सिंदबाद ट्रैवल्स-35 जर्मनी-4 फ्रैंकफर्ट-2 Sindbad Travels-35 Germany-4 Frankfurt-2
सिंदबाद ट्रैवल्स-35
जर्मनी-4 फ्रैंकफर्ट-2
Sindbad Travels-35
Germany-4
Frankfurt-2
Frankfurt Coordinates
50.1109° N, 8.6821° E
कॉस्ट्यूम ज्वेलरी के उस विशाल शोरूम के मालिक सरदार जी से,जो लगभग पचास के आस पास की उम्र के रहे होंगे, मैंने नमस्कार की जिसका उन्होंने बड़ी ही बेरुखी से जवाब दिया और ऐसा जताया कि उनका मुझसे बात करने में कोई इंटरेस्ट नहीं था और अपना पल्ला छुड़ाने की कोशिश की मगर मैं भी तो आखिर दुबई से घाट-घाट का पानी पीते हुए यहाँ तक पहुँचा था तो मैं भी कहाँ हार मानने वाला था।मैंने सरदार जी की अनिच्छा और बेरुखी के बावजूद अपने काम के और प्रोडक्ट्स के विषय में बताते हुए अपने आने का उद्देश्य बताया।सरदार जी की टोन अब बेरुखी से आगे बढ़ते हुए शालीनता की सीमा के आखरी पड़ाव की तरफ अग्रसर सी होती दिख रही थी जबकि मैं अपने देश का वास्ता देते हुए पूरी शालीनता से अपने प्रयास में रत था और हॉं ये सारी बातचीत खड़े ही खड़े हो रही थी,सरदार जी ने पानी पूछना तो दूर मुझको बैठने की कहने की जहमत भी नहीं उठाई थी।काफी इसरार और कोशिश के बाद भी सरदार जी बिल्कुल पसीजे नहीं और अपनी बेरुखी पर ही अड़े रहे और आखिर में मुझसे बोले कि,"मुझको आपसे कोई चीज़ नहीं लेनी है,मेरा इंडिया की किसी चीज़ को यहॉं खरीदने का कोई इरादा नहीं है और इंडियन लोग व्यापार करने आ जाते हैं जबकि उनको यहाँ की कोई समझ नहीं होती है।"
अब तक एक तो मेरी समझ में आ गया था कि यहाँ बात बननी नहीं है दूसरे उनकी बेरुखी और इंडियन लोगों के प्रति तंज से मैं आहत हो गया था जिससे अब मेरे सब्र का बाँध टूट ही गया।मैंने सरदार जी से उनसे भी अधिक तीखी टोन में कहा कि," सरदार जी आपको ऑर्डर नहीं देना है तो मत दो पर ऐसे बात करने की क्या ज़रूरत है।यदि आपका यहाँ शोरूम है तो हम भी भारत में कई फैक्ट्री चला रहे हैं और जब एक्सपोर्ट कर सकते हैं तभी यहाँ जर्मनी तक चल कर आये हैं।माल लेना या नहीं लेना अलग बात है लेकिन मुझको ये बिल्कुल अच्छा नहीं लग रहा है कि आप भारतीयों के लिए कुछ भी बोलते जा रहे हैं।आप क्या समझते हैं कि भारत के लोगों में सिर्फ आपने ही कुछ अचीव किया है और कोई भारतीय कुछ कर नहीं पाया है?"
