इलाहाबाद विश्वविद्यालय:चिंताएं और सुझाव

इलाहाबाद विश्वविद्यालय:चिंताएं और सुझाव

इलाहाबाद विश्वविद्यालय देश के आधुनिक समय के प्राचीनतम शिक्षण संस्थानों में एक अलग स्थान रखता है.इस विश्वविद्यालय का एक गौरवपूर्ण अतीत रहा है.अभी कुछ समय पहले मैंने फेसबुक पर अपने इस विश्वविद्यालय के विषय में एक आलेख पढा जिसमें इसके उसी गौरवपूर्ण अतीत की चर्चा की गयी थी और इसकी वर्तमान स्थिति पर चिंता भी व्यक्त की गयी थी.मैं स्वयं को सौभाग्यशाली समझता हूँ कि मैं इस विश्वविद्यालय का छात्र रहा और मेरे लिए यह भी एक उल्लेखनीय और गर्व की बात है कि मैं अपने परिवार की चौथी पीढ़ी का सदस्य था जो लोग लगातार पीढ़ी दर पीढ़ी इसी विश्विद्यालय के छात्र रहे.पीढ़ी दर पीढ़ी परिवार के अनेकों सदस्यों के अलावा मेरे बाबा के चाचा दीवान बहादुर जानकी प्रसाद जी ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से M.A.(English) और LLB की डिग्री ली,मेरे बाबा स्व0 सुशील चंद्र जी ने B.Sc.और LLB,मेरे पिताजी श्री अशोक चंद्र चतुर्वेदी जी ने M.A.(Med.History) और मैंने स्वयं M.A. (Mod.History) की डिग्री ली.अपने इस पारिवारिक पुश्तैनी रिश्ते को मैं यहीं तक कायम रख पाया क्योंकि मेरी सन्तानों ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से पढ़ाई नहीं की.

इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के पुरा छात्रों और वर्तमान छात्रों से तथा फैकल्टी के सदस्यों से भी मेरा अक्सर सम्पर्क होता है और सभी बातों में अधिकतर विश्वविद्यालय की खराब होती जाती दशा और दिशा पर लोग चिंता व्यक्त करते हैं.मैंने भी इस विषय में काफी सोचा और कुछ बातें मेरे मन में आयीं जो आप सबसे इस पोस्ट के माध्यम से शेयर कर रहा हूँ.इसमें बहुत सी बातें भावुकता का समावेश लिए हुए भी हैं किंतु असलियत में ये सब उस सोच का नतीजा हैं जो  देश के इस अद्वितीय संस्थान से जुड़े हुए लोग अपनी इस मातृ-संस्था के विषय में सोचते हैं.

जब इलाहाबाद विश्वविद्यालय की स्थापना हुयी थी तो इसका उद्देश्य देश के नौजवानों को आधुनिकतम शिक्षा प्रदान करना था और वो आधुनिकतम शिक्षा तत्कालीन वैश्विक संदर्भ में थी तभी इस विश्विद्यालय को Oxford of the East भी कहा गया (ना कि आधुनिक नालन्दा या तक्षशिला).चूँकि यह विश्विद्यालय भारत के सर्वश्रेष्ठ शिक्षण संस्थानों में से था और इसमें उस समय के सर्वश्रेष्ठ शिक्षक भी थे तो सारे देश से सर्वश्रेष्ठ शिक्षा पाने की इच्छा रखने वाले विद्यार्थी भी यहीं आते थे.उस समय देश के विकास और देश को चलाने के लिए सबसे अधिक आवश्यकता कुशल प्रशासकों की थी जो इस विश्वविद्यालय से हर वर्ष भारी मात्रा में भारतीय सेवाओं के लिए मिल जाते थे.चूँकि सारे देश से बेहतरीन छात्र यहाँ आ रहे थे तो सिर्फ प्रशासन ही नहीं अपितु स्वतंत्रता के संघर्ष,शिक्षा,विज्ञान,कानून आदि सभी क्षेत्रों में इस विश्वविद्यालय के छात्रों ने अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया और हर क्षेत्र में अपना उल्लेखनीय योगदान भी दिया.इलाहाबाद विश्वविद्यालय की ये स्थिति स्वतंत्रता के बाद और बेहतर हुई और लगभग 1970 के दशक तक कायम रही.

