Sindbad Travels-27 France 6, Paris 3rd day सिंदबाद ट्रेवल्स-27,फ्रांस-6,पेरिस 3सरा दिन
Sindbad Travels-27 France-6 Paris-Louvre Museum etc.
सिंदबाद ट्रेवल्स-27 फ्रांस-6
पेरिस- लूव(लूव्रे)म्यूज़ियम
सुबह होते ही तैयार होकर,नाश्ता आदि करके मैंने मेट्रो पकड़ी और पहुँच गया पेरिस के विश्व प्रसिद्ध लूव म्यूजिम.लूव म्यूज़ियम के पास के मेट्रो स्टेशनों के नाम हैं 1.Louvre Tivoli और 2.Palais Royal Musee du Louvre और निकटतम RER station का नाम है ‘Chatelet Les Halle's.’
पेरिस का यह लूव म्यूज़ियम विश्व के सबसे बड़े और प्रसिद्ध संग्रहालयों में से है जो कि लगभग 72,000 वर्ग मीटर के क्षेत्र में फैला हुआ है और इसमें प्रागैतिहासिक काल से 21वीं सदी तक की लगभग 38,000 वस्तुएं प्रदर्शित हैं.
जैसे ही मैं लूव म्यूजिम के प्रांगण में पहुँचा, उसकी भव्यता की झलक मिलनी शुरू हो गयी थी.बहुत ही बड़ा भव्य प्रांगण जिसमें एक तरफ पत्थर से बने रास्ते से में जल प्रवाहित हो रहा था जैसे कृत्रिम नहर सी बह रही हो,उसमें शानदार मनमोहक फुव्वारे चल रहे थे,चारों ओर पर्यटकों की चहल पहल और सामने तथा दोनों ओर लूव म्यूज़ियम की प्राचीन भव्य इमारत और इस सबके बीच एक अद्भुत कांच का बना विशाल पिरैमिड जिसमें से होकर इस विश्व प्रसिद्ध म्यूज़ियम में जाने का रास्ता था.कुछ देर तो मैं इस नहर,फुव्वारे और शीशे के बने उस शानदार पिरैमिड को ही निहारता रहा और ये सोचता रहा कि जब बाहर से यह इतना शानदार दृश्य है तो अंदर का नजारा कैसा होगा!!
पेरिस में सीन नदी के दाहिने किनारे पर बना यह संग्रहालय असल में शुरुआत में एक राजमहल ही था जिसका निर्माण सन 1202 में प्रारंभ हुआ था.14वीं सदी में चार्ल्स पंचम के समय से यह राजा लोगों का शाही निवास बन गया,और फ्रांस के शासकों ने इसको अपने मुख्य निवास महल की भांति प्रयोग किया.इसका वास्तुशिल्प गौथिक,पुनर्जागरण कालीन,निओ-क्लासिकल,नेपोलियन स्टाइल और 20वीं सदी का आधुनिक कालीन भी है.जिस शीशे के पिरैमिड का जिक्र मैंने किया इसका डिजाइन एक चीनी-अमेरिकन वास्तुविद आई0 एम0पई ने बनाया था और यह सन 1989 में बन कर तैयार हुआ.सन 1682 में फ्रांस के सम्राट लुई चौदहवें ने वर्साय के महल को राजसी निवास बनाया और लूव का यह महल राजसी वस्तुओं के संग्रह के प्रदर्शन का स्थान बन गया.कुछ दिन इसका नाम Musee Napoleon भी रहा क्योंकि इस संग्रहालय को अद्भुत संग्रहों से युक्त बनाने में नेपोलियन का भी बहुत बड़ा योगदान रहा है.म्यूज़ियम के रूप में इस संग्रहालय का उद्घाटन 10 अगस्त 1793 को हुआ था जो कि राजशाही के अंत की पहली बरस थी.
