Sindbad Travels-28 France-7 Paris-A few more experiences.
Sindbad Travels-28 France-7
Paris-A few more experiences
सिंदबाद ट्रेवल्स-28 फ्रांस-7
पेरिस-बाद की यात्राओं के कुछ किस्से
जब मेरा एक्सपोर्ट का कारोबार चलने लगा तो मेरी विदेश यात्राएं भी जल्दी-जल्दी होने लगीं और फ्रांस और पेरिस भी कई बार आना हुआ.यहाँ मैं उन दो तीन घटनाओं का जिक्र करना चाहूँगा जो आज भी जब मैं पेरिस का जिक्र करता हूँ तो मेरे मस्तिष्क पटल पर उभर आती हैं.
एक घटना तो सन 1995 की शुरुआत यानी कि जनवरी-फरवरी की है.जैसा मैं पहले जिक्र कर चुका हूँ कि एक्सपोर्ट का कारोबार चलने पर मैंने और मेरे छोटे भाई अभिनव ने विभिन्न देशों में आयोजित होने वाले ट्रेड शो (Trade shows or fairs)में जाना शुरू किया था.हम लोग उसूलन एक ही जहाज में साथ यात्रा नहीं करते हैं और जब गंतव्य एक ही हो तो आगे पीछे की फ्लाइट से जाते हैं.हम लोग फ्रेंकफर्ट,जर्मनी के फेयर में होकर अब पेरिस के लिए जा रहे थे.पेरिस,फ्रांस में हैंडीक्राफ्ट्स का maison n objet नाम से एक बहुत बड़े हस्तशिल्प मेले अथवा ट्रेड फेयर का आयोजन हो रहा था और कार्यक्रम यह था कि हम लोग पेरिस में इस फेयर को अटैंड करेंगे फिर मैं अपनी यात्रा खत्म कर के भारत वापिस लौट आऊंगा और अभिनव कुछ और व्यापारियों से मिलने को यूरोप कुछ और दिन रुकेंगे.जिन शहरों में अंतरराष्ट्रीय ट्रेड फेयर आयोजित होते हैं वहाँ उन दिनों ठहरने की समस्या हो जाती है,होटल सब बुक हो जाते हैं,इस बात को ध्यान में रखते हुए हमने अपने फ्रांस के एक व्यापारी मिस्टर शॉपियाँ से अनुरोध किया और उन्होंने पहले से ही हमारे लिए पेरिस डाउनटाउन में एक काफी अच्छे और महँगे होटल में कमरा बुक करवा दिया था.यहाँ मैं इस बात का उल्लेख करना चाहूँगा कि ये मिस्टर शॉपियाँ फ्रांस की एशिया टाइड कंपनी के मालिक थे,बहुत बड़े व्यापारी और बहुत अच्छे व्यक्ति थे और हाँ खास बात यह भी थी कि जब हमने दिल्ली में पहली बार 1994 में ट्रेड फेयर में भाग लिया था तो ये उसमें हमारे पहले विदेशी/यूरोपीय व्यापारी थे.हमारे एक्सपोर्ट के काम में पहले व्यापारी दुबई के श्री श्याम कपूर साहब थे जेमिनी ट्रेडिंग वाले और यूरोप के पहले व्यापारी ऐशियाटाइड,फ्रांस के मिस्टर शॉपियाँ थे और दूसरे इंग्लैंड के मिस्टर जॉन ली.ये मिस्टर शौपियाँ वही व्यक्ति थे जो दिल्ली में फेयर में हमारे स्टाल पर उस समय पहुँचे थे जब प्रगति मैदान में ही हॉल नम्बर 18 में ईपीसीएच वाले फेयर को देखने चला गया था और मेरी अनुपस्थिति में उस समय हमारे स्टैंड पर कोई अंग्रेज़ी बोलने वाला भी नहीं था जो इनसे बात कर पाता.वो तो हमारा सौभाग्य था कि उसी समय मेरे पापा जो कि गुलाम नबी अंकल (फ़िरोज़ाबाद के पूर्व विधायक)के साथ किसी काम से दिल्ली आए थे वो फेयर में हमारा स्टाल देखने प्रगति मैदान चले आये और मेरे स्टाल पर आने तक शौपियाँ साहब से बात करके उनको रोके रहे.यदि मैं यह कहूँ कि इस फेयर से शुरू होने वाले हैंडीक्राफ्ट्स के एक्सपोर्ट के काम में मुझे पहला ऑर्डर मेरे पापा श्री अशोक चतुर्वेदी जी के ही कारण मिला तो इसमें कुछ गलत नहीं होगा.
