Sindbad Travels-5
दोहा से काहिरा की यात्रा शुरू हो गयी थी।जहाज के उड़ कर हवा में आने के बाद मेरे विचार भी पंख लगा कर उड़ने लगे थे।मेरा इजिप्ट में एक सप्ताह रुकने का कार्यक्रम था।इजिप्ट यानी मिस्र जाने को लेकर मैं बहुत उत्साहित था क्योंकि व्यापार तो करना ही था लेकिन मेरी रुचि विभिन्न देशों के इतिहास और संस्कृति में होने के कारण मैंने इजिप्ट के विषय में जो कुछ भी पढ़ा था उसने मुझको बहुत आकर्षित किया था और अब मेरा मन इजिप्ट को साक्षात देख कर वहाँ के विषय में जानने को उत्सुक एवं उत्साहित था।
हम लोग जब पढ़ रहे थे तो “गुट निरपेक्ष आंदोलन” के संदर्भ में मिस्र का नाम “नेहरू-टीटो-नासिर” की तिकड़ी की विरासत के साथ खूब आता था।एक मनोवैज्ञानिक अवधारणा ऐसी बनी हुई थी कि इजिप्ट और यूगोस्लाविया तो भारत के दोस्त हैं मतलब हमारे दोस्त हैं।
मैं सोच रहा था कि कैसे होंगे इजिप्ट के लोग?कैसी संस्कृति होगी?नील नदी दिखने में कैसी होगी?मिस्र की गलियाँ यानी कि streets कैसी होंगीं?मिस्र के पिरैमिड कैसे होंगे?स्फिंक्स नज़दीक से देखने में कैसा लगता होगा?मिस्र के फराओ (Pharaohs) यानी कि प्राचीन राजाओं की ममी (Mummies) कैसी लगती होंगीं?इन सबके अतिरिक्त स्वेज़ नहर आदि न जाने कितनी चीज़ें ऐसी थीं जिनके विषय में सोच सोच कर मैं excited हो रहा था कि अब ये सारी चीज़ें और जगहें मुझको साक्षात देखना नसीब होगा।
हाँ लेकिन इन सबसे बढ़ कर जो मेरी चिंता थी वो थी कि वहाँ के व्यापारी कैसे होंगे?किस वस्तु को बेचने में मुझको सफलता मिलेगी और सफलता मिलेगी क्या?अथवा नहीं मिलेगी?भारत से चलने के पहले कुछ लोगों ने मुझसे ये भी कहा था कि मिस्र में जरा ध्यान से रहना और व्यापार भी जरा सम्हल कर ही करना लेकिन ये बात मेरी समझ में ज्यादा आयी नहीं थी और आती भी क्यों आखिर मैं तो विदेश व्यापार करने की ठान के ही निकला था और अब तो तीन ऑर्डर हाथ में होने के कारण मैं उत्साह से भी लबरेज था।
यही सब सोचते हुए दोहा से काहिरा की यात्रा पूरी हो गयी और हम काहिरा एयरपोर्ट पर थे।ये एशिया से बाहर और अफ्रीका महाद्वीप में मेरा पहला कदम था।जैसे ही जहाज से बाहर निकले तो अब तक की यात्रा में पहली बार ऐसा लगा कि बिल्कुल अपरिचित जगह आ गए हों।वहाँ लगभग सभी लोग अरबी भाषा और वो भी अभी तक के अरब देशों से भी थोड़े भिन्न से accent में बोल रहे थे और शक्लें भी थोड़ी फर्क दिख रहीं थीं।मुझको वहाँ कोई भी अपने देश जैसा यानी कि भारतीय या भारतीय उपमहाद्वीप के रहनेवाला जैसा कोई व्यक्ति एयरपोर्ट पर नहीं दिखा।एयरपोर्ट पर सबसे दृष्टव्य चीज़ थी वहाँ के पुरुषों के सर के बाल जो अधिकांश के काफी घुंघराले और छोटे -छोटे से थे।
