Sindbad Travels-1

जहाज में बैठे बैठे  मैं सोच रहा था कि मैं एक बिल्कुल अनजान जगह,अनजान देशों को जा रहा हूँ।वहाँ से व्यापार करना चाह रहा हूँ लेकिन पता नहीं क्या होगा।कुछ माल बिकेगा भी कि यूँ ही खाली हाथ वापिस आना पड़ेगा।जीवन में एक नई राह की खोज में कदम तो बढ़ा दिया था अब अंजाम चाहे कुछ हो लेकिन साथ में ये बात भी मन को हौसला दे रही थी कि हिम्मत करने वालों की कभी हार नहीं होती और भगवान भी उद्यमी लोगों की मदद करते ही हैं।
जब मैं अपनी पढ़ाई करके और UPSC में अपने हाथ आजमा कर अपने घरेलू व्यापार में आया तो कुछ समय मुझको काँच के व्यापार को समझने में लगा।कुछ समय बाद मुझको ऐसा लगने लगा कि मुझको तो कुछ हटके और नया काम  करना है और मेरा मन था कि मैं Export  के व्यापार को करूं।
मेरे शहर फ़िरोज़ाबाद में तब तक export का कोई व्यापार नहीं होता था।सिर्फ एक व्यक्ति थे कृष्णा बीड्स वाले वो जरूर मोतियों के export का कारोबार करते थे किंतु उस व्यापार का मूलतः फ़िरोज़ाबाद से कुछ सीधा लेना देना नहीं था।मेरे दो मामा जी लोग निर्यात के व्यापार से जुड़े थे और इसलिए मैं बस इतना जानता था कि एक्सपोर्ट का व्यापार होता है लेकिन फ़िरोज़ाबाद से एक्सपोर्ट क्या कर सकता हूँ ये पता नहीं था।
खैर,जब ये तय हो गया कि अब तो एक्सपोर्ट के व्यापार को शुरू करना है तो उसकी तैयारी शुरू हुई।मेरे माता,पिता,पत्नी और सभी घरवालों और अन्य सभी लोगों ने मेरा खूब उत्साहवर्धन किया और तैयारी में साथ भी दिया।सबसे पहले
मैंने फ़िरोज़ाबाद में इम्पीरियल ग्लास वालों से झाड़ फानूस (Chandeliers) के फोटो और उनकी कीमतें लीं।मेरी तैयारी में उनलोगों ने बहुत सहयोग किया।फिर एक बीड्स के काम वालों से बीड्स के सैम्पिल और कीमतें लीं।उसके बाद आगरा के एक परिचित से संगमरमर और सोप स्टोन के handicrafts के सैम्पिल और कीमतें लीं, अलीगढ़ से पीतल की ढलाई के handicrafts के सैम्पिल और उनकी कीमतें लीं, फर्रुक्खाबाद से सिल्क के स्कार्फ और उनकी कीमतें लीं।बाद में इन सब चीजों का कैटलॉग बनाया।
एक्सपोर्ट के लिए फर्म बनाई जा चुकी थी।फ़िरोज़ाबाद से झाड़ फानूस के अलावा कुछ और एक्सपोर्ट कर सकते हैं ये समझ में था नहीं तो दूसरी कई जगहों से काफी सैम्पिल इकट्ठे किये जा चुके थे।
उस जमाने में नए आदमी के लिए विदेश जाने हेतु विदेशी मुद्रा का इंतज़ाम एक बहुत ही कठिन काम था।हमारी अर्थव्यवस्था का उदारीकरण का दौर अभी शुरू होने को था और रिज़र्व बैंक के नियम और सोच बहुत ही कड़े और conservative किस्म के थे।जब मुझको लगा कि इसमें तो बहुत दिक्कत आ रही है तो मैंने इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के अपने हॉस्टल सर गंगानाथ झा छात्रावास के मेरे सीनियर रहे श्री के0के0तिवारी सर से मदद मांगी।श्री तिवारी सर उस समय कानपुर में आयकर विभाग में सहायक आयुक्त के पद पर थे।उन्होंने मुझको सही तरीके से गाइड किया और रिज़र्व बैंक में भी संबंधित अधिकारी से बात करके मेरी सहायता की और अंततः मुझको मेरी जरूरत भर की विदेशी मुद्रा मिल गयी।
अब बात ये तय करने की थी कि किस किस देश को जाना है तो इसमें मेरी मदद की फ़िरोज़ाबाद के ही मेरे बड़े भाई समान श्री अखिल चतुर्वेदी जी ने  जिनका कि दिल्ली में travel & tours का व्यापार था।उन्होंने मेरी itinerary बनवाई दिल्ली से दुबई,आबूधाबी,बहरीन,दोहा(कतर),
काहिरा(Egypt),लंदन(इंग्लैंड), जिनेवा(स्विट्ज़रलैंड),पैरिस(फ्रांस) एवं
फ्रैंकफर्ट (जर्मनी) से रोम (इटली)और फिर वापिस दिल्ली।
करीब 5-6 सप्ताह का टूर बना था।अखिल भाईसाहब की गाइडेंस और मदद से सभी देशों के वीसा भी आराम से हो गए।                   
दुबई का वीसा हमारे गुरूजी स्व0 डा0वासुदेव कृष्ण चतुर्वेदी जी जो मथुरा में रहते थे, उनके रिश्तेदार दुबई में थे  उन्होंने कराया।कतर का वीसा एक संभावित व्यापारी ने दिया जिसका संपर्क मुझको सुभाष मामा से मिला था,बहरीन का वीसा मेरे इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के ही सीनियर और बड़े भाई के समान श्री रतन कपूर जी ने करवाया जो उस समय बहरीन में ही रहते थे।
अब सैम्पिल तैयार थे,पासपोर्ट था,वीसा, टिकट और पैसे भी थे मतलब लंबे सफर के लिए ये यात्री तैयार था।                       
सन 1991 के सितंबर महीने के आखिरी सप्ताह में यात्रा का दिन भी आ गया।मेरी फ्लाइट दिल्ली से दोहा (कतर) और वहाँ से प्लेन चेंज करके दोहा से दुबई की थी।कुछ इत्तेफाक ऐसा था कि जिस एयरलाइंस से मैं जा रहा था वो उस दिन दिल्ली से दुबई via दोहा ही जाती थी,खैर फिर वो समय भी आ गया।एयरपोर्ट पहुँच कर सभी घर वालों से विदा ली तो मन अजीब सा हो चला क्योंकि वो मेरी पहली विदेश यात्रा थी।घर से सभी लोग हवाई अड्डे पर विदा करने आये थे।
