Sindbad Travels-17 सिंदबाद ट्रेवल्स-17

Sindbad Travels-17

England-5, London day-3

Buckingham Palace,Hyde Park,Kensington Palace,Oxford Street etc.

सिंदबाद ट्रैवेल्स-17

इंग्लैंड-5,लंदन 3सरा दिन

बकिंघम पैलेस,हाइड पार्क,केंसिंग्टन पैलेस,ऑक्सफोर्ड स्ट्रीट आदि

मैडम तुसादस म्यूज़ियम से चल कर अब मैं ग्रीनपार्क ट्यूब स्टेशन से निकल कर इंग्लैंड की राजशाही के शाही निवास बकिंघम पैलेस की तरफ पैदल ही बढ़ चला था।मुश्किल से 10 मिनट में पैदल चलते हुए मैं बकिंघम पैलेस के मुख्य गेट के सामने था।

बकिंघम पैलेस ईस्वी सन 1703 में Duke of Buckingham के लिए बनवाया गया था।ये लंदन के City of Westminster में स्थित है।सन 1837 में महारानी विक्टोरिया के राज्यारोहण के साल में ये लंदन में इंग्लैंड के शासक का पूरे तौर से सरकारी निवास बन गया और तबसे ये इंग्लैंड के शासकों का सरकारी आवास बना हुआ है।द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान हुई बमबारी में इसको भी कुछ नुकसान पहुँचा था।वर्तमान में ये लंदन में रानी एलिज़ाबेथ द्वितीय यानी कि यूनाइटेड किंगडम के शासक का निवास और प्रशासनिक मुख्यालय है।बकिंघम पैलेस एक अत्यंत विशालकाय महल है और आधुनिक काल के उन गिने चुने महलों में है जहाँ आज भी सचमुच के राजा-रानी रहते हैं।जब मैं वहाँ पहुँचा तो मुझको मालूम पड़ा कि उस दिन किसी कारण से महल के अंदर घूमना/जाना संभव नहीं था इसलिए मैंने इंग्लैंड के इस शाही निवास को केवल बाहर से ही देखा।बकिंघम पैलेस एक अत्यंत भव्य इमारत है,वहाँ किसी ने बताया कि इसमें 1500 से अधिक दरवाजे और 750 से अधिक कमरे और 40,000 से अधिक बिजली के रौशनी के बल्ब हैं।इसके बाहर मुख्य द्वार जो कि लोहे के सींखचों का बना एक भव्य द्वार था,उस पर लाल कोट और काली पैंट वाली प्रसिद्ध वर्दी और बड़े बड़े नकली झब्बेदार काले बालों के टोपे लगाए वहाँ के प्रसिद्ध अंग्रेज सैनिक तैनात थे और ड्यूटी बदलते वक्त उनकी एक सी चाल,हाथों में हथियार लिए चलना और उस समय उनके सिर के नकली बड़े बड़े बालों का हिलना एक अद्भुत दृश्य उपस्थित कर रहे थे।उस महल के बाहर खड़ा होकर मैं ये सोच रहा था कि अभी पचास-साठ वर्ष पहले ही तो इस महल के शासकों का इतना विशाल शासन क्षेत्र था कि कहा जाता है कि इनके राज्य में सूरज नहीं डूबता था और आज इनका साम्राज्य सिर्फ यहीं सिमट कर राह गया है बस ग्रेट ब्रिटेन में।लेकिन एक बात जो और मन में बार बार आ रही थी वो ये थी कि क्या कारण है कि हम लोग चीन के 1962 के कटु अनुभवों को भी नहीं भूल पाए हैं जबकि इस देश के लोग जिनका एक जमाने में दुनिया के बहुत बड़े हिस्से पर शासन था और आज नहीं है किंतु उन्होंने अपना शासन समाप्त होने या अपने साम्राज्य के पतन होने की घटना को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया है और इस देश में इस अत्यन्त बड़े ऐतिहासिक घटनाक्रम के बाद भी सबका जीवन सामान्य है बिना किसी मलाल के।

