श्रीदेवी की मृत्यु की चर्चा:-क्या हम एक संवेदनाहीन समाज बन गए हैं???

श्रीदेवी की मृत्यु की चर्चा:-क्या हम एक संवेदनाहीन समाज बन गए हैं???

कल से सारे देश में प्रख्यात अदाकारा श्रीदेवी की असामयिक मृत्यु की चर्चा हो रही है।कल सारे संचार माध्यमों और सोशल मीडिया के तमाम प्लेटफार्मों पर श्री देवी की मृत्यु पर लोग अफसोस प्रकट कर रहे थे और अपने अपने तरीके से श्रद्वांजलि भी प्रस्तुत कर रहे थे और इस से लग रहा था कि सारा देश एक प्रसिद्ध हस्ती की इस तरह अचानक मृत्यु से चौंक सा गया और बहुत दुःखी है।ये उस अभिनेत्री के प्रति सम्मान प्रकट करने के साथ ही हमारे देश की जनता कितनी भावुक और भावनात्मक है इस बात का भी परिचायक था।

लेकिन आज सुबह से फ़िज़ा कुछ बदली बदली सी लगी।सारे टीवी चैनल,सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफार्मों पर श्री देवी की मृत्यु क्यों और कैसे हुई इसकी चर्चा शुरू हो गयी थी।कुछ लोग इसका कारण दिल का दौरा पड़ना बता रहे थे तो कुछ लोग श्री देवी को 54 साल की उम्र में भी उम्र से काफी कम दिखें इसके लिए उनके द्वारा निरन्तर किये जा रहे प्रयास और ली जा रही दवाइयों को बता रहे थे।दोपहर होते होते चर्चा शुरू हो गयी कि उन्होंने कई किस्म की कॉस्मेटिक सर्जरी करवाई थीं वो और पतले रहने की दवाइयां लेती थीं जिसका दुष्प्रभाव उनकी मृत्यु के रूप में हुआ।शाम होते होते समाचारों ने एक और मोड़ ले लिया कि उनकी मृत्यु शराब पीने की वजह से बाथरूम के बाथटब में गिर कर डूब जाने से हुई।

अब इन सभी मुद्दों पर असंख्य समाचार चैनलों में सबसे तेज और सबसे आगे रहकर “नया कुछ” बताने और पेश करने की होड़ लग गयी और इसी सब के आधार पर सोशल मीडिया पर भी विभिन्न प्रकार की मीमांसा शुरू हो गयी।किसी ने उनकी मृत्यु को संदिग्ध बताना शुरू किया तो कोई उसके तार उनके पति के भारत आने और फिर वापिस दुबई आने से जोड़ रहा था तो कोई इसमें बोनी कपूर की पहली पत्नी की मृत्यु उनके पुत्र की फ़िल्म रिलीज़ होने से पहले हो जाने की पुनरावृत्ति की किस्म से जोड़ रहा था।मतलब ये है कि जितने मुँह उतनी बातें होने लगीं।

मेरा आज यह आलेख लिखने का मंतव्य यह है कि माना कि श्री देवी एक सेलिब्रिटी थीं,माना कि उनका परिवार भी एक सेलिब्रिटीज़ से भरा हुआ परिवार है किंतु एक और पहलू भी तो है कि वो भी एक इंसान थीं।उनके भी पति और बच्चे तथा रिश्तेदार नातेदार हैं।क्या टीवी और सोशल मीडिया का मतलब यह है कि किसी की लाश रखी है,उसकी दो मासूम और  दुःखी बेटियां हैं और सारे संचार माध्यम बिल्कुल संवेदना शून्य होकर यह चर्चा करने लगें कि वो नशा करती थीं अथवा नहीं करती थीं…..
वो शराब पीती थीं अथवा नहीं पीती थीं…..
कुछ चैनल तो इतने आगे निकल गए कि उन्होंने श्री देवी के एक करीबी और बहुत बड़े व्यक्ति का इंटरव्यू भी दिखा दिया जिसमें कहा जा रहा था कि वो शराब नहीं पीती थीं लेकिन शायद वाइन पीने की बात कही गयी.......
जरा एक सामान्य भारतीय होने के नाते सोचिये कि एक दिवंगत व्यक्ति वो भी महिला जिसका शरीर अभी रखा है,अंतिम संस्कार भी नहीं हुआ है,जिसकी दो छोटी बेटियां हैं उनके मन पर यह सब सुन कर क्या गुजर रही होगी???
क्या यही हमारी संस्कृति और संस्कार हैं जिन पर हम गर्व करते हैं???
क्या किसी मृतक और उसके  गमजदा परिवार के लिए इस प्रकार की बातें शोभनीय हैं???
क्या टीवी,मीडिया और सोशल मीडिया को इस स्तर तक ऐसा करना सही है???

बात सिर्फ श्री देवी की ही नहीं है।कुछ वर्ष पीछे चलिए,एक अबोध बालिका की हत्या हुयी थी नोएडा में,जी हाँ बिल्कुल सही पहचाना आपने,मैं आरुषि की ही बात कर रहा हूँ।शायद ही कोई देशवासी होगा जो आरुषि की हत्या से दुःखी नहीं हुआ होगा और जिसका हृदय काँप नहीं गया होगा.....

