Sindbad Travels-31 Switzerland-3 Nyon,Tasch & Zermatt

Sindbad Travels-31

Switzerland-3

Nyon, Montreux,Tasch,Zermatt

सिंदबाद ट्रैवल्स-31

स्विट्जरलैंड-3

न्यों,मोन्त्रो,टाख,ज़रमाट

ये 13 अक्टूबर 1991 की सुबह थी और मैं अतुल भैया के पुत्र यश और अतुल भैया के मित्र कानपुर वाले भार्गव जी निकल लिए थे आज स्विट्ज़रलैंड घूमने को अतुल भैया के साथ,उनकी लाल रंग की टोयोटा कोरल्ला कार से जिसका नम्बर था  GE 8.36 और चूंकि वह राजनयिक पोस्टिंग वाले व्यक्ति ( यानी अतुल भैया) की कार थी तो उसकी नम्बर प्लेट पर नीले रंग की बैक ग्राउंड पर सफेद से CD भी लिखा हुआ था साथ ही नम्बर प्लेट के नीचे बम्पर पर सफेद रंग की बैक ग्राउंड पर काले रंग से CH भी लिखा था जो शायद यह बताता था कि यह कार स्विट्ज़रलैंड की है.कार लेफ्ट हैंड ड्राइव होनी ही थी,आगे ड्राइविंग सीट पर स्वाभाविक रूप से अतुल भैया ही थे और उनके बगल की सीट पर उनके मित्र भार्गव जी और पीछे की सीट पर अतुल भैया का लगभग 11-12 साल का बेटा यश और मैं थे.कार काफी आरामदायक थी ही बैठने में तो इस प्रकार से हम लोगों की यात्रा घर से लगभग 10-साढ़े दस बजे सुबह शुरू हुयी होगी और जैसे ही हम लोग मोटर वे पर आए तो दोनों तरफ मनमोहक दृश्य शुरू हो गए.दोनों ओर हरियाली,पेड़,पौधे,बीच में कभी-कभी चॉकलेट टॉप के झौंपड़ीनुमा मकान और इन सबके बीच चौड़ी बढ़िया सड़क पर, जिस पर काफी कम ट्रैफिक था,हमारी गाड़ी तेज स्पीड में दौड़ी जा रही थी.अपनी आदत से मजबूर मेरा मन भी फिर पहुँच गया था वापिस अपने वतन हिंदुस्तान की सरज़मी  की सड़कों पर और मैं सोच रहा था कि अब (1991 में)हमारे यहाँ डबल लेन सड़कों का बनना शुरू हो गया है,मथुरा से दिल्ली की सीमेंट की बनी सड़क जो काफी पहले की बनी हुयी थी और उस समय की देश की बेहतरीन सड़कों में थी, हम लोगों को बहुत अच्छी लगती थी किन्तु यूरोप की सड़कें और उन पर चलने वालों का अनुशासन काबिले तारीफ था.मेरे मन में एक ख्वाब सा आ रहा था कि क्या हमारे यहाँ की सड़कें भी कभी ऐसी शानदार होंगी?क्या हमारे यहाँ भी कभी सड़क यात्रा इतनी आसान हो सकेगी?आज जब मैं यह संस्मरण लिख रहा हूँ(25 जुलाई 2019) तो मुझको अत्यंत गर्व की अनुभूति हो रही है कि हाँ, हमारे देश में भी आज अच्छी सड़कें हैं और बनती जा रही हैं,एक्सप्रेस वे भी हैं जो अति आधुनिक हैं लेकिन हाँ हमारे यहाँ आज भी लोगों को ट्रैफिक के नियमों का न तो पूरा ज्ञान है और न ही उनके पालन करने के प्रति सजगता जिसके कारण दुर्घटनाओं की संख्या बहुत है.मेरे विचारों की दौड़ को ब्रेक लगा जब गाड़ी रुकी और अतुल भैया ने बताया कि हम लोग Nyon न्यों शहर आ गए हैं.

