प्रवासी दिवस:प्रवासी भारतीय और पद्मभूषण दादाजी पण्डित बनारसी दास चतुर्वेदी
प्रवासी भारतीय दिवस के अवसर पर:-
पद्मभूषण दादाजी पण्डित बनारसीदास चतुर्वेदी और प्रवासी भारतीय
पद्मभूषण दादाजी बनारसी दास चतुर्वेदी जी एक प्रसिद्ध साहित्यकार,पत्रकार,दो टर्म राज्यसभा सदस्य और गांधीवादी व्यक्ति के रूप में किसी परिचय के मोहताज नहीं है.
दादाजी फ़िरोज़ाबाद के रहने वाले थे और गांधी जी से प्रभावित होकर उनके अनुयायी हो गए थे.दादाजी सबसे पहले जब डेली कॉलेज,इंदौर जहाँ कि वो शिक्षक थे,उसको छोड़ कर साबरमती आश्रम गांधी जी के पास गए थे.बापू ने उनको अन्य कार्यों के अतिरिक्त प्रवासी भारतीयों के हालात जानने और उस पर काम करने की जिम्मेवारी दी थी.उस समय प्रवासी भारतीयों की दशा बहुत ही खराब थी.उस समय ये भारतीय विदेशों में काँग्रेज़ शासकों द्वारा मजदूरी हेतु ले जाये गए थे और गवर्नमेंट कॉन्ट्रेक्ट में जाने के कारण ये लोग 'गिरमिटिया मजदूर' कहलाते थे.फिजी,ब्रिटिश गुयाना,सूरीनाम, मॉरीशस और दक्षिण अफ्रीका आदि देशों में ये खास तौर पर ले जाये गए थे और बहुत ही बुरे हाल में थे.इनको जिस प्रकार से विदेश ले जाया जाता था वो बहुत ही खराब दशा होती थी.इन मजदूरों को पानी के जहाजों में जानवरों की भांति बाड़े में बंद करके ले जाया जाता था और अमूमन लगभग आधे तो यात्रा के दौरान ही मर जाते थे और जो वहाँ पहुँच जाते थे उनसे बंधुआ मजदूरों की भांति कार्य करवाया जाता था.एक बार तो यात्रा के दौरान प्लेग फैलने से सभी मजदूर जो उस जहाज में थे वो मृत्यु को प्राप्त हो गए थे.स्थिति बहुत ही खराब थी.प्रवासी भारतीयों की दशा जानने और उसमें सुधार के उपाय सुझाने को गांधी जी ने एक कमीशन साउथ अफ्रीका भेजा था जिसमें आगरा के एक शर्मा जी जो बार ऐट लॉ थे और दादाजी आदि लोग थे.इन लोगों ने लौट कर जो अपनी रिपोर्ट दाखिल की उसको ब्रिटिश सरकार ने दबा दिया और कभी उस पर ध्यान नहीं दिया और न कभी उसका कहीं जिक्र किया.
दादाजी गिरमिटिया मजदूरों के विषय में लगातार काम करते रहे.फ़िरोज़ाबाद जिले के हिरनगऊ नामक गाँव के एक व्यक्ति थे जिनका नाम था श्री तोताराम सनाढ्य.
