Sindbad Travels-3

दुबई से बहरीन जाने के लिए मैं दुबई हवाई अड्डे कुछ पहले ही पहुँच गया था तो सोचा कि कुछ देर दुबई की विश्व प्रसिद्ध ड्यूटी फ्री शॉप्स भी देख ली जाएं।मैंने वहाँ जो चीज़े देखीं वो सभी उस समय की आधुनिकतम वस्तुएं थीं चाहे वो परफ्यूम हो,सिगरेट या शराब हो अथवा कोई अन्य वस्तु।वहीं पर एक तरफ एक मर्सडीज़ गाड़ी का लेटेस्ट मॉडल खड़ा हुआ था।वहाँ लोग 100 दिरहम की लॉटरी ख़रीद कर एक स्लिप वहाँ रखे एक बॉक्स में डाल रहे थे और बाद में लॉटरी में जीतने वाले को वो कार मिलनी थी।
फ्लाइट की घोषणा हुई और सब प्रक्रिया पूरी करके मैं फिर जहाज़ में था।जहाज़ में मैंने देखा कि बहुत सारे अरबी नागरिक भी थे।बाद में मुझको किसी ने बताया कि ये एक आम बात है।चूंकि अरब देशों में शराब पर पाबंदी है तो बहुत से लोग एक अरब देश से दूसरे अरब देश की अंतरराष्ट्रीय उड़ान में चले जाते हैं जो आम तौर पर आधे,एक से डेढ़ घंटे तक की होती हैं और उनमें चूंकि शराब serve होती है तो एक स्थान से दूसरे देश जाते में पीते हैं और फिर वहीं एयरपोर्ट से वापिस अपने देश लौटते में भी पीते हैं और अपने घर जाकर सो जाते हैं।तो इस कारण अरबी लोग इन international flights में काफी दिखते थे और वो एयरपोर्ट से बाहर भी नहीं निकलते थे बस वहीं से पहुँचे और वापिस।
मैं अपनी दुबई यात्रा और व्यापार के बारे में सोचता हुआ ही बहरीन पहुँच गया।वहाँ का एयरपोर्ट भी काफी अच्छा था परंतु दुबई जैसा नहीं।वहाँ एयरपोर्ट पर अरबी ज्यादा दिखे भारतीय बहुत कम।एयरपोर्ट पर रतन कपूर साहब मुझको लेने आ गए थे और हम लोग उनके घर पहुँचे।वहाँ पर भाभी और रतन कपूर भाईसाहब के मम्मी और पापा भी थे।उनके पापा इलाहाबाद विश्वविद्यालय के (जूलॉजी/बॉटनी) विभाग में प्रोफेसर थे और बैंक रोड पर ही रहते थे।इलाहाबाद में बैंक रोड पर ही मेरी मौसी और मौसाजी स्व0प्रो0 रामस्वरूप चतुर्वेदी जी रहते थे।मौसाजी इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में प्रोफेसर थे और बाद में विभागाध्यक्ष भी रहे।इस कारण इलाहाबाद में बैंक रोड मेरे लिए दूसरे घर जैसा ही था।रतन कपूर जी के मम्मी और पापा से खूब बातचीत हुयी और इलाहाबाद की यादें ताज़ी हुईं।रतन भाईसाहब के छोटे भाई रवि और मैं इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में एक ही बैच के थे।उनके घर पर सबसे मिलकर बहुत अच्छा लगा।उनका घर बहुत ही सुंदर था।

थोड़ी देर में मैं अपने सैम्पलों का पिटारा लेकर निकल पड़ा तिजारत के लिए।
जब मैं मनामा में बाज़ार पहुँचा तो थोड़ी देर में ही पता चल गया कि यहाँ भी माल बेचना आसान काम नहीं है लेकिन मैं खरीदार खोजता रहा। अफसोस ये रहा कि आज के दिन कोई सफलता नहीं मिली।

