मेरी अगस्त 2022 की इटावा की तीर्थ यात्रा

मेरी इटावा की तीर्थ यात्रा 28 अगस्त 2022


अभी कुछ दिन पहले 28 अगस्त को मेरा इटावा जाना हुआ।मेरे पुत्र अर्पित की और उपासना की शादी के बाद हम सबका मन था कि एक बार सबके साथ इटावा हो आएं किंतु कोरोना की महामारी और फिर मम्मी और पापा दोनों के न रहने से एक लंबे समय तक न जाना सम्भव हुआ और ना ही उस समय मन था।

इस बार की इटावा यात्रा में मैं,मेरी पत्नी रचना,छोटे भाई अभिनव (गुड्डू) की पत्नी नीता,मेरे पुत्र अर्पित,अर्पित की पत्नी उपासना और मेरी पुत्री ऐश्वर्या गए थे।अब जब सबके साथ इटावा गए तो भले ही अपने होश संभालने के समय से ही इटावा की यादें भी हैं किंतु इस बार की इटावा यात्रा का अनुभव अलग ही था।

इस इटावा यात्रा की चर्चा करूँ उसके पहले ये बताना उचित होगा कि इटावा से हमारे परिवार के पुश्तों से रिश्ते रहे हैं और हमारी लगभग 6 पीढ़ियों या सन 1850-1860 ईस्वी वाले दशक से तो जो रिश्ते रहे वो मेरी जानकारी में हैं।

सबसे पहले एक संक्षिप्त विवरण इन रिश्तों का:-

1.हमारे बाबा स्व0 सुशील चन्द्र चतुर्वेदी जी के बाबा स्व0 मथुरा प्रसाद जी की बहन मुना का विवाह इटावा के सुंदर लाल जी चतुर्वेदी से हुआ था 1850 या 1860 के दशक में।

2.हमारे बाबा स्व0 सुशील चन्द्र जी के बाबा के छोटे भाई राय साहब पूरन मल जी मास्टर बाबा का विवाह इटावा के छेदी लाल जी मैहारी (चतुर्वेदी) की बहन से जिनको हमारे परिवार में अच्छी अम्मा के नाम से जाना जाता है उनसे सन 1872 ईस्वी में हुआ था।

3.हमारे पापा स्व0 अशोक चंद्र चतुर्वेदी जी के बाबा हजारी लाल जी चतुर्वेदी का विवाह इटावा की सुखदेवी जी से हुआ था।

4.हमारे बाबा के चाचा मोती लाल जी का विवाह इटावा के स्व0 रामदास जी की बहन फूलमती जी से हुआ था।ईस्वी सन 1913

5.हमारे पापा के ताऊजी जज साहब सुरेश चंद्र जी का विवाह इटावा की रुक्मिणी जी    से हुआ था और उनको हमारे घर में अमैयां कहा जाता था।ईस्वी सन 1904

6.हमारे बाबा सुशील चन्द्र जी का विवाह इटावा के खतराने टोला निवासी

 स्व0 बृजवासी लाल जी की पुत्री कृष्णा जी से हुआ था जो हमारी दादी थीं।ईस्वी सन 1911

7.हमारे पापा की बुआ दयावती बुआ जी का विवाह इटावा के  रामदास जी से हुआ था।

8.हमारे बाबा के चाचा स्व0 रोशन लाल जी (भीम चच्चा) की पुत्री सरस्वती बुआजी का विवाह खतराने टोला निवासी रघुवर दयाल जी से हुआ था जो हमारी दादी के चचेरे भाई थे।इनके पुत्र मित्रा नंद जी भारतीय पुलिस सेवा में थे जो दिल्ली पुलिस में थे तथा CRP के IG भी रहे थे।इनकी अपने सेवाकाल में ही मृत्यु हो गयी थी।

9.हमारे बाबा के चाचा डॉक्टर गुलजारी लाल जी (बाबू चच्चा) की पुत्री सरोजिनी बुआ जी का विवाह खतराने टोला निवासी,हमारी दादी के भाई और स्व0 बृजवासी लाल जी के पुत्र बलभद्र जी से हुआ था।

10.हमारे बाबा के चाचा डॉक्टर गुलजारी लाल जी के पुत्र राय बहादुर बृजेन्द्र नाथ जी का विवाह इटावा की विद्यावती जी से हुआ था।