तो सुबह ही सुबह जर्मनी के फ्रेंकफर्ट से मैं और अभिनव पेरिस के लिए थोड़े अंतराल की उड़ानों से चले और पेरिस पहुँच कर हवाई अड्डे से टैक्सी लेकर जो होटल बुक था वहाँ पहुँच गए.होटल पहुँच कर रिसेप्शन पर हमने बात की तो वहाँ एक जापानी सी दिखने वाली महिला बैठी थीं उन्होंने काफी रूखे से स्वर में कहा कि हाँ आपकी पाँच दिन की बुकिंग है और पाँच दिन के पैसे जमा कर दीजिए.मैंने रजिस्टर में एंट्री करके,कमरे की चाबी लेकर कहा कि अभी मैं कमरे में सामान आदि रख दूँ फिर आपको आकर पैसे देता हूँ लेकिन उस महिला ने कुछ जिद सी की कि अभी ही जमा कर दीजिए पूरे पैसे लेकिन मैं बहुत थका हुआ था सो मैंने कहा कि मैं अभी कमरे से आकर तब पैसे दूँगा.इस बीच अभिनव ने पास कहीं टेलीफोन बूथ से इंग्लैंड मिस्टर ली से बात की थी और वो कमरे में आकर बोले कि, “मैं तो अभी ही इंग्लैंड जा रहा हूँ,मिस्टर ली ने आज ही मिलने को कहा है,मैं काम निबटा कर कल या परसों पेरिस लौट आऊंगा.” यह कह कर अभिनव तो इंग्लैंड को निकल गए.अब मैंने कमरे पर ध्यान दिया तो यह एक बेहद ही छोटा कमरा था जिसके आधे हिस्से से ऊपर का जीना जाने के कारण कमरे के उस भाग की छत जीने के नीचे की होने के कारण तिरछी सी थी,आप उस कमरे के उस हिस्से में सीधे खड़े भी नहीं हो सकते थे.कुल मिला कर कमरा कुछ ऐसा था कि मेरा मन वहाँ से उखड़ने लगा.मेरा मन उस कमरे में एक मिनट भी रुकने का नहीं था.कमरा सबसे ऊपर की मंजिल पर था,अच्छा कमरा था किंतु एक तो छोटा बहुत था और दूसरी छत नीची और जीने वाली बात थी.मैंने सोचा कि अभी फेयर का काम कर आऊं फिर बाहर जाकर आस पास कहीं कोई दूसरे होटल में जगह देख कर शिफ्ट हो जाऊँगा और अभिनव के लिए यहाँ मैसेज छोड़ दूंगा क्योंकि संपर्क के लिए तब मोबाइल फोन तो थे नहीं.मैं तैयार होकर नीचे आया वैसे ही उस जापानी सी दिखने वाली महिला ने कहा कि पैसे जमा करा दो.मेरे मन में तो होटल छोड़ने का विचार आ ही चुका था तो मैंने उस से कहा कि अभी फेयर जाने की जल्दी है लौट कर जमा करा दूँगा लेकिन वो मानी नहीं.उसकी बहस से आजिज़ आ कर मैंने कहा कि अच्छा चलिए मैं अभी एक दिन के पैसे दिए दे रहा हूँ बाकी रात को दे दूंगा,इस पर वो काफी नाराज होने लगीं कि मुझको तो पूरे पैसे अभी ही चाहिए जो मैं देना नहीं चाहता था क्योंकि मेरा मन वहाँ अधिक रुकने का नहीं था.बहस को खत्म करते हुए मैंने एक दिन के पैसे उनके काउंटर पर रखे और कहा कि मुझको देर हो रही है बाकी लौट कर दूंगा और मैं होटल के बाहर निकल गया.
