Sindbad Travels-2
अगले दिन मैं सुबह जल्द ही उठ कर तैयार हो गया क्योंकि दुबई में लोग 9-10 बजे तक अपने ऑफिस पहुँच जाते हैं और फिर दोपहर 12 से 4 बजे तक सारा कार्य व्यापार बन्द रहता है तथा शाम को 4 से 7 अथवा 8 बजे तक काम का समय रहता है।आज टैक्सी ले कर मैंने पहले "वाफी" की तरफ जाने का कार्यक्रम बनाया।वहाँ बीड्स के कुछ व्यापारी थे उनके गया तथा कुछ और शो रूम्स में भी गया किन्तु नतीजा वही था ढाक के तीन पात।
दुबई में एक बहुत बड़ा मॉल नुमा बाज़ार था अल गुरेर-मैं जब वहाँ पहुँचा तो जैसे एक बार तो भौंचक्का रह गया क्योंकि तब तक अपने भारत में तो मॉल कल्चर आया नहीं था और ये मैंने पहला ऐसा कोई बाज़ार देखा था।बड़ी बड़ी दुकानें,तरह तरह के ब्रांड्स आदि,ये सब मुझे तो एक सपनों की दुनिया सा लग रहा था।दुबई की एक और प्रसिद्ध चीज़ थी और वो थी टी0 चौइथराम नाम से डिपार्टमेंटल स्टोर।ये बहुत बड़ा डिपार्टमेंटल स्टोर था और उस समय शायद संपूर्ण अरब क्षेत्र में ये सबसे बड़े डिपार्टमेंटल स्टोरों में था और अपने देश में तो शायद उस समय ऐसा और इतना बड़ा कोई डिपार्टमेंटल स्टोर और उसकी चेन नहीं ही थी,कम से कम मेरी जानकारी में तो नहीं ही थी और हाँ उस डिपार्टमेंटल स्टोर में शायद दुनिया की अधिसंख्य चीज़ें उपलब्ध थीं और वो भी बहुत ही मुनासिब दामों पर।दुबई का एक और बाजार था और जो कि वहाँ का प्रमुख बाज़ार था वो था दुबई म्यूज़ियम के पीछे।ये बहुत बड़ा बाजार था लगभग दिल्ली के लाजपत नगर के बाज़ार जैसा और इसमें सभी प्रकार की दुकानें थीं।इस बाज़ार से मैंने एक वीडियो कैमरा खरीदा जो उस समय के हिसाब से एक विशेष चीज़ थी।
जब मुझको दिन में भूख लगी तो वैसे तो वहाँ सभी प्रकार का भारतीय भोजन उपलब्ध था जैसे दक्षिण भारतीय व्यंजन के लिए "दास प्रकाश"उत्तर भारतीय के लिए "चोटीवाला"आदि इत्यादि लेकिन मैंने
फला-फल खाई।
फला-फल एक तरह की रोटी होती है जिसमें अंदर सब्जी भरी होती है और उस रोटी को सब्जी भर के रोल किया होता है।ये एक लेबनानी व्यंजन है।मेरे लिए नया व्यंजन होने के अतिरिक्त मुझको ये दो और वजह से भी बहुत अच्छी लगी एक तो ये शाकाहारी थी और मैं विशुद्ध शाकाहारी हूँ-अंडा भी नहीं खाता,दूसरे ये सस्ती भी थी और हाँ स्वादिष्ट भी।
एक और बात जिसने मेरा ध्यान आकृष्ट किया वो थी दुबई की हरियाली।पूरे शहर में,चौड़ी चौड़ी सड़कों के किनारे खूब हरियाली और पेड़ थे।जब मैं कहीं पैदल जा रहा था तो मैंने गौर किया कि इन पेड़ों और हरियाली के पास जाने पर एक अजीब सी गंध आती है,इस विषय में जब जानकारी की तो मालूम पड़ा कि वहाँ इस सब हरियाली की सिंचाई के लिए वो लोग सीवर के पानी को प्रोसेस करके उसका उपयोग करते हैं जिस कारण उन पेड़ों आदि के पास जाने पर कुछ गंध सी महसूस होती थी।वहाँ सिंचाई का कुछ ऐसा सिस्टम दिखा कि एक निश्चित समय पर छोटे छोटे स्प्रिंकलर जो वहीं छिपे हुए से लगे होते हैं उनसे थोड़ी देर को पानी स्वत: ही चालू हो जाता और फिर बन्द भी हो जाता।