Sindbad Travels-6
काहिरा में दूसरे दिन की सुबह मेरी नींद कुछ इतनी जल्दी खुली कि कह नहीं सकता कि मैं पहले उठा या सूरज की पहली किरण।सुबह सुबह घर फोन से बात भी हो गयी थी।होटल से फोन करके मैंने हर जगह की तरह यहाँ से भी अपना होटल का फोन और कमरा नंबर बता दिया था फिर घर से फोन आ गया था।उस वक़्त मोबाइल आदि तो थे नहीं और होटल से कहीं भी फोन करना हमेशा बहुत महंगा होता है इसलिए मैं घर पर बता देता था और फिर वहाँ से वापिस फोन आ जाता था।घर से दूरी बढ़ती जा रहा थी इसका अहसास समय का फर्क यानी कि time difference भी बता देता था।दुबई और भारत में समय का फर्क 1 घंटे और 30 मिनट का था यानी कि भारत का समय डेढ़ घंटे आगे था।इसका मतलब ये हुआ कि यदि दुबई में सुबह के 7 बजे हैं तो भारत में सुबह के 8:30 बजे होंगे।दोहा-कतर और बहरीन में ये फर्क 2 घंटे और 30 मिनट का हो चला था यानी कि वहाँ यदि सुबह के 7 बजे तो भारत में सुबह के साढ़े नौ बजे थे और अब मिस्र पहुँचते पहुँचते ये फर्क 3 घंटे और 30 मिनट का हो गया था।यानी कि यदि काहिरा में सुबह के सात बजे तो दिल्ली में सुबह के 10:30 बजे होंगे।
सुबह जल्दी उठ कर स्नान-ध्यान करके मैं थोड़ी देर कमरे की खिड़की से बाहर निहारने लगा।सुबह सुबह की रोशनी में पिरैमिड झांकते हुए से बड़े अद्भुत लग रहे थे और कुछ लंबे लंबे पाम या खजूर के वृक्ष भी इस छटा को और मनोहर बना रहे थे।मैं कुर्सी पर बैठा बैठा सोच रहा था कि चलो अब at least exporter बनने की शुरुआत तो हो ही गयी है।जिन व्यापारियों ने ऑर्डर दिए थे वो मैंने एक डायरी में लिखे थे।उन लोगों ने कहा था कि वापिस पहुँच कर Proforma invoice फैक्स कर देना तो फैक्स तो मैंने लगा लिया था और वो हमारे शहर फ़िरोज़ाबाद में लगा पहला फैक्स था किंतु Proforma invoice बनाने का proper तरीका मुझको नहीं मालूम था।मुझको ये नहीं पता था कि प्रोफॉर्मा इनवॉइस में क्या क्या terms and conditions लिखी जाएंगी।दोहा के इस्माइल शेख ने मुझसे कहा था कि मैं उनको ऑर्डर का CBM भेज दूँ।मैं CBM का मतलब भी नहीं जानता था लेकिन मुझको लगा कि यदि इनसे पूछा तो इनको लगेगा कि ये कैसा एक्सपोर्टर है जो CBM भी नहीं जानता इसलिए झिझक की वजह से नहीं पूछा।
मेरे दिमाग में ये बातें चल ही रही थीं कि मेरी निगाह घड़ी पर गयी जो 8:30 बजा रही थी,नाश्ते का वक़्त हो चला था।
इस होटल और अधिकतर अच्छे होटलों में रुकने के प्लान में breakfast included होता है और इसमें बहुत सारी विभिन्न प्रकार के व्यंजन खाने हेतु उपलब्ध होते हैं।लोग सुबह खूब पेट भर के खाने नुमा नाश्ता कर के घूमने या अपने काम को निकलते हैं जिस से दिन में जल्दी और ज्यादा भूख नहीं लगे।Breakfast एक बड़े हॉल में उस से लगी बाहर खुली छत पर उपलब्ध था।सुबह सुबह नाश्ते का स्थान बहुत सुंदर था।उस छत से सामने पिरैमिडों की हल्की सी झलक दिखती थी।यहाँ की एक फोटो भी मैंने खिंचवाई थी।फोटो का मामला ऐसा हो गया कि मैं still camera अपने साथ ले गया था और दुबई से वीडियो कैमरा भी ले लिया था सो शौक में अधिकतर जगह वीडियोग्राफी ही ज्यादा करता रहा और स्टिल फोटो बहुत कम लीं।तब डिजिटल कैमरे थे नहीं और रील का मामला थोड़ा झंझट का लगता था।
