Sindbad Travels-20 England-8

Sindbad Travels-20

England-8
2nd trip

London:-Royal Albert Hall,Big Ben,Palace of Westminster,
10 Downing street

सिंदबाद ट्रैवल्स-20

इंग्लैंड-8
2सरी यात्रा

लंदन:-रॉयल एल्बर्ट हॉल,
बिग बेन,पैलेस ऑफ वेस्टमिंस्टर,
10 डाउनिंग स्ट्रीट

जैसा मैं इस से पहले बता ही चुका हूँ कि होटल के रिसेप्शन से मेरे पास फोन आया कि मेरा क्रेडिट कार्ड काम नहीं कर रहा था।मैंने सबसे पहले भारत अपनी बैंक के क्रेडिट कार्ड वाले अफसर को फोन मिलाया और इत्तेफाक से उनसे बात भी हो गयी।उन्होंने कहा कि भारत में उस समय शुक्रवार की शाम हो चली थी और वो सोमवार के पहले कुछ नहीं कर सकते थे।उन्होंने कहा कि कार्ड तो आपका बिल्कुल ठीक है शायद कम्प्यूटर की कुछ समस्या होगी जिसको आज के सन्दर्भ में कनेक्टिविटी प्रॉब्लम कहा जा सकता है।उन्होंने मुझको वीसा कार्ड वालों से सीधे बात करने को भी कहा।मुझे खुद भी ताज्जुब हो रहा था क्योंकि नया नया क्रेडिट कार्ड के शौक में मैंने दिल्ली से एम्स्टर्डम आते वक्त जब मुझको ज्ञात हुआ कि इस जहाज में फोन की सुविधा उपलब्ध है तो लगभग 35-40 हजार फीट की ऊंचाई पर उड़ते जहाज से जहाज के फोन से क्रेडिट कार्ड का सफल उपयोग कर के मैंने अपने घर बात की थी और अब जरूरत के वक़्त क्रेडिट कार्ड दगा दे गया था।

मैंने होटल के कमरे के फोन से क्रेडिट कार्ड के हेल्प लाइन नम्बर का फोन मिलाया।उधर से जिसने फोन उठाया उसने बड़ी तसल्ली से मेरी सारी बात सुनी और कुछ प्रश्न पूछे तो मैंने कहा कि ऐसे फोन पर तो लंबी बात हो जाएगी आप अपने ऑफिस का पता बता दीजिए तो मैं वहाँ आकर आपसे आमने सामने बात कर लूँ।इस पर वो व्यक्ति बोला कि वह तो हांगकांग में बैठे हैं अब तो मैं और घबरा गया कि मेरा होटल के फोन का बिल तो इतनी देर लंदन से हांगकांग बात करने से बहुत ज्यादा हो गया होगा वैसे भी अच्छे होटलों में होटल के फोन से बाहर बात करना आम तौर पर महँगा ही होता है, लेकिन उधर फोन पर बात कर रहे व्यक्ति ने मुझको आश्वस्त किया कि ये टॉल फ्री कॉल है और इसमें मेरे कोई पैसे नहीं लगेंगे  यह सुन कर मेरी जान में जान आयी।उन्होंने भी यही कहा कि अब जो भी होगा वो सोमवार को ही हो सकेगा।मेरी समस्या हल जरूर की जाएगी लेकिन सोमवार को मेरी बैंक से बात करने के बाद।अब तक मेरा क्रेडिट कार्ड के प्रयोग का भूत पूरी तौर पर उतर चुका था और मैंने बुजुर्गों का ये सिद्धांत फिर से याद कर लिया था कि वक़्त पर सिर्फ अपनी अंटी में पड़ा पैसा ही काम आता है।अब नहा कर मैं होटल के आरामदायक बिस्तर पर लेटा हुआ सोच रहा था कि यदि सोमवार को कोई व्यवस्था नहीं हुई तो कैसे काम चलाया जाएगा।उस जमाने में पैसा भारत से तुरंत ट्रांसफर होने का तो कोई सवाल था ही नहीं।खैर फिर मैंने ये सोच कर अपने मन को तसल्ली दी कि नहीं होगा तो अपने किसी व्यापारी से पैसा मांगा जाएगा या इलाहाबाद वाली बड़ी मौसी के लड़के बीनू दादा से पैसा मंगवाएँगे जो वाशिंगटन,अमेरिका में वर्ल्ड बैंक में कार्यरत हैं।इसके बाद शनिवार और इतवार को लंदन में क्या करना है सोचते हुए मेरी आँख लग गयी।