11.हमारे ताऊजी श्री सुधीर चंद्र जी का विवाह हमारी मम्मी के चाचा स्व0 दौलत राम जी की पुत्री उर्मिला जी से हुआ।

ईस्वी सन 1967

12.हमारे पापा का विवाह हथकांत/इटावा के स्व0 तेजपाल जी की पुत्री रजनी जी (हमारी मम्मी) से दिसम्बर सन 1960 में हुआ।

13.हमारी मम्मी के ताऊजी स्व0 चुन्नी लाल जी की पुत्री मिथिला जी का विवाह हमारे पापा के चाचा स्व0 नरेंद्र नाथ चतुर्वेदी (IAS) के पुत्र और हम लोगों के JN चाचा से हुआ।

14.हमारे पापा के चाचा स्व0 नरेंद्र नाथ जी की पुत्री  लीला जी (गुड्डी बुआ) का विवाह हमारी मम्मी के ताऊजी स्व0 चुन्नी लाल जी के पुत्र नरेश चन्द्र जी (नरेश मामा) से हुआ।

15.हमारे ताऊजी के पुत्र श्री सुदीप चन्द्र जी (टुन्नू दादा) के पुत्र सुशांत का विवाह इटावा के श्री अशोक नारायण चतुर्वेदी की पुत्री शिखा से हुआ है।

अपने घर की इटावा से इतनी रिश्तेदारियां तो हमको याद हैं जिनके अतिरिक्त फिरोजाबाद के अनेकों चतुर्वेदी परिवार के इटावा से रिश्ते हैं।


अब बात अपनी इस इटावा यात्रा की।दरअसल जैसा मैंने बताया कि अपने पुत्र अर्पित और उपासना के विवाह के बाद से ही बच्चों के साथ इटावा जाने का मन था जो अब जाकर अगस्त 2022 में सम्भव हो पाया।इटावा से इतना निकट का रिश्ता रहा और आना जाना रहा कि इच्छा हुई कि बच्चों को भी इटावा ले जाकर वहाँ से परिचित कराया जाए,अपनी ननसार दिखाई जाए।

इटावा का प्रोग्राम बनने पर मेरी स्व0 शीतल बाबू के पुत्र पियूष और श्री अशोक नारायण चतुर्वेदी जी से बात हो गयी थी और इटावा में हम लोग चक्कर वाली सड़क की तरफ से घुसे जहाँ टिकसी मंदिर के नीचे पियूष हमारा इंतज़ार अपनी मोटरसाइकिल के साथ कर रहे थे।वहाँ से सबसे पहले हम लोग छिपैटी के लिए चले तो रास्ते में टीले काट कर कई निर्माण कार्य होते हुए दिखे।आगे चल कर मैंने साथ के सब लोगों को शीतल प्रसाद शोरावाल स्कूल दिखाया जहाँ हमारी मौसियाँ पढ़ती थीं।उसके आगे फुलन्दिन और फिर इमली दिखी जहाँ कई बार इधर आकर इमली के नीचे हम लोगों की कार खड़ी होती थी और हम लोग अनंदिन के सामने से सीढियां उतरते हुए आ जाते थे।दाहिने हाथ पर खतराने टोला की रास्ता थी जिसको दिखाते हुए मैंने सबको बताया कि खतराने टोला में हमारी स्वर्गीय दादी श्रीमती कृष्णा जी का मायका था बृजवासी लाल जी के यहाँ।पापा बताते थे कि उनकी ननिहाल के घर में सड़क की तरफ भी खिड़की खुलती थी।जब सड़क से किसी शवयात्रा की आवाज आती थी तो हमारे पापा जो उस वक़्त एक छोटे बच्चे थे उनकी नानी उनकी आँखें अपनी हथेलियों से बंद करते हुए कहती थीं कि उधर मत देखो।अभी तक मैं इटावा अपनी ननसार बचपन से आता रहा था,अपने पापा की ननसार का घर भी मैंने देखा था किंतु इस बार की अनुभूतियां कुछ भिन्न थीं।मैं सोच रहा था कि कभी इसी खतराने टोला की गली में हमारी दादी,पापा, ताऊजी,बुआओं आदि के साथ आती होंगीं,अपने बचपन में वो भी इन्हीं गलियों में खेली होंगीं।सन 1911 में इसी खतराने टोला में हमारे बाबा सुशील चंद्र जी की बारात आयी होगी।

