Sindbad Travels-11
Sindbad Travels-11
Egypt-7 Cairo day 2
Sphinks etc.
सिंदबाद ट्रेवल्स-11
मिस्र-7 काहिरा 2सरा दिन
स्फिंक्स आदि
बहुत खोजने पर भी जो घोड़े वाला मुझको पिरैमिडों तक लाया था वो कहीं नजर नहीं आया और धीरे धीरे उसका इंतजार करते मुझको लगभग 45 मिनट हो गए तो मैंने फिर स्फिंक्स देखते हुए नीचे चलने को एक दूसरे घोड़े वाले से बात की और उसके घोड़े पर बैठ कर चल दिया।जैसे ही मैं थोड़ी दूर चल पाया था कि अचानक न जाने कहाँ से वो पहले वाला घोड़े वाला आ गया (जैसे वो कहीं पास ही छुपा हुआ था ) और मुझसे झगड़ने लगा कि मैंने उसको छोड़ कर दूसरा घोड़े वाला क्यों किया।देखते ही देखते वो दोनों घोड़े वाले लड़ने लगे और दोनों अपनी अपनी तरफ से मेरे हाथ तो कभी पैर पकड़ कर अपनी ओर खींचने लगे।मेरी स्थिति बड़ी विचित्र थी कि मैं घोड़े पर बैठा था और कभी लगता कि इधर गिरूंगा तो कभी लगता उधर गिरूंगा और उनको समझाना या उनसे ठीक से बात करना भी लगभग असंभव प्रायः ही था क्योंकि भाषा की समस्या थी।आखिर हार कर मैंने उन दोनों से इशारों में ये कहा कि पहले स्फिंक्स देख लेते हैं फिर दोनों लोग नीचे चलो वहीं बात करेंगे,इस बात पर दोनों शांत से हुए और हम स्फिंक्स की ओर बढ़ लिए।
स्फिंक्स एक 238 फिट के करीब लंबी और 66 फिट के करीब ऊँची पत्थर की मूर्ति है जिसका शरीर शेर का और चेहरा मनुष्य का है।पिरैमिडों के आगे स्फिंक्स की ये विशाल मूर्ति ऐसी प्रतीत होती है जैसे शेर के शरीर और मानव के चेहरे वाली ये मूर्ति यहाँ बैठ कर पिरैमिडों की रक्षा कर रही है।कहा जाता है कि ये मूर्ति सम्राट खूफु के पुत्र फराओ खाफ्रे ने बनवायी थी।कुछ लोगों का तो ये भी मानना है कि स्फिंक्स चेहरा दरअसल फराओ खाफ्रे के चेहरे की ही प्रतिकृति है।स्फिंक्स को ऐसा लगता है कि एक पूरे पहाड़ को काटकर बनाया गया है और उसके लिए मेरे मस्तिष्क में बस एक ही शब्द आया Majestic!!!
स्फिंक्स के सामने घोड़े पर बैठे हुए पर मुझको नेपोलियन बोनापार्ट की वो प्रसिद्ध पेंटिंग भी याद आयी जिसमें वो पिरैमिड और स्फिंक्स के सामने खड़े हुए हैं।मैं भी उसी स्थान पर खड़ा था लेकिन नेपोलियन का घोड़ा शानदार अरबी घोड़ा था और मेरे वाले शानदार घोड़े के कान कुछ बड़े थे।
चूंकि इतिहास मेरा विषय रहा है और मेरी इसमें रुचि भी रही है तो मैं सोच रहा था कि इजिप्ट पर एक जमाने में सीज़र ने हमला किया था तब यहाँ के राजा का नाम टॉलेमी Ptolemy था क्योंकि टॉलेमी ने पौम्पी को मार दिया था,हाँलांकि पौम्पी से सीज़र भी खुश नहीं था किंतु उसको टॉलेमी की ये बात गलत लगी कि उसने रोमन साम्राज्य के वीर पौम्पी को आखिर मारने की हिमाकत कैसे की।यहाँ इस बात का जिक्र इसलिए भी कि टॉलेमी को मारकर ही सीज़र ने प्रसिद्ध क्लियोपेट्रा को मिस्र की रानी बनाया था।भारत में पाटलिपुत्र के सम्राट अशोक के 13वें पत्थर के स्तम्भ(13th rock edict) जो कि 3सरी सदी ई0पू0 का है से मिस्र के राजा टॉलेमी से भारत के संपर्क का पता चलता है।प्राचीन इतिहासकार प्लिनी के अनुसार भी टॉलेमी ने पाटलिपुत्र के मौर्य सम्राट(संभवतः अशोक)के दरबार में डायोनाइसिअस नामक राजदूत को भेजा था।