शनिवार सुबह मैं आराम से सोकर उठा और नहा कर,तैयार होकर सबसे पहले मैंने होटल में सुबह का नाश्ता किया जो अत्यन्त स्वादिष्ट और लज़ीज़ था।मन को क्रेडिट कार्ड और पैसों की चिंता से सोमवार तक के लिए चिंता मुक्त किया क्योंकि मेरी समझ में ये बात आ चुकी थी कि सोमवार के  पहले अब इस विषय में कुछ किया नहीं जा सकता तो परेशान हो कर क्यों दिमाग को कष्ट दिया जाए इसलिए इस समस्या से संबंधित स्विच को  फिलहाल ऑफ कर लेना ही बेहतर था।हाँ तकनीकी कितनी भी उन्नति कर ले उस से जुड़ी समस्या जब उत्पन्न होती है तो काफी दिक्कत कर सकती है ये अनुभव तो प्राप्त हो ही रहा था।

लंदन में काफी स्थान मेरे देखे हुए थे ही तो मेरा मन हुआ रॉयल अल्बर्ट हाल देखने का।बात शायद सन 1974-75 की है लंदन के रॉयल अल्बर्ट हाल में लता मंगेशकर जी का एक म्यूज़िक कंसर्ट हुआ था जो देश के बाहर लता जी का पहला म्यूज़िक कंसर्ट था।इसके LP रिकॉर्ड बने थे और मेरे पास भी वो रिकॉर्ड था।        

तो मैं टॉटेनहम कोर्ट रोड ट्यूब स्टेशन से चल पड़ा High street Kensington स्टेशन के लिए जिसके पास ही रॉयल अल्बर्ट हॉल था।Tottenham Court Road station से central line से चलकर Notting hill station  से circle line change करके मैं लगभग 25 मिनट में High Street Kensington station पहुँचा।स्टेशन से निकल कर लगभग 10-15 मिनट में टहलता हुआ मैं इंग्लैंड के प्रसिद्ध रॉयल अल्बर्ट हॉल तक पहुँचा।

लंदन की सांस्कृतिक दुनिया में रॉयल अल्बर्ट हॉल की एक अलग पहचान है।यह सन 1871 में बन कर पूरा हुआ था और लंदन के इस प्रसिद्ध कंसर्ट हॉल का उद्घाटन महारानी विक्टोरिया ने किया था।ये कंसर्ट हॉल साउथ केंसिंग्टन,लंदन के उत्तरी छोर पर अवस्थित है।इसकी वर्तमान क्षमता लगभग 5200 दर्शकों की है और इसका नाम महारानी विक्टोरिया के पति की स्मृति में रॉयल एल्बर्ट हॉल रखा गया था।समय समय पर इस हॉल में विभिन्न किस्म के सांस्कृतिक कार्यक्रम होते रहते हैं।सन 1933 में इसी हॉल में प्रसिद्ध वैज्ञानिक एल्बर्ट आइंस्टीन ने चर्चित “Einstein meeting” की थी जिसमें विश्व के बहुत से नामचीन वैज्ञानिकों ने शिरकत की थी।इस भवन के विषय में एक मजेदार बात ये है कि द्वितीय विश्व युद्ध में इसको ज्यादा क्षति नहीं पहुँची क्योंकि शत्रु जर्मन सेना के पायलट इसको लंदन का landmark मान कर इस पर हमला नहीं करते थे।

जब मैं इस विश्व प्रसिद्ध रॉयल एल्बर्ट हॉल के पास पहुँचा तो इस हॉल की विशालता और भव्यता ने मुझको काफी प्रभावित किया।विशाल गोलाकार घेरे में स्टेप वार बनी बिल्डिंग,उसमें बड़े बड़े गलियारे और उसमें बड़े बड़े द्वार बने हुए, गोल घेरेनुमा इमारत और बीच में लोहे की छड़ों के ढांचे पर बना शीशे के विशाल गुम्बद की यह इमारत ब्रिटेन के सांस्कृतिक कार्यक्रमों की दो सदियों की गवाह थी।इसका निर्माण कैप्टन फ्रांसिस फौके (Francis Fowke) और मेजर जनरल हेनरी स्कॉट नामक वास्तुविदों ने किया था और यह उस समय की प्रसिद्ध ब्रिटिश Italianate Architectural style में बनाया गया है।