मुझको ऐसा लगता है कि यद्यपि देश प्रगति कर रहा था किंतु कई क्षेत्रों में वास्तविक प्रगति अपेक्षित गति से नहीं हो पा रही थी और शिक्षा और इससे जुड़े चातुर्दिक विकास का क्षेत्र भी उसमें से एक रहा है.इसका बहुत बड़ा खामियाजा इलाहाबाद विश्वविद्यालय को भी भुगतना पड़ा.समय बदल चला था और अब देश के विकास में सिर्फ नौकरशाही का ही रोल नहीं रह गया था;दूसरी ओर अन्य संस्थानों की भांति नौकरशाही का भी चारित्रिक पतन शुरू हो चला था.कारण अनेक थे किंतु एक जो प्रमुख गड़बड़ हुई वो यह थी कि इलाहाबाद विश्वविद्यालय की प्रमुख विशेषताओं में से जो एक थी;देश की नौकरशाही में लगभग मोनोपली जैसा होना उसमें दिल्ली विश्वविद्यालय और जेएनयू सेंध लगा चुके थे और इसलिए धीरे-धीरे 1980 के दशक से देश भर के अच्छे छात्र जो उच्च शिक्षा हेतु इलाहाबाद आते थे उनमें से काफी कुछ दिल्ली भी जाने लगे और फिर आगे चल कर स्थिति ऐसी हो चली कि इलाहाबाद खुद के बहुत से बच्चे भी दिल्ली का रुख करने लगे.सोचने की बात यह है कि चूक कहाँ हुयी?