एयरपोर्ट में इम्मीग्रेशन क्लीयर करते ही जो चीज़ सबसे पहले दिखी वो एक काउंटर था होटल के लिए।पूछने पर ज्ञात हुआ कि वो लोग एक 5 स्टार होटल “होटल सिआग (SIAG Pyramid) पिरैमिड” की promotional sales भी कर रहे हैं और काफी अच्छे और सस्ते दामों पर ये होटल उपलब्ध है।मैंने सोचा बाहर निकल कर होटल कहाँ खोजता फिरूँगा इसलिए मैंने 40 USD प्रति दिन (night stay and morning breakfast inclusive) में अपने लिए होटल की बुकिंग करा ली।होटल की बुकिंग कराने के बाद कन्वेयर बैल्ट से अपना सामान लेकर कस्टम की तरफ मैं आगे बढ़ ही रहा था कि मैंने क्या देखा कि लगभग 10-15 सुंदर लड़कियाँ नीली स्कर्ट की ड्रेस पहने हुए खड़ी हुई हैं और उन्हीं में से एक लड़की ने मेरी तरफ बढ़ कर एक लाल गुलाब का फूल मुझको दिया और अंग्रेज़ी में कहा “ I am Shireen.you are welcome in Egypt.”मैंने देखा अन्य लड़कियाँ भी और यात्रियों का ऐसे ही स्वागत कर रही थीं।शिरीन लगभग 21-22 साल की एक गोरी सी और अत्यंत आकर्षक,सौम्य और सुंदर लड़की थी।उसकी शक्लो-सूरत हमारी भारतीय लड़कियों से काफी भिन्न नाक नक्श की थी लेकिन उसको देख कर मुझको महसूस हुआ कि जब इजिप्ट की आम लड़की इतनी सुंदर है तो मिस्र की प्राचीन रानियों क्लियोपेट्रा और नेफरिटिटी की सुंदरता के विषय में जो पढ़ा और सुना है वो सत्य ही होगा।आम तौर पर मैंने देखा कि मिस्र के लोगों के माथे थोड़े बड़े दिखते हैं थोड़े खिंचे हुए से उन्नत ललाट,आँखें मध्यम से लेकर बड़ी आमतौर पर बादाम जैसी जो कि अक्सर उनके फराओ यानी पुराने राजाओं के चित्रों में भी दृष्टिगोचर होती हैं और हाँ गाल अधिकतर उभरे हुए और नाक भी काफी सुंदर और अक्सर चेहरे पर prominence लिए हुए ही दिखती है। स्त्रियाँ आम तौर पर थोड़े भारी जिसको स्थूल तो नहीं कह सकते ऐसी कद काठी की होती हैं,आम तौर पर उनके कंधे चौड़े से होते हैं और पुरुष अधिकतर सामान्य लंबाई के,सूर्य की रेगिस्तानी किस्म की गर्मी के कारण जैसे गोरा रंग तप जाने पर ताम्बई या गेहुएं पन पर हो जाये वैसे रंग के अधिकतर स्त्री और पुरुष होते हैं हाँलांकि बहुत सारे स्त्री और पुरुष भी गोरे रंग जैसे भी दिखे।पुरुष अधिकतर दुबले थे पर कुछ भारी कद काठी के भी होते हैं और उनके बाल अधिकांश छोटे और काफी घुंघराले होते हैं।
खैर तो मैं बात कर रहा था शिरीन के विषय में।उसने आगे बढ़ कर मेरा स्वागत किया,हाथ मिलाया और एक लाल गुलाब का फूल दिया फिर उसने बताया कि वो लोग इजिप्ट की सरकार की ओर से पर्यटकों और यात्रियों की सहायता के लिए नियुक्त हैं।उसकी अंग्रेज़ी कुछ ऐसी थी जिसको समझने के लिए काफी प्रयास करना पड़ रहा था,बोलने का तरीका और उच्चारण दोनों काफी अलग किस्म के थे।शिरीन ने मेरे सामान को कस्टम से आराम से क्लियर कराया और मुझसे मेरे काहिरा आने का प्रयोजन पूछा।मैंने उसको बताया कि मैं काँच के मोती और अन्य कुछ चीजों का व्यापारी हूँ और इन वस्तुओं के व्यापार हेतु मिस्र आया हूँ।