Sindbad Travels-18 सिंदबाद ट्रैवल्स-18

Sindbad Travels-18

England-6 London day-4 & 5

सिंदबाद ट्रेवल्स-18

इंग्लैंड -6   लंदन 4था और 5वां दिन

सुबह फिर जल्दी से उठ कर तैयार हो गया।आप जब किसी ऐसी जगह रुके हों जहाँ बाथरूम और टॉयलेट कॉमन हों तो जल्दी उठ कर तैयार होना हमेशा फायदेमंद रहता है और मैं तो यूथ हॉस्टल में रुका हुआ था ही।सुबह सुबह मठरी और शकरपाड़े खा कर मैं यूथ हॉस्टल से निकल पड़ा।बाहर मौसम ठंडा ही था इसलिए ट्यूब के स्टेशन पर जाकर सबसे पहले गरमा-गरम चाय पी और फिर ट्रेन पकड़ कर मैं पहुँच गया मिस्टर एडवर्ड के बताए पते पर।

द्वार पर लगी घंटी बजने पर एक 35-40 वर्ष की अंग्रेज़ महिला ने दरवाजा खोला और पूछा कि क्या आप मिस्टर चतुर्वेदी हैं?मेरे हामी भरने पर वो मुझको अंदर एक अच्छे से कमरे में ले गईं और मुझको वहाँ बैठने को कहा।लगभग 10 मिनट के इंतज़ार के बाद एक लगभग 50 वर्ष के जँचते हुए व्यक्तित्व के अंग्रेज़ ने आकर मुस्कुराते हुए मुझसे हाथ मिलाया और बताया कि वो ही मिस्टर एडवर्ड हैं जिनसे मुझको मिलना था।हम लोगों में परिचय हुआ।उन्होंने मुझसे मेरे कार्य,व्यापार और अब तक की यात्रा के विषय में पूछा।उन्होंने मुझसे पूछा कि अभी तक इंग्लैंड में मेरी किसी से व्यापारिक मुलाकात हुयी क्या तो मैंने उनको मिस्टर जेम्स सलीम के विषय में बताया।उनका नाम सुनने पर वो बोले भाई वो व्यापारी तो बड़ा है परंतु सद्दाम हुसैन के इराक का है और उस समय 1991 में इराक से अमेरिका आदि देशों का युद्ध होकर चुका था इसलिए किसी की भी राय वहाँ से व्यापार करने की होनी ही नहीं थी।खैर जो वस्तुएं जेम्स सलीम को चाहिए थीं वो वैसे भी मेरे व्यापार क्षेत्र की नहीं थीं।मिस्टर एडवर्ड ने मेरे सैम्पिल देखे और बीड्स में खासी रुचि दिखाई।वो मुझसे फ़िरोज़ाबाद और भारत के विषय में काफी चर्चा करते रहे।उन्होंने मुझको बताया कि यूरोप में बीड्स और बीड्स से बनी ज्वेलरी का काफी व्यापार होता है।साथ ही उन्होंने कहा कि भारत के माल की क्वालिटी के विषय में उनको काफी संदेह है इस पर मैंने उनको भरोसा दिलाया कि उनको सर्वश्रेष्ठ क्वालिटी का माल मिलेगा वो इस विषय में निश्चिंत रहें।उनसे काफी देर तक भारत के समाज,आर्थिक स्थिति आदि के विषय में भी बातचीत होती रही,मैं महसूस कर रहा था कि मिस्टर एडवर्ड एक वाकपटु व्यक्ति थे और उनको भारत के विषय में बहुत उत्सुकता तो थी ही बल्कि इस विषय में उनकी जानकारी काफी अच्छी भी थी।उन्होंने ये भी बताया कि उनके बुजुर्गों में से कोई भारत रहे भी थे।मिस्टर एडवर्ड ने बातचीत में ही मुझसे पूछा कि मैं कहाँ ठहरा हुआ हूँ तो मैंने उनको बताया कि मैं यूथ हॉस्टल में रुका हूँ।इसके बाद उन्होंने मुझसे व्यापार विषयक बात ज्यादा नहीं की और कहा कि वो बाद में मुझसे संपर्क करेंगे जो आज तक नहीं किया।यद्यपि उस समय तो मैं कुछ समझ नहीं पाया था किंतु वर्षों बाद मुझको ये बात समझ में आयी कि व्यापार में और खास तौर से विदेश व्यापार में  इस बात का भी बहुत महत्व होता है कि आप कैसी जगह पर ठहरते हैं।इस प्रकार से लंदन,इंग्लैंड में मेरे दोनों व्यापारिक अपॉइंटमेंट हो चुके थे और दोनों का ही परिणाम शून्य ही था।