ये 21 साल तक फिजी में कुली अथवा गिरमिटिया मजदूर की तरह रहे थे और किसी प्रकार से वापिस आ गए थे.वे किसी तरह से दादाजी बनारसी दास जी के सम्पर्क में आये,दादाजी ने उनकी पूरी कहानी और व्यथा सुनी और फिर उनकी आत्मकथा "फिजी द्वीप में मेरे 21 वर्ष" लिखी और प्रकाशित करवाई.इस पुस्तक ने उस समय प्रकाशित होने पर पूरे हिंदुस्तान में हल्ला और खलबली मचा दी.इस किताब से प्रभावित होकर प्रसिद्ध कवियित्री सुभद्रा कुमारी चौहान के पति ने एक नाटक लिखा था,"कुली प्रथा" जो कि बहुत चर्चित हुआ.इस सबसे पूरे देश में और विदेश में गिरमिटिया मजदूरों प्रवासी भारतीयों और उनकी दशा पर बहुत चर्चा होने लगी.दादाजी बिना थके अनवरत रूप से गांधी जी की मंशा के अनुसार इस विषय पर काम करते रहे.दादाजी ने एक किताब भी लिखी थी प्रवासी भारतवासी जो तत्कालीन काँग्रेज़ सरकार द्वारा जब्त कर ली गयी थी.उसकी एक प्रति अभी भी नैशनल आर्काइव्स में दादाजी के कलेक्शन में रखी हुई है.साबरमती से ही इस विषय पर एक अखबार निकलता था 'प्रवासी' जिसका सम्पादन दादाजी बनारसीदास जी ही करते थे.दुनिया भर में जितने भी प्रवासी भारतवासी थे उनके विषय में लिखना,उनका हिंदुस्तान से संवाद कराना,सरकार से उनकी दशा सुधार के प्रयास करना,वे कहाँ से गये थे इसके रिकॉर्ड बनाना,उनके भारत स्थित घरवालों को उनके विषय में जानकारी उपलब्ध कराना इन सब विषयों पर दादाजी ने बहुत काम किया.जब प्रवासी भारतीयों की दशा में कुछ सुधार होने लगा,काम मिलने लगा,उनको काम के लिए जमीनें मिलने लगीं तब उन लोगों ने दादाजी के इन प्रयासों को न सिर्फ recognize ही किया अपितु दादाजी की बहुत सराहना भी की.इन देशों खास तौर पर फीजी आदि के प्रमुख नेता अथवा राजदूत आदि जब आते थे तो वो दादाजी से मिल कर अपना सम्मान जताते थे और यदि मिल न सकें तो कम से कम बात/संपर्क अवश्य करते थे.दादाजी के पत्राचार लगातार इन देशों के राष्ट्राध्यक्षों से और गिरमिटिया मजदूरों की यूनियनों से होता रहा.बाद में दादा जी जब सांसद रहे तो भी प्रवासी भारतवासियों के मुद्दों koको जोरशोर से उठाते रहे.दादाजी ने जगह जगह हिंदी भवन बनाने शुरू किया,जब दीन बंधु एंड्रयूज के संपर्क में आये और साबरमती से शांति निकेतन गए तो वहाँ और दिल्ली में भी हिंदी भवन बनवाया. दादाजी का प्रयास यह था कि जहाँ जहाँ प्रवासी भारतीय हैं वहाँ हिंदी भवन अवश्य बने.इसी कड़ी में फिजी में भी हिंदी भवन बना.प्रवासी भारतीयों को वास्तव में जब इस बात की आवश्यकता थी कि उनका देश उनकी सुध ले तो गांधी जी के कहने पर दादाजी बनारसी दास जी ने इस काम को बखूबी अंजाम दिया और इसीलिए गांधी जी अक्सर कहते थे कि प्रवासी भारतीयों के विषय में उनके बाद यदि सबसे अधिक कोई जानता था और जिसने इस विषय पर काम किया था तो वो थे दादाजी बनारसीदास चतुर्वेदी.
आज प्रवासी दिवस पर महात्मा गांधी और उनके निर्देश पर प्रवासी भारतीयों के लिए भारत में सबसे पहले काम करने वाले,उनकी पीड़ा और समस्याओं से भारत देश और विश्व के लोगों को परिचित कराने वाले पद्मभूषण परमपूज्य दादाजी पण्डित बनारसीदास को सादर नमन!
क्या आप उनके सम्मन या स्मृति में कोयी आयोजन भी करते हैं।राजीव सक्सेना जर्नलिस्ट आगरा (sxrajeev[@] gmail[.]com )
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