इन बातों को सोचते हुए मेरे मन में ये प्रश्न भी उठा कि क्या इस से पहले के प्राचीनकाल में भी भारत और मिस्र के बीच संपर्क थे।विचारने पर जवाब हाँ में ही मिला।आज भी सोचता हूँ कि मैंने कभी पढ़ा था कि सिंधु घाटी की सभ्यता में लोथल और मोहन जो दाड़ो में टेराकोटा की जो ममी मिली हैं वो मिस्र की ममियों से मिलती जुलती हैं।ये भी कहीं लिखा है कि इजिप्ट की ममी लपेटने में भारतीय मलमल (Indian Muslin) का इस्तेमाल होता था।जर्मनी के प्रसिद्ध Indologist Peter Von Bohen के अनुसार मिस्र के Hieroglyphics लेखन और वैदिक लेखन में कई जगह काफी साम्य है।इतिहास में ये भी दर्ज है कि मिस्र की रानी हतशेपुत के समय में केरल से मसालों से भरे 5 जहाज इजिप्ट आने की बात कही गयी है।कुछ लोगों ने ये भी जिक्र किया है कि हमारे यहाँ जो यक्ष की प्राचीन मूर्ति पायी गयी है उसमें और प्राचीन मिस्र के देवता “बेस BES” की मूर्ति में काफी साम्यता है।
ये सब बातें मैं सोच रहा था विश्व प्रसिद्ध स्फिंक्स की विशालकाय मूर्ति के सामने खड़ा होकर।स्फिंक्स यानी जिसका सिर मानव का और बाकी का शरीर शेर का था और मुझको याद आ गए अपने भगवान नरसिंह।उनके अवतार में शरीर मानव का और मुख सिंह का है।
प्राचीन काल की लगभग हर सभ्यता में सिंह और मनुष्य के शरीर को एकरूप करके बनाई हुई मूर्तियां और कथाएं मिलती हैं,ग्रीस यानी कि यूनान में भी स्फिंक्स नुमा मूर्ति है और कुछ में पंख भी हैं।दरअसल मेरा मानना ये है कि मनुष्य पृथ्वी के किसी भी भाग में रहा हो उसको शक्ति ने सदैव आकर्षित किया है और यदि मनुष्य में सबसे ताकतवर यानी कि सिंह की शक्ति समाविष्ट होकर एकरूप हो जाये तो उस से ज्यादा शक्तिशाली आखिर किस जीव की कल्पना की जा सकती थी और विविध कालों और स्थानों में इस प्रकार की मूर्तियां,चित्र और कथाएं संभवतः मनुष्य की इसी इच्छा का प्रतिफल थे।आधुनिक काल में भारत की सरकार का राजकीय चिन्ह भी सम्राट अशोक के सिंह स्तम्भ वाला है।इस प्रकार के बहुत से विचार मन में आते रहे और मैं स्फिंक्स की उस विशालकाय मूर्ति और उसके पीछे छूट गए पिरैमिडों को काफी देर अपनी आँखों में भरने का प्रयास करता रहा और फिर यद्यपि मन तो नहीं भरा था किंतु समय हो रहा था इसलिए मैंने कार की तरफ चलने का विचार किया।