वो बहुत खुश हुई,फिर उसने पूछा कि आपके लिए होटल बुक करा दूँ तो मैंने उससे कहा कि धन्यवाद होटल तो मैं बुक करा चुका हूँ,मेरे ये कहने पर मुझको ऐसा लगा कि उसका चेहरा कुछ बुझ सा गया किन्तु मैंने उस समय इस बात पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया।अब उसने कहा कि मैं आपके होटल जाने के लिए टैक्सी बुला देती हूँ और मेरे कहने पर उसने एक टैक्सी वाले से अपनी भाषा में बात की और शिरीन से विदा लेकर मैं टैक्सी में होटल जाने को बैठ गया।काहिरा हवाई अड्डे से गीज़ा में होटल “गीज़ा पिरैमिड”(अब शायद नाम बदल कर कुछ और हो गया है) पहुँचने में लगभग 55 मिनट या एक घंटा लगा और टैक्सी वाले ने मुझसे लगभग 170 या 180 इजिप्शियन पाउंड किराए के रूप में लिए और “बख्शीश”अर्थात “टिप”अलग से मांगी (मिस्र की करेंसी Egyptian Pound है और इस समय 1 इजिप्शियन पाउंड में लगभग 3.90 पैसे या 4 रुपये आते हैं और उस समय भी 1 इजिप्शियन पाउंड शायद 2 या 3 रुपये के बीच
का कुछ था)।टैक्सी वाले से बातचीत लगभग असंभव सी ही थी क्योंकि उसको न हिंदी आती थी और न अंग्रेज़ी और उसकी भाषा मैं नहीं जानता था।मेरी समझ में आने लगा था कि काहिरा में मुझको भाषा की गंभीर समस्या आने वाली थी।
होटल में मैंने चेक-इन किया तो उन लोगों ने मेरा पासपोर्ट अपने पास रख लिया और बताया कि कहीं भी पूछे जाने पर मैं होटल का कार्ड दिखा कर बता दूँ कि इस होटल में रुका हूँ और पासपोर्ट वहीं है बाद में मुझको ये समझ में आया कि दुनिया में लगभग सभी जगहों पर होटल वाले अपने विदेशी रुकने वालों के पासपोर्ट अपने पास रख लेते हैं और होटल छोड़ते समय वापिस करते हैं।ये 5 स्टार होटल बेहद खूबसूरत और आलीशान था।होटल की लॉबी बहुत ही ऊंची छत की और विशाल थी और उसमें बीचो बीच एक बहुत ही शानदार chandelier टँगा हुआ था जैसा अपने आगरा के मुगल होटल की लॉबी में टंगा है उस से भी विशाल।स्टाफ बहुत ही शालीन और helpful था।
मैं जब अपने कमरे में पहुँचा तो यहाँ दोपहर हो रही थी लेकिन मुझको बहुत थकान हो रही थी इसलिए मैंने गर्म पानी का फव्वारा चलाया और उसके नीचे खड़ा हो गया ताकि थकान कुछ दूर हो।नहा कर मैं कमरे में बैठा,कमरा बहुत ही सुंदर और आरामदेह था।अब मेरी निगाह कमरे की खिड़की पर गयी मैंने पर्दा हटाया और वाह!क्या नज़ारा था,दूर विश्व प्रसिद्ध पिरामिड दिख रहे थे।हाँलांकि दूरी काफी प्रतीत हो रही थी किन्तु वो दृश्य अद्भुत था।मैंने चाय मंगाई थी और चाय पीते हुए पिरैमिड देख रहा था कि कमरे के फोन की घंटी बजी।मैंने फोन उठाया कि यहाँ मुझको कौन फोन कर रहा है तो मालूम पड़ा कि ये फोन होटल के रिसेप्शन से था।उन लोगों ने कहा कि कोई साहब आपसे मिलने आये हैं तो मैं तो बिल्कुल ही चौंक गया कि इजिप्ट तो मेरे घर से मेरी जानकारी में पुश्तों में कोई नहीं आया तो यहाँ मुझसे मिलने कौन आ गया!!!!!