कांच के उस अद्भुत पिरैमिड से अंदर जाकर जब मैं नीचे पहुँचा तो एक बहुत बड़ा स्थान था जिसका फर्श संभवतः सफेद संगमरमर का बना हुआ और उसमें अंदर जिस ओर भी निगाह जाए तो पत्थर की शानदार मूर्तियों को देख कर ऐसा लगा कि मैं शायद टाइम मशीन में बैठ कर किसी और कालखंड में आ गया हूँ.एक तरफ ईसा पूर्व दूसरी सदी की मार्बल की बिना सर की आदमकद या उस से भी विशाल मूर्ति जिसमें पत्थर के ही पंख बने हुए हैं और ऐसे सजीव कि मानो यह अभी उड़ना ही चाहती है,यूनानी मूर्तिकला का अद्भुत नमूना यह मूर्ति विजय की यूनानी देवी ‘नाइक’ की मूर्ति है और लगभग 2200 से अधिक वर्ष पुरानी है लेकिन उसकी सफाई,उसकी चमक,उसके कपड़ों की परतें जो कि दरअसल पत्थर में ही उकेरे हुए हैं दर्शकों को अपने दांतों में उंगली दबाने को मजबूर कर देती हैं.
अभी इस मूर्ति से निगाह हट भी नहीं पायी थी कि नजरों के सामने ग्रीक लोगों की मान्यतानुसार सुंदरता और प्यार की देवी ‘वीनस’ की मूर्ति Venus de Milo सामने नजर आती है.ये मूर्ति ग्रीक टापू ‘Milo’ में मिली थी इसलिए इसका नाम Venus de Milo पड़ा.यद्यपि मार्बल की इस मूर्ति के दोनों हाथ साबुत नहीं हैं किंतु इस मूर्ति को आप जितनी देर निहारें वो कम है.जब मैं और आगे बढ़ा तो 1513 से 1516 के दौरान प्रसिद्ध कलाकार,मूर्तिकार माइकिलेंजलो द्वारा निर्मित संगमरमर की Dying Slave नजर आती है जो शायद यह कह रही है कि प्राचीन काल में यदि जबरदस्त मूर्तिकार थे तो आधुनिक काल में भी कोई कम नहीं थे.
लूव म्यूज़ियम का संग्रह मोटे तौर पर आठ भागों में बाँटा जा सकता है;मिस्र की प्राचीन धरोहरें,पूरब (Near East) की प्राचीन धरोहरें,यूनानी,इट्रेसकन,रोमन धरोहरें,इस्लामिक कला,मूर्तियां एवं सजावटी वस्तुएं पेंटिंग्स,कलाकृतियां आदि
इस म्यूज़ियम में जॉर्डन में मिली लगभग 9-10 हजार साल पुरानी चूने,पत्थर और सरकंडों से बनी ‘आइन-ग़ज़ल’ की मूर्ति भी है, आधुनिक ईरान के खोरसाबाद से मिली असीरियन सभ्यता -मेसोपोटामिया की रक्षक मूर्ति जोकि ईसा पूर्व 713 साल की है वो Lamassu की मूर्ति भी दिखी जिसका धड़ बैल का,सर-दाढ़ी वाला मुख मनुष्य का है यद्यपि कान बैल के हैं और उसके पंख भी हैं,इस मूर्ति के पांच पैर हैं किंतु साइड से देखने में चार ही नजर आते हैं.जब तक आप और विभिन्न मूर्तियों को देखते आगे बढ़ते हो तो आपकी निगाह 2600 ईसा पूर्व के तानिस के स्फिंक्स की मूर्ति पर पड़ती है जो नेपोलियन के इजिप्ट अभियान के समय लायी गयी अन्य कीमती वस्तुओं में शामिल है.मूर्तियों के संग्रह में यदि आपकी निगाह नेपोलियन काल केे मूर्तिकार अंतोनियो कैनोवा द्वारा बनाई मूर्ति Cupid Kiss पर न जाये ऐसा तो हो ही नहीं सकता है.शानदार मार्बल की बनी यह मूर्ति प्रेम और चुम्बन को बहुत ही कलात्मक दृष्टि से दर्शाती है.
