सिंदबाद ट्रैवल्स-34 जर्मनी हाइडलबर्ग और फ्रैंकफर्ट Sinbad Travels-34 Heidelberg and Frankfurt

सिंदबाद ट्रैवल्स-34

जर्मनी-3  हाइडलबर्ग-3 साथ में फ्रैंकफर्ट-1


Sindbad Travels-34

Germany-3

Heidelberg-2 with Frankfurt-1


Frankfurt Coordinates 

50.1109° N, 8.6821° E


अगले दिन सुबह उठ कर तैयार होते में ही विकास बाफना जी और उनके साथी से बात हुई तो उन्होंने कहा कि फ्रैंकफर्ट में बुक फेयर लगा हुआ है और वो दोनों उसमें जा रहे हैं।उन्होंने मुझसे भी फेयर में चलने को कहा किंतु मुझको इस विषय में कोई जानकारी नहीं थी अतएव मैंने कहा कि भाई मैं एक्सपोर्ट करने आया हूँ न कि मेले घूमने;बाद में जाकर समझ में आया कि उस समय की मेरी यह सोच और समझ दरअसल मेरी कूपमंडूकता की ही द्योतक थी और कुछ नहीं।खैर…

हम लोग हाइडलबर्ग स्टेशन से ट्रेन पकड़ कर फ्रैंकफर्ट के लिए चले।यूरोप की ट्रेनों और खास तौर पर जर्मनी की ICE Trains के विषय में आगे बताऊंगा अभी बस इतना कि यूरोप और खास तौर से जर्मनी की ट्रेनों में चलना एक शानदार अनुभव होता है।हाइडलबर्ग से फ्रैंकफर्ट का लगभग सवा घंटे का सफर रास्ते के दोनों ओर के मनभावन दृश्यों को मंत्रमुग्ध होकर देखते हुए ही बीता।फ्रैंकफर्ट मेन स्टेशन से बाहर निकल कर लगा कि एक अन्य किस्म के शहर में आ गए हैं।स्टेशन और उसके बाहर गहमा गहमी का माहौल,बाहर चारों ओर मर्सडीज़ बैंज़ गाड़ियों का सड़क पर वर्चस्व,स्टेशन के अंदर एक विशालता का अहसास,बड़ी घड़ी,अनाउंसमेंट, ट्रेनों का जबरदस्त आवागमन,न जाने कितने प्लेटफॉर्म्स,खाने के किओस्कस और सब एक आयरन स्टील के हॉलोंनुमा स्ट्रक्चर में एक छत के नीचे, एक अलग ही माहौल प्रस्तुत कर रहे थे।एक बहुत बड़े टीनशेड जैसे आर्च में जिसका कि बीच का पूरा हिस्सा पारदर्शी था जिसमें से रोशनी आती थी और उस विशालकाय स्ट्रक्चर के बीच में अनेकों प्लैटफॉर्म्स जिनपर शानदार रंगीन इंजनों वाली,बढ़िया शीशे की खिड़कियों वाली आकर्षक ट्रेनों का आना-जाना,उनका अनाउंसमेंट,बड़े बड़े मेहराबदार गेट,चलते हुआ एस्केलेटर,शॉपिंग मॉल आदि सब मिलाकर एक अद्भुत विशालकाय इमारत का दृश्य था वो जिसको देख कर आप चमत्कृत हुए बिना नहीं रह सकते थे।

फ्रैंकफर्ट स्टेशन की डिजाइन बनाने का अवार्ड जर्मन आर्कीटेक्ट Hermann Eggert ने जीता था और यह स्टेशन सन 1888 के अगस्त महीने में बन कर तैयार और चालू हुआ और यह यूरोप का सबसे बड़ा रेलवे स्टेशन था।इसके अंदर के हिस्से को बनाने में बहुत बड़ी मात्रा में आयरन,स्टील और शीशे का प्रयोग हुआ है।

फ्रैंकफर्ट के Hauptbahnhof अर्थात रेलवे स्टेशन से बाहर निकलने पर स्टेशन की बिल्डिंग एक अलग ही नजारा दिखाती है।बलुआनुमा पत्थर की  नियो रैनिसां और नियो क्लासिकल वास्तुशिल्प से बनी यह इमारत बहुत ही भव्य दृश्य निर्मित करती प्रतीत होती है।स्टेशन के पूर्वी हिस्से से बाहर निकल कर देखने पर उसकी तीन प्रमुख आर्च के विशालकाय गेटों वाली इमारत पर ऊपर बीचों-बीच एक विशालकाय घड़ी लगी है,दिन और रात की दो प्रतीकात्मक मूर्तियां हैं।घड़ी के ऊपर स्टेशन के लिए जर्मन भाषा में प्रयुक्त होनेवाला शब्द Hauptbahnhof लिखा है उसके ऊपर ही जर्मन रेल जिसको उनकी भाषा में Deutsche Bahn कहते हैं उसका संक्षिप्त नाम का logo DB लिखा है।