आगे चल कर मैंने सबको छैराहा दिखाया, बजरिया से निकलते में डाकखाने वाली गली जिससे हम लोग बजरिया आ जाते थे।हरदू की दुकान,पतंगालाल की हेशमी, कुंजबिहारी के पेड़ों की दुकान की बात करते हुए आगे बढ़ते में बद्री प्रसाद की धर्मशाला दिखी और मैंने फिर सबको बताया कि इसमें पहले हमारी मौसियाँ की बारात ठहरती थी।इसी बद्रीप्रसाद की धर्मशाला में हमारे पापा की बारात भी रुकी थी।आगे चल कर पचराहे से मस्जिद के नीचे से बढ़कर कुंज होते हुए हम लोग जोड़िया महादेव पर पहुँच गए जहाँ श्री अशोक नारायण चतुर्वेदी जी मिल गए और वो भी पियूष की मोटरसाइकल पर बैठ गए।

सबसे पहले हम लोग सतिन या जहाँ सती मंदिर बने हैं वहाँ गए।हमारे ननसार वालों की सती का मंदिर मैनपुरी में है लेकिन अब ननसार वाले लोग इटावा में ही सती पूजते हैं।हमारी मम्मी हम लोगों की शादी के बाद जब सबको लेकर इटावा आईं तो यहाँ के दर्शन भी किये थे और अब हम लोग अपने पुत्र,पुत्रवधू और पुत्री आदि सबके साथ यहाँ प्रणाम करने आये थे।इंटरनेट से  जानकारी मिली कि विदेशी आक्रमणकारी मोहम्मद गौरी से युद्ध के दौरान राजा जयचंद के सेनापति सुमेर सिंह के भी कई सैनिक शहीद हुए,उन वीर सैनिको की पत्नियो ने दुश्मन की गिरफ्त में आने से पहले ही अपने प्राण त्याग दिए,और वे सती हो गई।इटावा की छिपैटी स्थित ये मठ उन स्वाभिमानी महिलाओ की गौरवगाथा के जीते-जागते प्रमाण हैं।इटावा के इन सती मठों में चतुर्वेदी समुदाय के डुंडवार, छिरौरा आदि लोगों के सती मंदिर भी यहाँ हैं। अब ये पता करना इटावा के इतिहासकारों का काम है कि क्या चतुर्वेदी वीर सैनिक भी उस विदेशी आक्रांता के विरुद्ध युद्ध में शामिल होकर शहीद हुए थे?माथुर चतुर्वेदी लोगों का वीरता का एक बड़ा इतिहास रहा है।

सती मठों की ओर जाते में लगा कि इस स्थान पर समय जैसे ठहर सा गया है।वैसे ही जंगली पेड़,झाड़-झंखाड़ जिनको काटने को या कहें जिनसे बचने को पियूष ने पास के मकान से एक लग्गी ले ली थी।वैसे ही पुरानी आगे को ढलान वाली सीढियाँ जिनके किनारे से पानी बहता हुआ नाली में जा रहा था।एक अजीब सा सन्नाटा वहाँ पसरा हुआ था,पुराने बंद कुएं के आगे बढ़ते हुए हम लोग सीढियाँ चढ़ कर सती मठ पर पहुँचे और सबने प्रणाम किया।वहाँ मुझको याद आया कि कैसे हम लोग अपनी मम्मी के साथ यहाँ आये थे।वहाँ एक शिव जी का मंदिर भी बना हुआ था लेकिन था बिल्कुल सन्नाटा।ऐसा लगता ही नहीं कि इतने भीड़ के समय में आज भी किसी शहर के बीचोबीच ऐसा निर्जन,शांत स्थान हो सकता है।

