Sindbad Travels-30,Switzerland-2 Zurich & Bern
Sindbad Travels-30
Switzerland-2
Zuric & Bern
सिंदबाद ट्रैवल्स-30
स्विट्ज़रलैंड-2
ज़्यूरिख और बर्न
अगली सुबह हो चुकी थी और मैं जल्दी तैयार हो कर घर से ज़्यूरिख जाने को निकल लिया.ये पहला दिन था जब मैं अपनी यूरोप यात्रा में ट्रेन से यात्रा करने वाला था.
यूरोप में ट्रेन से यात्रा करना बहुत रोमांचक एवं सुविधाजनक है.यूरोप में अलग-अलग देशों के अपने-अपने रेल नेटवर्क हैं और सब ही एक से एक बेहतरीन हैं और आपस में जुड़ कर इनका पूरे यूरोप में चलने वाला रेल नेटवर्क एक कम्पनी द्वारा परिचालित होता है जिसको "यू रेल" कहा जाता है.इसके तहत चलने के लिए सन 1959 में "यू रेल पास" की शुरुआत की गयी थी और आज (सन 2019 में) जब मैं अपने ये संस्मरण लिख रहा हूँ तो यह यू रेल नेटवर्क यूरोप के 31 देशों में उनके रेल नेटवर्को पर ही नहीं अपितु अनेकों शिपिंग लाइंस पर भी आपको यात्रा करने की सुविधा देता है.1991 ही वो वर्ष भी था जब यू रेल पास पूर्व के पूर्वी जर्मनी में भी यात्रा के लिए मान्य हो चुका था और इस पास से आप पूरे संयुक्त जर्मनी की यात्रा कर सकते थे.यू रेल पास के कई किस्म के प्लान होते हैं.अपनी उस यात्रा में मैंने लगभग 525 अमेरिकी डॉलर का यू रेल पास लिया था जो जिस दिन से यात्रा शुरू की जाए उस दिन से 15 दिनों तक आप अनेकों देशों में फैले यू रेल नेटवर्क के देशों में अनलिमिटेड यात्रा कर सकते थे और वो भी प्रथम श्रेणी में(हाँ जिस देश में जा रहे हैं उसका वीसा होना आवश्यक था क्योंकि तब सारे यूरोपियन यूनियन का एक वीसा नहीं था).इसके बाद भी मैं जब भी यूरोप गया तो मैंने सदैव यू रेल Eu Rail Pass का प्रयोग किया और इसका अनुभव सदैव बेहतरीन रहा.आगे जैसे-जैसे मैं अपनी यूरोप यात्रा के संस्मरण बताता चलूँगा तो उसमें यू रेल पास द्वारा रेल यात्रा के अनुभव भी होंगे ही.
सबसे पहले घर से टैक्सी पकड़ कर मैं जिनेवा के रेलवे स्टेशन पहुँचा और मैंने अपने यू रेल पास पर यात्रा की शुरुआत की एंट्री दर्ज करायी. अब 15 दिनों तक लगातार मैं यूरोप के देशों में यू रेल के द्वारा कितनी भी यात्रा कर सकता था.जिनेवा के स्टेशन से मैंने ज़्यूरिख जाने वाली गाड़ी की जानकारी ली और सही समय पर प्लेटफॉर्म से ट्रेन में सवार हो गया.वाह!क्या रेल थी!!!क्या शानदार कोच था!!उस समय तक हमारी भारतीय रेल में इतना सुधार नहीं हुआ था किंतु यकीन मानिए कि आज 2019 में भी हमारी रेल व्यवस्था का वह स्तर नहीं है जो वहाँ 1991 में था हांलांकि यह भी मानना पड़ेगा कि हमारी रेल सेवा का उपयोग शायद एक सप्ताह में जितने लोग करते होंगे उतने शायद वहाँ 6 महीने में भी नहीं करते होंगे.हमारी रेल सेवा का फैलाव बहुत बड़ा है और उसके ग्राहकों-सवारियों की संख्या बहुत विशाल होने से भारतीय रेलवे की समस्याएं और चुनौतियां बहुत भिन्न हैं.खैर तो मैं ट्रेन के जिस डिब्बे में चढ़ा उसमें उस समय सिर्फ एक ही सवारी थी और वो मैं ही था.ट्रेन चल पड़ी और स्विट्जरलैंड की हरी भरी वादियों के बीच से अति मनोरम दृश्यों से साक्षात्कार कराती हुई वो ट्रेन अति द्रुत गति से दौड़ी चली जा रही थी.