दीपावली की कुछ यादें
इस बार का दीपावली का त्योहार भी अच्छा और रौनक से भरा हुआ ही रहा। मैंने अपने घर फ़िरोज़ाबाद के अलावा बम्बई (अब मुम्बई) और इलाहाबाद (अब प्रयागराज) में भी इस त्योहार को मनाया है।
फ़िरोज़ाबाद में तो हम लोग पहले अपने व्यापारिक प्रतिष्ठान की गद्दी पर पूजा करते रहे हैं और फिर अपने घर पर पूजा करते हैं और उसके बाद पटाखे। बचपन में दीवाली की पूजा के बाद बाबा तथा पापा-मम्मी हम सब को कुछ पैसे अवश्य देते थे।जब हम लोगों की शादी हो गयी तो इस सबमें पत्नी भी शामिल हो गईं और फिर बच्चे भी। जब हम लोग बच्चे थे तो हमारे बाबा और पापा मम्मी हम लोगों को पटाखे चलाते देख खुश होते थे और अब पलक झपकते ही मानो कहानी वही हैं पर पात्र बदल गए हैं।
एक साल हम दिवाली पर मुम्बई (तब की बम्बई) थे। वहाँ की दिवाली की बहुत अच्छी यादें हैं। एक तो उस समय, यह 1980 के दशक की बात है,मुम्बई की रौनक देखने लायक थी क्योंकि छोटे और मंझोले शहरों में तब इतनी रोशनी की व्यवस्थाएं नहीं हुआ करती थीं। हम लोग अपने सुभाष मामा के तब के सैमुएल स्ट्रीट के घर पर थे। मुझको याद है कि धनतेरस के दिन सुभाष मामा के लड़के विकास सर पर टोपी लगाए और अपने सामने फैलाये हुए हाथों में नए बही खाते लेकर मुहम्मद अली रोड से अपने घर की ओर तेज-तेज कदमों से चलते हुए आये थे और हम लोग भी साथ ही थे। पूरे इलाके में गजब की रौनक और भीड़ थी। मुम्बई में हमारे बटेश्वर वाले नन्दू मौसाजी (स्व0 नरेंद्र नाथ जी) भी रहते थे जिनका निवास तीन बत्ती,वालकेश्वर पर था और गद्दी काज़ी सैयद स्ट्रीट पर। उनके यहाँ दिवाली पूजन लगभग अर्ध-रात्रि को सिंह लग्न में होता था (दिवाली पूजन स्थिर लग्न में करना शुभ माना जाता है तो हम लोग अक्सर शाम को बृष लग्न में करते हैं और नंदू मौसाजी के सिंह लग्न में होता था जो लगभग अर्ध-रात्रि में आती है)।
नंदू मौसाजी के यहाँ के दिवाली पूजन का बच्चों में बहुत क्रेज़ हुआ करता था क्योंकि पूजन के बाद वहाँ के नाश्ते में विभिन्न किस्म की खाने की चीजें हुआ करती थीं। सुभाष मामा का घर मस्जिद बंदर, सैमुएल स्ट्रीट के चौथे माले पर हुआ करता था तब (अब तो वो नेपियन सी रोड पर रहते हैं)। मस्जिद बंदर के घर पर जीने के पास एक खिड़की सी थी उसमें से एक छज्जे का रास्ता था जिस पर एक रेल जैसा पटाखा चलाया था जो आज सुभाष मामा के पुत्र विकास से वात करने पर याद आया। हम लोगों ने और भी काफी पटाखे चलाये थे और वहाँ की सजावट के तो कहने ही क्या थे और आखिर मुम्बई तो तब भी मायानगरी ही थी ।
अब कुछ बातें और यादें इलाहाबाद की भी।
जब मैं इलाहाबाद में पढ़ता था तो सन 1979 की दीवाली वहीं मनाई थी। इलाहाबाद में बैंक रोड पर हमारी बड़ी मौसी के यहाँ दिवाली पूजन और फिर पटाखे आदि का कार्यक्रम हुआ था और बैंक रोड पर काफी हम उम्र लोगों के कारण बहुत मजेदार यादें हैं उस दीपावली की परन्तु हॉस्टल की दीपावली के तो कहने ही क्या थे। सर गंगा नाथ झा हॉस्टल के बीच में बने शानदार लॉन में हम लोगों ने काफी पटाखे चलाये थे। हमारे बैच के ही मेरे घनिष्ठ मित्र जो वाणिज्य कर विभाग में एडिशनल कमिश्नर के उच्च पद से रिटायर हुए श्री नारायण अग्रवाल जो दरअसल उन दिनों नटखट नारायण हुआ करते थे उन्होंने उस दिन बहुत हंगामा किया था। हॉस्टल के लॉन में पानी लगाने को लगभग 4 इंच व्यास का एक लोहे का पाइप हुआ करता था और भाई नारायण ने उसके अंदर के बम चलाये थे। जैसे पूत के पांव पालने में दिख जाते हैं वैसे है नारायण अग्रवाल की क्रिएटिविटी के दर्शन हम लोगों को हॉस्टल के पहले साल में ही हो गए थे। उन दिनों की मधुर यादों को आज लगभग 45 वर्ष बाद भी जब याद करते हैं तो मन प्रफुल्लित हो जाता है और दिल कह उठता है कि कोई लौटा दे वो बीते हुए दिन।
शानदार यादे सर,
ReplyDeleteधन्यवाद पर आपका नाम नहीं दिख रहा है।😊
ReplyDeleteV nice
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