सतिन से अब हम दर्शन हेतु दाऊजी के मंदिर पहुँचे।मेरे पापा की दादी स्व0 श्रीमती सुखदेवी जी पत्नी स्व0 हजारी लाल जी बापू भी इटावा की थीं।ये चौपार के पास वाला मंदिर उनके मायके के घर के पास ही था और वो दाऊजी के प्रति असीम श्रद्धा और भक्ति रखती थीं।वैसे भी श्री माथुर चतुर्वेदी समुदाय के लोग भगवान श्री कृष्ण को अपना सखा मानते आए हैं और  दाऊजी उनके आराध्यों में प्रमुख रहे हैं।एक तो ये कारण था दूसरा हमारे बाबा की माँ के कारण हम लोगों के घर में भी दाऊजी के प्रति विशेष श्रद्धा रही है और खासतौर पर इस मंदिर की।हमारी दादी और फिर हमारी माँ भी इस मंदिर पर अक्सर दाऊजी को पोशाक चढ़वाती थी।अपने परिवारीजनों के साथ दाऊजी के दर्शन करके हम सबका मन बहुत ही प्रसन्न हुआ।वहाँ एक छोटी बच्ची को देख कर मैं यही सोच रहा था कि कभी ऐसे ही मेरे पापा की दादी आदि भी यहाँ ऐसे ही दाऊजी के दर्शन करते थे।इस बार अजीब बात यह हो रही थी कि मुझको इटावा आ कर अपनी बड़ी दादी के किस्से, अपनी दादी और अपनी माँ की बार-बार बहुत याद आ रही थी।

दाऊजी के दर्शन करके हम लोग स्व0 शीतल बाबू के घर अर्थात पियूष के घर गए।वहाँ उनके सब परिवारीजन से मिलकर बहुत अच्छा लगा।पियूष के यहाँ से निकल कर मैंने वेंकटेश जी के मंदिर पर जाकर हाथ जोड़े और फिर मम्मी की बिट्टी मौसी के घर आदि के सामने से होते हुए आगे बढ़े।आगे चौपार से मम्मी के पोपो मामा के घर के सामने होते हुए निकले।उस गली के मोड़ पर दो चतुर्वेदी नवयुवकों ने पालागन की और बताया कि वो स्व0 लखमी चन्द्र जी के नाती हैं और उन्होंने वहाँ दुकान खोल ली है।आगे बढ़ने पर हमको पोपो मामा के लड़के नवीन और उनके साथ में कपिल तथा संजू मिले और उनसे बात करके बहुत अच्छा लगा।सामने कपिल का घर देख कर एक बार फिर मैं सोच रहा था कि इस घर में मेरे बाबा के चाचा मोतीलाल जी की बारात सन 1913 में आई होगी और इसी घर में मेरे पापा की बुआ दयावती बुआजी रहती रही होंगीं। जैसे मैंने पहले भी कहा कि इस बार की इटावा यात्रा की अनुभूतियां अलग थीं।

यहाँ से आगे बढ़कर चलते हुए हम पुरोहितन टोला के मोड़ पर पहुँचे और वहाँ सामने ही 67 पुरोहितन टोला यानी हमारी ननसार का घर दिख रहा था।एक विशाल भवन जिसके हरे लोहे के खम्भे दूर से ही उसकी भव्यता को बताते हैं।वहाँ की ओर बढ़ते हुए मैं सबको बता रहा था कि कैसे हम लोग इस चबूतरे पर खेलते थे।छोटे थे तो कई बार इसी सड़क पर हब्बू का तांगा आता था जिसमें बैठ के लोग स्टेशन जाते थे।सामने आगे रहने वाले दाढ़ी वाले बाबा जब निकलते थे तो हम सब उनसे दाढ़ी वाले बाबा राम राम कहते थे और वो भी जवाब में राम राम कहते हुए निकल जाते थे।इस घर ने न जाने कितनी शादी,बारातें देखी हैं जो आज सूना पड़ा है।हर गर्मी की छुट्टियों में जब सारे लोग,मामा,मौसी और उनके परिवार इकट्ठे होते थे तो घर में ऐसा लगता था कि जगह कम पड़ रही है।सबके साथ जब हम पौरी और ड्योढ़ी से गुजरे तो मैंने सबको बताया कि इस बैठके में हमारी मम्मी के बाबा लेखराज जी चतुर्वेदी रहते थे जो बप्पू कहलाते थे।उनकी ठसक,उनका जबरदस्त व्यक्तित्व कोई भूल नहीं सकता।घर के आंगन में टट्टर के नीचे और अंदर के दल्लान में खड़े होकर मैं याद कर रहा था वहाँ होने वाले शाखोच्चार और शाम की आरती को।हम सभी लोग ऊपर गए तो एक तरफ मैं बच्चों को खास तौर पर बता रहा था कि कैसे हम लोग टट्टर पर सोते थे,कैसे चौके में हमारी नानी,मामीजी लोग सबका दिन का खाना बनाती थीं और बाहर के स्थान में मौसी लोग शाम का।छत पर कहाँ मम्मी की चारपाई पड़ती थी और कैसे हम लोग बरामदे से नीचे झांकते हुए आने वालों का स्वागत करते थे लगभग चिल्लाते हुए कि आय गए,आय गए।