बाहर आकर सबसे पहले टैक्सी पकड़ कर फेयर स्थल पर पहुँचा.ये फेयर पेरिस के Nord Villepinte Exhibition Centre में आयोजित होता है.फेयर में पहुँच कर प्रभावित और अचंभित तो होना ही था क्योंकि यह फेयर पेरिस में आयोजित हो रहा था वो पेरिस जो विश्व की फैशन की दुनिया के ट्रेंड्स तय करता है.फेयर में बहुत गहमा गहमी थी हाँलाँकि मैं एक बात यहाँ अवश्य कहना चाहूँगा कि ये फेयर था तो बहुत ही शानदार किन्तु विश्व का सर्वश्रेष्ठ ट्रेड फेयर हस्तशिल्प के लिए मैसे फ्रेंकफर्ट जर्मनी का ही है जिसके विषय में जब जर्मनी की चर्चा करूँगा तब लिखूंगा और हाँ ईपीसीएच द्वारा आयोजित दिल्ली/एक्सोपोमार्ट ग्रेटर नोएडा का फेयर भी अब बहुत जबरदस्त होता है.खैर तो मैं उस फेयर में घूम रहा था और विश्व प्रसिद्ध फैशन ब्रांड्स के स्टाल भी देख रहा था.सबसे पहले मुझको जिन दो लोगों से मिलना था उनके पास गया तो इत्तेफाक से दोनों ने तुरंत ही मिलने का समय दे दिया.मैंने उनसे सैम्पिल डिसकस किये,ऑर्डर की बात की और जो काम 2-3 दिन में होने की उम्मीद थी वह तुरंत ही समाप्त हो गया.मैंने सोचा कि अभी थोड़ी देर फेयर और घूम लूँ फिर वापिस चलूँगा क्योंकि काम तो हो गया अब चूंकि 5 दिन रुकेंगे तो रोज फेयर में ही लोगों से मिलूंगा.फेयर में घूमते हुए मुझको एक स्टाल नज़र आयी जिस पर ulysee pila लिखा हुआ था.ये फ्रांस की एक वहुत बड़ी फर्म थी और जब मैंने उनके स्टाल पर निगाह दौड़ाई तो उस पर बहुत ही सुंदर दिखने वाले जामुनी,नीले,हरे और क्लीयर रंग के काँच के कटोरे (Bowls),मुझको वो कुछ जाने हुए से लगे और जब मैंने पास जाकर देखा तो मेरी खुशी का ठिकाना नहीं था,ये तो हमारी फैक्ट्री का ही माल था जो हमने मुरादाबाद के एक एक्सपोर्टर को सप्लाई किया था.ये मेरे लिए पहला मौका था जब मैंने इतने बड़े अंतर्राष्ट्रीय ट्रेड फेयर में एक प्रतिष्ठित फ्रांसीसी ब्रांड के स्टाल पर अपनी फैक्ट्री के माल को शान से डिस्प्ले में लगा और बिकते देखा.मेरे लिए वाकई यह एक बहुत ही बड़ा रोमांच और खुशी का मौका और जीवन के यादगार पलों में से एक था.
इस ट्रेंड फेयर में आपको विश्व के सर्वश्रेष्ठ और प्रसिद्ध ब्रांड देखने को मिलेंगे जैसे LLADRO,PORADA,Skultuna,Dior,
DelightFULL,Boca do Lobo आदि.कहने का मतलब यह है कि इस ट्रेंड फेयर में यदि आप हस्तशिल्प और फैशन के ट्रेंड्स देखने निकले हैं तो आप की आँखे चौंधिया जाएंगी ऐसा विलक्षण आयोजन होता है यह.खैर व्यापारियों से सफल मुलाकातों के कारण मेरा मन काफी अच्छा था और थोड़ी देर और फेयर में लोगों से मिलजुल कर मैं टैक्सी लेकर वापिस अपने होटल वाली जगह पर आ गया.उस इलाके में बहुत सारे होटल थे.मैं ठहरने की जगह तलाशने हेतु कई होटलों में गया किन्तु क्या अच्छे और क्या बुरे किसी भी होटल में एक भी कमरा खाली नहीं था क्योंकि यह ट्रेड फेयर चल रहा था.मन मारकर मैंने सोचा कि अब मजबूरी है कि उसी होटल में रहना पड़ेगा.वैसे मेरा तो सारा काम पूरा हो चुका था और मैं अपने कार्यक्रम को pre-pone करके अगले दिन वापिस हिंदुस्तान लौट सकता था किंतु इसमें दो समस्या थीं.एक तो अभिनव अगले या उसके भी अगले दिन लौटने वाले थे तो तब तक तो मुझको रुकना ही था और दूसरी बात यह थी कि होटल पहुँचते ही 5 दिन के पैसे जमा करने थे तो फिर मैंने अपने मन को समझाया कि अब तो पेरिस में इसी होटल में 5 दिन रुकना होगा लेकिन जैसे ही होटल का कमरा याद आता और उसके आधे हिस्से में गर्दन झुका कर खड़ा होना,चलना ध्यान आता क्योंकि उसकी छत काफी नीची थी तो फिर झल्लाहट से भर उठता.