर मुझको एक बहुत पुरानी सी,अजीबो गरीब सी लेकिन बहुत बड़ी बस्ती नज़र आई।मिस्टर मैगदी ने बताया कि ये जगह “मृतकों का शहर” अथवा The City of dead कहलाती है।

जब मिस्र में इस्लाम का प्रचलन/आक्रमण और मुस्लिम सुल्तानों/बादशाहों का शासन आरम्भ हुआ अर्थात 7वीं शताब्दी के बाद से, तो उन लोगों ने मृत्यु के पश्चात दफनाने को शहर से बाहर के रेगिस्तानी इलाके को चुना।अलग अलग राजवंशों के दफनाने के अलग अलग इलाके थे जिनको बाद में चहारदीवारी से एक कर दिया गया।इसको el-Arafa Necropolis  भी कहा जाता है।शुरू में जो लोग कब्र खोदते थे या उन मकबरों की देखभाल करते थे वो वहीं रहते भी थे।धीरे-धीरे ये इलाका इजिप्ट के सबसे बड़े स्लम इलाकों में से एक बन गया और इसमें लाखों लोग रहने लगे।ताज्जुब की बात है कि यहाँ लगभग अधिकांश मकबरों की एक अपनी चहारदीवारी है और पानी और बिजली की सप्लाई भी है।उन मकबरों में बने कमरों और कब्रों के बीच ही लोग रहते हैं।मिस्टर मैगदी ने बताया कि बहुत सारे लोग यहाँ ऐसे भी हैं जो पुश्तों से सैकड़ों सालों से यहाँ रह रहे हैं और बाहर जाना नहीं चाहते।उन्होंने यह भी बताया कि इस इलाके में अपराधी, ड्रग्स आदि के बेचने और उपयोग करने वाले भी बहुत से लोग रहते हैं और यहाँ अकेले जाना कई बार बहुत सुरक्षित नहीं होता है।मिस्टर मैगदी के वहाँ चलने के विषय में पूछने पर मैंने कहा कि इस City of dead में मेरी इच्छा मरने के बाद भी जाने की नहीं है तो मैं भला जीते जी क्यों जाना चाहूँगा,मेरी बात सुन कर मिस्टर मैगदी और ड्राइवर अपनी चिरपरिचित रोती हुयी सी हँसी हँसे और हम लोग इजिप्शियन म्यूज़ियम की तरफ बढ़ दिए।

रास्ते में ही बातचीत में मिस्टर मैगदी से पता चला कि हवाई अड्डे पर मुझको जो मिस शिरीन मिली थीं वो मिस्टर मैगदी के भाई की दोस्त थीं और उन्होंने ही मिस्टर मैगदी को मेरे पास भेजा था अर्थात मिस्र की सरकार या किसी विभाग का मिस्टर मैगदी से कुछ लेना-देना नहीं था जैसा कि अब तक इन्होंने बताया था और मैं समझ रहा था।मिस्टर मैगदी के इस झूठ पर मुझको मन ही मन बहुत खराब लगा और रोष भी हुआ लेकिन अब क्या करता।ये सोच कि  परदेस में विवाद तो बिल्कुल करना ही नहीं चाहिए और इतने समय साथ रहने से मैं मिस्टर मैगदी और उनकी सोच एवं हरकतों को शायद कुछ कुछ समझने भी लगा था इसलिए मैंने सोचा कि अब इनकी, जैसी भी सही, मदद से काम चलाया ही जाए।

इसी सब को सोचते हुए हम लोग इजिप्ट के प्रसिद्ध म्यूज़ियम पहुँच गए।वहाँ बहुत भीड़ थी मिस्टर मैगदी ने कहा कि आप म्यूज़ियम घूम लो मैं बाहर ही आपका इंतजार करूंगा।म्यूज़ियम में मुझको अपने अलावा कैमरों का टिकट भी लेना था तो मैंने सिर्फ वीडियो कैमरे का ही टिकट लिया।मेरा टिकट लगभग 60 या 70 इजिप्शियन पाउंड का था और जहाँ तक मुझे याद है वीडियो कैमरे का भी लगभग इतना ही या इस से कुछ अधिक था।