न्यों स्विट्ज़रलैंड के वॉड(Vaud) कैंटन के न्यों जिले में ही स्थित एक नगरपालिका (Municipality)है.यह जिनेवा से लगभग 25 किलोमीटर उत्तर पूर्व में स्थित है.न्यों के को-ऑर्डिनेट्स 46° 23'N/6°14'E हैं.यह खूबसूरत कस्बा लेक जिनेवा के किनारे पर बसा हुआ है.इसका जुड़वां कस्बा न्यों फ्रांस में भी है.यह एक पुराना और ऐतिहासिक कस्बा है.यहाँ के प्रसिद्ध गिरजाघर Castle of Nyon की चर्चा सबसे पहले ईस्वी सन 1272 के समय की मिलती है किंतु यह किला उस से भी पुराना है.यद्यपि ये कैसल हमने बाहर से ही देखा किन्तु सफेद रंग के दीवारों वाले कैसल जिसमें चॉकलेट रंगी लकड़ी की दरवाजे नुमा शीशे लगी खिड़कियां,लाल खपरैल की सी झौंपड़ीनुमा छत और सामने किले की दीवार में ही बनी दो गोल और ऊपर को नुकीली होती गयी ये मीनारें उस कैसल को 1991 में भी एक भव्य रूप प्रदान कर रही थीं और मुझको याद आ रहे थे दिल्ली के कुतुब कॉम्प्लेक्स में पड़े हमारे प्राचीन काल की इमारतों के अवशेष जो यह बताने को काफी थे कि हमारे देश की प्राचीन काल की इमारतें भी यदि आक्रमणकारियों द्वारा ध्वस्त न की गयी होतीं तो हमारी वो विरासत भी इस से कहीं कमतर नहीं थी और हमारी मध्ययुगीन इमारतों जैसे लाल किला, राजस्थान के किले आदि की भव्यता भी कहीं किसी से कम नहीं है.

मुझको यह जानकर बहुत आश्चर्य हुआ कि सन 1322 में यहाँ न्यों में Municipal Government बन गयी थी और इस से मुझको प्राचीन भारत के गणतंत्र और वैशाली के जनपदों का इतिहास याद आने लगा.न्यों का गिरजाघर भी बहुत प्रसिद्ध है.हम लोग झील के किनारे रुके थे.न्यों शहर के लेक जिनेवा के किनारे के सुंदर प्रौमनेड (Promenades) यानी कि टहलने/विचरण करने के गलियारे अपनी सुंदरता के लिए बहुत विख्यात हैं. झील के किनारे से झील में थोड़ा अंदर की तरफ जा सकें इसके लिए वहाँ किनारे से 8-10फीट लम्बे और लगभग 4 फीट चौड़े चबूतरे-गलियारे से बने हुए थे जिनके किनारे लोहे की रेलिंग थीं और फर्श लकड़ी का था.पर्यटक इस पर चलकर झील के और अंदर एवं पास जाकर आनन्द ले सकते थे;हमने भी लिया.अब इस जगह के दृश्य हिंदी फिल्मों में काफी दिखते हैं.झील के किनारे पत्थर की ईंटों की दीवार जिनसे झील का पानी टकरा कर एक मनोरम दृश्य पैदा करता था और फिर इन गलियारों या आधे बने पुलों से झील के पानी के ऊपर चहलकदमी करना,सामने सुंदर पहाड़ियां, हरियाली,झील में किलोल करते पक्षी, मोटरबोट पर खड़े होकर अकेला झील में सैर करता एक व्यक्ति,झील के जल के चारों ओर हरियाली,सामने कुछ हरियाली युक्त पहाड़ तो उनके पीछे कुछ पथरीले पहाड़ और उनके भी पीछे सफेद हिमाच्छादित पर्वत जैसे जीवन के तीनों कालों;बचपन,जवानी और वृद्धावस्था का फलसफा बयान कर रहे हों और ऐसे माहौल के बीच फोटो खींचते हम लोग;बहुत ही गजब का अनुभव था.सब कुछ एक फिल्मी स्वप्न जैसा लग रहा था.कुछ लोग वहाँ अपने परिवारों के साथ जिसमें बुजुर्ग और छोटे बच्चे भी थे इस स्थान का आनन्द ले रहे थे और मेरा मन कह रहा था कि क्या ही अच्छा होता यदि ऐसे मनोरम स्थल पर मेरे साथ भी मेरे मम्मी,पापा,भाई अभिनव,बहन अर्चना-डॉक्टर साहब,मेरी अर्धांगिनी रचना,बेटा अर्पित,ईशा और ईशान भी होते.जब थोड़ी बून्दा-बांदी शुरू हुयी तो मुझको अपना ज़्यूरिख से खरीदा नीला शानदार छाता याद आया और यह भी याद आया कि ज़्यूरिख में ही बारिश बन्द होने पर उसी दुकान के सामने जब मैंने छाता बन्द किया तो वो टूट गया था और दुकानदार ने कोई सुनवाई नहीं की थी.मुझको उस महंगे छाते के टूटने का अफसोस था किंतु ज़्यूरिख जैसे वैश्विक शहर में भी ऊँची दुकान और फीके पकवान होते हैं यह जानकर अफसोस मिश्रित प्रसन्नता के भाव भी हृदय में आये थे.मैं यह सब सोच रहा था कि तभी विचारों की यात्रा अतुल भैया के कार में बैठने को कहने से रुकी और हम लोग चल पड़े आगे के सफर में.