इसी सब ऊहापोह में पड़ा हुआ मैं होटल पहुँच गया.रिसेप्शन पर जाकर मैंने उसी जापानी सी महिला से कहा कि मैडम एक दिन के पैसे तो मैं सुबह दे गया था अब बाकी कितने देने हैं वो बताइये तो मैं दे दूँ,इस पर बहुत रुक्ष स्वर में वो महिला बोली अब आपको कुछ नहीं देना है.उसके यह कहने पर मैं चौंक गया और बोला कि क्यों?!!अब कुछ क्यों नहीं देना है??!!!इस पर वो बोली क्योंकि मैंने तुम्हारी बुकिंग कैंसिल कर दी है और तुमको कल सुबह 10 बजे तक ये होटल छोड़ना है.पहले तो मैं समझा कि वो महिला मजाक कर रही है किंतु जैसे ही मेरी समझ में यह आया कि यह मजाक नहीं वास्तविकता थी तो मेरे पैरों के नीचे से तो जमीन खिसक सी गयी.मैंने उस से थोड़ी बहस और करने की जुर्रत सी की और कहा कि यदि सुबह मैं कमरा खाली न करूँ तो??इस पर उस दयालु महिला का निस्पृह भाव युक्त जवाब था कि कोई बात नहीं होटल का स्टाफ उस स्थिति में तुमको और तुम्हारे सामान को होटल के बाहर कर देगा और फिर वो अपने स्टाफ की ओर मुखातिब होकर बोली कि कल सुबह मेरे 10 बजे आने के पहले यदि ये कमरा खाली न करें तो तुम लोग इनको और इनके सामान को होटल के बाहर कर देना.यह निर्देश देकर वह भद्र महिला तो चली गयी और मेरे माथे पर पेरिस की जनवरो की ठंड में भी पसीना आ गया.उस महिला के जाने के बाद रिसेप्शन पर बैठी एक दूसरी लड़की ने मुझसे बहुत माफी मांगी.उसने कहा कि आप दूसरे देश से आये हैं और आपके साथ इन्होंने ऐसा व्यवहार किया इसके लिए मैं बहुत शर्मिंदा हूँ क्योंकि मैं पेरिस की ही हूँ और हमारे देश में किसी विदेशी को ऐसे परेशान किया जाए ये हमको अच्छा नहीं लगता.उसने कहा कि यह महिला ऐसी ही सनकी है लेकिन चूंकि यह इस होटल की मालकिन है इसलिए आपको होटल तो सुबह छोड़ना ही पड़ेगा क्योंकि कानून यही है और में चाह कर भी इस विषय में आपकी कोई मदद नहीं कर सकती हूँ.
अब मैं तो वाकई बहुत परेशान हो गया था.मैं कमरे में आकर लेट गया और यह सोचने लगा कि मैं तो वापस हिंदुस्तान भी जा सकता हूँ कल क्योंकि मेरा तो सारा काम हो ही गया है लेकिन अभिनव को कैसे सूचित किया जाए?कल या परसों न मालूम किस समय वो आएंगे और जब वो यहीं आएंगे और मैं यहाँ नहीं मिलूंगा तो वो परेशान होंगे.उस समय मोबाइल आदि संचार के सुविधाजनक साधन नहीं थे तो परेशानी बढ़ती ही गयी और मैं भगवान का ध्यान करने लगा कि प्रभु अब आप ही इस समस्या का हल निकाल सकते हो.यही सब सोचते हुए रात के 10 या 11 बजे थे कि अचानक कमरे की घंटी बजी,मैंने सोचा कि इतनी रात को पेरिस में कौन मेरे कमरे की घंटी बजा रहा है और यही सोचते हुए मैंने कमरे का दरवाजा जैसे ही खोला और लो ये तो चमत्कार था!!! सामने अभिनव खड़े हुए थे और मुझको अपनी आँखों पर विश्वास नहीं था.गुड्डू कमरे में घुसकर बिस्तर पर बैठते हुए बोले कि,भैया सारा काम आज ही पूरा हो गया तो हम वापिस आ गए.मुझको इतना भावुक और पुलकित देख कर वो बोले कि आखिर माजरा क्या है तो मैंने उनको पूरा घटनाक्रम बताया और फिर हम लोगों ने तय किया कि मैं अगले दिन वापिस हिंदुस्तान जाऊँगा और अभिनव अपने दौरे के अगले चरण में अगले देश ऑस्ट्रिया चले जायेंगे.रात को ही एयरलाइंस फोन करके मैंने अपनी हिंदुस्तान वापिसी की सीट कन्फर्म करायी और अभिनव ने विएना की तब जाकर चैन आया.