खैर,मैं नीचे लॉबी में पहुँचा तो एक लगभग 34-35 वर्ष के थोड़े तगड़ी गठीले बदन की बिल्ट के जिनकी लंबाई लगभग 5 फिट 5 या 6 इंच की होगी,चेहरे पर घनी लेकिन लंबी न होकर केवल नाक के नीचे दोनों ओर पूरे होठों को कवर करती मूछें,धूप में तपा हुआ ताम्बई या गेहुएंपन की ओर बढ़ता हुआ रंग,घनी भवें,छोटे और घुंघराले बाल,पैंट और पूरी आस्तीन की शर्त पहने हुए ये व्यक्ति मुझको मिले।उन्होंने मुझसे हाथ मिलाया और अपना परिचय दिया कि ,”मैं मिस्टर मैगदी हूँ (मिस्टर मैगदी का पूरा नाम इसलिए नहीं लिखा है ताकि उनकी पहचान गोपनीय रहे।मैगदी इजिप्ट में काफी common नाम है) और आप यहाँ व्यापार करने आये हैं तो मैं आपकी मदद करूंगा और आपके एजेंट के रूप में कार्य करूंगा।”मेरे ये पूछने पर कि आपको किसने मेरे बारे में बताया और किसने मेरे पास भेजा के जवाब में उनका कहना था कि एयरपोर्ट से government वालों ने उनको भेजा है।मैं ताज्जुब में था और मिस्र की सरकार की व्यवस्थाओं से बहुत प्रसन्न और चमत्कृत भी था कि गजब है ऐसे पर्यटकों और व्यापारियों की सहायता करना पहले एयरपोर्ट पर शिरीन और अब होटल में ये मिस्टर मैगदी मेरी मदद को मौजूद थे।मैंने भी सोचा कि मैं यहाँ के विषय में कुछ जानता नहीं हूँ और भाषा की भी दिक्कत है तो मिस्टर मैगदी की मदद लेने में क्या बुराई है।माल बिक़वाएँगे तो अपना कमीशन लेंगे।उनसे 5℅का कमीशन भी बिक्री के अमाउंट पर तय हो गया।उन्होंने कहा कि सबसे पहले glass beads के बाज़ार चलेंगे- तो कब चलेंगे उन्होंने पूछा, मैंने कहा कि बस मैं अभी कमरे से तैयार होकर आता हूँ।कमरे में पहुँच कर मैंने सोचा कि मैं एक बिल्कुल नई जगह पर और एक बिल्कुल अपरिचित व्यक्ति के साथ जा रहा हूँ और वो भी पता नहीं कहाँ तो कुछ सावधानी तो बरत ही लेनी चाहिए।मैंने होटल के एक पैड पर एक पन्ने पर अंग्रेजी में लिखा कि मैं काँच के बीड्स के मार्केट मिस्टर मैगदी के साथ जा रहा हूँ और यही बात एक अलग कागज पर हिंदी में भी लिख दी।दोनों कागजों पर मिस्टर मैगदी का पता और फोन नंबर भी लिख दिया और अंग्रेजी वाले कागज पर मिस्टर मैगदी का विज़िटिंग कार्ड भी नत्थी कर दिया।इस से मुझको ऐसा लगा कि खुदा न खास्ता मुझको कुछ हो भी गया अथवा कोई दुर्घटना भी हो गयी तो घर वालों को मेरे विषय में सही और पूरी जानकारी तो रहेगी क्योंकि तब मोबाइल फोन आदि तो कुछ थे नहीं।इसके बाद मैं कमरे से नीचे आया और अपने सैम्पिल लेकर हम और मिस्टर मैगदी टैक्सी में सवार हो चल दिये काहिरा शहर की ओर।
