इटावा की हेशमी
कुछ दिनों से एक प्रश्न मन में उठ रहा था कि संस्कृति और विरासत क्या है?
केवल क्षेत्रीय/इलाकाई/राष्ट्रीय/युगीन परम्पराएं?
या केवल क्षेत्रीय/इलाकाई/राष्ट्रीय/युगीन वस्त्रादिभूषण,इमारतें, इतिहास, रीति-रिवाज,बोलचाल?
या किसी समाज, देश आदि की प्रथाएँ, विचारधाराएँ, विश्वास आदि?
अथवा,कला; साहित्य, संगीत आदि; संस्कृति-विरासत है?
हम सब जानते हैं कि उपरोक्त सब किसी भी संस्कृति-विरासत के अंग हैं और इसके अतिरिक्त भी बहुत सी बातें हैं जो किसी भी संस्कृति-विरासत को उसका रूप देती हैं.मेरी रुचि इस विषय में रही है और समय-समय पर मैं इस से सम्बंधित ब्लॉग लिखता हूँ और वीडियो/यू-ट्यूब भी बनाता हूँ.
अक्सर मैं सोशल मीडिया पर लोगों द्वारा खाने-पीने सम्बन्धित पोस्ट्स भी देखता हूँ जो बहुत रोचक भी होती हैं किंतु उनमें से अधिकांश Non-Vegetarian dishes से सम्बंधित होती हैं.
हमारे देश और विभिन्न प्रदेशों में शाकाहारी व्यंजनों की भी बहुत ही rich संस्कृति और विरासत है.हम लोग जो ब्रज-क्षेत्र के रहने वाले हैं यहाँ तो खाना-पीना-बनाना-खिलाना एक प्रकार से एक पूर्णकालिक शौक रहा है और मिठाइयों की भी एक अलग विरासत है.आज हमारे देश में चाइनीज़,इटालियन और मैक्सिकन खाद्य पदार्थों का बहुत बोलबाला है और जब मैं देश के बाहर विश्व के अनेकों देशों में देखता हूँ तो ये सारी चीजें जिस अनुपात में उन देशों में दिखती हैं उस अनुपात में हमारे देश के खाद्य व्यंजन उतने बिकते नहीं दिखते हांलांकि कुछ इलाकों में मुगलई खाना,दक्षिण भारतीय इडली-डोसा,समोसे और गुलाब जामुन मिल भी जाते हैं किंतु वो Pizza,Pasta,Noodles आदि जितने सर्व-सुलभ नहीं हैं;हम लोगों को इस दिशा में भी कुछ करना चाहिए.
खैर यह सब सोच रहा था और फिर मन में विचार आया कि इस विषय पर कुछ अपने विचार और जानकारी सोशल मीडिया पर आप सबसे शेयर की जाए कि इसी दौरान हमारे यहाँ दो बहुत अच्छी और इलाकाई पहचान वाली मिठाइयां आईं तो मैंने सोचा कि इन्हीं से इस विषयक पोस्ट की शुरुआत की जाए.
जो मिठाइयां अभी आयी हैं उनमें पहली मिठाई है इटावा की हेशमी!हेशमी असल में तो पेठे की ही एक वैराइटी है जो रंग में लालामी का पुट लिए होती है और अन्य स्थानों के पेठों के विपरीत ऊपर से सूखी दिखती हुई भी अंदर से बहुत रसीली होती है.हम लोगों की ननसाल इटावा होने के कारण शुरू से हम लोग इटावा जाते रहे हैं और हेशमी से परिचित रहे हैं.कितनी भी गर्मी पड़ रही हो आप सफर करके कहीं पहुँचिये और एक हेशमी और एक ग्लास पानी से अंतर्मन तक शीतल हो जाता है.जब हम लोग छोटे थे तो छैराहे के पास पतंगा लाल जी के नाम से दुकान थी.हेशमी बनाने का भी मूल रॉ मैटीरियल तो पेठा/कुमैहड़ा और चीनी ही है बाकी कुछ ट्रेड सीक्रेट्स भी हो सकते हैं.हेशमी की एक स्टैंडर्ड सर्विंग में 200 से 250 कैलोरी होती हैं ऐसा मैंने कहीं पढा है.आगरा के पेठे के तो कई फ्लेवर्स अब बाज़ार में उपलब्ध हैं किंतु इटावा की हेशमी अभी भी अपना वही दशकों पुराने स्वरूप में ही उपलब्ध है.कहते हैं पेठा हमारे देश की सदियों पुरानी मिठाई है और इसकी चर्चा मुगल काल के पहले भी आई बताई जाती है.आप लोग जब कभी भी इटावा जाएं तो हेशमी जरूर खाइएगा और ख़रीदियेगा भी जिस से उसको बनाने वाले इस कार्य को जारी रखें और हमारी खान-पान की ये प्राचीन विरासत कहीं विकास के नाम पर बन रही नयी-सुंदर मिठाइयों की भीड़ में खो न जाये. खान-पान-व्यंजन-मिठाइयां भी हमारी संस्कृति और विरासत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं.दूसरी मिठाई के विषय में अगली पोस्ट में चर्चा करूंगा लेकिन प्रयास करिये कि हमारे देश की खान-पान के व्यंजन/मिष्ठान देश विदेश में पॉपुलर हों इससे एक तो लोगों का हमारी संस्कृति के एक और आयाम से परिचय होता है दूसरे इस से व्यापार के भी अकल्पनीय अवसर मिलते हैं पर इस सबके लिए शुद्धता,अच्छी पैकिंग और गुणवत्ता का ध्यान रखना बहुत ज़रूरी होगा.इटावा की प्रथा के अनुसार जय बिहारी जी कहिए और हेशमी खाइए.जल्द ही अगली पोस्ट में किसी और व्यंजन/मिष्ठान आदि की चर्चा करूंगा.
Comments
Post a Comment