Sindbad Travels-4

दोहा-कतर

जहाज में उदघोषिका ने बताया कि हम लोग दोहा पहुँच गए हैं और फिर थोड़ी देर में ही वीसा लेकर,इमीग्रेशन की औपचारिकताएं पूरी कर मैं दोहा हवाई अड्डे के लाउंज में पहुँचा और वहाँ मुझको वो महोदय मिल गए जिन्होंने मेरे लिए वीसा करवाया था.दरअसल जैसा मैं पहले ज़िक्र कर चुका हूँ कि मुझको अपने सुभाष मामा से भी कुछ business contacts के पते मिले थे।मैंने उन सभी लोगों से संपर्क किया था,उनमें से बहुत कम लोगों ने respond किया था और दोहा के ये व्यापारी जिन्होंने मेरा वीसा करवाया उन्हीं में से एक थे।

इस्माइल शेख यानी कि जिन्होंने मेरा दोहा का वीसा करवाया था वो अपनी बहुत बड़ी सी गाड़ी में मुझको साथ लेकर सीधे दोहा शेरेटन होटल की तरफ चल पड़े जहाँ उन्होंने मेरे ठहरने की व्यवस्था की थी।रास्ते में वो मुझसे मेरे व्यापार और products के विषय में बात करते रहे।उन्होंने ये भी बताया कि उनका व्यापार मूलतः खाने पीने की चीज़ों जैसे मसाले,गरम मसाले,केचअप सॉस,अचार आदि किस्म की चीज़ों का है और दुबई सहित कई अरब देशों में उनके ऑफिस हैं।आगे बातचीत में उन्होंने मुझको बताया कि दोहा के शेख/अमीर/राजा ने ये होटल बनवाया है और दाम भी ज्यादा नहीं रखे हैं ताकि लोग बिना किसी दिक्कत के रुक सकें।उस समय उस होटल का रेट 40 USD प्रति दिन था और डॉलर लगभग 28 या 30 रुपये का था।इस्माइल शेख लगभग मेरी उम्र के अर्थात लगभग 28-29 वर्ष के रौबीले लेकिन शालीन व्यक्तित्व के मालिक थे।उन्होंने कहा अब मैं जा रहा हूँ,आप आज आराम करिये कल सुबह 8:30 बजे मैं आपको ले चलूँगा।

इस्माइल शेख के जाने के बाद मैंने अपने कमरे में जाकर सबसे पहले तो चाय पी और फिर कमरे की विंडो से ही दोहा का नज़ारा देखा।कमरा काफी ऊपर की मंज़िल पर था तो उस से नीचे के स्विमिंग पूल को देखा जो शायद 5वीं या और ऊपर की मंज़िल पर था(इतना समय हो जाने के कारण ठीक ठीक याद नहीं)जो कि बहुत ही सुंदर था।दोहा में चारों तरफ बिल्डिंग  तो  दिखीं  लेकिन  बहुत congested नहीं प्रतीत हुआ बल्कि थोड़ा दूर देखने पर खाली खाली सा ही लगा।रात हो चली थी सो अगले दिन के विषय में सोचते हुए न जाने कब आँख लग गयी पता ही नहीं चला।

सुबह मेरी नींद नई जगह के excitement में जल्दी ही खुल गयी और 8:30 बजे तक मैं स्नान ध्यान और ब्रेकफास्ट करके तैयार था और तभी इस्माइल शेख भी आ गए।उनके साथ अपने सैम्पिल लेकर मैं चल पड़ा।

पहले हम लोग एक व्यापारी के ऑफिस गए,इस्माइल शेख ने उनसे बात करके मेरा परिचय कराया और फिर मैंने उनको कुछ सैम्पिल दिखाए।उन्होंने बीड्स के सैम्पिल देखे लेकिन वो लोग ग्लास बीड्स जापान से मंगाते थे और हमारी क्वालिटी उस स्तर की नहीं थी सो बात नहीं बनी।