हमारी कार लगभग 130-140 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार से सड़क पर फर्राटे से चली जा रही थी किन्तु यदि कार का स्पीडोमीटर न देखें तो रफ्तार मालूम नहीं होती थी.अब इस रास्ते पर कई और कार भी दिख रही थीं,मेरे कहने का आशय है कि इस सड़क पर अच्छा ट्रैफिक था.ऊँचे-नीचे, घुमावदार रास्ते पर हर और निगाह डालने पर हरियाली ही नजर आ रही थी जो कहीं कहीं सूर्य की रोशनी के कारण पीली-सुनहरी भी प्रतीत होती थी.सड़क के किनारे पर लोहे की रेलिंग लगी थी जैसी अब हमको (2018-19 में) अपने यहाँ बने एक्सप्रेस वे में देखने को मिलती है.दोनों ओर पहाड़ और बीच में सड़क जिसकी रेलिंग के सहारे चलती झील एक अद्भुत ही दृश्य उत्पन्न कर रहे थे.लगभग आधा घंटे के सफर के बाद जिसमें हमने एक लंबी सुरंग भी पर की थी, अतुल भैया ने मोटर वे से गाड़ी बाहर ली और अब हम लोग आज के अपने दूसरे पड़ाव पर पहुँच गए थे.

यह कुछ बड़ा सा शहर था.चौड़ी सड़कें,बड़ी गाड़ियां,करीने से सड़क किनारे लगे लंबे लंबे वृक्ष,शानदार इमारतें इस शहर की भव्यता का बखान कर रही थीं.बाएं हाथ पर बनी एक विशाल इमारत जिस पर Le Montreux Palace लिखा था उसको पार करते हुए एक बहुत अच्छी पत्थर के टुकड़ों की बनी हुई सड़क पर जाकर एक किनारे पर हम लोग भी रुक गए.

Montreux या मौंत्रो या मॉन्त्र या मॉन्त्रियू लेक जिनेवा के उत्तर-पूर्वी इलाके पर बसा एक बहुत ही खूबसूरत शहर है.इसके अक्षांश और देशांतर अर्थात co-ordinates 46°26'N/6°55'E हैं.आल्प्स पर्वतमाला की बर्फ से आच्छादित पहाड़ियों और अंगूर के बगीचों से घिरे हुए इस शहर की फिजा ही निराली है.मौंत्रो को स्विट्ज़रलैंड के वॉड रिवेरा इलाके (उष्ण तटीय क्षेत्र)  की राजधानी भी कहा जाता है.इस शहर में पाइन,सिप्रेसेस, पाम आदि जैसे भूमध्यसागरीय पेड़-पौधे भी पाए जाते हैं.इस शहर की जलवायु और भौगोलिक स्थिति के कारण विश्व के बेहतरीन शहरों में इसका शुमार है.वहाँ जाकर मुझको मालूम पड़ा कि चार्ली चैप्लिन और फ्रेडी मर्करी जैसी विश्व प्रसिद्ध हस्तियां यहाँ पर रही हैं.मुझको किसी ने यह भी बताया कि बॉलीवुड के प्रसिद्ध अभिनेता अमिताभ बच्चन जी का भी एक घर वहाँ पर है (मैंने जो सुना वो लिख रहा हूँ,इसका मुझ पर कोई प्रमाण नहीं है) और उनके बच्चे वहाँ रह कर वहाँ के विश्व प्रसिद्ध स्कूल/कॉलेज Aiglon College ऐगलोन या ऐगलों कॉलेज में पढ़ते थे.यहाँ का Chic Montreux & Charming Valley के बीच का झील के किनारे का गलियारा स्विट्जरलैंड के सबसे खूबसूरत स्थानों के रूप में जाना जाता है.यहाँ यानी कि मोन्त्रो से जिनेवा बोट सर्विस भी थी.इस इलाके के Terraced Vineyards को UNESCO ने World Heritage Site घोषित किया है.