इस प्रकार स्फिंक्स को देखने के बाद मैं फिर से उन्हीं घोड़े वालों के साथ चल दिया गाड़ी की तरफ।जब मैं गाड़ी के पास पहुँचा तो ये घोड़े वाले मुझसे पैसों के लिए फिर लड़ने लगे और उनका शोर सुनकर मिस्टर मैगदी जो एक दुकान में बैठे थे वो उस दुकान के मालिक आदि के साथ बाहर आ गए।जब उन लोगों को घोड़े वाला मामला मालूम हुआ तो मिस्टर मैगदी ने मुझसे कहा कि गलती आपकी ( यानी कि मेरी) ही है और आपको दोनों घोड़े वालों को पैसे देने ही होंगे,उनकी ये बात सुनते ही मैं चौंक गया और जब दुकानदारों ने भी उनके ही सुर में सुर मिलाया तो मुझको लगा कि मैं कहाँ फंस गया।बात पैसों की नहीं थी बल्कि परिस्थिति की थी,मिस्टर मैगदी जिनके साथ मैं यहाँ आया था वो खुद घोड़े वालों के पक्ष में थे।मुझको याद आया कि हमारे भारत में भी कई बार अखबारों में विदेशी पर्यटकों को परेशान करने की खबरें होती हैं और कई बार उनके साथ हो जाने वाले हादसों की भी।आगरा में ऐसे बदमाशों को “लपका” कहते हैं।ये पर्यटकों को घेर सा लेते हैं और उसके साथ बस कुछ भी हो सकता है। मुझे लगा कि आज मैं भी मिस्र के “लपकों” के बीच में ही शायद फँस गया हूँ। मैं ये भी सोच रहा था कि जब किसी पर्यटक के साथ ऐसा होता होगा तो उसको कितनी तकलीफ होती होगी।वो पर्यटक तो अपने घर से बहुत दूर नितांत अपरिचित जगह में होता है उस स्थान को देखने और घूमने के लिए और वो और उस जैसे लाखों पर्यटक उस स्थान की आर्थिकी में भी अपने पर्यटन से योगदान देते ही हैं लेकिन जब वो किसी खराब अनुभव से गुजरते हैं तो उनका मजा भी खराब होता है और उस स्थान और वहाँ के लोगों की छवि भी।इसलिए हम लोगों को सदैव पर्यटकों से अच्छा और सही व्यवहार ही करना चाहिए ऐसा मैंने सोचा।घोड़े वालों का शोर जारी था और जिनके साथ मैं आया था वो मेरी बात और समस्या समझे बिना उन्हीं घोड़े वालों के साथ थे लेकिन भारत देश का वासी ये पर्यटक यानी कि मैं भी अब हार मानने वाला नहीं था।
सामने वाले शोरूम में,जिसमें मिस्टर मैगदी बैठे थे और अब उस दुकान के मालिक के साथ ही उन घोड़े वालों के पक्ष में मेरे विरुद्ध खड़े थे,उसमें घुसते हुए मैं बोला,”मिस्टर मैगदी,मैं तो यहाँ से बहुत सा सामान खरीदना चाहता था किंतु ये लोग मूड ऑफ कर रहे हैं।”मेरे इतना भर कहने ने मानो जादुई असर किया ,मिस्टर मैगदी और दुकानदार के चेहरे और आंखें मानो चमक उठे और उन्होंने मुझसे कहा कि,”आप कोई चिंता मत करो,इन मक्कारों को हम देखते हैं।”और ये लीजिए बस दो मिनट में बाहर का शोर शांत था,उन्हीं मिस्टर मैगदी ने दोनों मक्कार घोड़े वालों को संतुष्ट कर के भेज दिया था।मैंने भी दुकान में घुस कर कई किस्म के Egyptian handicrafts के सामान निकलवाये और पैक करने को कहा और इसके साथ ही अपनी जेब टटोलने का उपक्रम करते हुए मैंने मिस्टर मैगदी से कहा कि इस सामान लायक पैसे तो अभी मेरे पास हैं नहीं वो तो मैं होटल में रख आया हूँ सो चलिए पैसे ले आते हैं।मिस्टर मैगदी खुशी खुशी मेरे साथ होटल की ओर चल दिये और उन लोगों के चंगुल से निकल कर मेरी भी जान में जान आयी।हम लोग होटल से थोड़ी ही दूर थे तभी गाड़ी का एक टायर पंक्चर हो गया,मिस्टर मैगदी की गाड़ी में मैं धक्का तो लगा ही चुका था मुझको लगा कि अब क्या घर से दूर काहिरा में इस EXPORTER को कार का टायर भी बदलना पड़ेगा लेकिन मेरी खुशकिस्मती थी कि कार में स्टेपनी थी जिसको मिस्टर मैगदी के ड्राइवर ने बदला।