अब हम लोग वहाँ से निकले तो इस्माइल शेख मुझको एक रेस्टोरेंट में ले गए और बोले कुछ खा लीजिए।हम लोगों ने कुछ सैंडविच आदि खाया और इस्माइल शेख ने कहा बेब्सी भी ले लीजिए तो पहले तो मैं समझा नहीं पर दरअसल वो पेप्सी पीने को कह रहे थे।बाद में मालूम पड़ा कि अधिकतर अरबी लोग पेप्सी को बेब्सी ही कहते हैं क्योंकि उनकी भाषा में इसका उच्चारण बेब्सी ही है,जैसे रमज़ान का रमदान।मैंने ये भी नोट किया कि अरबी लोगों का बोलने का तरीका हम लोगों से कुछ अलग है और बोलने में वे लोग गले का उपयोग अधिक करते हैं।

अब हम लोग एक और शो रूम में पहुँचे।शो रूम में घुसते ही मेरी आँखें चौंधिया सी गयीं।शो रूम था कि पूरा शहर था,कम से कम 25 से 30 हजार वर्ग फुट में बना हुआ और वो भी 2 या तीन मंज़िल का शो रूम था।उसकी सीलिंग कम से कम 25 फिट की थी।उसमें जो chandeliers लगे थे ऐसे मैंने अपने जीवन में और फिल्मों तक में नहीं देखे थे।बीचों बीच पानी के जहाज की शेप का एक chandelier जो टँगा था वो बहुत ही विशाल था और उसका मेटल फ्रेम इतनी गजब की गोल्ड प्लेटिंग का था कि चारों तरफ चमकते सोने और उसमें बीच में क्रिस्टल के नगीनों की लड़ी और उसमें से चमकती  हुई  लाइट्स  एक   बहुत  ही  majestic किस्म का नज़ारा प्रस्तुत कर रहीं थीं और वो भी इतना आकर्षक कि निगाह हटाये न हटे और कीमत का तो पूछना ही क्या हम लोगों की सोच के भी बाहर की थी।उस जहाज के इर्द गिर्द बहुत से अन्य छोटे - छोटे झाड़ फानूस भी टँगे थे।यहाँ छोटे से मेरा तात्पर्य 10-12 फुट के डायमीटर से है।कोई फूल की शेप का तो कोई कार की शेप का तो कोई पुराने टाइप के झूमरों की शेप का लेकिन सब एक से एक आलीशान और सोने की चमक से दमकते हुए।उसी शोरूम में ऊपर के फ्लोर पर उन्होंने कई फर्निश्ड model बेड रूम्स और ड्राइंगरूम्स भी बना रखे थे उनमें ऐसा फर्नीचर और पलंग आदि पड़े थे जो मुझको यह कहने में कोई गुरेज नहीं कि मैंने तो तब तक इतनी आलीशान चीज़ें अपने देश में कहीं देखी नहीं थीं।दरअसल तब तक भारत में economy open न होने के कारण विदेशी सामान जिसमें झाड़ फानूस भी शामिल है इतनी आसानी से हर जगह मिलते/बिकते/दिखते नहीं थे।मेरा कहने का मतलब ये है कि अपने देश में हो सकता है इस किस्म के झाड़ फानूस आदि कहीं रहे भी हों तो भी मैंने कहीं नहीं देखे थे।मेरी समझ में ये भी आ गया कि यहाँ मेरा तो कोई आइटम इस शो रूम के स्तर का है ही नहीं तो ये मुझसे क्यों खरीदेंगे।

अब दोपहर हो चली थी तो इस्माइल शेख ने मुझको वापिस होटल छोड़ दिया और कहा कि 4 बजे उनकी कार मय ड्राइवर के मुझको लेने आएगी और उनका एक मैनेजर आएगा जो मुझको और व्यापारियों के पास ले जाएगा और फिर शाम को 7:30 बजे के लगभग हम उनके ऑफिस पहुंचेंगे।होटल आकर मैंने दोपहर का भोजन किया और वहाँ के प्रचलन के हिसाब से थोड़ा आराम भी किया।