जैसा मैंने पहले जिक्र किया कि शहर में प्रवेश करते ही सबसे पहले हमको एक बहुत विशाल इमारत नजर आयी जो Le Montreux Palace नामक प्रसिद्ध होटल था.इसकी शानदार बड़ी इमारत पर स्विट्जरलैंड के प्रसिद्ध वर्गाकार झंडे के अलावा कई और देशों के झंडे भी लगे हुए थे और इसके चॉकलेटी कलर पर पीले रंग का बारिश के पानी से बचाने हेतु बना हुआ लंबा छज्जेनुमा आवरण बहुत ही अच्छा लग रहा था.

पहाड़ियों और झील के बीच बसे इस शहर में सुंदरता और भव्यता दोनों का बेहतरीन समावेश था.जहाँ हमारी गाड़ी खड़ी थी उसी के सामने एक अत्यंत भव्य किला बना हुआ था.एक पथरीले टापू जैसे पर बने इस सुंदर किले को Chateu Chillon कहा जाता है.वहाँ पर हुए उत्खनन से मालूम पड़ा है कि इस स्थान पर(किला नहीं) ताम्र युग से लोग रह रहे हैं.ईस्वी सन 1150 में इस किले का पहला लिखित प्रमाण मिलता है.यह किला कुछ कुछ पानी के जहाजनुमा बना हुआ है इसको एक बारगी देखने से ऐसा लगता है कि जैसे अथाह सागर में सफेद-मटमैले पत्थर से बना एक विशाल जहाज जैसा खड़ा हैइसकी लाल खपरैल जैसी बनी झौपड़ी नुमा छत,सामने दीवार में ही से बनी और ऊपर को निकली दो नुकीली होती जाती मीनारें,सबसे ऊपर एक तरफ की चौकोर वर्गाकार सी ढलवां छत,एक तरफ की दीवार पर रंगों से पेंटेड बनी घड़ी,अलग अलग किस्म की खिड़कियां कोई आयताकार दरवाजे जैसी तो कोई मेहराबदार,कुछ में बाहर को छज्जा निकला हुआ और ऊपर से शेड भी था,किले के चारों तरफ उल्टे कंगूरों की डिजाइन जैसा छज्जे का लटकता हुआ बॉर्डर,एक तरफ किले की दीवारों से टकराता झील का पानी और दूसरी ओर किले के पीछे पूरे हरियाली से भरे हुए पहाड़ों की दीवार एक बहुत ही अद्भुत और विहंगम दृश्य प्रस्तुत कर रहे थे.यद्यपि हम लोग उस कैसल के भीतर नहीं गए किन्तु काफी समय तक मैं उस किले और उसके बाहर के दृश्य को मंत्रमुग्ध सा होकर देखता रहा.उसी समय वहाँ से एक ट्रेन भी निकली जिस से मालूम पड़ा कि इस स्थान से ट्रेन की लाइन भी निकलती है.उधर दूसरी तरफ सड़क से लगे हुए इलाके में ही कुछ आगे चलकर कई किस्म के पेड़ पौधे अपनी ख़ूबसूरती की छटा बिखेर रहे थे.कुछ लाल पत्ते वाले पेड़ थे तो कुछ पीले और कुछ गहरे हरे रंग के.थोड़ी देर हम लोग उन मनोरम वृक्षों के बीच सड़क पर टहलते रहे और वीडियो बनाते रहे.पेड़ों के बीच जेबों में हाथ डाले एक ओर झील के पानी तो दूसरी ओर विशाल कैसल और उसके पीछे की हरित पर्वतमाला को निहारना एक दिव्य अनुभूति थी.वहीं सड़क के किनारे एक काली विशाल रोल्स रॉयस कर भी खड़ी थी जो उस शहर और अपने मालिक की रईसी को दर्शा रही थी.ये वो स्थान और दृश्य थे जहाँ देखते-विचरते कभी मन भरना ही नहीं था किंतु गन्तव्य तो दूर था,यह तो सिर्फ एक  पड़ाव मात्र था तो लगभग पौने दो घंटे मोन्त्रो में बिता कर अब हम चल दिये थे टाख की ओर.