बकिंघम पैलेस,लंदन,इंग्लैंड के गेट के सामने,अतुल चतुर्वेदी,ईस्वी सन 1991 अक्टूबर


बकिंघम पैलेस से मैं Hyde Park की तरफ चल दिया।लंदन का ये प्रसिद्ध पार्क लगभग 600 एकड़ से अधिक का है और इसी का एक हिस्सा इंग्लैंड के दूसरे प्रसिद्ध राजशाही निवास Kensington Palace का Kensington gardens है।ये पार्क भी सेंट्रल लंदन में ही अवस्थित है और बहुत ही शानदार सुरम्य वातावरण वाला बगीचा है।इस हाइड पार्क में पहले बहसें,प्रदर्शन,कंसर्ट आदि भी होते थे।इस पार्क की हरियाली और पेड़,पौधे बहुत ही मनमोहक माहौल उत्पन्न कर रहे थे।इसमें बीच में सड़क सी निकली हुई थी और बेंचे भी पड़ी थीं जहाँ आप बैठ भी सकते थे।हाइड पार्क में बेंच पर बैठ कर पक्षियों की चहचहाट के बीच हरियाली को निहारना बहुत अद्भुत और दिल को बहाने वाला अनुभव था।मेरा दावा है कि यदि आप प्रकृति से वास्तव में प्रेम करते हैं तो आपका मन वहाँ से उठने का कभी होगा ही नहीं।मैं उन कर्मचारियों और मालियों की मन ही मन में सराहना कर रहा था जिन्होंने अपनी मेहनत और लगन से इतना अच्छा पार्क इतने सुंदर रूप में बना के रखा था।इस पार्क में घूमते हुए मुझको अपने राष्ट्रपति भवन के मुगल गार्डन,श्रीनगर कश्मीर के निशात बाग और शालीमार गार्डन भी याद आये और आगरा का शाहजहाँ गार्डन भी किन्तु हाइड पार्क भी बहुत ही मनोरम और सुंदर स्थान था।हाइड पार्क  में ही एक तरफ speakers corner है जहाँ सप्ताहांत में लोग इकट्ठे होकर विभिन्न विषयों पर अपने विचार प्रकट करते हैं।

वहाँ और घूमने पर मैं इंग्लैंड के राजवंश के दूसरे शाही निवास Kensington Palace के सामने पहुँचा।ये राजमहल 17वीं शताब्दी से ब्रिटिश शाही परिवार का निवास था।इसमें रहने वाले आखिरी बादशाह जॉर्ज द्वितीय थे।वर्तमान में इसमें Duke & Duchess of Cambridge तथा शाही परिवार के अन्य लोग रहते हैं।इससे लगा हुआ ही Kensington Gardens का इलाका है जो विशाल हाइड पार्क से भी जुड़ा हुआ है।ये गार्डन लगभग 275 एकड़ के विशाल इलाके में फैला हुआ है।ऐसा लगता है मानो  लंदन शहर एक विशाल शरीर है और ये बगीचे उस शरीर  के  हरियाली युक्त साँस लेने के फेफड़ों के रूप में अपना काम कर रहे हैं।हरे भरे पेड़ों से भरे हुए बहुत ही व्यवस्थित और करीने से बने हुए ये बगीचे वास्तव में ऐसे ही हैं कि इनमें बनी बेंचों पर यदि आप बैठ जाएं तो उठने का मन ही ना हो बल्कि मन यही कहता है कि कुछ देर और बैठ लो इस सुरम्य वातावरण में,कुछ देर और।लंदन के इन हरियाली भरे बगीचों ने मेरा मन वास्तव में मोह लिया और आज भी जब मैं लंदन की याद करता हूँ तो ये शानदार बगीचे मानो मेरी आँखों के समक्ष सजीव से हो उठते हैं।