अगले दिन सुबह फिर बाज़ार में पता करके मैं बीड्स यानी काँच के मोती वालों की दुकानों पर पहुँचा।वहाँ एक दुकान पर एक नौजवान अरबी लड़के से बात हुई तो उन्होंने कहा कि मेरे फादर अभी आपसे बात करेंगे।थोड़ी देर में उनके फादर से मुलाकात हुई।उन्होंने काँच के मोतियों में रुचि दिखाई तो मैंने उनको पुरदिलनगर से जो मोती मैं ले गया था वो दिखाने शुरू किए।ये मोती मैंने बहुत खूबसूरत ढंग से चार्ट रूप में भी सैम्पिल बना कर रखे थे और प्लास्टिक की छोटी छोटी डिब्बियों में भी रुई में लपेट कर।मुझसे मेरे सुभाष मामा जो खुद भी एक्सपोर्ट के व्यापारी थे उन्होंने एक बार कहा था कि एक्सपोर्ट में presentation का बड़ा महत्व है।सैम्पिल भी बहुत अच्छे से पेश करने चाहिए।खैर उन अरबी लोगों से खूब बातचीत हुई,जो उस नौजवान के पिता थे उनकी काबिलियत देख कर मैं दंग रह गया,उनका काफी बड़ा कारोबार था और उनका लड़का उनकी सहायता करता था जब वो सैम्पिल देख रहे थे।वो एक एक मोती हाथ से छू कर देखते और उसके डिटेल मैं उनको बताता चल रहा था और उनका लड़का बाकी की बातें उनको बता रहा था और खास बात ये थी कि ये अरबी महाशय आंखों से देख नहीं सकते थे, completely blind थे किंतु product की जानकारी और उस पर उनकी पकड़ गजब की थी।आखिर उनसे  बात बन ही गयी और उन्होंने भी कहा कि take out your order book.और थोड़ी देर में लगभग 1700 USD  का ऑर्डर मेरे हाथ में था।इसके बाद दो-तीन शो रूमों और दुकानों पर मैंने और प्रयास किया किन्तु और सफलता नहीं मिली।

बहरीन एक बहुत ही छोटा टापू नुमा देश है जो समुद्र पर बने एक पुल से सऊदी अरब से जुड़ा है।उस समय बहरीन की आबादी भी 6 या 7 लाख की ही रही होगी और यहाँ भी भारतीयों की संख्या काफी थी किन्तु दुबई से बहुत कम।बहरीन की राजधानी का नाम मनामा है।ये एक साफ सुथरा और सुंदर शहर है।बहरीन की मुद्रा बहरीन दीनार कहलाती है और इस समय 1 दीनार लगभग 170 रुपये की है और उस समय भी लगभग 70-80 रुपये की थी।अन्य अरब देशों की भांति बहरीन भी बहुत सम्पन्न देश है।

बहरीन में बहुत से अस्पताल हैं यानी कि स्वास्थ्य सुविधाएं अन्य अरब देशों के मुकाबले काफी अच्छी बताई गयीं।वहाँ के अमेरिकन हॉस्पिटल में फ़िरोज़ाबाद के हमारे पारिवारिक मित्र परिवार के और मेरे बड़े भाई के समान डाक्टर पंकज गुप्ता भाईसाहब(दुख की बात है कि पंकज भाईसाहब अब इस दुनिया में नहीं हैं) के साढू साहब और साली साहिबा डाक्टर थे।उनसे मेरी फोन पर बात हो चुकी थी और जब मैं उनसे मिला तो बहुत अच्छा महसूस हुआ।वो लोग बड़े ही मिलनसार और सरल स्वभाव के दंपत्ति हैं और खातिर तवज्जो में उनका भी कोई मुकाबला नहीं था।

