Sindbad Travels-13

Sindbad Travels-13

Cairo,Egypt to London,U.K.

England -1,day-1,London

सिंदबाद ट्रैवल्स-13

काहिरा से लंदन,यू0के0

इंग्लैंड-1,पहला 1 दिन,लंदन

अब हमारा जहाज काहिरा के हवाई अड्डे से लंदन के लिए उड़ चला था।यह यात्रा लगभग 3500 किलोमीटर की थी और इसमें लगभग 5 घंटे का समय लगना था।इजिप्ट एयर का जहाज बहुत अच्छा था और उसमें उपलब्ध सेवाएं/सुविधाएं भी उत्कृष्ट कोटि की थीं।आज जब मैं ये संस्मरण ईस्वी सन 2017 में लिख रहा हूँ और अब जबकि मैं विश्व की अनेकों वायुसेवाओं (Airlines) में चल चुका हूँ तो भी यह कह रहा हूँ कि Egypt Air की सेवाएं तो बहुत अच्छी थी हीं लेकिन उनका Asian Vegetarian meal यानी कि शाकाहारी भोजन अत्यन्त स्वादिष्ट,बेहद लज़ीज़,लाजवाब और मेरे अब तक के अनुभवों में सर्वोत्तम में से एक था।
It was fabulous!!!
उन्होंने क्या परोसा था ये आज मुझको  ठीक से याद नहीं है किंतु उसका स्वाद जैसे आज भी मस्तिष्क में अंकित है और वो गजब का था।

जहाज में बैठे बैठे मैं सोच रहा था अपनी व्यापारिक तैयारियों के विषय में।मैंने अपना  परिचय देने हेतु एक Brochure भी बनाया था।इस ब्रोशर में कुछ सैम्पिलों के फोटो थे और हमारी फर्मों का परिचय था English,German,French & Arabic भाषाओं में।इस ब्रोशर को बनाने में मेरे इलाहाबाद विश्विद्यालय के सर गंगानाथ झा छात्रावास के जूनियर साथी रहे श्री संजीव शुक्ला और उनके कुछ मित्रों ने बड़ा सहयोग किया था।संजीव उस समय दिल्ली में जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्र थे और मेरे छोटे भाई अभिनव के अभिन्न मित्र।संजीव शुक्ला ने JNU के जर्मन भाषा विभाग की किसी छात्रा से हमारे परिचय वाले matter का जर्मन भाषा में अनुवाद करवाया।फिर हम लोग फ्रेंच के अनुवाद के लिए दिल्ली के साउथ एक्सटेंशन स्थित फ्रेंच भाषा सिखाने वाले alliance francaise संस्थान में गए जिसका पता हमको फ़िरोज़ाबाद के दिल्ली प्रवासी श्री अखिल चतुर्वेदीय ‘मुन्ना’भाईसाहब ने बताया था जिन्होंने मेरे यात्रा टिकट और वीसा भी करवाये थे।असली समस्या अरबी के अनुवाद में आई।उस समय हम लोगों को दिल्ली में अरबी भाषा का कोई टाइप करने वाला व्यक्ति या व्यवस्था नहीं मिला फिर संजीव शुक्ला आदि ने जामा मस्जिद के पास से एक अनुवादक और कातिब यानी कि हाथ से बहुत अच्छा और सुंदर लिखने वाला ढूंढा तब जाकर ये समस्या हल हुई और हमारे ब्रोशर की छपाई हो पायी।इस ब्रोशर और खास तौर पर डिज़ाइन किये गए logo वाले विज़िटिंग कार्ड ने मुझको एक्सपोर्ट के व्यापार में पहचान बनाने में बहुत मदद की।इस ब्रोशर के लिए मैं अपने छोटे भाई के समान संजीव शुक्ला,जो कि वर्तमान में उत्तर प्रदेश सरकार के होमगार्ड्स विभाग में  कमांडेंट, केंद्रीय प्रशिक्षण केंद्र, उ०प्र०होमगार्ड्स के पद पर कार्यरत हैं, उनका सदैव आभारी रहूँगा।

एक बात और भी उल्लेखनीय है कि मेरी इस यात्रा के बाद मेरी यूरोप के देशों की अनेक यात्राएं हुईं हैं और एक ही देश की कई-कई बार भी इसलिए मैंने सोचा कि जब एक देश के विषय में लिखूँ तो कोशिश की जाए कि वहाँ की बाद की यात्राओं के अनुभव भी उसमें समाविष्ट करता चलूं।1991 की जब इस यात्रा को पूरा करके मैं वापिस हिंदुस्तान पहुँचा तो मेरा एक्सपोर्ट का काम शुरू हो गया था किंतु बाद में जब मैंने International Trade Fairs में भाग लेना शुरू किया तो व्यापार की असली बढ़त हुई थी किन्तु उसकी चर्चा उपयुक्त समय पर करूंगा।

