बैंक घोटाले और बैंकिंग व्यवस्था

पंजाब नेशनल बैंक;नीरव मोदी,मेहुल चौकसी घोटाले की चारों ओर चर्चा है।यह कोई नई बात नहीं है इस सरकार में,पहले भी ललित मोदी,विजय माल्या आदि के उदाहरण हैं।देश की वर्तमान सरकार अथवा इसमें शामिल कुछ अति उच्च पदासीन लोगों की जानकारी और सहभागिता के बिना बार-बार ऐसे घोटाले हों और घोटालेबाज आराम से देश के बाहर जाकर ऐश करते दिखें और उनका कुछ न बिगड़े ऐसा कैसे संभव है?आज अब जनता भी इस विषय में काफी कुछ समझ चुकी है और ऐसे मामलों में सरकारी लोगों की मिलीभगत की आशंका से कोई इनकार नहीं ही कर रहा है ।ये एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय हैऔर इस विषय में विस्तार से फिर चर्चा करूँगा।
आज एक अन्य बात की ओर सबका ध्यान आकर्षित करना चाहता हूँ:-
1.कितनी बैंकों ने मुद्रा योजना के तहत वास्तविक जरूरतमन्दों को,बिना रिश्वत का एक भी पैसा लिए और बिना दलालों की भूमिका के,ऋण प्रदान किये हैं?
2.कितनी बैंकों ने मुद्रा योजना के तहत ऐसे जरूरतमन्दों को पचास हजार से अधिक के ऋण प्रदान किये हैं जिन्होंने उसी बैंक से किसी दूसरे खाते में पहले से ही ऋण नहीं ले रखा था किसी collateral के तहत?
3.मेरी जानकारी में बहुत से लोगों ने बताया कि बैंक के अधिकारी असलियत में वास्तविक जरूरतमन्दों/छोटे उद्यमियों को किसी भी सरकारी योजना के तहत बिना कोलैटरल सिक्योरिटी के ऋण नहीं ही देते हैं,कोई न कोई बहाना बना देते हैं।
4. कितनी बैंकों के हानि लाभ के खाते मात्र इसलिए लाभ दर्शा रहे हैं क्योंकि उनमें मेहनतकश लोगों और गरीब लोगों की रकमें जमा हैं और खास तौर से मिनिमम बैलेंस के रूप में??!!!

सही बात तो ये प्रतीत होती है कि देश के विकास को बाधित करने में भी इस प्रकार के बैंक कर्मचारियों/अधिकारियों की भी एक बड़ी भूमिका रही है जिसकी सही जाँच होनी अभी बाकी है।
बेरोजगार का रोजगार शुरू हो या ना हो,किसान ऋण के दवाब से मरता है तो मर जाये लेकिन अधिकतर बैंक अधिकारियों के चेहरे पर शिकन तक नहीं आती है (कुछ अपवाद हर क्षेत्र में हैं,बैंकिंग में भी हैं).
छोटे उद्यमियों का कारोबार तबाह हो तो हो जाये लेकिन इनको नीचे से लेकर ऊपर तक कहीं कोई फर्क नहीं किन्तु जो बड़े बड़े लोग हैं वो कितनी भी बड़ी गड़बड़ कर दें, बैंकों को और देश की अर्थव्यवस्था को कितनी भी चोट पहुँचा दें फिर भी बैंकों की कार्यप्रणाली उनकी मदद हेतु ऐसे ही तत्पर रहती है।
इसके लिए यदि एक तरफ बैंक के ईमानदार लोगों के दिल में बैठा ये डर उनको काम नहीं करने देता कि कुछ गड़बड़ हो गयी तो हमारा क्या होगा तो दूसरी ओर भ्रष्ट लोग वास्तविक जरूरतमंदों की मदद अपने कारणों से नहीं करते हैं जबकि बड़े घोटालेबाजों की मदद के लिए पूरी बैंकिंग प्रणाली हाजिर रहती है।उनके कागज पूरे हों या नहीं हों,उनके खाते नियमित न हों तो ये इधर से उधर करके खाते नियमित करा देते हैं अर्थात उनके लिए पूरी सहानुभूति रहती है और वास्तविक जरूरतमंदों के लिए आमतौर पर और रिश्वत के अभाव में लगभग पूरे तौर पर संवेदनहीनता ही देखने को मिलती है।
इस रोग का जड़ से इलाज करने हेतु एक तो बैंक कर्मियों को सही ट्रेनिंग देने की आवश्यकता है,ईमानदार बैंक कर्मचारियों/अधिकारियों को पूर्ण संरक्षण देने की जरूरत है तो दूसरी ओर इनके बेईमान और अकर्मण्य कर्मचारियों/अधिकारियों के गलत आचरण हेतु ज़ीरो टॉलरेंस की नीति रखनी होगी हाँलांकि इस सरकार की न तो कोई ऐसी नीति है और ना ही उनकी नियत ही ऐसी है।

Comments

  1. A very good an eye opening article on banking system in India ...... needs reform !!

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  2. अक्षरश:सही सर, बिना राजनैतिक मिली भगत के एक दोषी कैसे देश से भाग सकता है, पर क्या ये बात भोपाल गैस कांड के दोषी पर लागू होती है सर, इस पर आपका निष्पक्ष बिचार क्या है? ये सरकार इस बात के लिए जरूर कठघरे में खड़ी की जा सकती है कि 2014 से पहले जहाँ देश में गरीबी, बेरोजगारी, महगाई, भ्रष्टाचार, घोटाला.... आदि का जनता ने नाम नहीं सुना था आज ये शब्द हर जुबां पर है...

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