मैं दुबई में और अन्य अरब देशों में भी वहाँ की हरियाली और उसके प्रति वहाँ की सरकार की चेतना और व्यवस्था से बहुत प्रभावित हुआ।मेरे मन में लगातार ये बात आ रही थी कि हमारे देश में हम लोग कितने खुश किस्मत हैं कि हमारे यहाँ गर्मी है,जाड़ा है,बसंत है और बरसात भी है,हरियाली भी खूब थी किन्तु हम को इन मौसमों की आनंददायक ख़ूबसूरती और अपने सुंदर मनोरम पर्यावरण की सही कदर नहीं है तभी यहाँ मैं ये सोचने पर मजबूर था कि इन अरब देशों के policy makers और उनको लागू करने वाले अपने काम के प्रति कितने निष्ठावान,अपने पर्यावरण के प्रति कितने जागरूक हैं कि इन्होंने अपने रेगिस्तान में भी हरियाली खड़ी कर ली और एक हमारे यहाँ का हाल है कि हम लोग वर्षों से जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्रवाद आदि के झगड़ों को प्राथमिकता दे रहे हैं और पर्यावरण को इतना नज़रअंदाज़ कर रहे हैं कि ना जाने कितने हिस्से और इलाके जो हरे भरे होते थे वो आज रेगिस्तानों में तब्दील होते जा रहे हैं।
दुबई में काफी चतुर्वेदी परिवार रहते हैं और अधिकतर मथुरा से आये हुए हैं और वहाँ बहुत अच्छा कर रहे हैं।दुबई में शहर के दो हिस्सेनुमा हैं।एक को बर दुबई कहते हैं और दूसरे को डेरा।बर दुबई से डेरा जाने को एक रास्ता तो पुल से होकर था और दूसरा समुद्र में बोट से जिसको वहाँ की लोकल भाषा में अबरा कहते हैं।समुद्र के ऊपर का पुल बहुत शानदार और विशाल था और खास बात ये थी कि जब पानी के जहाज का निकलने का समय हो तो वो पुल एक हिस्से में पूरा ऊपर उठ कर खड़ा सा हो जाता था।इस पुल को बाद में कुछ हिंदी फिल्मों में भी फिल्माया गया है।
जहाँ से अबरा चलते हैं वहीं समुद्र के एक कोने को वहाँ रहने वाले चतुर्वेदी लोग मथुरा का यमुना जी का "विश्रांत घाट"कहते थे।
वहाँ जाकर चतुर्वेदी लोग हाथ जोड़ कर जैसे मथुरा में "जय जमुना मैय्या की"कहते हैं वैसे ही हाथ जोड़ कर "जय जमुना मैय्या की" कहते हुए प्रसाद अर्पित करते हैं।ये देख कर मुझको लगा कि व्यक्ति भले ही रोजी रोटी कमाने के लिए अपना घर छोड़ दे लेकिन उसकी जड़ों की याद और उसके संस्कार उसमें बने रहते हैं और वो किसी न किसी रूप में उन यादों को जिंदा बनाये रखना चाहता है।यहाँ भी चौबे लोग समुद्र में ही अपनी जमुना मैय्या की परिकल्पना करके संतुष्ट हो लेते हैं।वहाँ के घरों में भी मुझको अपने देश की झलक खूब दिखी।जिन शरद चतुर्वेदी भाईसाहब के मैं रुका था उनके घर में एक तोता पाला हुआ था और तुलसी जी भी थीं।
दुबई में मैं श्री कृष्ण जी के मंदिर भी गया वहाँ भगवान की फोटो स्थापित थी और बिल्कुल अपने देश की तरह पूजा पाठ होता था और आरती प्रसाद भी।उस मंदिर के पास ही के हिस्से में शिव जी के मंदिर में मैंने दूध भी चढ़ाया।