ये टैक्सी ऐसी नहीं थी जिसमें खाली हम लोग ही बैठे हों अपितु ये कुछ कुछ अपने यहाँ जैसी स्कॉर्पियो आदि गाड़ी हैं या पहले जैसी क्वालिस आती थी कुछ इस किस्म की थी लेकिन इसका दरवाजा आगे से पीछे स्लाइडिंग जैसा था जैसा अपने यहाँ की मारुति वैन के एक मॉडल में होता था और काहिरा की टैक्सी का ये स्लाइडिंग दरवाजा चलते में खुला ही रहता था।ये गाड़ी रास्ते भर सवारी बैठाती और उतारती चलती थी।जब हम लोग काहिरा शहर पहुँचे तो मैंने पाया कि यहाँ की सड़कें बहुत अच्छी थीं और उस समय तक हमारे देश में सड़कें इतनी अच्छी नहीं थीं।दुबई,आबूधाबी,बहरीन और दोहा की भांति यहाँ भी गाड़ियाँ सड़क के दाहिनी ओर चलती थीं यानी कि left hand drive था लेकिन एक फर्क ये था कि दुबई,आबूधाबी,बहरीन और दोहा में दुनिया की एकदम latest और खूब चमचमाती हुई बड़ी बड़ी cars चारों तरफ दिखतीं थीं,हमारे भारत में भी मारुति और कॉंटेसा अपना जलवा कायम कर चुकी थीं उसके विपरीत यहाँ गाड़ियाँ विदेशी यानी यूरोपीय तो जरूर थीं लेकिन models latest ज्यादा नहीं दिखते थे।खैर अपनी टैक्सी में बैठे हम लोग एक फ्लाईओवर पर चढ़े और मैं ये देख कर दंग रह गया कि ये कितना विशाल फ्लाईओवर था और इस पर एक ही पुल से आप कई दिशाओं में उतर सकते थे।उस समय तक हमारे हिंदुस्तान में ऐसे फ्लाईओवर बनना शुरू नहीं हुआ था और लौट कर मैंने देखा तो मुझको बहुत खुशी हुई कि हमारी दिल्ली में भी लाल किले से दिल्ली विश्वविद्यालय जाने पर एक फ्लाईओवर शाहदरा जाने को ऐसा बना था जिसकी कई भुजाएं थीं (और इस फ्लाईओवर का नाम युधिष्ठर ब्रिज रखा गया था)।जब हमारी गाड़ी काहिरा में फ्लाईओवर से उतर के उसके नीचे सड़क पर आई तो मुझको लगा कि मेरी पीठ पर दाहिने कंधे की तरफ किसी ने बहुत जोर से कुछ मारा या खींचने की कोशिश की।मैं टैक्सी में दाहिनी तरफ सबसे आगे से पीछे वाली सीट पर सबसे किनारे बैठा था और जैसा कि मैंने पहले ही बताया कि गाड़ी का स्लाइडिंग डोर था और खुला था।मुझको लगा कि किसी ने मेरे कंधे से मेरा वीडियो कैमरा छीनने की कोशिश की है एक क्षण को तो मैं कुछ घबरा सा गया लेकिन मिस्टर मैगदी ने हँसते हुए मुझको दिखाया कि पुल के ऊपर से कुछ बच्चे नीचे लोगों को पानी भरे गुब्बारे मार रहे थे और हँस रहे थे और ऐसा ही एक गुब्बारा मेरी पीठ पर भी लगा था।ये देख कर मुझको सहसा अपने देश की याद आ गयी और मैंने राहत की सांस ली।
काहिरा की लोगों से भरी सड़कों पर से गुजरते हुए मैं मंत्रमुग्ध सा चारों ओर देख रहा था।रास्ता बताने वाले एक बोर्ड पर मैंने अल-अज़हर यूनिवर्सिटी लिखा देखा।इस विश्व प्रसिद्ध अल अज़हर यूनिवर्सिटी की स्थापना सन 970 के आस पास, यानी अबसे लगभग 1000 वर्ष पूर्व, हुयी थी और ये विश्व के प्रसिद्ध शिक्षा संस्थानों में अपना स्थान रखती है ।अल अज़हर यूनिवर्सिटी विश्व में इस्लामिक शिक्षा के प्रमुख केंद्रों में से एक है।इस विश्वविद्यालय की तरफ जाने वाला road sign देख कर मुझे मौलाना आज़ाद याद आ गए जो हमारे देश के स्वतंत्रता संग्राम के नायकों में एक थे और उनकी विद्वता का सब लोहा मानते और सम्मान करते थे।मौलाना आज़ाद स्वतंत्र भारत के शिक्षा मंत्री भी रहे थे।मौलाना आज़ाद इस