मेरा मानना है कि सबसे बड़ी चूक समय के साथ न चल पाने की रही.देश में कई संस्थान ऐसे हो चले थे जो कि सिविल सर्विसेज और अन्य सरकारी नौकरियों के लिए योगदान देने लगे थे.यही समय था जब कि इलाहाबाद विश्वविद्यालय के लोगों को सोचना था कि अब आगे हमारा रोल क्या हो क्योंकि सरकारी नौकरियों के लिए तो अब बहुत संस्थान हो चले?जब देश को जरूरत थी तब इलाहाबाद ने बहुत अच्छे और काबिल नौकरशाह,नेता और वकील आदि दिए लेकिन अब देश को स्वतंत्र हुए बहुत वर्ष हो चले,दुनिया ग्लोबलाइज़ हो चली तो भारत की अग्रणी शिक्षण संस्था का भी रोल तो परिवर्तित होना चाहिए जिस से वो इस नए भारत में,नए वैश्विक संदर्भों में अपने अग्रणी होने की प्रासंगिकता कायम रख सके. इलाहाबाद विश्वविद्यालय से जुड़े लोगों और इसके शुभचिंतकों को यह सोचना ही होगा कि अब ऐसा क्या किया जाए कि हमारे विश्विद्यालय और इसके छात्रों का देश को योगदान अग्रणी नेतृत्वकर्ता के रूप में फिर से जारी रहे.मेरा मानना है कि एक तो तमाम अंतर्राष्ट्रीय शैक्षिक संस्थानों की भांति इलाहाबाद विश्वविद्यालय भी अपने पुरा छात्रों को प्रेरित करे,उनसे अपील करे कि विश्वविद्यालय में वो एक तो आर्थिक सहयोग करें,दूसरे कुछ विषयों में प्रोफेसरों के लिए ‘चेयर’ की स्थापना और स्पांसरशिप करें जिस से हमारे विश्वविद्यालय में विभिन्न विषयों के विश्व के सर्वश्रेष्ठ शिक्षकों का आवागमन प्रारम्भ हो.दरअसल हमारे यहाँ शिक्षकों की नियुक्ति की जो प्रणाली है उसमें जो नियम हैं उनके कारण इसमें भी एक किस्म की नौकरशाही जैसा सिस्टम हो जाता है,मेरी उस पर कोई टिप्पणी नहीं है लेकिन इस ‘चेयर सिस्टम’ से हम विश्व के सबसे अच्छे शिक्षक अपने यहाँ उपलब्ध करा सकते हैं.दूसरे अब हमको सिविल सर्विसेज प्रोडक्शन फैक्ट्री की मानसिकता से निकल कर यह सोचना होगा कि आज के वैश्विक परिदृश्य में देश की जरूरतें क्या हैं? आज यह सोचने का वक्त आ गया है कि इतने गौरवमय प्राचीन अतीत के बावजूद भी आज हमारे देश का साइंस,अंतरिक्ष विज्ञान,मेडिसिन, अर्थशास्त्र, भौतिकी आदि किसी में भी विश्व में वो सम्मानजनक स्थान नहीं है जैसा प्राचीन काल में था और अब भी होना चाहिए था जबकि हमारे देश के ही लोग जब विदेश पहुँच जाते हैं तो इन्हीं क्षेत्रों में कमाल करने लगते हैं जैसे डॉ0 हरगोविंद खुराना,अमर्त्य सेन,कौशिक बसु,कल्पना चावला आदि अनेकों नाम हैं.हमारे देश पर सी0वी0 रमन,जगदीश चन्द्र बोस,रामानुजन जैसी विरासतें तो हैं पर वर्तमान में परिदृश्य बहुत अच्छा नहीं है.बस ऐसी परिस्थिति में ही भारत की इस अग्रणी शिक्षण संस्था की जिम्मेवारी और बढ़ जाती है देश के विकास को अगले स्तर में ले जाने में अपना योगदान देने की.इसके लिए हमको अपने विश्वविद्यालय में शोध का स्तर अंतर्राष्ट्रीय मानदंडों का करना होगा अर्थात ऐसे शोध जिनका विकास में योगदान हो;वो शिक्षा और शोध जो सकारात्मक रूप से परिणामजनक हों,परमाणु विज्ञान के क्षेत्र में शोध हो, मेडीसिन के क्षेत्र,भौतिकी,रसायन शास्त्र, अंतरिक्ष विज्ञान,आर्थिकी,पब्लिक पॉलिसी और साथ ही साथ साहित्य,इतिहास,पुरातत्व आदि क्षेत्रों में भी.एक तरफ देश को शक्तिशाली बनाने में सक्रिय योगदान हो तो दूसरी ओर कुपोषण,भुखमरी को दूर करने में भी.एक ओर ऑर्गन ट्रांसप्लांट के क्षेत्र में काम हो तो दूसरी सबको शुद्ध पेयजल कैसे मिले इस दिशा में भी सक्रिय शोध और सक्रिय योगदान भी हो.यदि एक तरफ अंतरिक्ष विज्ञान विषयक पढ़ाई हो तो दूसरी ओर ग्रामीण क्षेत्रों के दूर दराज इलाकों में लोगों को स्वास्थ्य सुविधा और बेहतर तरीके से कैसे पहुँचे इस पर भी शोध हो.मेरा कहने का आशय यह है कि सारा देश और देश के छात्र यह सोचने पर मजबूर हो जाएं कि सरकारी नौकरी तो बहुत से स्थानों पर पढ़ कर मिल जाएगी किन्तु देश के विकास में  विशेष योगदान हेतु शिक्षा इलाहाबाद विश्वविद्यालय में ही प्राप्त हो सकेगी.आज भी इलाहाबाद विश्वविद्यालय में काबिल लोगों की कोई कमी नहीं है और मेरा मानना है कि यदि वो सब लोग एक जुट होकर अपनी सकारात्मक ऊर्जा इसके विकास हेतु लगाएं तो वो दिन दूर नहीं होगा कि अमेरिका और यूरोप के लोग भी अच्छी शिक्षा हेतु इलाहाबाद विश्वविद्यालय में प्रवेश की इच्छा रखने लगेंगे.

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