ट्रेन की सीटें बहुत अच्छी थीं और बाहर देखने को डिब्बे में बड़े बड़े शीशे लगे हुए थे जो तब हमारी ट्रेनों में सामान्यतः नहीं होते थे.थोड़ी देर बैठे रह कर फिर मैं आगे गैलरी में से दूसरे डिब्बे की तरफ बढ़ा तो वो ट्रेन का रेस्टॉरेंट था.उसमें किसी भी रेस्टॉरेंट की भांति मेज कुर्सियां सजी हुयी थीं और लोग उन पर बैठ कर खाने पीने का आनन्द ले रहे थे.उसी डिब्बे में आगे जाकर किचन-काउंटर जैसा भी था जिसमें पेप्सी आदि की बोतल मिल रही थीं और खाने की चीज़ें भी और यह सब देख कर मैं चमत्कृत तो था ही.छोटे-बड़े अनेकों स्टेशनों को छोड़ती यह ट्रेन अपनी रफ्तार से ज़्यूरिख की ओर भागी जा रही थी और बाहर हल्की बूंदा-बांदी के बीच मनोरम दृश्य दिख रहे थे;हरियाली, पहाड़ियां,झौपड़ीनुमा मकान जिनकी छतें अधिकतर चॉकलेट के रंग की थीं और बहुत से गायों के झुंड भी दिखते थे.इसी बीच ट्रेन ने बर्न स्टेशन को पार किया जो स्विट्ज़रलैंड की राजधानी है और लौटते में मेरा वहाँ भी एक चक्कर लगाने का प्लान था.अब मुझको थोड़ी भूख लग रही थी और कनक भाभी ने उस परदेस में भी मेरे लिए सुबह ही गरमागरम पूड़ी और सूखे आलू की सब्जी बना कर बाकायदा एल्यूमीनियम फॉयल के रैपर में पैक करके रखी थीं जिनको उस समय कहा कर जो आनन्दानुभूति हुई वह वर्णनातीत है.इस बीच में डिब्बे में दो-तीन सवारियां भी आ गयी थीं,उनसे बातचीत करके स्विट्ज़रलैंड के विषय में कई जानकारियां मिलीं और यह भी महसूस हुआ कि वहाँ के लोग पेरिस के मुकाबले काफी फ्रेंडली हैं.जिनेवा से ज़्यूरिख की दूरी लगभग 280 किलोमीटर है और इस दूरी को ट्रेन लगभग पौने तीन से तीन घंटों में तय करती है.
ट्रेन ने मुझको स्विट्जरलैंड के सबसे बड़े शहर ज़्यूरिख पहुँचा दिया था.ज़्यूरिख के को-ऑर्डिनेट्स 47°22'N & 8°33' E हैं.यह शहर समुद्र तट से 408 मीटर की ऊँचाई पर बसा है और प्रसिद्ध आल्प्स पर्वत से लगभग 30 किलोमीटर उत्तर में है.ज़्यूरिख में आमतौर पर बोली जाने वाली भाषा जर्मन है जिसका एक रूप ज़्यूरिख-जर्मन भी है.ज़्यूरिख फ्रेंच भाषा का शब्द है तो जर्मन में इसको ज़्यूरी या ज़ूरी, इटालियन में ज़ूरीगो, रोमन में टूरिटग या टूरिग(Turitg also Turicum) भी कहते हैं.ज़्यूरिख 2000 साल पुराना शहर है और बताते हैं कि इसकी स्थापना रोमन लोगों ने की थी.ज़्यूरिख में पाषाण युग एवं ताम्र युग के भी चिन्ह लेक ज़्यूरिख के आसपास मिले बताये जाते हैं.
स्विट्ज़रलैंड के उत्तर-मध्य इलाके में बसा ज़्यूरिख शहर बेहद खूबसूरत शहर है.कहा जाता है कि यहाँ के जीवन शैली की गुणवत्ता विश्व में सर्वश्रेष्ठ है.यह विश्व का सबसे अमीर शहर है जीडीपी और पर कैपिटा इनकम के हिसाब से.ज़्यूरिख एक अंतरराष्ट्रीय शहर है और यहाँ बहुत सारी वित्तीय संस्थाओं के दफ्तर हैं तथा बहुत सारी बैंकिंग कंपनियां भी यहाँ कार्यरत हैं.स्विट्ज़रलैंड के अधिकतर शोध एवं विकास संबंधी संस्थान भी ज़्यूरिख में ही स्थित हैं.ज़्यूरिख में टैक्स की दरें कम होने के कारण बहुत सी अंतरराष्ट्रीय कंपनियों के मुख्यालय भी हैं.