अल-अज़हर विश्वविद्यालय के भी पढ़े हुए थे ऐसा मैंने कहीं पढ़ा था।ना मालूम क्यों मुझको इस अल-अज़हर यूनिवर्सिटी के बोर्ड को देख कर एक अंदरूनी खुशी सी महसूस हुई और कुछ लगाव सा भी प्रतीत हुआ,ऐसा लगा कि इस नाम को तो मैं न जाने कब से जानता हूँ।वहाँ से जुड़े मौलाना आज़ाद हमारे स्वतंत्रता संग्राम के श्रद्धेय नायकों में से थे इसलिए ऐसे विश्व प्रसिद्ध शिक्षण संस्थान के लिए मन में स्वतः ही श्रद्धा के भाव उमड़ पड़े।
अब हम लोग काहिरा के खान अल-खलीली ( स्ट्रीट ) बाज़ार पहुँच चुके थे।ये काहिरा का बहुत प्राचीन बाज़ार है जिसकी शुरुआत 14वीं शताब्दी यानी लगभग 600 वर्ष पूर्व में हुई बताते हैं।वहाँ के दुकानदारों से बात करके मालूम हुआ कि कई लोग और कई दुकानें इस बाज़ार में ऐसी हैं जो कि 500 या 600 वर्षों से पुश्त दर पुश्त से यहाँ और इसी व्यापार को कर रहे हैं।जरा इस बात को सोच कर देखिए कि आप एक ऐसी दुकान पर बैठे हैं जो 500 या 600 साल से लगातार खुलती है और आज जो व्यक्ति यानी कि उस दुकान के मालिक जो आपके सामने बैठे हैं इसी दुकान पर कभी इनके बाबा और उनके बाबा और उनके भी बड़े बाबा बैठा करते होंगे।मुझको तो इस बात के सोचने मात्र से रोमांच हो उठा था।मुझको एहसास हो रहा था कि आखिर मिस्र की सभ्यता दुनिया की सबसे पुरानी सभ्यताओं में ऐसे ही नहीं कही जाती है और हाँ बड़ी बात ये थी कि उन लोगों ने अपनी इस विरासत को सहेज कर रखा हुआ था और उनको इस पर गर्व भी था।हमारे हिंदुस्तान में भी ऐसे बहुत से परिवार होंगे जिनके घर/मकान पुश्तैनी हैं,खुद फ़िरोज़ाबाद में हमारे परिवार का जो पुश्तैनी मकान है उसका 500 वर्ष से अधिक का इतिहास है और हमारे परिवार के अरविंद भाईसाहब आदि कुछ सदस्य अभी भी उस मकान में निवास कर रहे हैं और भी ऐसे कुछ लोगों के विषय में मैं जानता हूँ जो अपने अति प्राचीन घरों में पुश्त दर पुश्त रहते आ रहे हैं जैसे फ़िरोज़ाबाद में हरीश चतुर्वेदी जी (हरीश मामा का मकान ये भी सैकड़ों साल पुराना है और वो लोग इसमें अभी भी रहते हैं) लेकिन खान-अल-खलीली स्ट्रीट बाज़ार की खास बात ये थी कि यहाँ पूरा बाज़ार लगभग 600 साल पुराना है और उसमें जो दुकानें हैं उनके मालिकों के परिवार लगभग इतने ही यानी कि 600 वर्षों से इन दुकानों पर कारोबार करते आ रहे हैं।खान अल-खलीली बाज़ार में बहुत तरह की दुकानें थीं कुछ पर हुक्के बिक रहे थे जिनमें काँच के भी थे,कुछ पर और Egyptian artifacts बिक रहे थे।काँच,सिरेमिक आदि की वस्तुओं में नीले और फिरोज़ी रंग की वस्तुओं की बहुतायत थी और सफेद या क्रीम कहूँ तो ज्यादा उचित रहेगा तो क्रीम कलर के ऐलाबस्टर के पत्थर के बने मिस्र के पिरैमिड,रानियों की मूर्तियां,स्फिंक्स आदि के छोटे छोटे प्रारूप भी बिक रहे थे।