मैंने अभिनव से उनकी यात्रा के विषय में पूछा तो उन्होंने बताया कि बर्मिंघम के श्रुउसबरी/श्रूजबी(Shrewsbury) में मिस्टर ली के यहाँ की यात्रा बहुत अच्छी रही.मिस्टर ली को ध्यान था कि अभिनव शाकाहारी हैं और मिठाइयों के शौकीन तो मिस्टर ली ने अभिनव के लिए भव्य शाकाहारी भोजन की व्यवस्था की हुयी थी और मिठाई में भांति भांति की चॉकलेटों की! उनका प्रतिष्ठान और वेयर हाउस बहुत ही शानदार और बड़ा था.अभिनव ने ये भी बताया कि मिस्टर ली बहुत ही शौकीन आदमी हैं और उनके पास तरह तरह की विचित्र वस्तुओं का संग्रह था और उसमें अभिनव को जो चीज़ सबसे जबरदस्त लगी वो था रेल का एक भाप वाला इंजन,सचमुच का रेल इंजन,जो उनके बगीचे वाले एरिया में था और मिस्टर ली ने उसकी सीटी बजा कर एवं चला कर भी दिखाया.इस यात्रा की सबसे सुखद बात थी कि मिस्टर ली हमारी सप्लाई से खूब खुश और संतुष्ट थे.यहाँ यह उल्लेखनीय है कि ये वही मिस्टर ली थी जिन्होंने हमारे पहले कंसाइनमेंट से खुश होकर हमको एक फैक्स किया था और उसमें अपनी भावनाएं व्यक्त करते हुए हमको “(You are the)King Of Glass की उपाधि भी दी थी;अफसोस की बात ये है कि उस वक़्त हम लोग यह नहीं जानते थे कि कुछ समय बाद फैक्स के कागज से (थर्मल पेपर होने के कारण)लिखावट मिट जाती है और इसलिए वह अमूल्य पत्र हमारे पास अब नहीं है…….
अगले दिन सुबह होटल खाली करके हम एयरपोर्ट पहुँचे और फिर मैं जहाज पकड़ कर पेरिस से फ्रेंकफर्ट जर्मनी गया क्योंकि टिकट जर्मन एयर लाइन लुफ्थांसा का था और फिर फ्रेंकफर्ट से दिल्ली का जहाज लेकर वापिस दिल्ली.