इस इलाके में घूमते हुए एक घटना और हुयी।मैं बकिंघम पैलेस के पास ही था और वहाँ पास ही सड़क पर गाड़ियां गुजर रही थीं कि अचानक कुछ सरगर्मी सी हुई।कुछ लोग थोड़ी दूर पर खड़ी एक बड़ी नेवी ब्ल्यू या काली सी गाड़ी की ओर कुछ इशारा सा कर रहे थे कि अचानक वो गाड़ी बहुत धीरे से बढ़ती हुई आयी और मैंने देखा कि उस गाड़ी के शीशे चढ़े हुए हैं और उसमें पिछली सीट पर बायीं तरफ हैट लगाए एक महिला बैठी हैं और बाहर खड़े लोगों की तरफ मुस्कुराते हुए हाथ हिला कर अभिवादन सा कर रही हैं।गाड़ी के और पास बिल्कुल पास आने पर मैंने देखा और मुझे लगा कि यह मुस्कराती हुई महिला तो मेरी देखी हुयी है।अचानक ध्यान आया कि वो शानदार व्यक्तित्व और अप्रतिम सौंदर्य वाली महिला लेडी डायना थीं जो कहीं जा रही होंगी और जनता को देख कर मुस्कुराते हुए हाथ हिलाते हुए निकलना उनके स्वभाव,व्यवहार का एक अंग रहा होगा लेकिन हाँ इतनी प्रसिद्ध हस्ती को इतने पास से देखना वास्तव में एक सुखद अनुभूति थी।

इंग्लैंड के इन शाही निवासों के आसपास घूम कर अब मैं आ गया था लंदन की विश्वप्रसिद्ध ऑक्सफोर्ड स्ट्रीट पर।ये एक बहुत ही चहल पहल भरा शानदार बाज़ार है।ऑक्सफोर्ड स्ट्रीट लगभग 2 किलोमीटर लंबी एक सड़क तथा उसके आसपास के इलाके का बाज़ार है।ये स्ट्रीट मार्बल आर्च से टॉटेनमकोर्ट रोड तक ऑक्सफोर्ड सर्कस से होती हुई जाती है।यहाँ पहुँच कर इस इलाके को देख कर मुझको अपने दिल्ली का कनॉट प्लेस याद आ गया।कहा जाता है कि कनॉट प्लेस इस ऑक्सफोर्ड स्ट्रीट को ध्यान में रखकर ही बनाया गया था।जो कोई भी लंदन आता है ऑक्सफोर्ड स्ट्रीट घूमे बिना उसकी लंदन यात्रा ऐसे ही अधूरी है जैसे कि संगम में डुबकी लगाए बिना तीर्थराज प्रयाग की यात्रा।ऑक्सफोर्ड स्ट्रीट का स्थापत्य यानी कि architecture और वहाँ की lighting भी बहुत ही आकर्षक और लुभावनी थी।

कहा जाता है कि रोज लगभग 4-5 लाख लोग ऑक्सफोर्ड स्ट्रीट घूमने और खरीदारी करने आते हैं इस से इसकी विशालता और भव्यता का अंदाजा लगाया जा सकता है।खास बात ये थी कि यदि एक तरफ वहाँ बड़े बड़े विश्वप्रसिद्ध ब्रांडों की दुकानें,स्टोर्स जैसे Selfridges,HMV,John Lewis आदि थे तो दूसरी ओर कुछ छोटी रिटेल जैसी दुकाने भी थीं,खूब शोर शराबा और चहल पहल थी।कहा जा सकता है कि ऑक्सफोर्ड स्ट्रीट में मानो विश्व की विभिन्न सभ्यताएं जीवंत सी हो उठी लगती थीं।मैंने भी ऑक्सफोर्ड स्ट्रीट से स्वेटर,टाई, टी शर्ट्स आदि चीज़ें अपने और घरवालों के लिए खरीदीं और कह सकता हूँ कि अनुभव अच्छा रहा।

