दादाजी बनारसी दास जी का पत्र बाबा सुशील चंद्र जी को
आज बाबा स्व0 सुशील चंद्र जी के पुराने कागजों को व्यवस्थित करने के क्रम में एक और अनमोल खजाना हाथ लगा.इसमें दादाजी स्व0 बनारसी दास जी का एक पत्र,एक लेख और उनसे सम्बन्धित अखबार में छपी एक खबर की कटिंग है.
दादा जी बनारसी दास जी और मेरे बाबा सुशील चन्द्र जी लगभग हमउम्र थे और उनमें कौन बड़ा है और कौन छोटा इस पर चर्चा चलती रहती थी.नीचे दादा जी से सम्बंधित पत्रादि की फोटो लगा रहा हूँ:-
1.दादा जी ने बाबा सुशील चन्द्र जी को पत्र लिखा है,उस समय दादा जी राज्यसभा के सदस्य 'सांसद' थे और 1962 के इस पत्र में वो लिख रहे हैं कि उनके राजधानी में बन्दी रहने के अब दो वर्ष और 23 दिन ही बचे हैं अर्थात उनके राज्यसभा के सदस्य के रूप में उनका दूसरा कार्यकाल समाप्त होने के जो 23 अप्रेल 1964 को पूरा हो रहा था.उन्होंने यह भी लिखा है कि उनका दिल वहाँ नहीं लगता है.यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि जब नेहरू जी ने उनसे राज्यसभा का सदस्य बनाने का प्रस्ताव रखा था तो दादा जी ने कहा था कि "लेकिन मैं अपना दोपहर का सोना नहीं छोडूंगा" और ऐसा ही हुआ भी.दादा जी ने बाबा के 'बापू' और 'बिनोवा जी' के विचारों के पालन की बात भी लिखी थी. ऐसे निस्पृह भाव वाले लोग थे वो.
2.दूसरी फोटो अखबार की उस कटिंग की है जिसमें 25 जनवरी सन 1973 को दादा जी बनारसी दास जी को पद्मभूषण से सम्मानित किए जाने का समाचार है.
3.तीसरी फोटो दादा जी के 1939 में लिखे और प्रकाशित हुए एक लेख की है जिसमें दादा जी ने फ़िरोज़ाबाद शहर के विकास के प्रति अपने विचार बताए हैं.यह तो लगभग सभी जानते हैं कि फ़िरोज़ाबाद की सफाई व्यवस्था और इसके विकास हेतु दादाजी न सिर्फ बहुत चिंतित रहते थे अपितु सदैव इसके लिए अपने तरीकों से प्रयत्नशील भी रहते थे.उपरोक्त 1962 में लिखे इस पत्र के साथ ही दादा जी ने 1939 के इस लेख को भी बाबा को भेजा था;पत्र में इस बात का शुरुआत में ही जिक्र है.
जिन लोगों की इतिहास में,शहरों के विकास में रुचि है और जिनका दादाजी बनारसी दास जी,बाबा सुशील चंद्र जी 'महाराज जी' और फ़िरोज़ाबाद से सम्बन्ध है या रहा है,ये पोस्ट शायद उनको रुचिकर लगेगी.
अतुल चतुर्वेदी,
दिनांक 3 मार्च 2019
रविवार
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