एक तो कुछ अपवाद छोड़ दें तो मैंने इस किस्म के व्यवहार का सामना अभी तक की अपनी यात्रा में किया नहीं था दूसरे एक हिंदुस्तानी का ऐसा व्यवहार मुझको बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगा था।इसलिए मेरा धैर्य भी अब साथ छोड़ चला था तो मैं तैश में आकर आगे बोलता चला गया और मैंने उनसे कहा,"सरदार जी मुझको लगता है कि यूरोप में आकर यहाँ रहकर आपका खून भी लाल से सफेद हो गया है जो आपका व्यवहार अपने देश के लोगों से ऐसी बेरुखी वाला है।" मेरा ये कहना था और सरदार जी पर जैसे मानो घड़ों पानी पड़ गया हो।वो बहुत शर्मिंदगी के साथ बोले , "जी ऐसी बात नहीं है।आप आइए, बैठिए, कुछ चाय पानी लीजिए।" इसपर मैंने कहा कि, "सरदार जी बात चाय पानी की नहीं बल्कि आपकी इस बेरुखी की है।"
सरदार जी का रुख अब बदल चुका था।बहुत सहज होते हुए उन्होंने मुझको लगभग जबरदस्ती अपने पास बैठाया और बोले,"बेटे जी,अब आप मेरे साथ मेरे घर चलो और वहीं और बातचीत करेंगे।आप प्लीज़ मेरी बात का बुरा मत मानो और मेरे घर चलो।" अब सरदार जी का बदला हुआ रुख और व्यवहार ऐसा हो चला था कि जैसे उनका किरदार ही बदल गया हो और आखिर मैं उनके साथ उनके घर को चल दिया।
सरदार जी अपनी शानदार मर्सडीज़ बैंज़ कार से अपने साथ बैठा कर मुझको अपने घर ले गए।उनका घर फ्रैंकफर्ट में ही था और बहुत ही शानदार सजावट वाला घर था।उन्होंने अपने ड्राइंगरूम में मुझको बैठाया और सबसे पहले मुझको ऑरेंज जूस पिलाया।उनका ड्राइंग रूम काफी भव्य था और उसके बढ़िया कुशन वाले लैदर की अपहोल्स्ट्री के सोफे, कमरे की सजावट,स्वरोस्की क्रिस्टल के लैम्प्स,कई देशों के सोविनियर डेकोरेटिव्स, बढ़िया कीमती पेंटिंग्स जो दीवारों पर टँगी हुई थीं वो सब उनकी सफलता की कहानी को बयान कर रही थीं।सरदार जी ने मुझसे ड्रिंक्स के लिये पूछा जिस पर मैंने उनको बताया कि मैं शराब नहीं पीता हूँ।मेरी इस बात पर वो बहुत हँसे और बोले, "भई फिर तेरा काम इधर के मुल्कों में कैसे चलेगा?" तो मैंने कहा कि, "पिस्ते बादाम खा कर और गर्म चाय,कॉफी और दूध मिले तो मैं तो उसी में खुश हूँ।"
अब हमारी बातचीत काफी सहज हो चली थी।इस बीच मेरे लिए बढ़िया कॉफी,नमकीन काजू,पिस्ते,कई किस्म के कुकीज़ तथा अन्य चीजें नाश्ते में आ चुकी थीं और साथ में गर्म पकौड़े भी जिनका जर्मनी में पाने और खाने का लुत्फ अलग ही था।सरदार जी ने मुझको सबसे पहले तो कहा कि बेटा हम खुद दिल्ली और अन्य जगहों से अपना माल बनवा कर खुद ही यहाँ के लिए एक्सपोर्ट कर लेते हैं इसलिए आपसे सामान तो हम नहीं खरीद पाएंगे।मैंने कहा उसकी कोई बात नहीं है पर आप इतनी बेरुखी क्यों दिखा रहे थे।इस पर उन्होंने कहा कि देखो बात ये है कि मैं जब लगभग 20-22 साल का था तब जर्मनी आया था और बहुत साधारण से काम करके मेहनत करते हुए आज यहाँ पहुँचा हूँ।होता क्या है कि शुरू-शुरू में भारत से और पंजाब से अक्सर कोई न कोई आजाते थे और मुझको देख कर मेरे शो रूम पर बैठ जाते,अपना सामान रख देते और कई बार तो जबरदस्ती रुक भी जाते थे।अब एकाध बार की बात हो तो कोई नहीं पर यहाँ तो हर महीने ही 2-4 किस्से ऐसे होने लगे और इससे मुझको बहुत असुविधा होती थी क्योंकि एक बहुत ही साधारण स्तर से आकर मैं अपना काम जमा रहा था।कुछ लोग पैसे भी मांगते थे।काफी लोग ऐसे होते थे जो काम और रहने की तलाश में ही जर्मनी आये हुए होते थे तो जब तक उनका कहीं हिसाब न बैठ जाये वो फिर यहीं बने रहना चाहते थे।इस किस्म की घटनाओं से आजिज़ आ कर मैंने फिर अपरिचित लोगों से किनारा करना ही बेहतर समझा।