वहाँ घूमते हुए मुझको भूख भी लगने लगी थी और तभी उसी इलाके के आसपास  मैंने एक दुकान देखी जिसमें शीशे के काउंटर पर मुझको तंदूरी रोटी और रसेदार सी सब्जी भी दिखीं।मैं बता नहीं सकता कि रोटी और सब्जी देख कर मैं कितना उत्साहित हो गया और मेरी भूख कई गुणा बढ़ गयी क्योंकि ना तो मुझको इजिप्ट में रोटी सब्जी नसीब हुई थी और ना ही अभी तक लंदन में।मैं तुरंत उस दुकान में प्रविष्ट हुआ और मैंने दो रोटी और वो गोभी की सी दिखने वाली रसे की सब्जी खरीदी और एक तरफ खाने वाली मेज पर खड़ा हो गया खाना खाने के लिए।जहाँ तक मुझको याद है एक रोटी एक पाउंड की और सब्जी शायद 3 या 4 पाउंड की रही होगी।सब्जी शाकाहारी थी ये मैंने पूछ लिया था।जैसे ही मैंने रोटी का कौर तोड़ा और सब्जी में लगा कर मुँह में रखा मुझे अपनी नानी याद आ गयी।मैंने अपने पूरे जीवन में इतनी अजीब स्वाद की और बुरी सब्जी कभी चखी भी नहीं थी।खाने को छोड़ना या फेंकना मेरे स्वभाव में नहीं है और मेरे उसूलों के भी खिलाफ है किंतु अपने तमाम उसूलों को एक साथ याद करने पर और अपनी पूरी मन:शक्ति लगाने के बावजूद मेरी हिम्मत उसका दूसरा कौर मुँह में रखने की नहीं ही हुई।ये सब मुझको बहुत बुरा लग रहा था और मुझको वो रोटी भी बहुत महंगी (लगभग 57-58 रुपये की शायद एक रोटी)लग रही थी और वहाँ कोई दूसरी सब्जी उपलब्ध नहीं थी,आखिरकार मैंने थोड़ी बहुत रोटी ऐसे ही बिना सब्जी के रूखी खाने की असफल कोशिश की और अंत में क्षुधा शांत करने को सैंडविच और बर्गर की ही शरण ली।

कुल मिलाकर आज का दिन लंदन की भव्यता से रूबरू होने का दिन रहा था,वहाँ की संस्कृति और संपन्नता से परिचित होने का दिन रहा था लेकिन अंग्रेजों के तौर तरीकों आदि से जो चीज़ मुझको सबसे ज्यादा सीखने वाली लगी वो ये थी कि भूतकाल की ऐतिहासिक चीजों को संजो के तो रखो लेकिन भूतकाल के विषाद में जियो मत अपितु भविष्य की ओर अपनी पूरी शक्ति और सामर्थ्य से बढ़े चलो।इतने बड़े साम्राज्य के खत्म होने के बाद भी उसको खोने की तकलीफ से पीड़ित मुझको कोई अंग्रेज़ नहीं मिला।दूसरी बात ये भी महत्वपूर्ण थी कि इन लोगों ने सारी दुनिया में अपनी कुटिलता,क्रूरता,चालबाजियों से अपना राज्य स्थापित किया और अपने मातहत वाले गुलाम देशों और उनके नागरिकों का हर प्रकार का और खूब शोषण किया किन्तु यहाँ के लोगों से मिलकर उनसे बात कर के  हर बार यही लगा कि लोकतंत्र और मानव मूल्यों का इनसे बड़ा अलंबरदार कोई और नहीं है।

यही सब विचार करता हुआ मैं अपने ठहरने के स्थान यूथ हॉस्टल पहुँच गया था और जल्दी ही निद्रा देवी की शरण में जाने का प्रयास करने लगा क्योंकि अब अगले दिन एक व्यापारी से मिलना था।

Comments

  1. Replies
    1. बहुत बढ़िया अतुल। हमेशा की तरह फिर आनंद आया ... रोटी की कहानी पढ़ के बुरा भी लगा ... भारतीय रोटियों की बदनामी कर रहे है इंग्लिश टेस्ट लगा कर .. हाहाहा

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    2. संदीप भाई जो इतने भाग लिख गए अभी तक इसमें आप जैसे मित्रों के द्वारा निरंतर किये जा रहे उत्साहवर्धन का भी काफी योगदान है।धन्यवाद

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