एक तरफ वो पुरानी बातें तो मनोमस्तिष्क में चलचित्र की भांति चल ही रही थीं किंतु साथ ही अचानक मुझको लगा कि अरे कभी यहीं हमारी मम्मी और मौसियाँ बच्चों की तरह भी तो खेले होंगे।अगर यहाँ हमारे बचपन के दिनों की स्मृतियां हैं तो मम्मी लोग भी फ्रॉक पहन कर यहीं खेले होंगे।मामा और मम्मी मौसियों के बीच यहाँ बाल-तकरार हुयी होंगी और फिर धमाचौकड़ी भी।मुझको वो डबल रोटी मक्खन वाला याद आ रहा था जो नीचे से आवाज लगाता हुआ निकलता था और चूंकि मुझको पसंद थी तो डबल रोटी और मक्खन मेरे लिए लिया जाता था।असल में उस स्थान के कोने-कोने से हम लोगों के जीवन के एक बड़े कालखंड की मधुरतम स्मृतियां जुड़ी हुई हैं और लिखने बैठें तो इस पर कई ग्रन्थ लिख सकते हैं।कहीं अपने नानाजी जिनको हम लोग बाऊजी कहते थे उनकी याद आयी तो रौंस पर बैठ कर शाम का खाना,सुभाष मामा के साथ की बातें और प्रकाश मामा के साथ के किस्से याद आये।डॉक्टर गोपाल का इंजेक्शन लगाना,मोतीलाल का दूध औटाना,नीचे के गौंड़ा में आइस पाइस और नीली परी-पीली परी,मगर गए ससुराल खेलना,छत पर पतंग उड़ाना,अंटिया से पूरा शहर देखना,सामने वाला में शादी का खाना बनना, शंभू मामा और उनकी टीम,हम सबका जोश और ऊधम याद आया और सामने के घर वाली काके की नानी और अन्नू भाईसाहब और आशा जी भी याद आये।उमेश मामा के जमाने का सिनेमा जाना,बैंचे की चुस्की,जुगरामऊ के हनुमान जी के दर्शन को जाना,बाऊजी की राइस मिल में जाकर सही मायने में मजे करना,टैंक में नहाना,जलेबी कचौड़ी खाना और भी न जाने कितनी बातें-कितनी यादें….

इन्हीं यादों के समुद्र में डूबते उतराते हम लोग नीचे गौंड़ा की तरफ आये वहाँ के बड़े हॉल में श्री अशोक नारायण जी के साथ बैठे,चाय नाश्ता हुआ और उनसे पुराने दिनों और दीन-दुनिया की चर्चा होती रही।उनके साथ हमारी शुरू से खूब बनती रही है और उनके सरल सहज स्वभाव के हम सभी कायल रहे हैं।

मैंने अपने साथ के सब लोगों को बताया कि शादियों के दौरान उस हॉल में घर के सब दामाद लोग रुकते थे।मन तो ननसार के घर से जाने का हो ही नहीं रहा था और जीवन में कभी नहीं हुआ पर घड़ी कह रही थी कि अब चलना ही होगा।

घर से निकल कर हम लोग स्व0 शिवदत्त जी पटू चाचाजी जो कि राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त शिक्षक,विद्वान और साहित्यकार थे उनके घर गए।उस समय की उनकी बैठक का दृश्य मस्तिष्क पटल पर उभर आया।वहाँ अजीत भाईसहब,गुड्डन भाईसाहब आदि सभी लोगों से बहुत ही गर्मजोशी से मुलाकात और बातें हुईं।इटावा पहुँच कर शीतल बाबू बहुत याद आये,डॉक्टर दया टण्डन,बाबू गिरजा शंकर आदि याद आये और पवन तथा पुनीत की भी याद आयी।बहुत लोगों से मुकाकात हुई तो बहुतों से समयाभाव के कारण चाह कर भी मिलना नहीं हो सका।कहने का मतलब ये है कि इटावा का हम लोगों के जीवन में एक अलग स्थान रहा है और ऐसा लग रहा था कि आज यादों का खजाना खुला है जितना चाहो बटोर लो।