काहिरा के होटल में छत से ली फोटो।इसमें पीछे बहुत हल्की सी झलक पिरैमिडों की दिख रही है।
नाश्ते में गर्म और ठंडा दोनों किस्म का बहुत अच्छा दूध था,कॉर्न फ्लैक्स, कई किस्म की ब्रेड,मक्खन,शहद और जैम के छोटे छोटे गोल ट्रांसपेरेंट पैकेट्स जैसे थे,कई किस्म के फल थे,कई किस्म के फलों के जूस और ताजे रस भी थे,सैंडविच थीं,चाय थी,कॉफी थी।इसके अलावा जो अंडा,ऑमलेट और अन्य non-vegetarian चीज़ें खाना चाहते हों उनके लिए वो थीं।बहरहाल मैंने खूब पेट भर कर नाश्ता किया और शहद के कुछ पाउच अपने पास रख भी लिए जो कि दिन भर काम आए।
अब कमरे में आकर मैं सोच ही रहा था कि होटल वालों से कह कर एक टैक्सी मँगवाई जाए जिस से दिन भर काहिरा देखूंगा कि तभी मेरे कमरे के फोन की घंटी बजी।फोन उठाने पर उधर से वही चिर परिचित खुद में बेहद परेशान और सुनने वाले को भी परेशान कर दे ऐसी उन्हीं मिस्टर मैगदी की आवाज़ थी।
Good morning Mr.Atul!
उनकी आवाज़ सुन कर मैं थोड़ा चौंक भी गया कि ये महाशय आज क्यों और कैसे?खैर मैंने उनसे कहा कि मैं लॉबी में उनसे मिलने आ रहा हूँ।उनके पास पहुँच कर मैंने उनसे यही पूछा कि मिस्टर मैगदी आप आज क्यों और कैसे?तो बेहद मनमोहक मुस्कान देने का प्रयास करते हुए मिस्टर मैगदी बोले,”आज आप काहिरा घूमेंगे ना?” मेरा जवाब था कि हाँ लेकिन आज कुछ व्यापार थोड़े ही होना है तो मिस्टर मैगदी अपनी बोली में शहद घोलते हुए बोले,”तो क्या हुआ,आज मैं आपका guide हूँ और मैं आपके लिए टैक्सी भी ले आया हूँ।”
मैंने उनको टालने का असफल प्रयास किया लेकिन उनकी रिश्तेदारी तो जौंक से निकली सो वो कहाँ पीछा छोड़ने वाले थे।अंततः मैंने अपने हथियार डाल दिये और अपने दोनों कैमरे लेकर चल दिया मैगदी साहब की लायी टैक्सी की ओर।
टैक्सी ड्राइवर एक 28-30 साल का नौजवान सा था लेकिन था वो ढीला-ढाला सा और दाढ़ी ऐसी कि जैसे 4-5 दिन से शेव न बनाई हो और सेहत ऐसी कि मानो बकरी ने अपने दूध के अलावा और कुछ पूरे जीवन में खाने पीने ना दिया हो।
जो गाड़ी टैक्सी में आयी थी वो भी माशा अल्लाह अपनी तरह की खास ही थी,बहुत पुरानी नहीं थी लेकिन उसको कतई नया भी नहीं कहा जा सकता था,खटारा कहना मिस्टर मैगदी की भावनाओं का अपमान होता और खटारा किस्म की न कहना कार का।अपने यहाँ जैसी NE118 car होती थी वैसी सी ही,left hand drive,बादामी से कलर की जिसमें कार को कहीं नज़र न लगजाए इसलिए कई खरोंचों को अपने श्रृंगार में शामिल की हुयी वो टैक्सी थी।