बहरीन में बाजार अच्छा और खुला खुला सा भी था।वहाँ एक चीज़ पर और ध्यान गया कि इस्लामिक देश होते हुए भी वहाँ काफी खुलापन दिखा।औरतें यदि बुर्का पहने हुए थीं तो बहुत सी महिलाएं पेंट शर्ट अथवा स्कर्ट में भी नज़र आईं।अरबी शेख तो सभी देशों में अपनी चिरपरिचित ड्रेस ही पहनते हैं सो यहाँ भी अरबी पुरुष उन्हीं कपड़ों में दिखते थे।हाँ एक बात और थी कि पुरुषों की इस अरबी ड्रेस को इन अरब देशों में गैर-अरबी देशों के नागरिक नहीं पहन सकते थे और उनके सिर पर बंधे चुटीले किस्म की चीज़ों में कुछ देशों के हिसाब से भिन्नता भी थी.जैसे स्त्रियों के परिधान को हिजाब या बुर्का कहा जाता है वैसे ही अरब पुरुषों के परिधान को थॉब (Thawb or Thobe)या कंधूरा कहा जाता है।

बहरीन दुबई की अपेक्षाकृत थोड़ी महँगी जगह लगी मुझको। मेरा रुकना केवल 3 दिन का था इसलिए अगले दिन मुझको यहाँ से निकल पड़ना था।

इन लगभग तीन दिनों में बहरीन का अनुभव बहुत अच्छा, रहा खास तौर से रतन भाईसाहब के यहाँ उन लोगों ने मेरा जो ध्यान रखा वो मैं कभी भूल नहीं पाऊंगा।

अगले दिन मैं फिर बहरीन के एयरपोर्ट पर था।इस बार यहाँ एक समस्या हुई।सुरक्षा जाँच में जब मेरी अटैची एक्सरे से गुजरी तो उन लोगों ने रोक ली।मुझसे उन्होंने पूछा इसमें क्या है।मैंने उनको बताया कि मैं व्यापार के लिए निकला हूँ और मेरे पास सिर्फ सैम्पिल ही हैं।सुरक्षा वालों का प्रमुख एक अरबी व्यक्ति था वो बोले कि इसमें "तोते की चौंच"जैसी कोई नुकीली चीज़ है,कोई हथियार भी हो सकता है इसको खोल कर दिखाइए।मैं परेशान तो हो रहा था लेकिन क्या करता।अटैची खोल कर सारे सैम्पिल निकाले तो वो अलीगढ़ का पीतल का ढलाई का एक शो पीस का सैम्पिल था जो एक तरफ से कुछ नुकीला सा था।ये देख कर वो संतुष्ट हुए और मैंने सारे सैम्पिल फिर से अटैची में भरे तब जाकर सुरक्षा जाँच पूरी हुई और मैं आगे बढ़ पाया।

बहरीन की ड्यूटी फ्री शॉप का दुबई की शॉप से कोई मुकाबला नहीं था लेकिन थी ये भी अच्छी।

दुबई,आबूधाबी और बहरीन में मैंने ये देखा कि अरबी लोगों के जो ऑफिस हैं उनमें मुख्य कार्यकर्ता मैनेजर आदि अधिकांशतः भारतीय ही थे और उनमें भी केरल के लोग सबसे अधिक थे।उनलोगों में आपसी बातचीत और संबंध मुझको cordial लगे लेकिन हाँ अरबी लोगों में खास तौर से दुबई के में मुझको एक किस्म की feeling of superiority महसूस हुयी।कहीं न कहीं ऐसा लगा कि बहुत सम्पन्न और खुश होते हुए भी भारतीय लोगों में "हम परदेस में हैं" ये भावना झलक ही जाती थी,अधिकतर 1st generation NRIs में।
मैं ये सब बातें सोच ही रहा था कि जहाज की बोर्डिंग की घोषणा हो गयी और मैं जहाज में अपनी सीट पर बैठ कर अब चलने को तैयार था अपनी इस यात्रा के अगले पड़ाव यानी कि "दोहा" कतर की ओर।

Comments

  1. Fir ek shandar anubhav padha aur next experience ka ab besabri se intezar hai

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  2. बढ़िया लगा श्रृंखला का यह लेख अतुल! रवि 9वीं से GIC में और फिर AU में साथ था ..कालांतर में वह हेंडीक्राफ्ट commisioner भी रहा था ! 👍

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