म्यूज़ियम में घुसते ही मैं आश्चर्यचकित था।मैंने अपने देश यानी भारत में बम्बई (अब मुंबई) और एकाध और जगहों के म्यूज़ियम ही अभी तक देखे थे लेकिन ये तो एक बिल्कुल दूसरी दुनिया थी।बाद में मैंने इंग्लैंड में लंदन,फ्रांस में पेरिस का लूव(Louvre Museum)आदि कई म्यूज़ियम भी देखे लेकिन उनकी बातें आगे चल कर होंगीं।हाँ तो मैं बता रहा था कि मिस्र के संग्रहालय में पहुँचते ही मैं तो मंत्रमुग्ध सा हो गया।नीचे घुसते ही एक बहुत बड़े हॉल जैसे ही मैं घुसा तो उसमें बहुत ही बड़ी बड़ी विशाल मूर्तियों से मेरा सामना हुआ।कुछ मूर्ति तो इतनी विशाल थीं कि यदि सिर पर टोपी लगी हो और मूर्ति का सिर देखने को आप अपना मुँह ऊपर की ओर करें तो सिर की टोपी ही गिर जाए।

ये मिस्र के 3 से 4 हजार वर्ष पुराने फराओ अर्थात सम्राटों/शासकों की मूर्तियां थीं।अधिकांश मूर्तियां  पत्थर की थीं ऐसा गाइड ने मुझको बताया और ये मिस्र के अलग अलग समय के विभिन्न वंशों शासकों की मूर्तियां थीं।विशाल मूर्तियों के अतिरिक्त सिक्के,छोटी और मध्यम साइज़ की मूर्तियाँ,बहुत सी तरह के पपीरोज़ और न जाने कितनी प्राचीन किस्म की वस्तुएं थीं।गाइड ने मुझको ये भी बताया कि इस संग्रहालय में एक लाख से अधिक प्राचीन वस्तुएं संग्रहीत हैं।इस ग्राउंड फ्लोर पर कुछ स्थान/मूर्तियां ऐसे भी थे जहाँ फोटो/वीडियो खींचना मना था या संभव नहीं था किंतु Tip लेकर वहाँ के सुरक्षा कर्मी ये काम खूब करवाते दिखे।इस प्रकार की मूर्तियां और अन्य कलात्मक वस्तुओं को देख कर मैं यही सोच रहा था कि आज से लगभग 4500-5000 वर्ष पहले भी मिस्र की सभ्यता कितनी विकसित रही होगी।म्यूज़ियम में प्राचीन फराओ के समय के,ग्रीक समय के,रोमन राज्य काल और बाद के काल की भी वस्तुएं थीं।

काफी देर तक नीचे के परिसर में घूमने के पश्चात मैं ऊपर की ओर बढ़ा।म्यूज़ियम की पहली मंजिल पर पहुँचते ही मुझको एक क्षण को तो ये विश्वास ही नहीं हुआ कि मैं इसी दुनिया में हूँ या किस्से कहानियों और चमत्कारों की दुनियाँ में पहुँच गया हूँ।संग्रहालय के इस तल पर मिस्र के महान फराओ/सम्राटों के पिरेमिडों/मकबरों से निकले सामान/खजाने मेरे सामने थे।

मिस्र के प्रसिद्ध फराओ जैसे हतशेपसुत,अमेनोफिस आदि के अकूत संपत्ति के खजाने यानी कि उनके पिरेमिडों से निकली वस्तुएं सामने थीं।उस जमाने के फर्नीचर,दैनिक उपयोग की चीज़ें आदि भी सामने प्रदर्शित थीं।

यहीं पर एक अलग कक्ष था मिस्र के इतिहास के प्रसिद्ध और रहस्यमय फराओ तुत अन खामुन के पिरैमिड से निकली वस्तुएं।तूतनखामन मिस्र के बहुचर्चित सम्राटों में थे।कहा जाता है कि केवल 9 वर्ष की उम्र में वो फराओ बने और एक मान्यता के अनुसार 19 वर्ष की उम्र में उनकी मृत्यु हो गयी थी।माना जाता है कि तूतनखामुन के पिता का नाम अखनातेन और माँ संभवतः प्रसिद्ध रानी नेफरीतीती थीं जो रिश्ते में फराओ अखनातेन की बहिन भी लगती थीं।मिस्र में फराओ काल में राजपरिवारों में भाई बहिन की आपस में शादी का रिवाज भी था।यद्यपि फराओ ईश्वर के अवतार माने जाते थे किंतु मुझको भारतीय पुराणों का वो किस्सा याद आ रहा था जब सूर्य की पुत्री यमी ने अपने सहोदर यम से प्रणय निवेदन किया था किंतु यम ने इस निवेदन को अनैतिक बताते हुए अस्वीकार कर दिया था जबकि यहाँ भी राजा सूर्य के ही अवतार थे किंतु यहाँ भाई-बहिन की शादी में अनैतिकता का कोई पहलू नहीं था अपितु उसका रिवाज़ ही था।