मिस्टर मैगदी ने मुझको इस रुतबे और शान से उस टैक्सी में बैठने को कहा कि जैसे मेरे लिए जैगुआर लेकर आये हों।मैं भी कहाँ बाज आने वाला था,मैंने मिस्टर मैगदी से कहा कि आप ये कैसी गाड़ी लाये हो तो उन्होंने मुझसे कहा कि टैक्सी में काहिरा में ऐसी ही गाड़ियां होती है।गाड़ी के सेल्फ ने एक आध बार हकला कर चलने का मन भी बना ही लिया।
मिस्टर मैगदी ने पूछा कि पहले कहाँ चलें तो मैंने जवाब दिया कि भाई मेरे गाइड तो आप हैं इसलिए आप तय करिये कि कहाँ चलेंगे।
हाँ जहाँ तक मेरा सवाल है तो मैं नील नदी देखना चाहता हूँ,पिरैमिड देखना चाहता हूँ,स्फिंक्स देखने का इरादा है और मिस्र की प्रसिद्ध ममियाँ देखना चाहता हूँ और काहिरा में जो देखने की प्रसिद्ध चीज़ हो वहाँ भी ले चलिए।
इस पर मिस्टर मैगदी ने कहा कि ठीक है सबसे पहले नील नदी के पास से होकर हम लोग पैपिरस म्यूज़ियम चलेंगे और फिर आगे।
मैंने मैगदी साहब से पूछा कि ये पैपिरस म्यूज़ियम क्या जगह है?इस पर मिस्टर मैगदी ने बताया कि मिस्र वालों ने पैपिरस यानी कि एक विशेष किस्म की लिखने योग्य शीट 3000B.C.के समय में यानी कि अबसे लगभग 5000 वर्ष पहले बना ली थी।ये विधा कागज़ का आविष्कार होने के बाद धीरे धीरे लुप्त हो गयी थी।
फिर इजिप्ट के एक वैज्ञानिक/इंजीनियर मिस्टर रगब ने इसकी फिर से खोज की और इसको बनाने और प्रदर्शित करने का संस्थान/म्यूज़ियम खोला।ये सुनकर मेरी भी उत्सुकता ऐसी जगह और ऐसी चीज़ को देखने की हो गयी और मैंने भी इसके लिए हाँ कर दी।
होटल से निकल कर हम लोग लगभग 7-8 किलोमीटर चले होंगे कि सामने दिखी विश्व की प्रसिद्ध और मिस्र की जीवन रेखा नील नदी।हाँ वही नील नदी जिसके लिए ‘हिरोडोटस’ ने कहा था कि “मिस्र ही नील है और नील ही मिस्र है।”
नील शब्द ग्रीक के ‘नीलोस’से आया है।नील संसार की सबसे लंबी नदी कही जाती है यद्यपि 2007 के बाद से कुछ लोगों के अनुसार संसार की सबसे लंबी नदी अमेज़न है।
खैर नील नदी का उद्गम अफ्रीका की प्रसिद्ध विक्टोफ़िया झील से है और ये दक्षिण से उत्तर को बहती हुई लगभग 11 देशों से होती हुई (युगांडा, इथियोपिया, बुरुंडी, सूडान आदि) उत्तर में भूमध्य सागर में मिल जाती है।
मैं ये सोचने लगा कि हमारे देश का भूगोल ऐसा है कि हमारी नदियां उत्तर से दक्षिण को बहती हैं जबकि यहाँ बिल्कुल उल्टा है मतलब कि नील नदी दक्षिण से उत्तर की तरफ बाह रही है।इसका अर्थ ये भी हुआ कि इस भूगोल का असर यहाँ वास्तु पर भी पड़ेगा और यहाँ के वास्तु के नियम और हमारे यहाँ के वास्तु के नियमों में बहुत फर्क हो जाएगा।भूगोल का ही कारण था कि जैसे हमारे देश में मुसलमान लोग पश्चिम को (पवित्र काबा की ओर)मुख कर के नमाज़ पढ़ते हैं लेकिन यहाँ के लोग मैंने पूरब की ओर (यहाँ से पवित्र काबा पूरब की ओर है)मुख करके नमाज़ पढ़ते देखे।