लगभग एक-सवा घंटे का सफर सुंदर दृश्यों को निहारने में और अतुल भैया से उन जगहों के विषय में जानने में ही निकल गया और हम लोगों की कार एक छोटे से कस्बे में दाखिल हुयी जिसमें सड़क के दोनों ओर छोटी इमारतें बनी हुयी थीं जिनमें से कुछ पर टीन का शेड पड़ा हुआ था.बाएं हाथ पर जरूर एक बड़ी सफेद और चॉकलेट कलर की इमारत नजर आयी जिस पर   SOUVENIR SPIELWAREN जैसा कुछ लिखा हुआ था.वहीं आगे मैदान में एक बहुत बड़ा कार पार्किंग एरिया था जहाँ न जाने कितनी गाड़ियां खड़ी हुयी थीं और वहीं हमने भी अपनी कार खड़ी कर दी.

इस स्थान का नाम टाख Tasch था.यह एक बहुत ही छोटा लगभग एक हजार लोगों की आबादी का कस्बा है.इसके कोऑर्डिनेट्स 46°04' N और 7°46'E हैं.यहाँ की बोलचाल की भाषा स्विस जर्मन है.यहाँ की अर्थव्यवस्था मुख्यतः पर्यटन पर ही आधारित है.जिनेवा से इस कस्बे की दूरी लगभग 230 किलोमीटर है और बाई रोड सफर का समय 3 साढ़े तीन घंटे है और रुकते हुए आएं तो 1-2 घंटे और लग सकते हैं.टाख नामक यह कस्बा ज़रमाट नामक पर्यटन स्थल के लिए ट्रांज़िट पॉइंट भी है क्योंकि इस स्थान से आगे प्रदूषण न हो इस उद्देश्य के मद्देनजर कोई भी कार आदि वाहन आगे ज़रमाट की ओर जा नहीं सकता था.टाख ज़रमाट से लगभग 5 किलोमीटर उत्तर में स्थित है.यह एक बहुत ही सुंदर,शांत स्थान है.चारों ओर पर्वत श्रृंखला,हरियाली,पर्यटकों के खुशी से दमकते चेहरे सब मिलकर एक अच्छा वातावरण बना रहे थे.यहाँ से ज़रमाट या तो रोप वे से जाया जा सकता था अथवा एक छोटी सी पहाड़ी ट्रेन से.अतुल भैया ने कहा कि हम लोग ट्रेन से जाएंगे सो हम लोग स्टेशन पहुँचे जो बहुत छोटा सा था और उसका भारत के के छोटे स्टेशनों जैसा छोटा सा टीन शेड पड़ा छोटा सा ही प्लेटफॉर्म भी था.हम लोग भाप के जैसे छोटे से सामने से काले और बाकी हिस्सा गहरा नीला था ऐसे इंजन वाली ट्रेन में बैठ गए.इस ट्रेन में कुल दो या तीन ही डिब्बे थे,सवारियां भी न के बराबर थीं पर हाँ इंजन के किनारे पर अवश्य दो-तीन लोग बाहर की ओर बैठे थे,शायद सफर का आनन्द लेने को.मुझको वहाँ का माहौल देख कर अपने बॉलीवुड की फिल्मों की याद आ रही थी.थोड़ी देर में ही इंजन ने भाप निकाली, सीटी बजाई और चल पड़ा धीरे-धीरे मन्थर गति से पहाड़ों और बहुत लंबे-लंबे वृक्षों के बीच बने रास्ते पर.

पीछे-सामने,दाएं-बाएं चारों तरफ जहाँ निगाह जाए वहाँ बर्फ से ढंके पहाड़,लंबे पेड़, हरियाली,पहाड़ की तलहटी,और एक तरफ निगाह डाली तो दूर ऊपर रोप वे का डिब्बा भी चलता दिखाई दिया.बून्दा-बांदी हो चुकी थी,मौसम सर्द था,मैंने अपना कोट पहन लिया था और हम लोग ज़रमाट में घूम रहे थे.