सम्राट तूतनखामुन की ममी तीन स्वर्ण मुखौटों के पीछे थी और वो स्वर्ण के ही तीन ताबूतों में रखी थी।फराओ तुत अंख आमुन या तूतनखामुन की ममी पर लगे शुद्ध ठोस स्वर्ण के मुखौटे का वजन मात्र 11 किलो था,जी हाँ केवल ग्यारह किलो!!! ये सारी और ऐसी बहुत सी चीज़ें वहाँ प्रदर्शित थीं।पूरा सोने का बना कमरा और कमरे के अंदर के छोटे कमरे जैसा भी कुछ लगा,सम्राट का शुद्ध सोने का पलंग,कुर्सी,मेज और सभी पूरा खालिस सोने का और उन पर क्या लाजवाब पच्चीकारी जैसा काम था,फराओ और उनकी साम्राज्ञीयों के पहनने के शुद्ध सोने के जूते,सोने की ही चप्पल,सैंडिल,स्वर्ण और हाथीदांत के अनेकों आभूषण, फर्नीचर और जो एक बहुत खास चीज़ थी वो थीं गुलाब के फूलों की काली सी पड़ गईं पत्तियां जो फराओ की ही एक रॉकिंग चेयर के सामने जमीन पर रखी थीं।बताया गया कि ये फूलों की पत्तियां भी उसी जमाने की थीं और उनके शव पर शायद चढ़ाई गयी थीं यानी कि लगभग 3500-4000 वर्ष पुरानी यद्यपि ऐसा प्रतीत होता था कि ये  पत्तियां/गुलाब के फूल मानो अभी दो चार दिन पहले ही चढ़ाए गए हों,ये अविश्वसनीय सा था लेकिन प्रत्यक्ष था।वहाँ इतना सोने का सामान चारों तरफ प्रदर्शित था कि मैं ये सोचने को मजबूर था कि प्राचीन काल में ‘सोने की चिड़िया’ तो मिस्र नहीं बल्कि भारत कहलाता था तो जब मिस्र में सोने के इतने अम्बार थे तो हमारे भारत में कितना सोना रहा होगा।

फराओ तूतनखामुन के मकबरे से निकले सामान,हाथीदांत और सोने के आभूषणों आदि को देखते हुए अब आगे नंबर था ‘ममी’ वाले कक्ष का।इसके पहले कई खानों की रैकों में विविध किस्म के विचित्र और अनोखी नक्काशी और पेंटिंग  किये हुए वो ताबूत रखे हुए थे जिनमें रखकर विभिन्न ममी दफन की गयी थीं।ममी वाले कक्ष में जाने के लिए अलग से टिकट था।वहाँ मिस्र के पुराने राजाओं,रानियों,उनके सेवकों और यहाँ तक कि जानवरों तक की ममियाँ प्रदर्शित थीं।उनको देखना अपने आप में एक अत्यंत विचित्र और रोमांचक अनुभव था।जरा सोचिए कि ये वो लोग थे जो आज से 3500-4000 वर्ष पहले चलते फिरते जीव थे और इन सभी को उनकी मृत्यु के बाद और बहुत से सेवकों को उनके स्वामियों के साथ जिंदा ही इस उम्मीद में दफनाया गया था कि एक वक्त आएगा जब ये सब फिर जीवित हो जाएंगे और इसीलिए उनके मृत शरीरों पर एक खास प्रकार का लेप लगा कर पूरे शरीर को पट्टियों से लपेट कर ममी बना कर संरक्षित रखा जाता था और कमाल था उस 4-5 हजार साल पुरानी तकनीक का क़ि ये ममियाँ अभी तक सुरक्षित रखी हैं।कई ममी के तो चेहरे के फीचर और बाल भी स्पष्ट से लगे।वहाँ पहुँच कर ऐसा लगता था कि जैसे वहाँ इतिहास सो रहा हो,शरीर में सिहरन पैदा कर देने वाला एक अजीब सा सन्नाटा प्रतीत होता था यद्यपि वहाँ दर्शक काफी थे और उनका शोर भी था किंतु शोर के बीच भी उस वातावरण की अनुभूति एक अलग किस्म की थी।उस माहौल में मन में अचरज,कौतूहल,एक अजीब किस्म का हल्का सा अजीब सा भय क्योंकि आखिर वहाँ आपकी मौजूदगी तो असंख्य मृत शरीरों के बीच ही थी और एक किस्म का वैराग्य ये सभी प्रकार के भाव एक साथ मन में आ जा रहे थे।