मतलब ये है कि मुझको ऐसा लगा कि दुबई में एक छोटा सा हिंदुस्तान बसा हुआ है और जो लोग वहाँ अपनी रोज़ी रोटी या बेहतर जीवन चर्या और बेहतर सुख सुविधा आदि के कारण रह रहे हैं वो खूब सुखी हैं,सम्पन्न भी हैं लेकिन उनका दिल अभी भी अपने देश हिंदुस्तान में ही है और इसीलिए यहाँ विदेश में भी उन्होंने अपने घरों में,अपने कार्यालयों में और अपने दिलों के कोनों में एक छोटे से भारत को बसा रखा है और अपनी सांस्कृतिक विरासत को पूर्णतयः जीवित और जीवंत रखा हुआ है।दरअसल जो भी भारतीय विदेश में रहते हैं उनकी first generation तो कम से कम अपने देश का जुड़ाव महसूस करती ही है और कई बार ऐसा भी प्रतीत होता है कि इन प्रवासी भारतीयों का शरीर अवश्य विदेश में है लेकिन उनकी आत्मा भारत में ही बसती है
मुझसे दुबई के अपने एक बंधु ने बातचीत में ये भी कहा कि "अतुल भाई,ये दुबई है,इंडिया के करोड़पति की हैसियत भी यहाँ कदम रखते ही मिलेनियर की हो जाती है।"मैंने इसका शब्दार्थ ये लगाया कि दुबई की मुद्रा दिरहम थी और एक दिरहम में लगभग 10 रुपये होते थे उस वक़्त तो उन्होंने सही ही कहा कि 1 करोड़ वालों के 10 लाख ही रह गए वहाँ की करेंसी में।लेकिन हकीकत ये है कि उनके इस उद्गार का भावार्थ कुछ और ही था और वो आगे की यात्रा में जब मैं जर्मनी पहुँचूँगा तब मेरी समझ में आने को था।
उस जमाने में दुबई जाने वाले को जो एक और चीज़ आकर्षित करती थी वो था "जम्बो इलेक्ट्रॉनिक्स" का शो रूम।एक व्यक्ति जिसको बाद में सफल होने के बाद सारी दुनिया ने जाना ये उसके सपनों के सच होने की कहानी बताता है।
Mr. M.R. Chhabariya या जिनको मनु छाबरिया के नाम से भी जाना जाता है उन्होंने 5 लाख रुपयों से भी कम रकम अथवा 50 000 दिरहम से अपना
इलेक्ट्रॉनिक्स का व्यापार दुबई में शुरू किया 1974 में और फिर अपने व्यापार में धन और ख्याति दोनों खूब कमाए।बताते हैं कि जब वो कंपनी रजिस्टर कराने गए तो जब कंपनी का नाम तय करना था तो उनको याद आया कि वो जम्बो जेट में बैठ कर आये थे तो उन्होंने अपनी कंपनी का नाम जम्बो इलेक्ट्रॉनिक्स ही रख दिया।वो बाद में कतिपय विवादों में भी रहे लेकिन जम्बो इलेक्ट्रॉनिक्स की सफलता की कहानी एक भारतीय नौजवान के सपनों की उड़ान के हकीकत में बदलने की कहानी है,आज जम्बो इलेक्ट्रॉनिक्स कई बिलियन डॉलर की कंपनी है।
दुबई की एक और चीज़ ने मुझको आश्चर्यचकित किया वो थी वहाँ का "गोल्ड सूक"अथवा सोने का बाज़ार।इस बाज़ार में लाइन से न जाने कितनी दुकानें हैं और उनमें सोना और सोने के जेवरात भरे पड़े हैं।एक पूरे बाज़ार में चारों तरफ सोना ही सोना और वहाँ सारी दुनिया से लोग खरीदारी करने आते हैं।एक बार में तो सहसा विश्वास ही नहीं होता कि इतना बड़ा एरिया सिर्फ सोने के जेवरातों और कीमती आभूषणों से भरा हुआ है और किसी को कोई भी किसी भी किस्म की असुरक्षा की भावना नहीं है।हाँ,मैंने ये जरूर महसूस किया कि वहाँ भारत या अन्य एशियाई देशों के जो लोग थे वो मोटरसाइकिल पर चलने वाली पुलिस जिसको वहाँ की भाषा में "सुरता"कह रहे थे उस से थोड़ा भय खाते थे।मुझसे भी एक सज्जन ने कहा था कि सुरते से दूर रहना और आंखें मत मिलाना।
दुबई में वहाँ के सत्ताधीशों,policy makers और नीतियों को लागू करने वालों की विद्वता का एक और कमाल देखा।उस जमाने में भी वहाँ व्यापार करने वालों को बहुत सुविधाएं थीं।कोईआयकर,बिक्री कर नहीं था,कोई सरकारी झमेले और harassment & red tapism भी नहीं।