सही बात तो यह है कि लूव म्यूज़ियम को देखने को बहुत समय चाहिए.वहाँ पर विश्व के विभिन्न क्षेत्रों की विभिन्न कालखंडों की अनेकों अद्भुत कृतियाँ हैं जो मानव जाति मात्र के लिए अभिमान करने की कारक कही जाएं तो अतिशयोक्ति नहीं होगी.
यहाँ खड़ा होकर मैं यह सोच रहा था कि विश्व भर का इतना खजाना इस संग्रहालय में मौजूद है यह बहुत बड़ी बात है किंतु इसका एक दूसरा पहलू यह भी है कि इस देश के शासकों खास तौर से नेपोलियन ने जब पूर्व की ओर अपना विजय अभियान चलाया तो उनको जो भी बेहतरीन लगा उसको वहाँ से लूट कर या उठा कर यहाँ सजाते गए.
जब मैं इस म्यूज़ियम को देख रहा था तो मुझको अपने देश के ही अनेकों संग्रहालय याद आये;जैसे हैदराबाद के सालारजंग म्यूज़ियम की कलाकृतियां और संग्रह विश्व में किसी से कम नहीं जैसे वह अद्भुत घड़ी जिसमें हर घंटे पर जब घड़ी में घंटा बजाने आदमी घड़ी से बाहर निकलते हैं और उसको देखने को जो मजमा होता है या 19वीं सदी के इटैलियन मूर्तिकार
जी बी बेंजौनी की अद्वितीय कलाकृति
‘Veiled Rebecca’ जिसको ऐसे तराशा गया है कि उसके मुख पर पत्थर का ही पर्दा है किंतु लगता झीने वस्त्र का है अथवा बचपन में देखा मुम्बई का प्रिंस ऑफ वेल्स म्यूज़ियम जिसका नाम अब छत्रपति शिवाजी संग्रहालय है और उसमें घुसते ही एक बहुत बड़े हॉल में छत पर लटका एक विशालकाय व्हेल मछली का शरीर जिसकी छवि आज भी मस्तिष्क पर अंकित है या मथुरा के म्यूज़ियम का गांधार कला और कुषाण कालीन अद्भुत कलाकृतियां और मूर्तियां,भगवान बुद्ध की मूर्तियां और बौद्ध काल की कला के नमूने अथवा कोलकाता का इंडियन म्यूज़ियम और उसमें रखी इजिप्शियन ममी अथवा उदयपुर की क्रिस्टल गैलरी या ग्वालियर का संग्रहालय और हाँ इस सबसे जरा हटकर अपने इलाहाबाद का म्यूज़ियम जिसमें रखी सिर्फ एक चीज़ ही ऐसी है जिस पर दुनिया भर के सारे म्यूज़ियम और कलाकृतियां कुर्बान,जी हाँ मेरा मतलब अमर शहीद चंद्रशेखर आज़ाद की पिस्तौल से ही है.लेकिन हमारे किसी म्यूज़ियम को वो अंतर्राष्ट्रीय ख्याति नहीं प्राप्त है जो काहिरा के इजिप्शियन म्यूज़ियम या पेरिस के लूव म्यूज़ियम को है,जबकि वो भी इस लायक हैं और हमारे यहाँ की सरकार और सम्बन्धित विभागों और लोगों को इस विषय पर अवश्य ध्यान देना चाहिए.