एक तरफ सबको छोड़ कर अकेले जाने के कारण मन कुछ अजीब सा हो रहा था तो दूसरी ओर पहली बार विदेश जाने और वो भी व्यापार शुरू करने के लिए जाने का उत्साह भी था।
चैक-इन,इम्मीग्रेशन और सिक्योरिटी चैक के बाद बोर्डिंग और फिर जहाज उड़ चला अपने गंतव्य की ओर।
जहाज में मेरे बगल की सीट पर एक अरबी व्यक्ति बैठे थे।उनसे परिचय हुआ और मालूम पड़ा कि वो आबूधाबी की सरकार में एक वरिष्ठ अधिकारी थे।दोहा पहुँचते-पहुँचते उनसे काफी घनिष्ठता होगयी और उन्होंने मुझको आबूधाबी आने पर मिलने को कहा।
दोहा के हवाई अड्डे पर पहुँच कर मुझको बड़ा अच्छा लगा क्योंकि उस जमाने में हमारी दिल्ली का अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा इतना शानदार नहीं था जैसा कि आज है।थोड़ी देर में ही मैं दुबई के जहाज में था और फिर पहुँच गया दुबई।
दुबई हवाई अड्डे पर उतर कर तो मैं चमत्कृत था।ये लगा कि किसी दूसरी दुनिया में आ गए हों।दुबई की प्रसिद्ध ड्यूटी फ्री शॉप जिसमें लग रहा था कि मानो सारी दुनिया का बाज़ार सिमट कर आ गया हो।ना जाने कितने किस्म की चीज़ें और ना जाने कितने सारे विभिन्न राष्ट्रीयता के लोग वहाँ खरीदारी कर रहे थे।मालूम होता था कि सारी दुनिया का representation वहाँ हो रखा था।
एयरपोर्ट पर वीसा के विषय में पूछने पर मालूम पड़ा कि एक तरफ सारे वीसा रखे होते हैं तो फिर उनमें से अपना वीसा खोज कर इ्मीग्रेशन पर  गया और फिर बाहर निकला।
बाहर निकलते ही शरद चतुर्वेदी जी ने,जिन्होंने मेरा वीसा करवाया था और जिनके साथ मुझको रुकना था,उन्होंने मुझको तुरंत पहचान लिया क्योंकि वो इस बीच हिंदुस्तान फोन करके पता कर चुके थे कि मैंने क्या कपड़े पहने हुए थे।
उस जमाने में मोबाइल और वीडियो कॉल्स तो होते नहीं थे तो ये ही रास्ता सबसे अच्छा था।शरद भाईसाहब बहुत ही गर्मजोशी से मुझसे मिले और फिर उनकी कार में बैठ कर हम लोग उनके घर को चल पड़े।उनके घर पर पहुँच कर शरद भाईसाहब और भाभी ने बहुत खातिर की और न जाने कितने प्रकार की चीजें खाने में थीं जिनको शरद भाईसाहब के इसरार के कारण खाना ही था।
थोड़ी ही देर में खाना आदि खाकर मैं तैयार था अपने लगभग 60-65 किलो सैम्पिलों के साथ व्यापारियों की खोज में निकलने को।शरद भाईसाहब ने मुझको बाज़ार का पता आदि बता दिया और मैं टैक्सी पकड़ कर चल पड़ा।पहले मैं बाज़ार में एक बहुत बड़े शो रूम में पहुँचा जिसमें भाँति भाँति के लैम्प्स और शैंडेलियर्स आदि थे।बहुत ही अच्छा शो रूम था।उसमें एक अरबी व्यक्ति थे उनसे मिला।जैसे ही उनको मालूम पड़ा कि मैं भारत से ये सामान बेचने आया हूँ तो उन महाशय ने मुझसे बात करने से भी मना कर दिया।उन्होंने कहा भारत के लोग सामान की क्वालिटी अच्छी नहीं देते हैं और उनको मुझसे काम नहीं करना है।मुझको बहुत ही अपमानजनक अनुभूति हुयी और निराशा भी।लेकिन वो समय ऐसा ही था भारत की व्यापार के क्षेत्र में,खास तौर से इस प्रकार की वस्तुओं के लिए,इमेज उस समय बहुत अच्छी नहीं थी।मैं खराब मन और बोझिल कदमों से वापिस टैक्सी में बैठ आगे चला।मैंने भी ठानी थी कि अब तो मैं हिम्मत नहीं हारूँगा और एक्सपोर्टर बनके ही मानूंगा।खैर फिर दो तीन जगह और निराशा मिली और उसके बाद मुझको एक और शो रूम दिखा।मैं उसमें घुसा,उसके मालिक एक भारतीय कपूर साहब थे और उनकी बातें भी शुरू में वैसी ही थीं जैसी मुझसे पहले शोरूमों के अरबी मालिकान कर चुके थे  लेकिन फिर उन्होंने मुझको बैठाया और चाय ठंडा मंगवाया।बातचीत में उन्होंने कहा कि भाई बात ये है कि अपने यहाँ से विदेश के लोग काम करने में डरते हैं।हम लोग एक तो quality conscious नहीं हैं,दूसरे बहुत से लोगों का तरीका ये है कि माल दिखाते कुछ हैं और भेजते कुछ और हैं इस से भी पूरे देश का नाम खराब होता है।मैंने उनसे कहा कि मैं पूरी ईमानदारी से काम करूंगा क्योंकि मुझको तो इस व्यापार को करना ही है।कपूर साहब ने मेरा झाड़ फानूस वाला एलबम देखा और हँसते हुए बोले भाई शैंडलियर की फोटो तो सीधी कर लो तो मैं बहुत झेंप गया क्योंकि फोटो वाकई उल्टी लगी थी।वो बोले यदि तुमको इसका ऊपर क्या हिस्सा रहेगा और नीचे कौन सा वाला यही नहीं मालूम तो इसका काम कैसे करोगे।मैंने उनको धन्यवाद भी दिया और क्षमा याचना भी की तो कपूर साहब हँस पड़े और बोले निकालो अपनी order book.मुझको तो सहसा विश्वास ही नहीं हुआ कि मैं अपने सपने को हकीकत में बदलते देख रहा था।थोड़ी देर में ही मेरे हाथ में मेरा पहला ऑर्डर था 800 डॉलर का और मेरी खुशी का पारावार नहीं था।मुझको लगा कि भगवान ने मेरी सुन ली।वो मेरे जीवन के सबसे खुशी के पलों में से एक पल था।