4 बजे उनकी गाड़ी आ गयी और साथ में उनके मैनेजर वर्गीज़ साहब(परिवर्तित नाम) थे जो केरल से थे।वर्गीज़ साहब बहुत समय से दोहा में थे और इसी कंपनी में थे।उन्होंने बताया कि यहाँ के लोग बहुत ईमानदार और सीधी बात करने वाले हैं।उन्होंने बताया कि इस्माइल शेख और इनके पिता जी इब्राहीम शेख दोहा के बहुत बड़े लोगों में हैं और इनका कारोबार बहुत फैला हुआ और अच्छा है।हम लोग 2-3 शो रूम्स पर गए और वर्गीज़ साहब के साथ होने के कारण सबने बहुत अच्छे से बातचीत और व्यवहार किया किन्तु व्यापार नहीं बना।वर्गीज़ साहब के साथ घूमने पर मुझको महसूस हुआ कि जैसे उनको दोहा में सभी लोग जानते थे।और हाँ लगभग हर व्यापारिक प्रतिष्ठान में अरबी मालिक के साथ मुख्य कर्ताधर्ता केरल के ही लोग मिले।शो रूम्स तो मैंने बहुत बड़े-बड़े और अच्छे देख लिए थे लेकिन मन निराश था क्योंकि काम कुछ बना नहीं था और अगले दिन सुबह यहाँ से चल ही देना था।यहाँ मुझको अपने नरेश मामा की याद आ रही थी।मैं सोच रहा था कि वो तो 1970 के दशक की शुरुआत से ही अरब देशों में खूब काम कर रहे हैं और यहाँ बहुत तरह का सामान बेचते रहे हैं वो। मैं यही सोच रहा था कि उन्होंने भी न जाने कितनी मेहनत करके कितने चक्कर काट कर यहाँ माल बेचने में सफलता पाई होगी।मुझको याद आ रहा था नरेश मामा का बातचीत में अक्सर ये कहना कि "I have worked very hard."अब उनके इस वाक्य का असली मतलब और महत्व मैं वास्तविकता में समझ पा रहा था।

7:30बजते बजते हम लोग इस्माइल शेख के ऑफिस पहुँच गए।अब तक मैं और इस्माइल शेख काफी friendly हो चुके थे।इस्माइल शेख ने मुझको अपने वालिद साहब इब्राहिम शेख से मिलवाया जो उनके प्रतिष्ठान और व्यापार के मुख्य मालिक थे।इस्माइल शेख कद काठी से अच्छे व्यक्तित्व के थे और अरबी ड्रेस में तो उनकी पर्सनैलिटी और शानदार लगती थी लेकिन उनके पिताजी तो बहुत ही लहीम शहीम थे,लगभग 6 फुट लंबे और तगड़े।भारत से दोहा पहुँचते पहुँचते लोगों की शक्लों में भी परिवर्तन आने लगा था।
दुबई,आबूधाबी और बहरीन में ये फर्क इतना महसूस नहीं होता था लेकिन दोहा,कतर के लोगों को देख कर आप ये पहचान सकते थे कि शक्लोसूरत कुछ फर्क हैं,कुछ भारी से चेहरे,भरे हुए बदन,चौड़े कंधे और थोड़ा फर्क नाक,नक्श,भवों और आँखों में भी दृष्टिगोचर होता था।