यही सब सोचते हुए लूव म्यूज़ियम में कलाकृतियां देखता हुआ अब मैं कुछ अद्भुत पेंटिंगों को देख रहा था.वैसे तो वहाँ जो भी पेंटिंग थी उसका एक अलग स्तर और इतिहास था ही किन्तु मेरा ध्यान सबसे पहले आकृष्ट किया 1830 की जुलाई क्रांति से सम्बंधित पेंटिंग 'Liberty leading the people’ जो कि प्रसिद्ध चित्रकार Eugène Delacroix द्वारा बनाई गई इसमें फ्रांस का झंडा हाथ में लिए हुए फ्रांस की जनता को क्रांति के लिए मार्गदर्शित कर रही महिला का चित्रण बड़ा गजब का है.महिला का ऊर्ध्व वस्त्र खिसका हुआ सा है जिस से उसके वक्ष प्रदर्शित तो हो रहे हैं किंतु क्या मजाल है किसी की कि इस स्वतंत्रता की मातृशक्ति को दर्शाती इस पेंटिंग को देख कर किसी को भी उसमें अश्लीलता की किंचित मात्र भी झलक लगे,बहुत ही गजब की ये लगभग 9-10 फिट के विशाल कैनवास पर बनी पेंटिंग है.आगे मुझको एक और विशाल पेंटिंग नज़र आई जिसका नाम था ‘The Raft Of Medusa’ 19वीं सदी में थिओडोर गैरीकाउल्ट की बनाई ये पेंटिंग उन विपदाग्रस्त लोगों का चित्रण है जिनकी नौका एक दुर्घटना में टूट गयी और लोगों के सहायता माँगने के भावों का बड़ा ही अद्भुत चित्रण है.एक और कलाकृति जिसने मेरा ध्यान खींचा वो थी नेपोलियन के सिंहासनारोहण को दर्शाती नेपोलियन के शाही चित्रकार Jacques-Louis David के द्वारा बनाई गई पेंटिंग ‘The Coronation of Napoleon.’ इस भव्य चित्र में सम्राट नेपोलियन और उनकी पत्नी साम्राज्ञी जोसेफाइन के राजतिलक का बहुत ही विवरणात्मक चित्रण है.समारोह में आमंत्रित अतिथि,हैसियत के अनुसार उनके बैठने की व्यवस्था और चूंकि मैं इतिहास का विद्यार्थी रहा हूँ तो खास तौर पर नेपोलियन के अपने हाथ में मुकुट लेने के दृश्य से मुझको अपनी पढ़ी हुई वो घटना याद आ गयी कि कैसे जब तत्कालीन पोप नेपोलियन को मुकुट पहनाने वाले थे तो सम्राट नेपोलियन ने वो मुकुट खुद अपने हाथ में लेकर स्वयं ही अपने सिर पर धारण कर लिया था जो उसके अहंकार को तो दर्शाता था ही साथ ही उसने यह संदेश भी दिया कि वो किसी की कृपा से नहीं अपितु अपने पुरुषार्थ से सम्राट बना था.इस 10 मीटर X 6 मीटर के चित्र के बाद एक बहुत ही मार्मिक चित्र ने मेरा ध्यान आकृष्ट किया और यह चित्र था लाल रंग की प्रधानता वाला पुनर्जागरण काल के इटली के प्रसिद्ध चित्रकार Domenico Ghirlandaio द्वारा बनाया गया चित्र ‘An old man & his grandson’.यदि आप को कला से जरा भी प्रेम है तो आप इस चित्र को अनदेखा नहीं कर सकते,अंधेरी सी बैकग्राउंड से बाबा और नाती के रोशनी से भरे चेहरे,बुजुर्ग व्यक्ति की मस्सों से युक्त नाक परन्तु उसका वात्सल्यपूर्ण चेहरा और उसकी छाती पर हाथ रखे उसके चेहरे को निहारता छोटा बच्चा;बड़ा ही अद्भुत चित्रण लगा मुझको वो.