इसके बाद वहाँ से निकल कर और ट्यूब पकड़ कर मैं पिकेडली सर्कस स्टेशन पहुँचा और वहाँ से बाहर निकल कर लगभग 15-20 मिनट में पैदल टहलते हुए पहुँच गया सोहो स्ट्रीट पर ISKCON Temple  यानी कि अंग्रेजों वाले हरे रामा हरे कृष्णा मंदिर। मैं पहले ही ज़िक्र कर चुका हूँ कि विदेश यात्रा आरम्भ होने से पहले की तैयारियों में मैंने इस संस्था की आजीवन सदस्यता भी ली थी ताकि विदेश में आवश्यकता पड़े तो रुका जा सके।बहरहाल सोहो स्ट्रीट पर यह मंदिर एक घर जैसी इमारत में ही अवस्थित था।ये बहुत विशाल स्थान नहीं था किंतु विदेश की धरती पर अपने भगवान श्री सीताराम जी और श्री राधाकृष्ण जी की प्रतिमा और पूजा देख कर मन अच्छा हुआ और अत्यधिक आनंद की अनुभूति भी हुई।वहाँ जब मैं पहुँचा तो काफी लोग थे,हरे रामा,हरे कृष्णा, रामा रामा हरे हरे का कीर्तन चल रहा था।शाम होते होते पूजा,कीर्तन और आरती के पश्चात प्रसाद वितरण हुआ और फिर मैं भी वहाँ से निकल लिया।

सोहो एक भीड़ भाड़ वाला इलाका था।वैसे तो बताया कि इस इलाके में प्रसिद्ध संगीतज्ञ मोज़ार्ट जब लंदन आये तब रहे थे और टेलीविजन का आविष्कार भी इसी इलाके में हुआ था किंतु था ये इलाका अजीब सा।यहाँ कई थियेटर भी थे और बताया गया कि ये इलाका नाइट लाइफ के लिए काफी प्रसिद्ध है।इंग्लैंड के हर स्थान की भांति सोहो इलाके का भी एक इतिहास है।लगभग 400 साल पहले यहाँ फार्म थे या खेती होती थी फिर बसावट शुरू हुई।वहाँ की भीड़ में कई देशों के लोगों के चेहरे दिखाई पड़ रहे थे।चूँकि मैं काफी समय इस्कॉन मंदिर में बिता चुका था और अब रात सी हो चली थी तो मैंने अब अपने यूथ हॉस्टल की तरफ का रुख किया।

अगला दिन मेरी इस इंग्लैंड यात्रा का अंतिम दिन था क्योंकि उसके अगले दिन मेरी पेरिस,फ्रांस यात्रा की टिकट थी।जल्द ही मैं वापिस यूथ हॉस्टल में अपने बिस्तर पर था।अगला दिन जो मेरी इस इंग्लैंड यात्रा का अंतिम दिन होना था सो इस दिन मेरा विम्बलडन जाने का इरादा था।

अगले दिन फिर सुबह उठ कर और तैयार होकर मैं चल दिया अर्ल्स कोर्ट स्टेशन की तरफ. Earl's Court स्टेशन से मैंने ट्यूब की District line लेकर Wimbeldon की यात्रा शुरू की।विम्बलडन दरअसल लंदन के बिलुकल पास ही है या ये भी कहा जा सकता है कि लंदन का ही हिस्सा है।लंदन से विम्बलडन की दूरी लगभग 11-12 किलोमीटर की है।अर्ल्स कोर्ट स्टेशन से विम्बलडन स्टेशन लगभग 40-45 मिनट का समय लगा और शायद उस लाइन पर ये अंतिम स्टेशन था।विम्बलडन स्टेशन पर उतर कर विम्बलडन ग्राउंड के लिए मुझको लगभग 10-15 मिनट थोड़ा चढ़ाई के रास्ते पर पैदल चल कर जाना पड़ा।बाद में ये भी मालूम पड़ा कि विम्बलडन कोर्ट जाने के लिए सबसे नजदीक का स्टेशन Southfields था।

चूँकि मैं लगभग 10 वर्ष की उम्र से ही पढ़ाई के लिए दूसरे शहरों अर्थात इलाहाबाद और लखनऊ के स्कूलों/यूनिवर्सिटी में पढ़ा और हॉस्टलों में रहा इसलिए मैं लगभग सभी प्रकार के खेलों में हाथ आजमा चुका था अर्थात मैं अपने यहाँ खेले जाने वाले सभी खेलों में भाग लेता रहा था और ये भी सच है कि मैं किसी भी खेल में बहुत अच्छा खिलाड़ी कभी नहीं था।लॉन टेनिस उन खेलों में से रहा है जो मुझको शुरू से बहुत अच्छा लगता था और मैं खेलता भी था।उस समय के विश्व टेनिस चैंपियनशिप के प्रमुख खिलाड़ी आंद्रे अगासी,बोरिस बेकर,मार्टिना नवरातिलोवा,जेनिफर कैप्रियाती, स्टेफी ग्राफ और गैब्रिएला सबातीनी का मैं जबरदस्त फैन भी हुआ करता था।यद्यपि वो अक्टूबर का महीना था और विम्बलडन चैंपियनशिप जून आखिर और जुलाई में खेली जाती थी किंतु फिर भी मेरा मन उस स्थान को देखने का था जहाँ ये सितारे खिलाड़ी खेलते थे।टेनिस के शौकीनों के लिए विम्बलडन का वही महत्व है जो क्रिकेट प्रेमियों के लिए लॉर्ड्स के मैदान का।