इस्माइल शेख ने मुझको सुस्त देखा तो पूछा कि क्या बात है my friend,दोहा में आपको कोई दिक्कत हुई क्या?तो मैंने कहा कि बात और कुछ नहीं है न कोई दिक्कत हुई बस व्यापार नहीं मिला इसलिए मन थोड़ा उदास है।इस पर उनके पिता इब्राहीम शेख ने उनसे अरबी भाषा में कुछ बात की तो इस्माइल शेख उठे और अलमारी से निकाल कर कुछ कागज़ात उन्होंने मेरे सामने रख दिये।मैंने कहा कि ये क्या है तो वो बोले कि हम भारत से जो सामान मंगाते हैं ये उनकी invoices हैं,आप इस में से जो भी चीज़ सप्लाई करना चाहो वो इन्हीं रेटों पर हमको सप्लाई कर दो।मैंने वो कागज देख कर उनसे कहा कि भाई ये तो सॉस, कैचअप, अचार,जैम चावल आदि चीज़ें हैं और कम से कम अभी तो मैं
न इन वस्तुओं में डील करता हूँ और
ना ही इनके विषय में कुछ जानता हूँ सिवाय इनको खाने के।ये सुनकर वो लोग हँसने लगे।फिर इस्माइल शेख ने कहा कि अच्छा अपने सैम्पिल निकालो।मैंने कहा परंतु आप लोग तो इन products में deal   नहीं करते हैं इस पर इस्माइल शेख ने कहा अभी तक नहीं करते हैं पर अब करने लगेंगे."Mizder.Adul you are a friend now and we will not let you go empty handed from Doha."
और थोड़ी देर में 2500 USD का ऑर्डर लिखा जा चुका था।इस ऑर्डर में झाड़ फानूस,ऐश ट्रे,flower vases और आगरा के संगे-मर-मर के handicrafts के आइटम थे और वो हमारे ब्रांड "Raghav India" की लिखी हुई पैकिंग में लेना उन्होंने पसंद किया था।मतलब अब अपना सामान अपने brand name के साथ
दोहा-कतर में भी बिकेगा ये बात मुझको काफी खुशी दे रही थी।

इसके बाद इस्माइल शेख ने मेरे लिए बेब्सी मंगाया और मुझको अपनी कार में बैठा कर दोहा दिखाने ले चले।कतर दक्षिण में सऊदी अरब से लगा हुआ है और उस भूभाग के पश्चिमी तट पर तीन तरफ से फारस की खाड़ी से घिरा हुआ है।प्रति व्यक्ति आय के हिसाब से कतर विश्व के समृद्धतम देशों में है।यहाँ के बाजारों में महिलाएं खूब घूमती हुई दिखीं और अधिकांश के चेहरे खुले थे किंतु वस्त्रों में बहरीन जैसा खुलापन नहीं दिखा।हम लोग दोहा शहर के बाहर भी गए।बाहर जाकर बिल्कुल सुनसान सा माहौल था लेकिन सड़कें बहुत अच्छी थीं।दोहा में मौसम गर्म और  उमस भरा भी था।कतर बिल्कुल रेगिस्तान में ही बसा हुआ है इसलिए वहाँ का मौसम भी अधिकतर बहुत गर्म ही रहता है किंतु वहाँ तेल की समृद्धि ने इतनी सुविधाएं उपलब्ध करा रखी हैं कि वहाँ रहने वालों को मौसम की दुश्वारियां परेशान नहीं करती हैं.कतर की मुद्रा कतरी रियाल है जो इस समय लगभग (1 कतरी रियाल में ) 17-18 रुपये के बराबर है और 1991 में इस से काफी कम थी किन्तु दोहा प्रवास में मेरा एक रियाल भी अभी तक खर्च नहीं हुआ था।

इस्माइल शेख ने बताया कि कतर में राजपरिवार की गाड़ियों पर अलग प्रकार की नंबर प्लेट होती है जिस से वो अलग से मालूम पड़ें लेकिन ट्रैफिक नियम सबके लिए हैं।एक बात मैंने सभी अरब देशों में महसूस की कि वहाँ के लोगों में अपने राजा के प्रति काफी सम्मान है और लोगों की रोजमर्रा की ज़िंदगी में शासन-प्रशासन का कोई दखल नहीं है और वहाँ आम तौर पर कोई VIP culture भी नहीं है।बाद में अपनी 2005 की एक दुबई यात्रा में मैंने खुद दुबई के शासक शेख को अपनी रोल्स रॉयस कार से  जाते देखा।हम लोग की कार एक फ्लाई ओवर से उतर रही थी मैं अपने मामाजी के लड़के समीर के साथ था जो दुबई में ही रहते हैं।समीर ने मुझसे कहा कि अतुल दादा वो रोल्स रोयस देखिए इसमें दुबई के शेख जा रहे हैं जो खुद कार चला रहे थे और उसके पीछे एस्कॉर्ट में सिर्फ एक कार थी जिसके ब्लिंकर्स जल रहे थे।कोई वीआईपी गीरी नहीं थी।बाद में समाचारों से मालूम पड़ा कि उस दिन सऊदी अरब के शाह की मृत्यु हो गयी थी और दुबई के शेख उसी के लिए कार से जा रहे थे।हाँलांकि इन सभी अरब देशों में जहाँ अभी तक मैं गया था एक बात common थी कि
वहाँ के लोगों को राजनीति अथवा
शासन-प्रशासन से कुछ लेना देना नहीं था और  वहाँ की व्यवस्थाएं भी कुछ ऐसी थीं कि उन लोगों को इसकी कोई आवश्यकता भी महसूस नहीं होती थी साथ ही वहाँ चोरी और भ्रष्टाचार की भी कहीं कोई चर्चा नहीं सुनी।