खैर अब और चित्रों को देखते,म्यूज़ियम की छत पर बनी कलाकारी को भी देखते हुए घूमते फिरते आखिर में मेरा सामना हुआ उस चित्र से जिसको देखने सबसे ज्यादा लोग इस म्यूज़ियम में आते हैं;प्रसिद्ध चित्रकार लियोनार्डो दा विंसी का बनाया शायद दुनिया का सबसे प्रसिद्ध चित्र,’मोनालिसा’.इस चित्र को देखने के लिए भारी भीड़ थी,मैंने एक कोने में थोड़ी खाली जगह देखी और वहाँ खड़ा होकर आधुनिक काल की इस सबसे चर्चित मानव निर्मित कृतियों में से एक को मैं भी निहारने लगा.इस चित्र की एक खास बात तो यह है कि इसको आप किसी भी को से देखें आपको लगेगा कि मोनालिसा जी आपको ही देख रही हैं.दूसरे उनकी विश्व प्रसिद्ध मुस्कान जिसमें बहुत से विद्वानों के अनुसार क्रोध और विद्रूपता की भी झलक है लेकिन एक बहुत ही विचित्र बात इस चित्र की यह है कि इसमें मोनालिसा की आँखों के ऊपर भौहें और पलकों पर बन्नी(बाल-eye lashes) नहीं हैं.1503 1519 में बनाई गई यह दुनिया की सबसे अधिक देखी जाने वाली और सर्वाधिक चर्चित पेंटिंग है जिसके समक्ष मैं खड़ा हुआ था.अपने 100 मिलियन अमेरिकी डॉलर के 1962 में हुए बीमे के कारण इसका गिनीज़ बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में नाम भी है.इस चित्र में भाव प्रवणता बहुत गजब की है और इस से जुड़े रहस्यों,विवादों और यह किसका चित्र है इन बातों ने भी इस चित्र को काफी चर्चित बनाया.एक खास बात यह थी कि इस म्यूज़ियम में जितनी भी कलाकृतियां थीं,मूर्ति,पेंटिंग या कुछ भी और उनमें भी खास तौर से यूरोप की तो उनमें से हरेक के पीछे एक कहानी थी,किस्सा था अथवा घटना थी.
मैं वहाँ पर खड़ा देख तो रहा था इन विदेशी चित्रकारों के बनाये विश्व प्रसिद्ध चित्रों को किन्तु सोच रहा था राजा रवि वर्मा के प्रसिद्ध चित्रों के विषय में और थोड़ी याद मुझको अमृता शेरगिल,अवनीन्द्र नाथ टैगोर या एम एफ हुसैन की भी आ रही थी और झुंझलाहट भी हो रही थी कि हमारे देश के कलाकारों,चित्रकारों को उनकी योग्यतानुसार विश्व भर में प्रसिद्धि और सम्मान क्यों नहीं मिला अभी तक.जितना मिला है वो उस से बहुत अधिक के हकदार थे.लेकिन कुछ बातें और भी थीं जो मेरे मन-मस्तिष्क को झकझोर रही थीं,जैसे कि इन यूरोपीय या इजिप्ट के लोगों ने अपना काफी पुराना इतिहास खोज निकाला है लेकिन हमारे यहाँ अभी पौराणिक मान्यताओं को प्रामाणिक ऐतिहासिक मान्यताओं में बदलने को बहुत काम होना बाकी है,ये वांछित गति से अभी तक क्यों नहीं हो रहा?क्या हमारे पुरातात्विक विशेषज्ञ कभी इतनी खोजें कर पाएंगे कि हमारे भी संग्रहालयों में लोग आएं और कहें कि ये हमारे पौराणिक संदर्भो के,भगवान श्री राम के,भगवान श्री कृष्ण के,जो वास्तव में थे ये मैं और हम सब मानते हैं,होने के पुरातात्विक प्रमाण हैं,ये समुद्र में डूबी द्वारिका भगवान श्री कृष्ण की थी ये हम सब जानते और मानते हैं किन्तु सही बात ये भी है कि पुरातात्विक और पौराणिक दृष्टि से इस पर अभी बहुत काम होना बाकी है.