जब सरदार जी मुझको ये सब बता रहे थे तो मुझको याद आ रहा था कि भारत में एक जमाना ऐसा था जब अंग्रेज लोग हमारे देशवासियों को बंधुआ मजदूर बना कर मजदूरी के लिए फीजी, मॉरीशस जैसे अनेकों देशों में ले जाते थे और वो लोग गिरमिटिया मजदूर कहलाते थे।मैंने अपने बाबा स्व0सुशील चंद्र चतुर्वेदी जी की डायरी में पढ़ा है कि कैसे फिरोजाबाद में फीजी से आये हिरणगऊ वाले तोताराम सनाढ्य जी से उन लोगों ने फीजी के मजदूरों की तकलीफों के किस्से सुने थे और मेरे बहनोई डॉक्टर अपूर्व चतुर्वेदी जी के बाबा स्व0 दादाजी बनारसी दास जी चतुर्वेदी पद्मभूषण एवं 2 बार के राज्य सभा सांसद ने तोताराम सनाढ्य के अनुभवों फीजी के कटु अनुभवों को बताने वाली "फीजी द्वीप में मेरे 21 वर्ष" लिखी थी।दादाजी बनारसी दास जी को इन मजदूरों की दशा देखने महात्मा गांधी जी ने फीजी भेजा भी था।बाद के वर्षों में लगभग 70 के दशक तक यूरोप के देशों खास कर इंग्लैंड जाने वाले अधिकांश भारतीय भी रोजगार की तलाश में वहाँ पहुँचते थे और बहुत ही साधारण किस्म के कामों को करके अपने जीवनयापन का संघर्ष करते थे।इस बात का एक पहलू ये भी था कि ये लोग जब भारत आते तो यहाँ के हिसाब से उस समय वो सम्पन्न दिखते थे-होते भी थे किंतु वो लोग ये नहीं चाहते थे कि उनके नाते-रिश्तेदारों तक ये बात पहुँचे कि वो यहाँ विदेश में क्या काम कर रहे हैं।अमेरिका चूंकि भारत से बहुत दूर था तो वहाँ 60 के दशक से वैज्ञानिक,इंजीनियर, डॉक्टरों का जाना अधिक रहा।लेकिन 90 का दशक आते-आते स्थितियों में परिवर्तन आने लगा था।एक तो ये लोग जो पहले विदेश गए थे इन्होंने उन देशों में अपनी मेहनत और कार्य कुशलता से अपनी पहचान बनानी शुरू कर दी थी और वहाँ के समाज में अब ये सम्मान की स्थिति में पहुँचने लगे थे।इधर 90 का दशक शुरू होते होते भारत में भी कम्प्यूटर क्रांति,टेलीकॉम क्रांति शुरू हो चुकी थी,देश की अर्थव्यवस्था खुल चुकी थी और भारत ने एक देश के रूप में वैश्विक अर्थव्यवस्था में अपनी मौजूदगी दर्ज करानी शुरू कर दी थी।आज अपने देश में NRI लोगों की जो इज़्ज़त है और सम्मान का स्थान है उसके पीछे हमारे भारत के उन पुरखों की तकलीफें, त्याग और मेहनत छुपा है और नई पीढ़ियों की मेहनत और कार्यकुशलता तो है ही।मैं ये सोच रहा था कि वर्तमान की सफलता के पीछे हमारी पुरानी पीढ़ियों के कष्ट,त्याग और मेहनत का बहुत बड़ा रोल होता है और चाहे परिवार हो,समाज हो या देश किसी को भी कभी भी यह बात भूलनी नहीं चाहिए।जो लोग,समाज या देश ये बात भूल जाते हैं और पुरानी पीढ़ियों के त्याग और मेहनत को सम्मान नहीं देते उनसे बड़ा कृतघ्न शायद ही कोई हो।
सरदार जी से काफी देर बात होती रही जिसमें उन्होंने मुझसे कहा कि मेरे प्रोडक्ट्स और मेरा जज़्बा दोनों अच्छे हैं लेकिन यूरोप के मार्केट में काम शुरू होने में थोड़ा समय लगता है। सरदार जी ने यूरोप में काम कैसे करना चाहिए इस पर भी कुछ जानकारी दी और काम की तो वो पहले ही बता चुके थे कि वो नहीं दे पाएंगे किंतु उनके पास से चलने तक हमारे बीच एक आत्मीयता पनप चुकी थी।
सरदार जी से विदा लेकर मैं बाहर निकला तो अब मेरे पास अगला पता एक व्यापारी का था जो सिल्क के स्कार्फ खरीदते थे।
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