रॉयल एल्बर्ट हॉल के परिसर में खड़े हुए मुझको ग्रामोफोन के उस LP record के स्वर याद आने लगे जिनकी याद ही तो मुझको इस इमारत तक खींच लायी थी।मेरी पत्नी रचना लता मंगेशकर जी की बहुत बड़ी भक्त जैसी ही हैं।वो खुद भी बहुत अच्छा गाती हैं और लता जी की बहुत बड़ी फैन भी हैं।मैंने सोचा कि वो अभी यदि यहाँ मेरे साथ होतीं उस स्थान पर जहाँ देश के बाहर लता जी ने अपना पहला कार्यक्रम पेश किया था तो यकीनन बहुत खुश होतीं।मैं यह सोच ही रहा था कि यकायक मुझको लगा कि मेरे साथ की भीड़ दरअसल सभी दर्शक हैं लता जी के उस कार्यक्रम के और अचानक संगीत की धुन के बीच मिस्टर जूलियस सिल्वरमैन ने जैसे लंदन के लोगों को बताया कि लता मंगेशकर जी भारत के बाहर यह पहला कार्यक्रम नेहरू मेमोरियल प्रोजेक्ट,लंदन के लिए कर रही हैं और इसके लिए उन्होंने कोई फीस नहीं ली है कि तभी लगा कि असंख्य तालियों की गड़गड़ाहट के बीच अभिनय सम्राट दिलीप कुमार साहब अपनी खालिस उर्दू में कह रहे हैं कि नेहरू जी को ‘फुनून ऐ लतीफा या फाइन आर्ट्स ‘ का बहुत शौक था।जब देश के सामने कोई मसला पेश आया तो फ़िल्म इंडस्ट्री आगे आयी और उन्होंने मौसिकी यानी म्यूज़िक कंसर्ट के कई प्रोग्राम करवाये और उन कार्यक्रमों की ‘रूह ऐ रवां’  रहीं हैं लता मंगेशकर।मैं मानो मंत्रमुग्ध सा सुन रहा था दिलीप कुमार को उस भव्य हॉल में हजारों लोगों के बीच अपनी बात कहते हुए और वो कहते जा रहे थे कि  जैसे फूल की खुशबू का कोई रंग नहीं होता,जैसे बहते झरने और पानी का कोई वतन नहीं होता जैसे सूरज की रौशनी और मासूम बच्चे की मुस्कान का कोई मजहब नहीं होता वैसे ही लता मंगेशकर की आवाज़ कुदरत की तख़लीक़ का एक करिश्मा है।लगा कि यह कहते हुए वो लता जी को स्टेज पर बुला रहे हैं कि लता मंगेशकर उनकी एक छोटी सी बहन हैं मुख्तसर सी और फिर जैसे लता जी ने संस्कृत के श्लोक से आरंभ करके अपने गानों से लोगों को मंत्रमुग्ध कर दिया हो।’इन्हीं लोगों ने ले लीन्हा दुपट्टा मोरा’ पर तालियां रुक भी नहीं पाई थीं कि ‘तुम ना जाने किस जहाँ में खो गए’ और फिर ‘ये जिंदगी उसी की है’,’बिंदिया चमकेगी’ आदि के बाद मुझे याद आ रहा था उनका कालजयी गाना,’ ऐ मेरे वतन के लोगो’।मैं अपनी सोच में ऐसा खो गया था कि मुझको लगा ही नहीं कि मैं तो एल्बर्ट हॉल देखने आया हूँ ना कि उस कंसर्ट में हूँ तभी कुछ नौजवान बच्चों का एक ग्रुप मेरे बिल्कुल पास से शोर मचाता गुजरा जिस से मेरा ध्यान टूटा और मैं वर्तमान में लौटा।इस शानदार सांस्कृतिक भवन से अब मैं चल दिया  इंग्लैंड के पार्लियामेंट हाउस पैलेस ऑफ वेस्टमिंस्टर और लंदन की ही एक और प्रसिद्ध इमारत Big Ben की तरफ।