एक बात और मन में आई कि ऐसे क्या कारण थे कि यूरोप के विपरीत हमारे यहाँ मध्यकाल की जितनी पेंटिंग मिलती हैं या काव्य संग्रह मिलता है वो अधिकांशतः या तो ‘ईश स्तुति’ है या ‘राज स्तुति’!तो क्या सभी सुखी थे या हमारा अधिकांश बुद्धिजीवी वर्ग या तो ईश भक्ति में लीन था या राज भक्ति में?!या वास्तव में सब सुखी और सम्पन्न ही थे?!!आखिर क्या वजह है कि हमारे यहाँ 15वीं,16वीं,17वीं सदी या बाद में भी सामाजिक विषयों,सामाजिक विद्रूपताओं,विषमताओं अथवा व्यवस्था के विरुद्ध विचार अभिव्यक्त करती हुयी कलाकृतियां,चित्रकारी इतनी क्यों नहीं मिलतीं जबकि हमारे यहाँ चित्रकारी हर काल में और लगभग हर राज्य में काफी उन्नत दशा में रही है चाहे अजंता एलोरा की चित्रकारी हों या तंजौर या पाल राज्य में अथवा कांगड़ा या मधुबनी कला हो या मुगल काल की और राजपूताने की मिनिएचर पेंटिंग हों लेकिन जनता जनार्दन के प्रश्न उन चित्रों में कम ही दिखते हैं (प्राचीन काल की कला,चित्रकारी और साहित्य की बात और है)??!!!
या अभी बहुत सारी खोजें होनी बाकी हैं…..
यही सब देखते सोचते म्यूज़ियम के Dinon, Sully और Richelieu सभी भागों को देखते हुए अब मैं म्यूजियम के बाहर आ गया था.म्यूज़ियम के बाहर आते ही मुझको लगा कि शायद अभी तक मैं किसी दूसरी दुनिया या मायालोक में था जहाँ से लौटा हूँ.बहुत ही गजब का अनुभव है इस लूव संग्रहालय को देखना और जो भी पेरिस जाए उसको ये म्यूज़ियम अवश्य देखना चाहिए.ये अपने आप में एक अद्भुत अनुभव है.बाहर निकल कर जब मेरा ध्यान समय पर गया तो ज्ञात हुआ कि म्यूज़ियम में इतना समय कैसे बीत गया पता ही नहीं चला और अब मेरा जिनेवा,स्विट्ज़रलैंड की फ्लाइट का कार्यक्रम था इसलिए मैं तुरन्त यूथ हॉस्टल पहुँचा और सामान लेकर,टैक्सी पकड़ के एयरपोर्ट पहुँचा और थोड़ी देर में ही मैं चैक इन,सिक्योरिटी आदि की कार्यवाही के बाद जहाज में बैठा था अपने अगले गंतव्य,विश्व के सबसे खूबसूरत कहे जाने वाले,शांतिप्रिय देश स्विट्ज़रलैंड के जिनेवा शहर जाने के लिए और अपने मन में पेरिस की,फ्रांस की यादें संजोये हुए.
इसके बाद भी मैं अनेकों बार पेरिस आया और उन यात्राओं से जुड़ी कई रोमांचक यादें भी हैं जैसे एक बार होटल से मेरा सामान और मुझको बाहर निकाल दिए जाने की नौबत आना या एक बार रात को रास्ता भूल कर पेरिस के बाहरी हिस्से में चले जाना और उस से सुबह की फ्लाइट छूटने की नौबत तथा ऐसी अन्य कुछ बातें,आगे बताऊंगा जो अपनी अगले गंतव्य मनोहारी स्विट्ज़रलैंड की यात्रा के विषय में लिखने के पहले लिखूंगा.
Yatra kiya bina yatra ka anubhav
ReplyDeleteThanks sir
धन्यवाद भाई
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