फ्रैंकफर्ट रेलवे स्टेशन के मुख्य हॉल के द्वार के ऊपर ही प्रसिद्ध यूनानी देवता एटलस की विशालकाय मूर्ति लगी दिखी जो अपने कंधे पर विश्व का विशाल ग्लोब उठाये हुए है और उसके साथ दो मूर्ति और हैं,ये मूर्तियां काहिया हरे रंग की किसी धातु की बनी हुई प्रतीत हुईं।स्टेशन से बाहर निकल कर मैं कुछ देर उस स्टेशन की भव्यता को निहार रहा था और सोच रहा था कि पेरिस में विशाल आइफ़िल टॉवर दिखा तो यहाँ जर्मन लोगों की कार्यकुशलता,इंजीनियरिंग कौशल,कार्यदक्षता और सक्षमता का प्रतीक यह विशालकाय ढाँचा था और मैं ये भी सोच रहा था कि द्वितीय विश्वयुद्ध के अंतिम चरण के दौरान इसी जर्मनी में कितनी तबाही भी हुई थी।

अब मैंने स्टेशन से बाहर निकल कर एक टैक्सी ली और फ्रैंकफर्ट स्थित जर्मन चैंबर ऑफ कॉमर्स के दफ्तर पहुँच गया।ध्यान रखिएगा कि ये वो जमाना था जब न मोबाइल फोन थे और ना ही इंटरनेट था।हमारे भारत में न ऐसी शानदार ट्रेन ही चलती थीं (यद्यपि राजधानी एक्सप्रेस और शताब्दी चलना शुरू हो गया था)।पीज़ा और बर्गर का जमाना अभी भविष्य में ही ठीक से हमारे देश में शुरू होना था जबकि फ्रैंकफर्ट में रेडियो टैक्सी थीं जो पता बताने मात्र से सही जगह पहुँचा देती थी और इन सबसे मुझ जैसे 29 वर्षीय भारतीय नौजवान का बार-बार चमत्कृत महसूस करना लाजिमी ही था।चैंबर ऑफ कॉमर्स पहुँच कर मैं वहाँ के अधिकारी से मिला,अपना परिचय दिया और बताया कि मैं यहाँ सिल्क के स्कार्फ,काँच के मोतियों के माला आदि आभूषण,पत्थर और पीतल के हैंडीक्राफ्ट्स आदि के व्यापार को आया हूँ और मुझको उनकी मदद चाहिए।मेरी बात सुनकर उन्होंने मुझको वहाँ की यलो पेजेज डायरेक्टरी में बताया और फिर मैंने उसी दफ्तर की फोटोकॉपी मशीन से उन पन्नों-पतों की कॉपी की,उसके चार्जेज का भुगतान किया और उन पतों को देखना शुरू किया।

उन पतों में मुझको फ्रैंकफर्ट स्टेशन के पास का ही एक Modeschmuck यानी Costume Jewellery की दुकान का पता दिखा और मैं उस पते को तलाशता हुआ Kaiser Strasse से आगे चलता हुआ वहाँ पहुँच गया।

वह एक शानदार शो रूम था जिसके शो केसेज में से काँच आदि मोतियों के बने विभिन्न किस्म के माला,ईयर रिंग्स,नैकलेस, अंगूठियां आदि दिख रहे थे।मैं अपने साथ जो सैम्पल्स लाया था वो भी बहुत अच्छे थे तो मुझको लगा कि मैं सही जगह आ गया हूँ।ये सब देखभाल कर मैं उस दुकान के अंदर अपने सैम्पलों से भरी अटैची/सूटकेस और भारी बैग लेकर घुस गया।दुकान बहुत सुंदर थी और उसमें काफी भीड़ थी।मैं काउंटर पर खड़ी एक लड़की के पास गया और मैंने उससे बात करनी चाही किंतु उसको शायद सिर्फ जर्मन भाषा आती थी या कम से कम अंग्रेजी और हिंदी भाषा नहीं आती थीं जबकि मुझको इन्हीं दो भाषाओं का ज्ञान था।खैर मैंने और प्रयास किया और अंततः उनमें से एक को यह समझाने में सफल हुआ कि मैं  यहाँ अपने प्रोडक्ट बेचने आया हूँ।उन लोगों ने मुझसे बहुत बेरुखी दिखाई और कहा कि माल खरीदना उनका काम नहीं है।मेरे पूछने पर उन्होंने बताया कि खरीद का काम करने वाली टीम और ऑफिस अलग है और इस काम को उनकी कम्पनी के मालिक ही देखते हैं।यह जानने पर मैंने उनसे अनुरोध किया कि मुझको अपने मालिक से मिलवा दो तो भाषा की काफी दिक्कत के बाद उनसे मालूम पड़ा कि थोड़ी देर में उस कम्पनी/दुकान/शोरूम के मालिक आएंगे।इस पर मैंने कहा ठीक है और एक तरफ खड़ा होकर उनकी दुकान के बेहतरीन उत्पादों को निहारने लगा।दुकान में ग्राहकों का आना जाना लगा ही हुआ था।थोड़ी देर में दुकान में एक स्मार्ट से सरदार जी घुसे जिनसे उस दुकान के एक कर्मचारी ने मेरी तरफ इशारा करते हुए कुछ कहा और फिर वो सरदार जी मेरी तरफ को चलकर आये और उन दुकान के इस स्टाफ ने उनसे मेरा परिचय कराया और मुझको बताया कि वही उस शोरूम/कम्पनी के मालिक थे।

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