अच्छा अब फिर से उसी बात पर आते हैं यानी कि नील नदी और उसको इतना महान मानने के कारणों पर।मिस्र की प्राचीन सभ्यता का विकास भी नील नदी की घाटी में ही हुआ है।प्राचीन मिस्र के लोगों ने अपना कैलेंडर भी नील नदी के पानी के बाढ़ आने,पानी उतरने और सामान्य रहने के मौसम के हिसाब से ही बनाया था।नील नदी में हर साल बाढ़ आती थी और जब पानी उतरता था तो अपने साथ लायी काली कचकची मिट्टी छोड़ जाता था जो बहुत ही उपजाऊ होती थी और यहाँ के लोग उसमें खेती करके लाभ कमाते थे/जीवन यापन करते थे।
अब मेरे सामने वो विशाल नदी थी जिसकी जीवनदायिनी शक्ति के कारण उसकी घाटी में पनपी सभ्यता का 5000 साल का प्रामाणिक इतिहास है।जरा कल्पना करिए एक ऐसे क्षेत्र की जहाँ की पहचान सिर्फ रेगिस्तान से होती यदि उस क्षेत्र के बीच ये निर्मल जल से कल कल करती बहती नील नदी नहीं होती।चौड़ा पाट, शांत जल और इस सबकी सुंदरता बढ़ाती अनेक किस्म की नाव थीं वहाँ।मैं देख तो नील नदी को रहा था और मन मेरा पहुँच गया था अपनी गंगा-यमुना के पास।पूरा का पूरा दो आबे का क्षेत्र ऋणी है इन नदियों का और इसीलिए तो हम गंगा और यमुना को केवल नदी नहीं अपितु माँ का दर्जा देते हैं और उसी तरह पूजते हैं।जहाँ मैं था वहाँ देखने पर लगा कि नील नदी में बहुत पानी था और मुझे फिर अपनी जीवन दायिनी गंगा यमुना की दुर्गति याद आ गयी,याद आ गया कि दिल्ली के आगे यमुना में और कानपुर के आगे गंगा में तय करना मुश्किल है कि कितना स्वच्छ जल है और कितना नालों और औद्योगिक गंदगी से युक्त…..
हाँ नील नदी का पानी नीला नहीं लगा मुझको।
मिस्टर मैगदी ने बताया कि नील नदी पर शाम/रात को नौका विहार खूब प्रसिद्ध है(Boat cruise) इसमें मोटर बोट/नौकाओं पर खाना,पीना और मिस्र के प्रसिद्ध “बैली डांस शो” का आयोजन क्रूज़ में शामिल रहता है।
मिस्टर मैगदी ने बताया कि मिस्र में 90℅ जनसंख्या सुन्नी मुसलमानों की है और लगभग 9% ईसाई हैं।मिस्टर मैगदी भी मिस्र के अल्पसंख्यक ईसाई समुदाय से थे।उनकी बातों में कहीं न कहीं बहुसंख्यक समुदाय के प्रति कुछ कसक सी थी और मुझको फिर याद आयीं अपनी गंगा-यमुना और हमारी गंगा-जमुनी तहजीब और सुलहकुल की।खैर मन ही मन अफ्रीका महाद्वीप के कई देशों और खास तौर से इजिप्ट की जीवनदायिनी और हजारों साल से यहाँ की सभ्यताओं को पालने-पोसने वाली उस विश्वप्रसिद्ध नील नदी को मैंने प्रणाम किया और हम लोग आगे चल दिये पैपिरस म्यूज़ियम की ओर।
A very lively presentation of your trip dada. Will love to read more
ReplyDeleteThanks Ambar!!
Deleteवाह !👌 शानदार सर । सुंदर संस्मरण
ReplyDeleteधन्यवाद रानीश भाई!
DeleteBohot hi shandar
ReplyDeleteएक बार फिर से सुयोग्य और जानकारी युक्त लेखन के लिए बधाईयाँ ... कहना न होगा मेरी उत्सुकता बनी रहेगी !!
ReplyDeleteपिक्चर अभी बाकी और जारी है मेरे दोस्त।
Deleteधन्यवाद!!