खैर तो मैं बात कर रहा था दोहा की तो अब रात को डिनर आदि करा के
और एक बेब्सी और पिला कर इस्माइल शेख ने मुझको 11 बजे होटल में छोड़ा और कहा कल सुबह 10 बजे तैयार मिलूं एयरपोर्ट चलने को।इस्माइल शेख को बेब्सी बहुत पसंद था।

सुबह तैयार होकर ब्रेकफास्ट आदि करके मैंने होटल वालों से बिल की पूछा कि कितना पेमेंट करना है तो उन्होंने बताया कि मेरे रहने आदि का पेमेंट इस्माइल शेख कर चुके थे।ठीक दस बजे इस्माइल शेख मुझको लेने आ गए।मैंने उनसे पूछा कि आपने होटल का पेमैंट क्यों किया तो वो अपने typical अंदाज़ में बोले "Mizder Adul you are my friend.Not only diz time but whenever you are in Doha you will be my guest."मेरे पास उनसे कहने को शब्द नहीं थे लेकिन मैं सोच रहा था कि दुनिया में कहीं चले जाएं जो भाग्यवान होते हैं उनको दोस्त हर जगह मिल जाते हैं और दोस्ती एक ऐसी चीज़ है जो देश,धर्म,रईसी,गरीबी और भाषाओं की हदें ना जानती है और न मानती है।हम लोग बातें करते करते न जाने कब दोहा एयरपोर्ट आ गए पता ही नहीं चला।विदा लेते समय मेरा मन भर आया,मुझको लगा कि ना जाने कितने अरसे से मैं और इस्माइल शेख एक दूसरे से परिचित थे और दो दोस्त अब बिछड़ रहे थे।मैंने इस्माइल शेख को भारत आने का निमंत्रण दिया और चल पड़ा  सिक्योरिटी चैक की तरफ।

अब तक की यात्रा में दोहा पहली ऐसी जगह थी जहाँ जब मैं आ रहा था तब मेरा यहाँ कोई कैसा भी परिचित नहीं था और अब मैं एक घनिष्ट दोस्त से विदा लेकर दोहा से जा रहा था।

दोहा एयरपोर्ट में मैंने ड्यूटी फ्री का भी एक चक्कर चलते चलते लगाया तो वहाँ मुझको एक चीज़ नयी दिखी वो थी खजूर जिनमें गुठली के स्थान पर बादाम भरे हुए थे।ये खजूर बहुत ही आकर्षक पैकिंग में थे जो आज तो अपने देश में खूब उपलब्ध हैं लेकिन उस समय ऐसा नहीं था।मुझे ये खजूर विशेष लगे इसलिए मैंने इन खजूरों के 3-4 पैकिट घर ले जाने को खरीद लिए और बढ़ चला जहाज की ओर क्योंकि बोर्डिंग का अनाउंसमेंट हो गया था।

अगला पड़ाव था काहिरा,मिस्र(Cairo,Egypt)
जहाँ मेरे लिए अब तक की विदेश यात्रा के सबसे विचित्र अनुभव होने को थे.....

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