Comments

  1. बहुत शानदार अतुल भाई !! इतनी सरल सच्ची भाषा दिल से निकली हुई !! मुझे आशा है आपके इस ब्लॉग को पढ़ कर देश में नये एक्सपोर्टर लोगों का उत्साह वर्धन होगा !

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  2. अब आगे की कहानी सुनने की अभिलाषा है

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  3. Sandeep भाई उत्साहवर्धन हेतु धन्यवाद।कई मित्रों ने कहा तो मैंने सोचा अपने अनुभव सबसे शेयर करे जाएं।भारत के लोगों के साथ व्यापार करने से हिचकने से लेकर हम लोगों के साथ व्यापार करने को उत्सुक हों विदेशी ऐसा सफर हम लोगों के समय ने तय कराया है।1991 से जो यात्राएं शुरू हुई तो चलती ही रही है लेकिन जो खुशी इस 800 डॉलर के पहले ऑर्डर में मिली वो अलग ही थी।यदि आप सब ऐसे ही उत्साहवर्धन करते रहे तो ये ब्लॉग भी चलता रहेगा।

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  4. Dear Atul!
    You must continue sharing your such encounters, which framed-up your enriching experiences, whether you get any response or not. I'm sure it would encourage many more Atuls!
    We must talk tomorrow about an outline of its presentation.

    Wish you all the more successes!!!
    Love & regards
    Aditya Vidyasagar
    Am accessible at 9838026777

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  5. हुत ही ईमानदारी से किये गए प्रयास के प्रथम चरण को व्याख्यायित किये हैं,चाचा जी कुछ नया प्रारम्भ करने से पहले का भय,जबकि सिविल सर्विसेज जैसे सपने के पूरे न होने पर,कुछ अधिक ही आशंकित करता है।प्रेयणादायी यात्रा वृतांत।

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  6. Sir
    I belong to firozabad so I wanna meet you sir. Would you like to meet me. Firstly you can call me on my mob. No.
    8395098369

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    1. Sorry,I just saw your message.Sure,you can meet me.Pl.call and come.My number is 9897284000.regards

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