ज़्यूरिख में मैंने प्रसिद्ध सेंट पीटर चर्च के घंटाघर की विश्वप्रसिद्ध घड़ी को देखा जिसका क्लॉक फेस लन्दन की बिगबेन के क्लॉक फेस से भी बड़ा है.ज़्यूरिख की सीधी-सपाट खड़ी-खड़ी स्टाइल की बनी बहुमंजिली इमारतें,उनकी खिड़कियों पर लगे-सजे फूलों के गमले, शहर एवं बाजारों की इमारतों से लटकते झंडे बहुत ही मनोहारी दृश्य उत्पन्न कर रहे थे.ज़्यूरिख की ट्राम के डिब्बों का रंग जिनेवा के सफेद/क्रीम -ऑरेंज/लाल जैसा न होकर मिलिट्री कलर जैसा हरा और सफेद है.मैं ज़्यूरिख में लेक के किनारे भी घूमने गया और लगभग 15-20 मिनट वहाँ शांति से बैठ कर आनन्द लेने की कोशिश भी की किन्तु झील में चल रहे स्टीमरों के हॉर्न बार-बार वहाँ की शांति को भंग कर देते थे.झील और उसके किनारे के इलाकों में हल्का-हल्का कोहरा छाया हुआ था और वहाँ के ठंडे और गीले मौसम में शांति से बैठ कर मन को एकाग्रचित्त करने से एक अद्भुत किस्म की शांति महसूस होती थी.
मैं ज़्यूरिख में कुछ दुकानों पर गया और माल बेचने का असफल प्रयास भी किया और फिर एक बार फिर थोड़ा मायूस भी हुआ.इसके बाद जब मैं ज़्यूरिख के शानदार बाज़ार में घूम रहा था तो मैंने एक तरफ से बहुत ही मधुर संगीत की आवाज़ आते सुनी और उधर मुड़ा तो क्या देखता हूँ कि बाज़ार में दुकानों के सामने एक चौड़ी जगह पर 5-7 लोगों का एक बैंड जैसा था जिसमें एक व्यक्ति बांसुरी बजा रहा था,2 के हाथ में गिटार थे और कोई ड्रम बजा रहा था कोई कुछ और लेकिन बहुत ही मधुर संगीत था. वो सभी वादक एक सी ड्रेस पहने हुए थे जिसमें स्कॉटिश कपड़े जैसे लाल-काले चौखाने की डिजाइन बनी हुयी थी और बहुत ही मनोयोग से झूम-झूम कर अपने-अपने वाद्य यंत्र बजा रहे थे और हल्के बारिश के झुटपुटे से हो रहे मौसम में उनकी स्वर लहरियों से एक अलग ही वातावरण का निर्माण हो रहा था.वो लोग एक अर्ध गोलाकार घेरा बना कर खड़े होकर अपना बैंड बजा रहे थे,उनके सामने जमीन पर उनके गिटार का खाली केस खुला रखा था जिसमें लोग अपनी खुशी से कुछ पैसे डाल रहे थे.विश्व के इस सबसे अमीर शहर के बैंड बजाने वालों को उनके शानदार संगीत के प्रदर्शन पर कुछ पैसे मैंने भी उस गिटार के केस में डाले और एक अलग किस्म के आनन्द और आत्म संतुष्टि की अनुभूति की जो मेरे जैसे बहुत से भारतीय समझ सकते हैं.
मैं बाज़ार में घूम ही रहा था कि बून्दा-बांदी ने बारिश का रूप ले लिया तो मेरा ध्यान गया कि वहाँ छातों की बहुत सी दुकानें थीं या यह भी कह सकते हैं कि बहुत सी दुकानों पर छाते भी बिक रहे थे.मैं एक बहुत ही बढ़िया दिखती दुकान जो बिल्कुल सामने दिखी उसमें घुस गया और वहाँ से मैंने भी एक आसमानी-नीले से रंग का फूलों की डिजाइन का बहुत ही सुंदर और थोड़ा महंगा सा ही छाता खरीदा.छाता लेने के बाद कुछ देर छाता लगाए मैं ज़्यूरिख के उस बाज़ार में एक दुकान से दूसरी दुकान में जा कर बाज़ार घूमता रहा.तभी मेरी घड़ी ने मुझको याद दिलाया कि वापिसी का समय हो गया है और मैं ज़्यूरिख स्टेशन आया और वहाँ से ट्रेन पकड़ कर वापिस रवाना हो गया अब बर्न के लिए.ट्रेन में बैठे हुए बाहर के मनोरम दृश्यों को देखते हुए समय का पता ही नहीं चला और मेरी ट्रेन बर्न स्टेशन पर जाकर खड़ी भी हो गयी.