अपनी विदेश यात्रा की तैयारियों में मेरी एक और तैयारी भी थी और वो थी ठहरने के इंतजाम की।इसके लिए मैंने एक तो Youth Hostel की Life Membership ली थी।इस से आप सारे विश्व में जहाँ भी यूथ हॉस्टल हो उसमें बहुत मुनासिब दामों पर ठहर सकते हैं और यूथ हॉस्टल देश विदेश घूमने वाले सैलानियों के लिए वाकई एक बहुत ही सुविधाजनक व्यवस्था है।इसके अतिरिक्त मैंने ISKCON यानी देशी भाषा में कहें तो हरे रामा हरे कृष्णा या अंग्रेजों के मंदिर वालों की संस्था की भी Life Membership ली थी जो उस समय 7777/= रुपयों में मिली थी।अपनी इस यात्रा में आगे आने वाले यूरोपीय देशों में मेरा इरादा इन दोनों ही सदस्यताओं की सुविधा के अधिकतम इस्तेमाल का था।

हाँ तो मैं इजिप्ट एयर के जहाज में बैठा उनके लज़ीज़ शाकाहारी व्यंजनों का लुत्फ उठाते हुए अब लंदन,इंग्लैंड की ओर अग्रसर था।मैं सोच रहा था कि एक समय था जब ये अंग्रेज़ लोग हमारे देश में/से व्यापार करने आये थे और आज हमारे देश भारत से मेरे जैसे व्यापारी इनके देश से व्यापार करने जा रहे हैं। मैं ये सच भी कुबूल करना चाहूंगा कि चूंकि मैं इतिहास का विद्यार्थी भी रहा हूँ और मैंने आधुनिक इतिहास भी पढ़ा था इसलिए अंग्रेजों की कारगुजारियों के कारण मेरे मन में उनके प्रति एक किस्म का पूर्वाग्रह भी था।
मैं सोच रहा था कि कैसे लोग होंगे ये अंग्रेज़?
उनका मेरे जैसे एक भारतीय व्यापारी से कैसा व्यवहार होगा?
क्या वो बहुत दंभी और घमंडी होंगे?
क्या वो रूखे स्वभाव के और बदतमीज़ होंगे?
मुझको याद आ रहा था कि कैसे दुबई में एक अरबी शेख ने मुझसे भारतीय होने के नाते व्यापार की बात भी करने से इनकार कर दिया था।इस किस्म की अनेक शंकाओं ने मेरे मन में झंझावात पैदा किया हुआ था।इन सभी प्रश्नों के उत्तर भविष्य के गर्भ में ही थे।

खैर अब उस देश और उन लोगों से रूबरु होने का समय आ गया था जिन्होंने हमारे देश को लगभग 200 वर्ष अपना गुलाम बना कर रखा था।काहिरा से विमान को उड़े लगभग पाँच घंटे हो चले थे और हमारा विमान अब जल्द ही लंदन,इंग्लैंड के हीथ्रो हवाई अड्डे पर उतरने वाला था।

इंग्लैंड के हीथ्रो हवाई अड्डे पर पहुँचने के बाद मैं इ्मीग्रेशन की लाइन में लगा,वहाँ उन्होंने बस मेरा वीसा देखा और पासपोर्ट पर entry की मुहर लगा कर क्लीयर कर दिया अर्थात कोई दिक्कत नहीं हुई हाँलांकि न जाने क्यों लंदन हीथ्रो एयरपोर्ट पर सामान लेने की बेल्ट से सामान लेकर बाहर निकलते हुए anxiety के कारण  मेरी छाती में काफी जोर से धक-धक हो रही थी।वहीं बूथ से मैंने अपने ठहरने के लिए यूथ हॉस्टल में बुकिंग करायी,ये यूथ हॉस्टल लंदन के earl’s court इलाके में था।सामान में मेरी  अटैची, ब्रीफ केस एक पहियों वाली ट्रॉली पर बंधा था जो मैं अपने साथ लेकर चल रहा था,एक एयर बैग और एक वीडियो कैमरे का बैग और एक स्टिल कैमरे का छोटा बैग मेरे कंधे पर था और ये सब सामान लेकर मैं एयरपोर्ट परिसर में ही पहले टैक्सी वालों की तरफ पहुँचा और उनमें से एक से मैंने Underground Tube यानी कि मेट्रो का स्टेशन पूछा तो उन टैक्सी वालों ने मुझसे पूछा कि मुझको कहाँ जाना है मैंने कहा कि मुझको earl’s court जाना है तो वो बोले कि आप अंडरग्राउंड से न जाकर टैक्सी से चलिए।जब मैंने टैक्सी के चार्जेज़ पूछे तो मुझको वो पैसे बहुत ज्यादा लगे और मैंने उनको मना करते हुए कहा नहीं मैं तो अंडरग्राउंड से ही जाऊँगा।इस पर वो बहुत चिढ़ कर लगभग चिल्लाते हुए बोले कि,” ठीक है जाओ अंडरग्राउंड से।अच्छा है कोई तुम्हारे गले में लटके ये बैग छीन लेगा और अटैची ले जाएगा तब तुमको मालूम पड़ेगा।”खैर मैंने उनकी बात की कोई परवाह नहीं की और मैं अंडरग्राउंड स्टेशन की तरफ बढ़ चला।हाँ,यहाँ ये बताना भी जरूरी है कि वो टैक्सी वाले शक्लो सूरत से एशियन यानी हिंदुस्तानी या पाकिस्तानी ही लग रहे थे!!!

