श्री गणेशोत्सव:एक विचार

     श्री गणेशोत्सव:एक विचार

भारत में श्री गणेश जी की मान्यता गणपति के रूप में अति प्राचीन है और

श्री गणपति वैदिक देवता माने गए हैं.

ऋग्वेद द्वितीय मंडलके तेईसवेंसूत्र के पहले मन्त्र एवं तैतिरीय संहिता में गणपति का उल्लेख आता है.उनका उल्लेख हम गणेश के रूप में पाते हैं :-

“गणानांत्वा गणपतिं हवामहे

कविं कवीनामुपश्रवस्तमम् ।”

शुक्ल यजुर्वेद के सोलहवें अध्याय के पच्चीसवें मन्त्र में भी गणपति शब्द आया है।
“नमो गणेभ्यो गणपतिभ्यश्च वो नमो नमो व्रातपतिभ्यश्च वो नमो नमो गृत्सेभ्यो गृत्सविभ्यश्च वो नमो नमो विरूपेभ्यो विश्वरूपेभ्यश्च वो नम: ।”

गणपत्युपनिषद में गणेश को ब्रह्म का स्वरूप कहा गया है-

“नमो व्रातपतये नमो गणपतये

नम: प्रथमपतये नमस्तेऽस्तु ।
लम्बोदरायैकदन्ताय विघ्नविनाशिने शिवपुत्राय वरदमूर्तये नमो नम: ।।”

एतेरेय ब्राह्मण 1/21 में गणपति को ब्रहस्पति या बृहस्पतिवाचक कहा गया है।
तैतिरीय आरण्यक में यह मन्त्र आया है.
“तत्पुरुषाय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि तन्नो दन्ति प्रचोदयात ।”

गणेश शब्द की व्युत्पत्ति है ‘गणानां जीवजातानां यः ईशः स्वामी सः गणेशः अर्थात, जो समस्त जीव जाति के ईश-स्वामी हैं वह गणेश हैं। इनकी पूजा से सभी विघ्न नष्ट होते हैं। ‘गणेशं पूजयेद्यस्तु विघ्नस्तस्य न जायते’। (पद्म पुराण, सृष्टि खंड 51/66) पुराणों में गणेश जी के जन्म से संबंधित कथाएं विभिन्न रूपों में प्राप्त होती हैं। इस संबंध में शिवपुराण, ब्रह्मवैवत्र्तपुराण, लिंग पुराण, स्कंद पुराण, पद्म पुराण, गणेश पुराण, मुद्गल पुराण एवं अन्य ग्रंथों में विस्तृत विवरण प्राप्त होता है।

ऐसी मान्यता है कि मंगलमूर्ति भगवान् श्रीगणेश के नाम,स्मरण,ध्यान,जप,आराधना एवं प्रार्थना से मेधा प्राप्त होती है,समस्त कामनाओं की पूर्ति होती है, समस्त विघ्नों एवं दुखों का विनाश होता है तथा उपासक का परम कल्याण भी होता है । इनकी प्रसन्नता से निरन्तर आनन्द, मंगल की वृद्धि होती है.सनातन धर्मालम्बियों में किसी भी मंगलकार्य की शुरुआत श्री गणपति की पूजा से करने का ही प्रचलन है.

महाराष्ट्र में गणेश पूजा का बहुत प्राचीन इतिहास है,सातवाहन,चालुक्य और राष्ट्रकूट शासकों के गणपति पूज्य देव थे और छत्रपति शिवाजी भी श्री गणपति की पूजा करते थे,उनकी माता जीजाबाई ने पुणे में गणपति मूर्ति की स्थापना भी की थी.दक्षिण भारत में भी श्री गणेश जी को कला का देवता माना जाता है और उनकी काफी मान्यता है.उत्तर भारत में भी गणेश पंच देवताओं (गणेश,सूर्य,विष्णु,शिव और दुर्गा) में से एक देवता के रूप में प्राचीन काल से स्तुत्य रहे हैं.शाक्त सम्प्रदाय में भी गणपति अति महत्वपूर्ण एवं पूज्य देव हैं.

