मेरी मई 2022 की इलाहाबाद-प्रयागराज यात्रा- (2)

मेरी इलाहाबाद-प्रयागराज यात्रा;मई 2022  ---(2)...

26 मई को जब मैं इलाहाबाद पहुँचा तो रात के लगभग 8:30 बज रहे थे और हम लोग 3 बैंक रोड स्थित अपनी मौसी के घर से तुरंत तैयार होकर आकाशवाणी के आगे स्थित DSOI पहुँच गए जहाँ से मेरे हॉस्टल के 1 वर्ष सीनियर,मेरे घनिष्ट मित्र श्री धीरेंद्र पांडे के बड़े भाई और मेरे भी अग्रज समान श्री प्रदीप पांडे सर की बेटी की शादी थी।शादी में उनके परिवार के सदस्यों के अतिरिक्त भी अनेकों लोगों से मिलना हुआ।शादी में मेरी मुलाकात इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के अध्यक्ष रहे श्री अनुग्रह नारायण सिंह,श्री राकेशधर त्रिपाठी (जो बाद में उ0प्र0 सरकार में मंत्री भी रहे), मेरे हॉस्टल के समकालीन सीनियर श्री राजेन्द्र प्र0 सिंह (करमैनी वाले),श्री के0पी0 सिंह(खेमादेई देवरिया वाले)श्री सुधाकर तिवारो,श्री सत्यानन्द श्रीवास्तव और न जाने कितने लोगों से हुयी और कइयों से तो एक बहुत बड़े अंतराल के बाद मिलना हुआ।
चूंकि धीरेंद्र मेरे रूम पार्टनर भी रहे थे और जितेंद्र सहपाठी तो उनके सभी परिवारीजन हम सबसे भली भांति परिचित थे और सबसे मिलकर बहुत आनन्द आया।
27 तारीख को अपनी बड़ी मौसी के यहाँ तो बैंक रोड पर हम सब रुके ही थे दोपहर का लंच मेरी सबसे छोटी मौसी के घर पर हुआ। शाम को हेरम्ब भाईसाहब की पुस्तक के लोकार्पण में सम्मिलित हुआ था।इसी दिन मैं अपने परिवार के लोगों के साथ अपने हॉस्टल जिसमें इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के दौरान मैं रहा था अर्थात सर गंगा नाथ झा हॉस्टल गया।हॉस्टल में रह रहे अनेक छात्रों से मुलाकात हुई।अपने घर वालों को मैंने वो कमरे जिन में मेरा रहना हुआ था 85,133 और 126 नम्बर तो दिखाए ही साथ ही साथ वो कमरा (68 नम्बर) भी दिखाया जिसमें 1955 से 1959 के दौरान मेरे पापा स्व0 श्री अशोक चंद्र चतुर्वेदी जी और मेरे ताऊजी श्री सुधीर चंद्र चतुर्वेदी रहे थे।हॉस्टल के इनमेट्स के साथ बाहर बगीचे में स्थित सर गंगा नाथ झा की मूर्ति भी मैंने अपने घरवालों को दिखाई और उन दिनों को याद किया जब मैं हॉस्टल का सोशल सेक्रेटरी था और हम लोगों ने जयपुर के मूर्तिवाले मुहल्ले से ये मूर्ति बनवा कर लगवाई थी और श्रद्धेय (स्व0) डॉ0 बावू राम सक्सेना जी ने इसका अनावरण किया था।हॉस्टल के छात्रों से मिलकर बहुत अच्छा लगा किंतु हॉस्टल की चहारदीवारी का जो रूप दिखा वो अच्छा नहीं लगा और उस से मूर्ति की शोभा भी दब गई सी लगी।हॉस्टल में जब भी जाओ सदैव अच्छा लगता ही है तो इस बार भी बहुत अच्छा लगा और लगे भी क्यों नहीं  आखिर जीवन के इतने बहुमूल्य पल हमने वहाँ व्यतीत किये थे।उल्लेखनीय बात यह है कि मेरे पहुँचते ही वहाँ जो इनमेट्स रह रहे थे वो एक-एक करके आते गए और सबके साथ हमने हॉस्टल का पूरा चक्कर लगाया।इसी दौरान इस नई युवा पीढ़ी से बहुत रोचक बात-चीत का दौर भी चलता रहा और खुशी इस बात की हुई कि मेरे हॉस्टल छोड़ने के लगभग 37 वर्ष बाद भी कुछ इनमेट्स मेरे नाम से परिचित थे और कुछ ने बताया कि वो फेसबुक पर मेरे मित्र भी हैं;ये है सोशल मीडिया का कमाल।अपने छात्रावास के नौजवानों से बात करके,उनका उत्साह देख कर मन वाकई खुश हुआ और मुझको लगा कि इन युवा लोगों में वो काबिलियत और क्षमता है जो इनको जीवन में नई ऊंचाइयों तक ले जाएगी और अपने समाज और देश के विकास में निश्चित ही ये अपना योगदान देंगे।
हॉं हॉस्टल की मेंटिनेंस और दशा देख कर अच्छा नहीं लगा।जीने की रेलिंग गायब थी,कॉमन हॉल में हॉस्टल के वार्डन, अधीक्षकगण, सोशल सेक्रेटरी, लिटरेरी सेक्रेटरी के नामों के जो बोर्ड हुआ करते थे वो भी नदारद थे।इस सबको देख कर ऐसा लगा कि जैसे एक निरन्तर चलने वाली सतत पम्परा खंडित हो चली है शायद….

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