इसके अतिरिक्त वहाँ काँच के कुछ छोटे खिलोने और हुक्के आदि चीज़ें एक बहुत ही translucent किस्म के काँच की भी थीं जिनको देख कर ऐलाबस्टर जैसे पत्थर की वस्तु होने का आभास होता था और ये वजन में बहुत ही हल्की थीं। काँच के बीड्स जहाँ भी दिखे हम उन दुकानों पर गए लेकिन उनके यहाँ भी जापान का माल अधिक था और मेरी भरपूर कोशिशों के बावजूद भी मेरे रेट उनके मोतियों से ज्यादा ही थे ऐसा क्यों था ये मैं उस वक़्त समझ नहीं पाया लेकिन नतीजा ये रहा कि ऑर्डर नहीं मिला।
इसके बाद हम काहिरा की एक और पुरानी स्ट्रीट अल मोइज स्ट्रीट पर स्थित दुकानों पर गए।अल मोइज स्ट्रीट काहिरा की सबसे पुरानी सड़कों में से है ,ये एक किलोमीटर के करीब लंबी सड़क है और कमाल की बात ये है कि ये लगभग एक हजार वर्षों से भी ज्यादा पुरानी सड़क है।अल मोइज स्ट्रीट के दुकानदारों से बैठ कर खूब बातचीत हुई किन्तु prices पर फिर बात नहीं बनी।मिस्टर मैगदी एक अच्छे translator साबित हो रहे थे हाँलांकि उनको मेरी और मुझको उनकी अरबी नुमा अंग्रेज़ी समझने में खासी मशक्कत करनी पड़ रही थी।
इसके बाद मिस्टर मैगदी मुझको कुछ और इलाकों में ले गए जहाँ की गलियाँ फ़िरोज़ाबाद के सहपऊ बूरा वालों की गली(रघुवर गली)या लोहियान गली अथवा शीतल खाँ इलाके की गली नंबर 7,इलाहाबाद की खुशाल पर्वत,मालवीय नगर या लोकनाथ जैसी चौक की गलियों,दिल्ली के चाँदनी चौक और सदर बाजार की गलियों और मुंबई के मस्जिद बंदर इलाके की सैमुएल स्ट्रीट या काज़ी सैय्यद स्ट्रीट और चकला स्ट्रीट जैसी गलियों को भी मात दे रही थीं।
रात हो रही थी और मैं और मिस्टर मैगदी काहिरा की गलियों में कंधों पर सैम्पिल लादे glass beads के व्यापारी खोजते घूम रहे थे।लंबी,पतली घुमावदार गलियों में दोनों तरफ ऊँची ऊँची इमारतें और दोनों ही तरफ उन इमारतों की बहुत ऊँची और विशालकाय दीवारें थीं जो कई जगहों पर तो बड़े विशाल और बेहतरीन सजावट के गेटों से युक्त थीं तो बहुत सी जगहों पर ऊँची सीधी और सपाट सी थीं और उन गलियों की दीवारों में ही थोड़ी थोड़ी दूरी पर थोड़ी ऊँची बनी और सीढियाँ चढ़ कर वो दुकानें थीं जिनमें हम सैम्पिल दिखाते घूम रहे थे।आखिर में ये लगा कि बहुत देर हो गयी है तो मैंने कहा अब अगले दिन प्रयास करेंगे अभी होटल चला जाये।दरअसल इतनी रात को काहिरा की वो अजीबोगरीब गलियाँ मानो मुझसे ये कह रही थीं कि बहुत देर हो गयी है अब वापिस जाओ।
आज देर तक घूमने का एक कारण यह भी था कि वैसे तो मेरा काहिरा में एक सप्ताह रुकने का प्लान था लेकिन आने वाले अगले दो दिन शुक्रवार और शनिवार थे और सप्ताह के इन दो दिनों में मिस्र में साप्ताहिक छुट्टी रहती है ऐसा मुझे बताया था और शुक्रवार तो सब काम काज बन्द था ही।इसलिए ये आने वाले दो दिन घूमने के थे और व्यापार इसके बाद ही होना था????