इसके बाद पेरिस की और भी यात्राएं हुईं लेकिन उल्लेखनीय घटना हुईं सन 2000 की यात्रा में.इस यात्रा में मैं और मेरे एक दोस्त श्री प्रवीन जैन साथ साथ थे.हम लोग अपनी यात्रा के (यूरोप)अंतिम चरण में पेरिस आये.पेरिस हम लोग ब्रसेल्स, बेल्जियम होते हुए आये थे और 300 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार से चलने वाली TGV ट्रेन से आये थे.ट्रेन में अंदर बैठ कर महसूस ही नहीं हो रहा था कि यह ट्रेन इतनी तेज रफ्तार से चल रही है.एक स्थान पर मैंने एक पत्थर पर या बोर्ड पर लिखा देखा “पेरिस 150 किलोमीटर” मैंने अपनी घड़ी देखी और विश्वास मानिए घड़ी से देख कर सही 30 मिनट में इस शानदार,बेहद आरामदायक ट्रेन ने हमको उस स्थान से,जहाँ पेरिस 150 किमी लिखा था, पेरिस पहुँचा दिया जबकि ट्रेन के अंदर स्पीड इतनी तेज है ये कतई पता नहीं चलता था.पेरिस पहुँच कर हम लोग एयर पोर्ट के पास एक होटल में रुके क्योंकि अगले दिन सुबह प्रवीण की फ्लाइट हिंदुस्तान की और मेरी फ्लाइट वाशिंगटन डीसी,अमेरिका की थी.होटल में सामान रख कर हम दोनों लोग पेरिस शहर में निकल गए और आइफ़िल टावर आदि घूमते रहे.रात होने पर खाना आदि कहा कर हमने शहर से एयरपोर्ट जाने की मेट्रो पकड़ी.मेट्रो में बैठने पर हमको मालूम था कि हमको आखिरी स्टेशन पर उतरना है और रात में हम लोग मेट्रो रुकने पर आखिरी स्टेशन पर ही उतरे पर स्टेशन पर उतरते ही समझ में आ गया कि बहुत बड़ी गड़बड़ हो गयी थी.हुआ ये था कि हम एयरपोर्ट से विपरीत दिशा की मेट्रो में बैठ गए थे यानी कि बैठना एयरपोर्ट जाने वाली में था और बैठ गए थे एयरपोर्ट से आने वाली में.आसानी के लिए समझिए कि दिल्ली में कहीं से एयरपोर्ट जाना था और उस दिशा से आने वाली मेट्रो पकड़ के पहुँच गए नोएडा.लेकिन असली मुसीबत तो अब शुरू हुयी;अपनी गलती पता चलने पर सोचा कि कोई बात नहीं अब वापिसी की मेट्रो पकड़ लेते हैं किंतु रात के शायद 11 बज चुके थे और मेट्रो चलना बन्द हो गया था.अब स्टेशन से बाहर निकले कि चलो टैक्सी कर लेंगे लेकिन लगभग 1-डेढ़ किलोमीटर तक कोई टैक्सी नहीं मिली,सारा इलाका सुनसान और सन्नाटे से भरा तो था ही.एक बार सोचा कि पैदल ही होटल चल दें किन्तु वो कतई व्यवहारिक नहीं था क्योंकि एक तो दूरी बहुत थी शायद 20-30 किलोमीटर और दूसरे रास्ता तो मालूम ही नहीं था.अब तो बड़ा मुसीबत थी कि क्या करें..लगा कि सुबह की फ्लाइट तो छूटना अब तय ही है….
हाँ मोबाइल का जमाना आ चुका था तो सोचा कि होटल फोन कर लें तो जेब से होटल का कार्ड निकाला,जो मैं हमेशा जहाँ रुकता हूँ वहाँ का कार्ड अपनी पॉकिट में अवश्य रखता हूँ,और होटल फोन किया तो होटल वाले ने पूछा कि आप हैं कहाँ बताइये तो हम टैक्सी का कुछ इंतज़ाम करें लेकिन उस अंधेरी रात और अनजान शहर में हमको तो मालूम ही नहीं था कि हम exactly हैं कहाँ.मैंने कहा अभी कोई दिखेगा तो फिर फोन करते हैं.थोड़ी देर भटकने के बाद एक स्थान पर 4-5 नौजवान लड़के खड़े हुए बातें कर रहे थे,हम उनके पास गए,थोड़ी भाषा की समस्या लगी लेकिन फिर उनकी होटल के रिसेप्शन पर बात करायी तो उन लोगों ने होटल वाले को बताया कि वो जगह क्या थी,फिर होटल वाले ने कहा कि उसने टैक्सी वाले से बात कर ली है और हम वहीं रुकें,10 से 15 मिनट में टैक्सी वहीं पहुँच जाएगी और ऐसा ही हुआ.जब टैक्सी आ गयी तब हमारी जान में जान आयी और हम आखिरकार अपने होटल पहुँच गए और सुबह मैं अपनी अमेरिका की फ्लाइट में बैठ कर वाशिंगटन को रवाना हो लिया.