कुल मिलाकर मिस्र के इस म्यूज़ियम को देखना अपने आप में एक बहुत ही विचित्र और रोमांचित कर दे ऐसा अनुभव था ।
इसमें घूमने वाले को कई जगह ये प्रतीत होगा कि उसके रोंगटे खड़े हो गए हैं और कई जगह दर्शक को अपने चिकोटी काटनी ही पड़ेगी ये सुनिश्चित करने को कि वो सोते में कोई स्वप्न नहीं देख रहा है अपितु जागते हुए जो कुछ भी देख रहा है वो अविश्वसनीय होते हुए भी प्रत्यक्ष है और सत्य है।

ये कहना गलत नहीं होगा कि इजिप्ट जाकर यदि ये म्यूज़ियम नहीं देखा तो समझिए कुछ नहीं देखा और 5000 साल के इस इतिहास को देखने के लिए कुछ दिन या सप्ताह भी कम पड़ेंगे और मैंने तो बस कुछ घंटों में ही 5000 साल के इतिहास को जानने और अनुभूत करने का ये प्रयास किया था।इस म्यूज़ियम में पहुँच कर आपको प्रतीत होगा कि मानो आप टाइम मशीन में बैठ कर हजारों साल पहले के समय में पहुँच गए हैं और आपके चारों ओर जैसे इतिहास ही बिखरा पड़ा है।आप प्राचीनकाल के अतीव शक्तिशाली सम्राटों के बीच,उनके अप्रतिम वैभव के बीच घूम रहे हैं और मानों ममी के रूप में उस काल के वो सर्वशक्तिशाली व्यक्तित्व चिर शांति में सो रहे हों।पहले कभी एक फ़िल्म देखी थी सो मन में एक बार उसका दृश्य याद आया और मैं ये सोचने लगा कि क्या होगा यदि अचानक अभी ये सारी ममी जिंदा होकर उठ कर बैठ जाएं!!!!ये सोचते ही रीढ़ की हड्डी तक के पास कंपकंपाती हुई सी एक ठंडी सी सिहरन शरीर में दौड़ती चली गयी।ये सोच कर ही आश्चर्य हो रहा था कि मिस्र के रेगिस्तान की रेत में दफन हजारों साल के ये रहस्य तो उजागर हो गए लेकिन न जाने कितने रहस्य अभी भी ऐसे ही दफन होंगे और शायद हमारे भारत में भी प्राचीन इतिहास के न जाने कितने रहस्य अभी उजागर होने को बाकी  होंगे।

म्यूज़ियम से बाहर निकला तो मिस्टर मैगदी मुझको फिर मिल गए।उनके साथ जाकर एक दुकान से मैंने मार्बल और ओनिक्स जैसे सफेद ऐलाबस्टर पत्थर की मिस्र के प्रसिद्ध हस्तशिल्प की कुछ वस्तुएं जैसे नेफरीतीती के चेहरे की प्रतिकृति,पिरैमिड की प्रतिकृति आदि खरीदीं और फिर उसी खटारा किस्म की कार में बैठ कर चल दिये।

अब हम जा रहे थे मिस्र के प्राचीन रहस्यमय संसार की सबसे अद्भुत कृति जो कि विश्व के सात अजूबों में शुमार भी है यानी कि पिरैमिडों को देखने।यहाँ मुझको अपनी मिस्र यात्रा के अब तक के सबसे विचित्र अनुभव??? भी होने को थे।

Comments

  1. हर अंक के साथ रोमांच बढ़ता जा रहा है और लेखनी कमाल कर रही है ! आपके रिएक्शन और भावों को पढ़ कर बहुत अच्छा लगा यूंकी मानो हम खुद प्रत्यक्ष सारे नज़ारे देख-समझ रहे हों ! धन्यवाद ... अगले अंक का उत्सुकता से इंतज़ार रहेगा !

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  2. बस आप जैसे कद्रदान हौसला बढ़ाते रहे तो 10-15 साल की यात्राएं और थोड़े से विदेश व्यापार के अनुभव लिख डालने की मंशा है।

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  3. अतुल जी आपका यात्रा वृतांत वाकई कमाल का है।इतनी रोचक जानकारी पढ़कर मन प्रसन्न हो उठता है ऐसे लगता है कि जैसे हम स्वयं ही उस स्थान की सैर कर रहे हैं,आगामी यात्रा वृतांतों का बेसब्री से इंतजार है।
    अनिल चतुर्वेदी,फ़िरोज़ाबाद

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