Westminster अंडरग्राउंड स्टेशन से बाहर निकलते ही यह बिग बेन दिखती है।बिग बेन वेस्टमिंस्टर के पैलेस के उत्तरी छोर पर बने घंटाघर और उसके विश्वप्रसिद्ध विशालकाय घंटे को कहा जाता है।

Palace of Westminster इंग्लैंड के संसद भवन को कहा जाता है।यह संसद भवन की इमारत सन 1016 में बनी थी फिर सन 1834 में आग लगने से यह नष्ट हो गयी और 1840-70 में फिर बनाई गई।यह विश्व प्रसिद्ध इमारत गौथिक रिवाइवल की स्टाइल में बनाई गयी है और टेम्स नदी के किनारे पर स्थित है।इंग्लैंड के संसद भवन को इतने पास से देखना एक बहुत ही रोमांचकारी अनुभव था क्योंकि आधुनिक विश्व में  संसदीय प्रणाली लोकतंत्र की शुरुआत यहीं से मानी जाती है और  संसदीय लोकतंत्र के उस मंदिर के पास खड़े होकर उसको निहारना जीवन एक बहुत ही मूल्यवान अनुभव था।इस भवन के सामने खड़े होकर मुझको किंग जॉन के जमाने 1215 का मैग्ना कार्टा याद आ रहा था, जिसका कि इंग्लैंड ही नहीं अपितु संपूर्ण विश्व के लोकतंत्र में एक अलग और बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। मुझको इंग्लैंड की संसद का लोकतंत्र के विकास में योगदान ध्यान आ रहा था किंतु साथ ही साथ में ये भी सोचने पर मजबूर था कि इसी भवन में बैठ कर इसी लोकतंत्र के ठेकेदार सारी दुनिया में साम्राज्यवाद की और मानवाधिकारों के हनन की नई परिभाषाएं भी गढ़ते थे ये भी इसी सिक्के का दूसरा पहलू है।

इस संसद भवन के उत्तरी छोर पर ही बिग बेन है।पहले इसको clock tower कहा जाता था लेकिन अभी हाल ही में सन 2012 में इंग्लैंड की रानी एलिज़ाबेथ द्वितीय की हीरक जयंती के उपलक्ष्य में इसका नाम Elizabeth Tower कर दिया गया है।इस टॉवर की मीनार भी Gothic Revival Architectural style में बनी है।इसकी ऊँचाई 96 मीटर या 315 फिट है।ये घण्टाघर 31 मई 1859 को बन कर तैयार हुआ था।इस मीनार की 11 मंजिल हैं।इसके वास्तुविद का नाम Augustus Pugin था।इस घंटाघर को Prince of Time keepers भी कहा जाता है।इसमें हर 15 मिनट,30 मिनट,45 मिनट पर घंटियां और फिर एक घंटे पर बड़ा घंटा बजते हैं।इसकी गिनती विश्व की सबसे सही समय बताने वाली घड़ियों में है।यह इमारत बलुई रंग के औसटन लाइम स्टोन के रंग की बनी दिखती है।ये चौपहला मीनारनुमा घंटाघर यूनाइटेड किंगडम और वहाँ की संसदीय प्रणाली के प्रमुख प्रतीकों में से एक है।1987 से यह इमारत  UNESCO World Heritage Site में शुमार है।इस घंटाघर से जुड़ा एक मजेदार किस्सा ये भी है कि सन 1949 में ये घड़ी लगभग साढ़े 4 मिनट सुस्त हो गयी थी क्योंकि इस घड़ी की मिनट वाली सुई पर मैनाओं का एक झुंड बैठ गया था।इस घड़ी और इसके घंटे की विशालता का अनुमान इस बात से भी लगाया जा सकता है कि इसके घंटे का मूल रूप से वजन लगभग 16 टन का था।कुछ समय बाद इसके विशाल घण्टे में हल्का सा क्रैक आ गया जो अभी भी है और इसके परिणाम स्वरूप घंटे की आवाज हल्की सी परिवर्तित हो गयी थी।इस घंटे/घंटाघर/मीनार को इसका नाम Big Ben सर बेंजामिन हॉल के नाम से मिला है और यह नाम इस पर अंकित भी है हाँलांकि कुछ लोग इसको उसी समय के प्रसिद्ध हैवीवेट बॉक्सर बेंजामिन काउंट के नाम से भी जोड़ते हैं।

