कोबरा
"कोबरा"
लेप लगा के चंदन का और मीठा दूध पिलाने से
कोबरा विष-हीन बन पाते हैं क्या
प्यार से सहलाने से?
उतार लबादा अच्छे का,
मिलते ही मौका
विष-दंत अपने वो दिखाते हैं
अपना जो भी फंस गया
बस उसको धीरे से वो डस जाते हैं।।
दशकों बिल में सिमटे रहकर,
वक़्त के इंतज़ार में हॉं जी-
हॉं साहब कह-कह कर,
षड्यंत्र अपना रचाते हैं,
मीठी-मीठी बातें कर के
मृत्यु प्रयोग वो कर जाते हैं
याद करो उस वक़्त को ,
जब फैलाये तुम सबने अपने फन औ फंदे थे,
एक असहाय का खून बहा था छत पर
और तुम सबके हाथों में पिस्तौल और डंडे थे।।
दशक बीत गए मीठे-झूठे
धोखा तुम्हारा सच्चा है,
दाग खून के सूख गए हैं
पर वो कपड़ा अब भी रखा है।।
अहसानों की तो बात ही छोड़ो
कृतघ्न तो तुम पुराने हो,
दुनिया तुमको ना जाने
हमारे लिए तुम अब जाने पहचाने हो।।
लेप लगा के चंदन का
और मीठा दूध पिलाने से
कोबरा विष-हीन बन पाते हैं क्या
प्यार से सहलाने से?
उतार लबादा अच्छे का,
मिलते ही मौका
विष-दंत अपने वो दिखाते हैं।
अपना जो भी फंस गया
बस उसको धीरे से वो डस जाते हैं।।
एक-एक हर्फ लिखा रखा है,
सच्चाई जो तुम्हारी कहता है
हमको सब पता है कि किस की खाल में वो कोबरा छुपा बैठा है।।
लेप लगा के चंदन का
और मीठा दूध पिलाने से
कोबरा विष-हीन बन पाते हैं क्या
प्यार से सहलाने से?
उतार लबादा अच्छे का,
मिलते ही मौका
विष-दंत अपने वो दिखाते हैं।
अपना जो भी फंस गया
बस उसको धीरे से वो डस जाते हैं।।
छुप-छुप कर करते वार रहे
तुम कुंठा से अपनी अपनों पर,
कपट से बख्शा नहीं उनको भी
जिनको विश्वास रहा तुम्हारी कसमों पर।।
पर रखो ध्यान इस बात का भी कि
युग बीत जाने पर भी कुछ घाव नहीं भर पाते हैं,
कर्कश अंधड़ एक हवा का और घाव हरे वो हो जाते हैं
जीवन उनका जिन्होंने संवारा
स्वार्थ उनको भी विस्मृत कर देता है,
किया भला किसने भी कितना
कोबरा उनको भी डस लेता है।।
बन न सके इंसान तुम तो
हमको ध्यान इसका भी रखना है
अमृत न देगा कोबरा कभी भी
क्योंकि उसका तो काम ही सबको डसना है।।
क्योंकि लेप लगा के चंदन का
और मीठा दूध पिलाने से
कोबरा विष-हीन बन पाते हैं क्या
प्यार से सहलाने से?
दशकों बिल में सिमटे रहकर,
वो तो षड्यंत्र अपना रचाते हैं,
उतार लबादा अच्छे का
मिलते ही मौका
अपने विष-दंत वो दिखाते हैं।
अपना जो भी फंस गया
बस उसको धीरे से वो डस जाते हैं।।
अतुल चतुर्वेदी
3 फरवरी 2023
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