होटल पहुँच कर मैं मिस्टर मैगदी को नीचे लॉबी में बैठा कर कमरे में आया और कमरा बंद करके आराम से लेट गया।कुछ देर में मिस्टर मैगदी का फोन आया तो मैंने कहा कि,”अभी मेरी तबियत खराब हो गयी है,उल्टी हो गयी हैं और सर दर्द है इसलिए कल चलेंगे सामान लेने।”इस पर मिस्टर मैगदी ने कुछ जिरह भी की लेकिन फिर अगले दिन सुबह 10 बजे का समय तय करके वो चले गए।मिस्टर मैगदी अपने और गाड़ी के आज के पैसे मुझसे पहले ले ही चुके थे।अब मैं अपने कमरे में लेट कर चैन की सांस ले रहा था।
असलियत ये है कि उस समय तक मैं मिस्टर मैगदी आदि के कारण बहुत परेशान हो चुका था और मुझको इजिप्ट में व्यापार का भी कुछ हिसाब किताब दिख नहीं रहा था इसलिए मैंने मन ही मन ये तय कर लिया था कि अब अपना कार्यक्रम परिवर्तित करके यहाँ से जल्दी ही आगे के लिए निकल देना उचित होगा।आज 2017 में जब मैं ये संस्मरण लिख रहा हूँ तो मुझको लगता है कि होटल बदल कर कहीं और चला जाना था किंतु उस समय मैं इतना परेशान हो गया था कि अब वहाँ और रुकने का मन नहीं था।थोड़ी देर में मैं नीचे होटल की लॉबी में गया तो मिस्टर मैगदी जा चुके थे।मैंने होटल वालों से अगली सुबह पूरे दिन के लिए एक टैक्सी मंगाने को बोला और कहा,”भाई देख लेना टैक्सी ठीक हो।”इस पर होटल वाला हँसते हुए बोला,”आप बिलकुल चिंता मत करिए,टैक्सी अच्छी ही होगी।”उस से आगे बातचीत में मालूम हुआ कि आज जिस और जैसी कार में मैं गया था वो टैक्सी नहीं अपितु पर्सनल कार थी,ये बात भी मुझको चौंकाने और दुःखी करने वाली ही थी।
अगली सुबह मेरे कहे अनुसार टैक्सी 7 बजे आ गयी थी और लगभग 7:30 बजे तक मैं टैक्सी में बैठ कर होटल से निकल दिया।ये बहुत ही आरामदायक और अच्छी गाड़ी थी और ड्राइवर भी बहुत ही तहजीब वाला था और अंग्रेजी भी अच्छी जानता था।उसने मुझको बताया कि अलेक्जेंड्रिया, स्वेज़ अथवा फयूम ये तीन जगह देखने लायक अच्छी हैं और इनमें से हम कहीं भी जा सकते हैं।मेरा स्वेज़ नहर देखने का बहुत मन था इसलिए मैंने उस से कहा कि भाई स्वेज़ चलेंगे लेकिन पहले मुझको इजिप्ट एयर के ऑफिस ले चलो।इजिप्ट एयर के ऑफिस पहुँच कर सबसे पहले मैंने अपना टिकट अगले दिन सुबह का लंदन के लिए prepone करवाया और अब हम लोग आगे निकल लिए स्वेज़ शहर के लिए।
आपका यात्रा वृतांत अद्भुत है,कितने तरीके से विभिन्न लोगों के व्यवहार,वहां की सभ्यताओं की जो जानकारी आपने उपलब्ध कराई है वो आगे जाने वाले पर्यटकों के लिए बेहद उपयोगी साबित होगी।आगे की कड़ियों का बेसब्री से इंतज़ार रहेगा ।
ReplyDeleteVery well written travel account.
ReplyDeleteहौसला अफजाई के लिए आप लोगों का बहुत बहुत शुक्रिया!आभार!!Thanks!!!
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