लेकिन याद है टीवी मीडिया पर क्या-क्या नहीं चला था???
एक किस्म से अप्रत्यक्ष रूप से ही सही लेकिन उस बेचारी दिवंगत बच्ची के चरित्र को तार तार करने का प्रयास हुआ था या नहीं???
क्या वो सही था???
उस केस की जैसे चर्चा हुई थी मुझको अच्छी तरह से याद है कि कई अबोध बच्चियां डर गयीं थीं कि क्या बच्चों के खुद के माँ बाप भी उनको खुद ही मार सकते हैं???
जरा सोचिए इस किस्म की गैर जिम्मेदाराना तरीके से रिपोर्टिंग करने और चर्चा का कितने बड़े स्तर पर और कितना गलत प्रभाव पड़ता है......
क्या इस प्रकार की बातें हम किसी के लिए भी और किसी भी स्तर पर जाकर करें और उसमें कुछ भी गलत नहीं है???
समाचार पत्र,टीवी चैनल,सोशल मीडिया कोई यह सोचना ही नहीं चाहता कि उनकी इस प्रकार की बातों का समाज पर और संबंधित परिवार के सदस्यों पर कितना दूरगामी और कितना बुरा असर पड़ता है…..
क्या हम लोग इतने संवेदनाहीन और भावशून्य हो गए हैं कि हमको उस मासूम आरुषि के विषय में,जिसने अभी दुनिया को ठीक से देखा भी नहीं था,कुछ भी कह दें,कुछ भी बोल दें,कुछ भी लिख दें लेकिन हमारी जुबान लड़खडायेगी नहीं???
हमारी कलम कांपेगी नहीं?????हमको एक बार भी नहीं प्रतीत होगा कि वो मासूम बच्ची अपनी कातर निगाहों से हम सब को देखते हुए पूछ रही है कि मैं तो आपकी बच्ची की तरह थी फिर भी आप लोगों ने ऐसे मिर्च मसाला लगा कर मेरी हत्या की चर्चा की…....
आखिर क्यों??????

जरा सोचिए इस विषय में…...

जरा सोचिए श्री देवी जिनकी प्रशंसा का पुल बांधते कल से हम लोग थक नहीं रहे थे आज हम यह चर्चा करने पर उतर आए कि वो शराब पीती थीं.....
कि वो नशा करती थीं.......
अथवा अन्य इसी किस्म की बातें…....

जरा सोचिए कल आपको श्री देवी की मासूम बिटिया मिल जाये और आपसे पूछ बैठे कि क्या उसकी माँ का कसूर यह था कि वो एक सेलिब्रिटी थीं???

क्या इसीलिए उनके लिए कोई भी,कुछ भी,कहीं भी कह देगा???

अरे अपने देश के संस्कार तो यह हैं कि लोग मरने के बाद अपने शत्रु तक की बुराई न करके प्रशंसा करते हैं....

लेकिन ये आज हमें क्या हो गया है???

ये हम क्या करने लगे हैं?????

आप जो लोग मेरा यह आलेख पढ़ें उनसे मेरा अनुरोध यही होगा कि यदि वो मेरे उठाये प्रश्न से यदि सहमति रखते हैं तो इस बात को पूरे जोर से उठाइये जिस से हमारे चरित्र का यह पतन यहीं रुक जाए।इस प्रवृत्ति का विरोध करिये ताकि हमारे शालीन संस्कार बने रहें और टीवी चैनल,सोशल मीडिया सभी प्लेटफॉर्मों से सम्बंधित लोग कुछ भी प्रकाशित/प्रसारित/प्रचलित करने के पहले उस बात को मानवीय मूल्यों और अपने देश के संस्कारों की कसौटी पर तौल लें और तभी उस बात को आगे बढ़ाएं।पश्चिमी सभ्यता के अंधानुकरण से कुछ लाभ नहीं होगा....

सच लोगों के सामने अवश्य लाएं,लाना भी चाहिए किन्तु घटना से प्रभावित लोगों की भावनाओं और अपने प्रस्तुतीकरण के दूरगामी परिणामों को देखते हुए बहुत संवेदनशील होकर बड़ी जिम्मेदारी के साथ ही ऐसा करना चाहिए।

Comments

  1. धन्यवाद,अतुल। आप बिलकुल सही हैं। हम पश्चिम का अन्धानुकरण नहीं कर रहे हैं,बल्कि Freedom of Expression के नाम पर हम गर्त में जा चुके हैं। आपको याद होगा कि Princess Diana के असामयिक देहान्त को पश्चिमी मीडिया ने कितनी शालीनता से प्रस्तुत किया था। मुझे लगता है celebrities के लिये हमारे समाज में जबर्दस्त ईर्ष्या है जो कोई मौका मिलते ही अपने शिकार पर खूँखार जानवरों की तरह टूट पड़ता है। जय हिंद ।

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  2. बिल्कुल सही लिखा अतुल बाबू ... एक उचित शुरुआत ! और सलाह भी वो कि जो हुआ सो हुआ आगे के लिए जनमानस चेते !!

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    1. धन्यवाद,संदीप भाई

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  3. बिल्कुल सही कहा अतुल, हमारी संवेदनहीन पीत खोजी पत्रकारिता जो केवल समाज मे सेंसेशन फैलाने और TRP पाने के लिए ही कार्य करती है कि वजह से ही बहुतायत संवेदनशील मुद्दे बस एक चटकारे और मसालेदार न्यूज़ ही बन कर रहजाते है। मुख्य बिंदु से परे असामाजिक और बेहद निजी मुद्दों पर अपना रुख चिल्ला चिल्ला कर बताना ही बस आज की पत्रकारिता रह गया है। पत्रकार (न्यूज़ और मीडिया दोनों) लगता है अपना समाज के प्रति सोशल दायित्व भूल ही बैठे है जो हमेशा सर्वोपरि होना चाहिये ।।
    इस मुद्दे को उठाने के लिए आप का आभारी हूँ,जनमानस का ध्यान इस संबंध में उठाना चाहिए। पत्रकारिता में भी एक जनजागरण की बेहद सख्त जरूरत है ।।
    प्रेम सहित,
    आपका
    आनन्द बाली

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