बिग बेन और पैलेस ऑफ वेस्टमिंस्टर से आगे बढ़ कर अब मैं पास ही स्थित 10 नम्बर डाउनिंग स्ट्रीट के पास था।ये मकान और पता है इंग्लैंड या ग्रेट ब्रिटेन के प्रधान मंत्री के सरकारी आवास और कार्यालय का।इसको इंग्लैंड में No.10 के नाम से भी जाना जाता है।ये एक लगभग 300 वर्ष पुराना घर है जो 1684 में बन कर तैयार हुआ था और इसको बनने में लगभग 2 वर्ष का समय लगा था। दरसल Mr.Downing ओलिवर क्रॉमबेल के जासूस थे और इन्होंने इस इलाके में संपत्ति में निवेश किया था और बाद में ये इलाका मिस्टर डाउनिंग के नाम से ही जाना जाने लगा।सन 1732 में किंग जॉर्ज द्वितीय ने सर रॉबर्ट वालपोल को ये घर दिया था जिन्होंने इसको First Lord of Treasury(अब प्रधान मंत्री) का सरकारी आवास बना दिया।ये घर सामने से मात्र एक दरवाजा जैसा दिखता है जिस पर  No.10  लिखा है किंतु इस सादा से दिखने वाले लेकिन गजब के मजबूत इस दरवाजे के पीछे एक अत्यंत विशाल और भव्य इमारत है जिसमें 300 तो कमरे हैं।इसके मुख्य दरवाजे की एक खासियत ये भी है कि ये बाहर से नहीं खुल सकता इसको खोलने के लिए अंदर से ही कोई चाहिए।ये मकान ब्रिटेन की महारानी के आवास बकिंघम पैलेस और ब्रिटिश संसद भवन पैलेस ऑफ वेस्टमिंस्टर दोनों से ही बिल्कुल पास ही है।मैं वहाँ खड़ा होकर सोच रहा था कि इस घर में ही कभी वालपोल,बेंजामिन डिज़राएली, पिट द यंगर,विंस्टन चर्चिल,मार्गरेट थैचर आदि रहते होंगे।

तो मैं आज लंदन की चार प्रसिद्ध इमारते देख चुका था।रॉयल एल्बर्ट हॉल,इंग्लैंड का संसद भवन यानी कि Palace of Westminster, 10 डाउनिंग स्ट्रीट यानी कि ब्रिटेन के प्रधान मंत्री का आवास और विश्व प्रसिद्ध Big Ben.चूँकि मैं इतिहास का विद्यार्थी भी रहा हूँ तो मैं बिग बेन की मीनार की तुलना अपने देश की कुतुब मीनार, अफगानिस्तान की ‘जाम मीनार’, मोरक्को और अन्य देशों की मीनारों से करने लगा किन्तु मीनारों के विषय में विशद चर्चा करूंगा जब इटली की पीसा की मीनार को देखने की यात्रा के विषय में लिखूँगा।

अब मैं काफी थक चुका था और समय भी काफी हो चला था इसलिए रास्ते में फोन से घर बात करते हुए और कुछ  खाना खा कर मैं अपने होटल वापिस आ गया।होटल के कमरे में पहुँच कर मैंने सबसे पहले गरम पानी से स्नान करके अपनी थकान उतारी और फिर बिस्तर पर लेट गया।बिस्तर पर लेटते ही एक बार फिर क्रेडिट कार्ड की समस्या ने अपना सर उठाया किन्तु मुझको मालूम ही था कि इस विषय में जो कुछ भी होना है वो सोमवार को ही होगा इसलिए उस सोच को फिलहाल मैंने तिलांजलि दे दी हाँ बस चिंता यही थी कि सोमवार को ही मुझको मारटौक शहर में अपने व्यापारी से मिलने भी जाना था तो क्या पैसों का इंतज़ाम होगा,यदि हाँ तो कैसे और कब तक?!!यदि इंतज़ाम नहीं हुआ तो क्या करूंगा??और क्या मैं मारटौक जा पाऊँगा?? यही सब सोचते हुए ना जाने कब मेरी आँख लग गयी।

Comments

  1. Beautifully described,I too traveled with you from your description,thanks for arranging my free tour through your description to england

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