मैंने मिस्टर मैगदी के पूछने पर उन से भी कह दिया था कि अब अगले दो दिन मैं इजिप्ट और काहिरा खास तौर से घूमूँगा फिर काम करूंगा।
अब हम लोगों ने एक टैक्सी गीज़ा यानी अपने होटल के लिए की।होटल की काहिरा शहर से दूरी लगभग पौने एक घंटे के आसपास की लगभग 24-25 किलो मीटर की थी।रास्ते में इलाका काफी सुनसान भी था और रात काफी हो चली थी कि तभी शहर से थोड़ा बाहर निकल कर मिस्टर मैगदी ने कार रुकवा दी।मैंने पूछा कि क्या बात है तो वो बोले कि मेरा घर यहीं पर है और मैं यहीं उतरूंगा तो मैने उनसे कहा कि भाई इतनी रात हो रही है और ये टैक्सी वाला अंग्रेज़ी नहीं जानता है तो मुझको तो बहुत दिक्कत होगी आप होटल तक चलो और यही टैक्सी आपको छोड़ देगी,पैसे मैं दे दूंगा,लेकिन वो नहीं माने।उतरते हुए मिस्टर मैगदी ने कहा कि मेरे आज के पैसे दीजिए।अब मेरी चौंकने की बारी थी।मैंने पूछा कि पैसे किस चीज़ के तो वो बोले कि मैंने आज पूरे दिन आपके लिए काम किया है इस चीज़ के पैसे चाहिए।मैंने कहा कि भाई आपसे तो ये तय हुआ था कि जो ऑर्डर मिलेगा आप को उस पर कमीशन देंगे और ऑर्डर कोई हुआ नहीं है अभी तक तो पैसे कैसे लेकिन अब तक मिस्टर मैगदी की बोली की सौम्यता गायब हो चुकी थी और उसकी जगह एक किस्म की चिड़चिड़ाहट ने ले ली थी,उनकी आवाज़ में एक प्रकार का खुरखुरापन आ गया था और वो बोले कि ऑर्डर और कमीशन की बाद में देखी जाएगी अभी तो मुझको मेरे आज के पैसे चाहिए।खैर मैं कर ही क्या सकता था सो मैंने उनके बताए अनुसार लगभग तीन सौ इजिप्शियन पाउंड यानी कि लगभग 20-25 USD या 800-900 रुपये उनको दिए हाँलांकि उनकी इच्छा और असफल प्रयास तो ये था कि मैं उनको कम से कम 50 USD तो दे ही दूँ(उस समय USD लगभग 28-30 रुपये का था) और तभी वो बोले 100 पाउंड और दीजिए,मैंने पूछा कि ये किस लिए तो वो बोले सुबह मैं टैक्सी से आपके पास आया ये उस के किराए के।मैंने झल्लाते हुए ये भी दे दिए और सोचा कि चलो अब इनसे पिंड तो छूटा।टैक्सी ने थोड़ी देर में ही मुझको होटल पर छोड़ दिया लेकिन टैक्सी वाले ने भी मेरा पिंड तब ही छोड़ा जब उसने भी मुझसे टैक्सी के किराए के अलावा अपनी “बख्शीश”यानी कि tip ले ली।रात का खाना कुछ स्नैक्स किस्म का और फला-फल मैं रात को बाज़ार में मिस्टर मैगदी के साथ खा ही चुका था सो अब होटल के कमरे में पहुँचते ही काफी थका होने के कारण मैं तुरंत सो गया।
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