इसके बाद हम लोग इटावा के प्रसिद्ध टिकसी मंदिर गए जो बहुत ही भव्य और विशाल इमारत है।कहते हैं कि वहाँ के शिवलिंग की स्थापना स्वयं मुनि वसिष्ठ ने की थी और इसीलिए वहाँ के शिवलिंग को वसिष्ठेश्वर महादेव के रूप में जाना जाता है।लगभग 83 सीढ़ी चढ़ कर जब सब लोग ऊपर पहुँचे तो वहाँ से चारों ओर का नजारा देख कर सब का मन प्रफुल्लित तो होना ही था।सामने बारादरी,तो यमुना की झलक,दूसरी तरफ शहर का दृश्य!

वाह!क्या कहने थे उन दृश्यों के!

जब हम टिकसी मंदिर से नीचे उतरे तो मैं बच्चों को बता रहा था कि भारी शरीर होने के बावजूद हमारी मम्मी यहाँ ऊपर तक चढ़ कर आ जाती थीं।मैं यह भी याद कर रहा था कि कैसे वहाँ लाल मखमली रंग का एक कीड़ा निकलता था जिसको हम लोग राम की बुढ़िया कहते थे और किसी डब्बी में रख कर घर भी ले जाते थे बचपन में।टिकसी मंदिर से उतरते में मैंने अपने साथ के सभी लोगों को सामने का स्वामी नारायण दास जी का आश्रम भी दिखाया और बताया कि वो एक उच्च कोटि के संत थे और उनकी मुझ पर बहुत कृपा थी।

नीचे उतर कर हम सबने काली बाड़ी के दर्शन किये और मैंने टिकसी मंदिर के प्रांगण में बना प्रसिद्ध कवि का देव का स्मारक भी देखा जहाँ बच्चे क्रिकेट खेल रहे थे।मुझको याद आया कि भैया साहब श्रीनारायण जी की प्रेरणा और प्रयास से यह स्मारक बना था जिसमें बिड़ला जी ने भी कुछ मदद की थी।इस स्मारक के बनते वक़्त मेरे नाना जी स्व0 तेजपाल जी,स्व0शिवदत्त जी आदि ने भी बहुत महत्वपूर्ण रोल निभाया था।

इन्हीं बातों को करते हुए हम लोग फिर काले वाहन या काली बाहं की तरफ चल पड़े।

वहाँ जाते में मैं याद कर रहा था और बता भी रहा था कि कैसे सुभाष मामा यहीं से आगे हम लोगों को जमुना जी नहाने ले जाते थे जिसमें हम लोगों को जो मजा आता था वो अवर्णनीय है।

काले वाहन पहुँच कर भी पुरानी यादों का पिटारा खुलना ही था कि कैसे मम्मी-पापा और सभी के साथ यहाँ दर्शन करने आते थे।वहाँ स्थित देवी के मंदिर में हम सबने दर्शन किये और घंटों की लंबी लड़ी देख कर बहुत ही अच्छा लगा।

और अब समय आ गया था इटावा की इस यात्रा के समापन का।पियूष हम लोगों को छोड़ने हाइवे तक गए और उनको जितना धन्यवाद दिया जाए वो कम था।इटावा से चलते समय में सोच रहा था कि अब तक मैं न जाने कितनी बार इटावा आया था किंतु इस बार की यात्रा बहुत फर्क किस्म की थी।ये पहला मौका था जब मैं अपने मम्मी पापा के न रहने के बाद इटावा आया था तो यादों की भावनाएं भी अलग किस्म की थीं।यदि हमारा घर फिरोजाबाद है तो इटावा भी पुश्तों से हम लोगों की ननसार रहा है और जिस स्थान से हमारी माँ, दादी,नानी,नाना,परदादी और उनसे भी ऊपर की पुश्तों का जन्म-सम्पर्क रहा हो वो स्थान क्या किसी तीर्थ से कम हो सकता है भला?इसलिए मुझको अपनी इटावा की ये वाली यात्रा किसी तीर्थ यात्रा से कम नहीं लगी।चलते चलते मेरा दिल कह रहा था कि इटावा हम फिर आएंगे,क्योंकि दिल अभी भरा नहीं।










Comments

  1. बहुत बढ़िया,बचपन आँखों के सामने घूम गया।

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