इन सब वजहों से और चूंकि दुबई उस क्षेत्र के एक प्रमुख व्यापारिक केंद्र के रूप में विकसित होता जा रहा था इसलिए भी बहुत से लोग वहाँ कंपनी खोल कर व्यापार करना चाहते थे।वहाँ की सरकार ने उस समय ये नियम बना रखा था कि कोई भी व्यक्ति यदि कंपनी खोलना चाहे तो उसको वहीं के लोकल अरबी नागरिक को पार्टनर बनाना पड़ेगा और उस अरबी नागरिक का हिस्सा 51% से कम नहीं हो सकता।सरकार अपने नागरिकों को व्यापार के लाइसेंस जारी करती थी और उन लाइसेंसों के ऊपर वो अरबी इन फर्मों में पार्टनर बनते अर्थात साल की एक निश्चित रकम इन अरबी लोगों को उस कंपनी से मिलती।इस प्रकार से सरकार ने अपने नागरिकों की बिना काम किये भी आय की व्यवस्था की हुई थी।
बहुत से लोग वहाँ ऐसा व्यापार भी करते हैं कि अपने स्टॉक में माल तैयार रखते हैं और वहाँ आस पास के देशों जैसे ईराक आदि और बहुत से अफ्रीकी देशों से लोग अपनी बोट लेकर आते हैं और नगद पैसे देकर सामान हाथों हाथ लेकर अपनी बोट भरकर चले जाते हैं।ये बोट बहुत बड़ी बड़ी भी होती हैं।ये व्यापार अधिकतर खाने पीने की वस्तुओं, मसालों, गरम मसालों और दैनिक उपयोग की वस्तुओं का ज्यादा होता है।इसमें लाभ ये है कि भारत में हम लोग अफ्रीका के कई देशों से व्यापार करना avoid करते हैं क्योंकि वहाँ के पेमेंट और बैंकिंग सिस्टम की विश्वसनीयता संदेहास्पद लगती है लेकिन जिन लोगों ने दुबई में ऑफिस खोले हुए हैं वे इन सब चिंताओं के बिना नगद में ही अपना काम कर लेते हैं।इस प्रकार के छोटे,मझोले और नगद वाले बड़े व्यापारी भी ऐसी खरीदारी करने भारत नहीं आते हैं क्योंकि भारत उनके यहाँ से दूर पड़ता है और इतनी दूर फुटकर किस्म की या नगद किस्म की खरीद के लिए हर हफ्ते या पंद्रह दिन पर आना संभव नहीं होता है।इसके अलावा एक बात और भी महसूस हुई कि संयुक्त अरब अमीरात/दुबई की सरकार और वहाँ के नीति निर्माताओं ने इस प्रकार का सिस्टम बना दिया है जिसमें व्यक्ति सभी तरह के व्यवधानों के बिना भयमुक्त वातावरण में अपना व्यापार कर सकता है और वहाँ सभी आधुनिकतम सुविधाएं और आधारभूत सुविधाएं सभी के लिए उपलब्ध हैं तो इन कारणों से भी विभिन्न देशों के लोग वहाँ अपना केंद्र बना कर व्यापार करते दिखते हैं।
दुबई मैं इसके बाद बहुत बार आया और खूब व्यापार भी हुआ किन्तु वो बाद की कहानी है और उन बातों को आगे कभी विस्तार से लिखूंगा क्योंकि अभी बात सिर्फ इसी यात्रा की।
दुबई से आबूधाबी के लिए शेयरिंग टैक्सी चलती हैं सो अगले दिन मैं शेयरिंग टैक्सी पकड़ कर आबूधाबी को निकल पड़ा।उस समय हमारे भारत में ऐसी सड़कें और इस किस्म के हाइवे और एक्सप्रेसवे नहीं थे जैसे आज हैं तो 6 लेन सड़क देख कर भी मैं चमत्कृत सा ही था।इस प्रकार की सड़क पर और विदेशी बड़ी गाड़ी में चलने का अनुभव ही कुछ अलग था क्योंकि अभी भारत में विदेशी और उन्नत किस्म की गाड़ियों का युग शुरू होने को था।