Bern or Berne बर्न स्विट्ज़रलैंड की आधिकारिक राजधानी तो नहीं है किंतु वास्तविकता में यही इस देश की राजधानी है.सन 1848 में स्विट्ज़रलैंड के एक देश के रूप में आने के पहले ज़्यूरिख, बर्न और लुजर्न बारी-बारी से दो-दो साल राजधानी के रूप में काम करते थे लेकिन 1848 से बर्न वास्तविक राजधानी हो गया यद्यपि वहाँ के संविधान के अनुसार कोई शहर ऐसा नहीं है जिसको राजधानी होने का दर्जा प्राप्त हो.बर्न के को-ऑर्डिनेट्स 46°57'N & 7°27'E हैं.यह शहर मध्य-पश्चिमी और दक्षिण यूरोप की तरफ बसा हुआ है जिसके दक्षिण मे इटली है तो पश्चिम में फ्रांस है,उत्तर में जर्मनी तो पूर्व में ऑस्ट्रिया और लीचेन्स्टीन है.यहाँ के अधिकांश लोग जर्मन भाषी हैं.बर्न शहर में 1903 से 1905 तक प्रसिद्ध वैज्ञानिक आइंस्टीन रहे थे.यहाँ मैंने विशुद्ध यूरोपियन स्टाइल में बनी The Central building of the Federal Palace of Switzerland यानी कि स्विट्ज़रलैंड की संसद को देखा उसके बाहर हल्का सा इंतज़ाम ट्रैफिक व्यवस्था सही चलती रहे,इस बात का था.दूर से गिरजाघर सी दिखने वाली इस बिल्डिंग पर Curia confederation velvet लिखा हुआ था.बर्न का सिटी सेंटर UNESCO World heritage sight घोषित है और एक मध्ययुगीन इमारत है.बर्न में विश्व प्रसिद्ध Zytglogge (Time bell) भी है जो कि एक माश्य युगीन बड़ा घंटाघर है और जिसमें कठपुतलियां चलती हुयी आती दिखती हैं.बर्न में मैंने देखा कि सड़क के एक किनारे पर बड़े-बड़े चौखाने बने हैं और उनमें बहुत बड़े बड़े शतरंज के बड़े बड़े मोहरे रखे हैं और उनसे लोग बाकायदा शतरंज खेल रहे थे और मोहरों को हाथ के स्थान पर पैर से सरका रहे थे.
बर्न में एक और बड़ी अजीब सी चीज ने ध्यान आकर्षित किया वो थी रास्ते में बनी एक विशालकाय लम्बी नाक के आदमी की मूर्ति जिसके पास एक झोला लटका है और उसमें से छोटे बच्चे निकलते दिख रहे हैं.यह थी The Ogre of the kindlifresserbrunnen की मूर्ति.इस लम्बी नाक वाले आदमी के पास एक झोला है जिसमें छोटे बच्चे हैं और ये उन बच्चों को निगल जाना चाहता है.
बर्न भी बहुत खूबसूरत शहर था.इसमें हरियाली खूब दिखी.यहाँ की इमारतों पर भी स्विट्ज़रलैंड के चौकोर लाल झंडे जिनमें बीच में सफेद क्रॉस होता है खूब लहराते दिखे.विश्व में स्विट्ज़रलैंड के अलावा चौकोर झंडा सिर्फ वैटिकन सिटी का ही है.यहाँ यह बात भी रोचक है कि यह बर्न शहर ही है जहाँ पर रहते हुए विश्व के प्रसिद्ध वैज्ञानिक आइंस्टीन ने अपने प्रसिद्ध फॉर्मूले E=MC 2 की स्थापना की थी.कुल मिला कर स्विट्ज़रलैंड के अन्य शहरों की भांति बर्न भी एक बहुत ही सुंदर,शांत और मनोहारी किस्म का शहर है और उसको कितना भी घूमो किन्तु मन नहीं भरता है.थोड़ी देर बर्न घूमने के बाद मैंने स्टेशन से ट्रेन ली और वापिस जिनेवा आ गया,अतुल भैया-कनक भाभी के घर.यहाँ पर अतुल भैया के साथ के उनके पुराने मित्र भार्गव जी जो कि कानपुर के एक बहुत बड़े पब्लिशर थे आये हुए थे उनसे मुलाकात हुई.तभी अतुल भैया ने बताया कि अब अगले दिन वो हम लोगों को अपनी कार द्वारा स्विट्ज़रलैंड के कुछ और विश्व प्रसिद्ध टूरिस्ट स्थलों टाख-ज़रमाट आदि को घुमाने ले चलेंगे.रात को काफी देर तक बातचीत होती रही और फिर जब मैं सोने गया तो मेरे दिमाग में ज़रमाट घूम रहा था कि किसी होगी वो जगह जहाँ कार या कोई भी प्रदूषणकारी वाहन का जाना माना है.
Running commentary with heart of world aesthetics...great
ReplyDeleteThanks a lot sir ����
ReplyDelete