मैं अपने लगभग 62-65 किलो सामान के साथ अंडरग्राउंड में चढ़ गया।मैं पहले बम्बई (अब मुम्बई) में लोकल ट्रेन में जरूर चला था किंतु इस प्रकार की Underground (जैसी अब अपने मेट्रो चलती हैं) में चलने का ये मेरा पहला अनुभव था और मैं उस ट्रेन में बैठ कर बहुत रोमांचित महसूस कर रहा था।ट्रेन के दरवाजों का अपने आप खुलना और बन्द होना तथा स्टेशन आने की उद्घोषणा होना मेरे लिए बहुत रोमांचक करने वाला अनुभव था और होता भी क्यों नहीं आखिर उस जमाने में ये सब मैं तो पहली बार ही देख रहा था।जब ट्रेन जमीन के अंदर सुरंग में गयी तो ये भी इस प्रकार का मेरे जीवन का पहला ही अनुभव था।जब ट्रेन ground level पर चलती तो हरियाली और अपने यहाँ से अलग किस्म की बिल्डिंगों का एक अद्भुत नजारा भी दृष्टव्य था।विभिन्न स्टेशनों पर रुकते चलते लगभग आधे घंटे से कुछ अधिक समय में आखिर earl's court स्टेशन आ गया जहाँ मैं ट्रेन से उतर गया।स्टेशन से बाहर निकलने पर इतने सारे सामान के साथ सही पते पर पहुँचने के लिए मुझको ये उचित लगा कि अब टैक्सी ही कर ली जाए।लंदन में काले रंग की बहुत पुरानी गाड़ी के शेप की टैक्सी थीं और उसमें सवारी के पीछे बैठने की जगह और ड्राइवर के बीच में एक शीशा था जिसको हटा कर ड्राइवर बात करता।रास्ता खूब भीड़ भरा था,कार हम लोगों के देश की भांति Right hand drive थी जबकि अभी तक इस से पहले सभी जगहों पर कार left hand drive की ही मिली थीं।अंग्रेज़ ड्राइवर ने स्टेशन से मुश्किल से सौ डेढ़ सौ मीटर चल कर उसने गाड़ी रोक दी वहाँ से साइड की एक गली नुमा में जाकर वो यूथ हॉस्टल था।टैक्सी वाले को मुझको minimum charges of fare जो कि लगभग 8 पाउंड यानी कि 460 रुपये के लगभग थे(उस समय 1 ब्रिटिश पाउंड लगभग 57-58 रुपये का था शायद) वो देने पड़े जो इतनी कम दूरी के कारण मुझको अखर गए।खैर अपना सामान लादे मैं अब अपने लंदन में ठहरने के स्थान यूथ हॉस्टल पहुँच चुका था और अब यहाँ से मेरी लंदन और यूरोप की आगे की यात्रा की शुरुआत होनी थी।

Comments

  1. बहुत ही अच्छा संस्मरण अतुल !! भाषा की जटिलता में पड़े बिना सामान्य शब्दो मे वस्तुस्थिति का विश्लेषण एवं व्याख्या एक साधा हुआ लेखक ही कर सकता है अगले संस्करण के इंतज़ार में.......
    शुभकामनाएं !!

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    1. धन्यवाद,आनंद!तुमको ये पसंद आया ये मुझको भी अच्छा लगा.

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  2. अतुल जी ये न केवल यात्रा वृतांत है बल्कि नए नए अनुभवों की खान भी है।नए यात्रियों जो पहली बार विदेश यात्रा पर जा रहे उनके लिए आपके यात्रा वृतांत लाइट हाउस का काम करेंगे,ऐसा मेरा दृढ़ विश्वास है।अगर आप अपने यात्रा के इन अनुभवों को पुस्तक का रूप दे दें तो कोई शक नही की ये बेस्ट सेलर के रूप में सामने आए,आगे के अंकों का बेसब्री से इंतेज़ार रहेगा ।

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  3. आपकी हौसलाअफजाई के लिए बहुत बहुत धन्यवाद नीलमणि भाईसाहब!!सादर

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