आबूधाबी में मैं सीधे मिस्टर मत्तार के ऑफिस पहुँचा।ये वही अरबी सज्जन थे जो मुझको दिल्ली से दोहा की फ्लाइट में मिले थे और आबूधाबी की सरकार में कार्यरत अधिकारी थे।
उनसे मेरी फोन पर बात हो चुकी थी और वो बड़ी उत्सुकता से मेरी प्रतीक्षा कर रहे थे।मैं जैसे ही वहाँ पहुँचा वो बहुत प्रसन्न हुए।पहले चाय पानी हुआ फिर वो मुझको अपने बॉस से मिलवाने ले गए जो आबूधाबी की सरकार में किसी किस्म के सेक्रेटरी या अति0सचिव के पद पर थे।उन लोगों से विभिन्न विषयों पर बहुत देर बात होती रही और वहाँ की संस्कृति तथा भारत की ज्योतिष पर भी काफी बातचीत हुई।जब बात व्यापार की हुई तो उन दोनों ने मुझसे कहा कि तुम यहाँ आबूधाबी में काँच की एक फैक्ट्री खोल लो और हम तुरंत हर प्रकार की मदद करेंगे तो मैंने उनको धन्यवाद देते हुए बड़ी विनम्रता पूर्वक मना किया और कहा कि ये अभी मेरी scheme of things में नहीं है।इस पर उन सचिव महोदय ने मिस्टर मत्तार से कहा कि इनको इनक्यूबेटर का ऑर्डर दे दो।मैंने उनसे इस विषय में जानकारी ली तो मालूम पड़ा कि मुर्गी के अंडों को सेने के लिए इंक्यूबेटर्स की बड़ी डिमांड थी उसका ऑर्डर मुझको दिया जा रहा था।मैंने उसके लिए भी विनम्रता पूर्वक धन्यवाद देते हुए मना कर दिया।उनको लगा कि ऑर्डर मुझको छोटा लग रहा है मैं इसलिए मना कर रहा हूँ तो उन्होंने मुझसे कहा कि ये बहुत बड़ा ऑर्डर है और तुम जितना तुम्हारे लिए संभव हो उतना कर लो।मैंने कहा कि बात ये नहीं है जो आप समझ रहे हैं बल्कि बात ये है कि मैं पूर्णतः शाकाहारी हूँ और मैं ये मुर्गी,अंडे,चूज़े आदि का व्यापार कतई करना नहीं चाहूंगा चाहे मुझको इसमें कितना भी लाभ और पैसा मिले, इस कारण से मैं इसको नहीं करूंगा।उन दोनों ने मेरी भावना को समझा और कहा कि फिर आप हम लोगों से आगे जो मदद चाहें वो बताइयेगा और हम जरूर आपकी मदद करेंगे।कुल मिलाकर आबूधाबी यात्रा अच्छी रही किन्तु व्यापार कुछ नहीं हुआ।उनलोगों ने अपनी शानदार मर्सडीज़ गाड़ी से मुझको दुबई वापिस छुड़वाया।उनकी गाड़ी जब रोड पर 160 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से भी तेज चली और ये सिर्फ गाड़ी का मीटर देख कर ही पता चल रहा था तो मैं ये देखकर विस्मय से भर गया।
आबूधाबी में मुझको अपने दिल्ली की कुछ झलक सी लगी क्योंकि यहाँ चौड़ी सड़कें,खूब सारे पेड़,बहुत अच्छी हरियाली और काफी कुछ खुला खुला सा था जबकि दुबई ऐसा लगा कि अपना मुम्बई ही है बस थोड़ी सुंदरता और सफाई ज्यादा है।
इस प्रकार से दुबई,आबूधाबी यानी कि संयुक्त अरब अमीरात में चार दिन बीत गए थे,एक ऑर्डर भी हो गया था यानी काम का श्री गणेश हो गया था और अब कल तैयारी थी बहरीन यात्रा की।
Bohot shandar aur inspirational post
ReplyDeleteलिखते रहिये ... लिखते रहिये ... बहुत रस और ज्ञान मिल रहा है ... आप एक अच्छे लेखक हैं और अपनी भावनाएं सही रूप में पाठकों को संप्रेषित कर लेते है ... अगले अंक का इंतज़ार रहेगा !!
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