ज़रमाट के कोऑर्डिनेट्स 46°01'N & 7°45'E हैं.यहाँ की भाषा जर्मन है.यह शहर स्विट्जरलैंड के सबसे ऊँचे पहाड़ों की तलहटी में स्थित है.यह बिल्कुल स्विट्ज़रलैंड और इटली की सीमा पर है,इटली की सीमा के Theodul pass से इसकी दूरी लगभग 10 किलोमीटर ही रह जाती है.यह शहर स्विस आल्प्स के प्रसिद्ध स्की रिजॉर्ट्स और माउंटेनियरिंग स्थलों में है.यहाँ की पूरी अर्थव्यवस्था पर्यटन आधारित है.यह स्विट्ज़रलैंड के VISP district और Valais कैंटन में स्थित है.इसके पास इटली की तरफ Dora Balta,Sesia,Toce नदियां बहती हैं जबकि स्विट्ज़रलैंड की सीमा में इसके पास Rhone नदी बहती है.

ज़रमाट में वातावरण बहुत ही सुरम्य और अच्छा था.चारों ओर से आल्प्स पर्वत श्रृंखला के पहाड़ नजर आ रहे थे.ज़रमाट को स्विट्जरलैंड की सबसे ऊँची पहाड़ी छोटी 'Monte Rosa' (4634 मीटर ऊँचाई)ने भी अपनी छाया में लिया हुआ है.आल्प्स पर्वत श्रृंखला के अधिकतर 4 हजार मीटर से ऊँचे पहाड़ ज़रमाट के इर्द गिर्द ही हैं सो चारों तरफ ऊँचे-ऊँचे पहाड़ों का एक अद्भुत दृश्य दिखता है वहाँ. पर्वतारोहियों के लिए ज़रमाट स्टार्टिंग पॉइंट है और ज़रमाट में दुकानों पर बर्फ पर स्कीइंग करने के रंग बिरंगे स्की और अनेकों सामान खूब दिखते हैं.ज़रमाट में रेस्टॉरेंट की खिड़कियों पर भी खूब फूलों के गमले रखे हुए नजर आए.ज़रमाट एक कार फ्री ज़ोन है तो साइकिल भी नजर आती हैं.सड़क के किनारे घूमने,चलने वालों के आराम के लिए लाल रंग की खूब सारी बेंचे लगी हुई थीं.यदि भी की संख्या पर न जाएं तो कुछ कुछ मसूरी,शिमला,नैनीताल में जैसे पैदल घूमने वाले लोग आनन्द लेते हैं वैसे ही (लेकिन कम भीड़) यहाँ भी लोग घूमते दिखे.एक तरफ मेरी निगाह गयी तो मुझको वहाँ होटल की सवारियों को लेने और छोड़ने हेतु काहिया हरे रंग की बैटरी ऑपरेटेड बहुत छोटी बस जैसी वैन चलती दिखीं.उस पर सामने पीले रंग की प्लेट पर होटल का नाम Hotel Pollux भी लिखा हुआ था.एक होटल के बाहर बड़ी सी दाढ़ी वाले बकरे की मूर्ति लगी देख कर मुझको बड़ा अजीब सा लगा.वहाँ से ज़रमाट के आगे भी रोप वे या अन्य साधनों से जाया जा सकता था किंतु हम लोगों को जिनेवा लौटना भी था तो थोड़ी देर और वहाँ के प्रदूषण रहित वातावरण में घूमने के बाद हम लोग फिर उसी फिल्मी ट्रेन में बैठ कर टाख की ओर चल दिये और फिर वहाँ से वापस जिनेवा के लिए.

वापसी का रास्ता हम लोगों ने बिना रुके तय किया और लगभग रात के 8 बजे हम लोग अतुल भैया के घर पर थे.

रात को सब लोगों के साथ अतुल भैया के ड्राइंग रूम में बैठ कर काफी देर बातचीत होती रही.

ये स्विट्जरलैंड में इस यात्रा में मेरा आखिरी दिन था और अगले दिन यानी 14 अक्टूबर 1991 को मुझे जिनेवा से फ्रैंकफर्ट,जर्मनी जाना था;उस देश की ओर जो भविष्य में मेरे व्यापार और व्यापारिक जीवन में एक नया मोड़ लाने वाला था,उसकी दिशा बदलने वाला था.

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