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने महाराष्ट्र में राष्ट्रवाद,आपसी भाईचारा और स्वातंत्र्य की भावना के प्रसार और प्रचार के मुख्य उद्देश्य को लेकर प्रतिवर्ष भाद्रपद,चतुर्थी से अनन्त चौदस तक श्री गणेशोत्सव की सन 1893 में शुरुआत करायी थी.इस उत्सव के मनाने के पीछे लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक का उद्देश्य यह था कि समाज के सभी वर्गों के लोगों में मेलजोल और आपसी भाईचारा बढ़ेगा और इस से जातिप्रथा के बंधन भी टूटेंगे और असलियत में भी इस उत्सव ने इन सब उद्देश्यों की पूर्ति में अपना बहुत बड़ा योगदान दिया है.आज़ादी की लड़ाई में इस उत्सव का भी अपना एक महत्वपूर्ण रोल रहा था.यह भी अत्यंत प्रसन्नता का विषय है कि समय के साथ धीरे-धीरे ये उत्सव उसी उत्साह और जोश से अब उत्तर भारत में भी मनाया जाने लगा है. राष्ट्रीय,सांस्कृतिक और सामाजिक एकता की भावना के प्रचार और प्रसार में आज फ़िल्म,टीवी,मीडिया (प्रिंट एवं इलेक्ट्रॉनिक दोनों)और सोशल मीडिया का भी बहुत बड़ा योगदान है.ऐसे उत्सव जब इन्हीं भावनाओं,समझदारी  और जिम्मेदारी से मनाए जाते है तो लोगों को बहुत अच्छा लगता है,उनकी सहभागिता होती है,आनन्द आता है और उपरोक्त उद्देश्यों की पूर्ति भी होती है.

हम को यह उत्सव खूब धूम-धाम से मनाने चाहिए लेकिन लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक और अन्य स्वतंत्रता सेनानियों की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए एक जिम्मेदार नागरिक होने के नाते यह भी ध्यान रखना ही चाहिए कि हम उत्सव अवश्य मनाएं और पूरे उत्साह और जोश से मनाएं, यही नहीं अपितु कोई भी उत्सव और किसी भी धर्म की बात हो,लेकिन इस से उन मरीजों को जो ऐम्बुलेंस में अस्पताल ले जाये जा रहे हैं (जैसे विभिन्न धर्मों के अनेक त्योहार मनाने में सड़क एवं ट्रैफिक काफी देर या कई दिनों को बाधित कर दिया जाता है)अथवा जनसाधारण और उस इलाके में रहने वालों को खास तौर से बुजुर्गों को जो बीमार हैं,कोई असुविधा न हो क्योंकि यदि हमारे किसी कृत्य से किसी अशक्त,असहाय,मरीज अथवा बुजुर्ग को किसी प्रकार का कष्ट होता है तो इस से हमारे ईश्वर,अल्लाह या God कभी प्रसन्न नहीं होते हैं.

हाँ एक बात और आज सड़कों पर श्री गणेश उत्सव के पहले दिन काफी हल्ला गुल्ला और लाउडस्पीकरों के भयंकर बहुत ही जोर के आवाज के शोर को सुनकर एक बार फिर से कबीर दास और उनका वो दोहा याद आ रहा है 'ता चढ़ मुल्ला बांग दे क्या बहरा हुआ खुदा"जो उन्होंने कहा तो  मुल्ला के लिए है लेकिन लागू आज इस शोर पर भी हो रहा है.

आप सभी को एक बार फिर से श्री गणेश चतुर्थी और श्री गणेश उत्सव की बधाई और शुभकामनाएं इस अनुरोध के साथ कि आइए हम सब खूब उत्साह,जोश और खुशी के साथ इस पावन उत्सव को मनाएं और साथ ही एक जिम्मेदार नागरिक की भांति यह भी ध्यान रखें कि हमारे जोश से किसी अन्य नागरिक, बुजुर्ग या मरीज को कोई कष्ट न हो और पर्यावरण का भी ध्यान रखें!

आप सभी को विघ्नहर्ता श्री मंगलपूर्ति और श्री मंगल मूर्ति गणपति उत्सव की बहुत बहुत शुभकामनाएं!!

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