जैसा कि हम सभी जानते हैं विम्बलडन विश्व में टेनिस की खेली जा रही 4 प्रमुख चैंपियनशिप खिताबों में से विश्व की सबसे पुरानी प्रतियोगिता है।ये आल इंग्लैंड क्लब,विम्बलडन,लंदन में ईस्वी सन 1877 से खेली जा रही है।ग्रैंड स्लैम कहे जाने वाले अन्य तीन खिताबों की प्रतियोगिताएं यानी कि ऑस्ट्रेलियन ओपन,फ्रेंच ओपन और यू ऐस ओपन इसके बाद शुरू हुईं।यही सब बातें सोचता हुआ पैदल चलते हुए मैं विम्बलडन ग्राउंड पर पहुँच गया।वहाँ कुछ बच्चे रैकिट लिए घूम रहे थे।कुछ लोग ग्राउंड पर कुछ काम कर रहे थे।सामने शानदार हरी घास का मैदान सेंटर कोर्ट था जिस पर अपने समय के महान टेनिस खिलाड़ी खेलते हैं।मैं काफी देर वहीं खड़ा होकर उस ग्राउंड को बस निहारता रहा और सहसा मुझको लगा कि मैं 1991 के Women’s singles final में स्टेफी ग्राफ और गैब्रिएला सबातीनी को खेलते देख रहा हूँ।स्टेफी ग्राफ की सर्विस और उस पर सबातीनी का जबरदस्त शॉट और दर्शकों का जबरदस्त शोर कि तभी विचार श्रृंखला और आगे बढ़ी और मुझको प्रतीत हुआ कि वहाँ सामने wimbledon Men’s final में बोरिस बेकर और माइकिल स्टिच खेल रहे हैं।हजारों लोगों की तालियों की गड़गड़ाहट के बीच स्टिच ने अपना विजयी शॉट मारा लेकिन तभी एक व्यक्ति ने आकर मुझसे पूछा कि क्या आप भारत से हैं और जैसे मेरी तंद्रा भंग हो गयी।मैं वहाँ लगभग 1 घंटे वहाँ रुका लेकिन फिर भी उस स्थान से मेरा मन नहीं भरा।आगे फिर कभी यहाँ मैच देखने आऊंगा ये सोचते हुए मैं वहाँ से लौट चला लंदन के लिए।

लंदन लौट कर मैं काफी देर बस ऑक्सफोर्ड स्ट्रीट पर घूमता रहा।एक दुकान से दूसरी दुकान कभी किसी कैफे में तो फिर सड़कों पर टहलना।ऑक्सफोर्ड स्ट्रीट खूब गहमा गहमी से भरा और बहुत जीवंत इलाका है।मेरा उस यात्रा का लंदन में वो आखिरी दिन था इसलिए मैं खूब देर तक इधर उधर घूमता रहा,थोड़ी देर को जाकर टेम्स नदी के किनारे टहलते हुए वहाँ के मनोरम दृश्यों का भी आनंद उठाता रहा।मन तो कर रहा था कि पूरी रात इसी माहौल का आनंद उठाता रहूँ लेकिन अगले दिन मेरी यात्रा के अगले पड़ाव यानी कि पैरिस,फ्रांस की फ्लाइट थी इसलिए मन मसोसते हुए मैं अपनी उस इंग्लैंड यात्रा की आखिरी रात बिताने को यूथ हॉस्टल के अपने पलंग पर वापिस आ गया था।

हाँलांकि लंदन की यात्रा पूरी हो चली थी और आगे पैरिस के किस्से हैं लेकिन उस से पहले मैं अपनी इंग्लैंड की अन्य यात्राओं के विषय में भी बताऊंगा और जब इंग्लैंड के किस्से हो जाएंगे तब पैरिस यात्रा की चर्चा करूंगा।

मेरी इस विदेश यात्रा के कुछ समय बाद मेरा एक्सपोर्ट का कारोबार ठीक से शुरू हो गया था किंतु उन घटनाओं के विषय में उपयुक्त समय आने पर लिखूँगा यहाँ तो बस इतना ही बताना चाहूँगा कि मेरी भविष्य की इग्लैंड यात्राओं में बर्मिंघम के बबली दा हैं,बीड़ी पीने वाले अंग्रेज और रेल के इंजन वाले अंग्रेज का किस्सा है तो उस जगह का किस्सा भी है जहाँ रेलवे स्टेशन से सिर्फ एक टैक्सी जाती थी,वो घटना भी है जब लंदन में मेरे छोटे भाई अभिनव बीमार हुए और डॉक्टर ने इंश्योरेंस होने के कारण ही इलाज को मना कर दिया और हाँ वो किस्सा भी है जब मेरा क्रेडिट कार्ड काम नहीं कर पाया और जेब में पर्याप्त पैसे नहीं थे।आपको ये सारी बातें बताऊंगा पैरिस के नजारों से पहले।

एक्सपोर्ट व्यापार हेतु ईस्वी सन 1991 में मेरे द्वारा बनवाया गया मेरी कम्पनी का ब्रोशर


Comments

  1. बेहतरीन ... बेहतरीन ! हमेशा की तरह !

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