जब मैं अमेरिका से वापिस लौटा तो चूँकि टिकट एयर फ्रांस का था तो वापिसी वाया पेरिस ही थी और पेरिस में मेरा एक दिन का स्टॉप ओवर था यानी मैं एक दिन सुबह पेरिस पहुँचा और दूसरे दिन शाम किसी समय की दिल्ली की फ्लाइट थी.पेरिस पहुँच कर मैंने रेलवे स्टेशन “गारे नोर्ड” के पास के एक अच्छे होटल में कमरा लिया और सबसे पहले यात्रा की थकान दूर करने को अपनी आदत के अनुरूप गर्म पानी से स्नान किया.इसके पश्चात मैं पेरिस में टहलने-घूमने निकल गया.एक चक्कर मैंने आइफ़िल टावर का लगाया और उसके पास से पेरिस की कुछ टी शर्ट्स और पेन,पेंसिल,चाबी के गुच्छे आदि सोविनियर्स खरीदे.मैं जहाँ भी जाता हूँ उस स्थान की कुछ वस्तुएं अवश्य लेता हूँ और घर लौट कर परिवारीजनों, रिश्तेदारों, दोस्तों और अपने स्टाफ के सदस्यों को अपनी विदेश यात्रा से लाया हुआ कुछ न कुछ भेंट करने का प्रयास अवश्य करता हूँ और मुझको प्रसन्नता है कि मेरी पत्नी रचना में तो ये आदत है ही और मेरे दोनों बच्चों अर्पित और ऐश्वर्या में भी मेरी यह आदत आयी है.
हाँ,इस बार मैंने अमेरिका से एक नयी चीज़ ली थी और वो था सोनी का एक डिजिटल कैमरा.फोटोग्राफी की दुनिया में अब डिजिटल कैमरों का प्रचलन शुरू हो चुका था.मैंने “arc de triumph” आदि के आसपास कुछ फोटो अपनीआस पास के लोगों से कह कर खिंचवाई और फिर रात होते होते मैं अपने होटल के कमरे पर आ गया.
Atul Chaturvedi on the roof of arc de triumph,Paris,France
year 2000 AD
Atul Chaturvedi at arc de triumph,Paris,France
year 2000AD
रात को जब मैं कमरे में पहुँचा तो मेरे कमर और पैर में थोड़ा दर्द शुरू हो गया था.कमरे में पहुँच कर,कमरा लॉक कर के,कपड़े आदि बदल कर मैं बिस्तर पर सड़क के किनारे वाली साइड पर लेट गया और दर्द के बावजूद थोड़ी देर में नींद भी आ गयी.सुबह जब मैं सो कर उठा और बाथरूम आदि से निवृत्त हुआ तो ये दर्द और बढ़ चुका था और मैं समझ गया था कि ये साइटिका का दर्द है.मैं फिर पलंग पर लेट गया और बस अब समस्या शुरु हो गयी थी.दर्द बढ़ता गया और थोड़ी देर में ही हाल यह था कि मेरा करवट लेना तो छोड़िए हिलना भी असंभव हो गया.अब बड़ी विचित्र स्थिति थी फोन बेड की दूसरी साइड में था,न मैं उठ कर दरवाजा खोल सकता था और न ही फोन से होटल के रिसेप्शन से ही कोई सहायता मांग सकता था.मुझको लगा कि यदि यही हाल रहा तो मेरी तो भारत वापिसी की फ्लाइट ही छूट जाएगी.जब सुबह से बिना कुछ खाये पिये लेटे-लेटे दोपहर हो गयी तब लगा कि दर्द कुछ कम हुआ है तो मैं प्रयास करके उठा और तुरंत बाथरूम में जाकर खूब गर्म पानी का शॉवर खोल कर उसके नीचे खड़ा हो गया.लगभग आधे घण्टे तक मैं यूँही गर्म पानी से नहाता रहा या कहिए सिकाई करता रहा तब कुछ राहत मिली.फिर रूम सर्विस को फोन करके कुछ खाने को मंगाया.अब एयरपोर्ट जाने का समय हो चला था सो होटल से चेकआउट करके टैक्सी लेकर मैं ऐयरपोर्ट पहुँचा और फिर कुछ समय बाद मैं जहाज में बैठा हुआ दिल्ली की तरफ उड़ रहा था.
इस दर्द के कारण जो परेशानी मुझको हुयी तो मैंने तय कर लिया कि अब बहुत हो गया अब मैं अपने देश में भी कोई लंबी यात्रा अथवा कोई भी विदेश यात्रा अब कभी भी अकेले नहीं करूंगा और इसके बाद की विदेश यात्रा मैंने कभी अकेले नहीं की.
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